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Monday, October 24, 2022

सूर्य ग्रहण


कर्मशील और  श्रमजीवी  व्यक्तियों  कोई  भी  ग्रहण  प्रभावित  नहीं  कर  सकता  है  l सतत  कर्म  में  रत व्यक्ति  को  कहा फ़ुरसत  मिल  पाती  है  कि  वह  सिर उठा  कर  सूर्य  चंद्रमा  आसमान  और  तारों  को  निहारे l यह  कार्य  उन  लोगों  का  है  जिनके  जीवन  मे  कोई  काम  नहीं  है  , मात्र  दूसरे  लोगों  की  निंदा  स्तुति  करते  रहना  उनका  कार्य  है  l देखने  वालों  को  तो  जमीन  पर  ही  सौंदर्य दिखाई  देता  है उसे  आसमान  देखने  की  आवश्यकता  नहीं  होती है l
    अकर्मण्य  और  आलसी  लोगों  को  चाहे  चंद्र  ग्रहण  हो  या सूर्य   ग्रहण  हो  या  कोई  भी  ग्रहण  न भी  हो  तो  भी  वह  दुष्प्रभावित होता  रहता  है  l उसे  सभी  प्रकार  के  ग्रह  चाहे  मंगल  हो  बुध हो  शनि  हो  या  शुक्र  हो  दुष्प्रभावित करते  रहते  है l

Sunday, April 24, 2022

मित्रता और शत्रुता

मित्र होते नही ,मित्र बनाये जाते है ।उसी प्रकार से दुश्मन होते नही ,दुश्मन पैदा किये जाते है। जितना कठिन है अच्छे मित्र बनाना। उतना ही आसान है दुश्मन तैयार करना । बुरे लोगो में जितनी जल्दी मित्रता हो जाती है । उतनी ही जल्दी वे दुश्मन भी बन जाते है अच्छे लोगो में परस्पर मित्रता बहुत कठिनाई से हो पाती है । 
         सज्जन लोगो मे मित्रता का प्रारम्भ परिचय से होता है। भली भांति परिचित होने के बाद ही वे परस्पर विश्वास कर पाते है । विश्वास सहयोग और सहयोग घनिष्ठता में कब बदल जाता है पता ही नही चलता ।  फिर भी वे एक दूसरे को मित्र बताते नही पर सभी लोगो जो उन्हें जानते है वे मित्र के रूप में ही जानते है ।
     मित्र और परिचित के बीच एक और कड़ी होती वो हितैषी के रूप में कहलाते है । कुछ लोग वास्तव में हितैषी होते है तो कुछ लोग हितैषी होने का दम्भ भरते है और मुफ्त की सलाह दे दे कर भृमित करने में निपुण होते है । 
    कहा जाता है मूर्ख मित्र से बेहतर है समझदार शत्रु का होना। यह  कहावत वर्तमान परिस्थितियों में बिल्कुल स्टीक बैठती है । क्योकि शत्रु अगर समझदार हो तो वह कितनी चोट पहुंचाना कब चोट पहुचाना सब कुछ दूरगामी दृष्टिकोण रख कर तय करता है , जबकि मूर्ख मित्र नजदीकी का लाभ उठा कर स्वयं सबसे बड़ा हितचिंतक बताते हुए अपरिमित क्षति पहुचा भी देता है और स्वीकार भी नही करता है कि उसने कितनी बड़ी गलती की है । 
      कुछ लोग दुश्मन पैदा करने की कला में इतने दक्ष होते है कि उनके पास दुश्मन पैदा करने के अनेक तरीके होते है।अकारण किसी व्यक्ति की आलोचना करना । किसी के कार्य मे अनावश्यक हस्तक्षेप करना । दूर दूर तक संबंध नही होने के बावजूद किसी व्यक्ति के चरित्र और आचरण के बारे में  टीका टिप्पणी करना , सदैव अप्रासंगिक बातो को लेकर चिंतित रहना ।इनमें से कुछ तरीके हो सकते है ऐसे लोगो का कोई दुश्मन नही होता । वे स्वयं अपने दुश्मन होते है फिर उन्हें नित्य  और निरन्तर नवीन दुश्मनो की तलाश रहती है 

Sunday, January 2, 2022

अभिमान

सौंदर्य का अभिमान महिला को चरित्रहीन और ज्ञान का अभिमान व्यक्ति को मूर्ख बनाता है । धन का अभिमान व्यक्ति को कृपण और बल का अभिमान  व्यक्ति को अत्याचारी बनाता है । पद का अभिमान अधिकारी को निकृष्ट और भ्रष्ट बनाता है और सिध्दि का अभिमान तपस्या का क्षरण करता है । 
      स्वाभिमान व्यक्ति को स्वालम्बी कर्मठ और ईमानदार बनाता है ।अभिमान समृध्दि सामर्थ्य और वैभव के पलों में पैदा होता है और जैसे ही व्यक्ति सामर्थ्य समृध्दि से विहीन होता है वह  अभिमान से शून्य हो जाता है ।अभिमान तब पैदा होता है ।अपात्र व्यक्ति को बिना परिश्रम के धन और पद की प्राप्ति होती है ।बिना तपस्या के सिध्दि की प्राप्ति होती है ।बिना गुरु के ज्ञान की प्राप्ति होती है ।
             व्यक्ति में अभिमान की तब उत्पत्ति होती है । जब अनायास ही उसे सफलता प्राप्त होती है ।   पात्रता होने पर व्यक्ति को जब धन वैभव पद सिध्दियां प्राप्त होती है ।तब वह अभिमान से शून्य होकर उनका सदुपयोग करता है । जब महिला में आंतरिक गुणों का अभाव होता है ।तब वह अपने तनिक सौंदर्य को झूठी प्रशंसा के कारण अत्यधिक मान लेती है और झूठे प्रशंसको के प्रति आकृष्ट भी हो जाती है ।
            जब व्यक्ति पद के अभिमान से ग्रस्त हो जाता है तो वह उसकी झूठी प्रशंसा करने वाले व्यक्तियों से प्रभावित हो जाता है , इसका लाभ उठाकर लोग उस व्यक्ति की क्षमता का अपने हित उपयोग करने लगते है । ऐसे व्यक्ति के समस्त निर्णय दूसरे लोगो की धारणाओं पर आधारित होते है । स्वयम का विवेक शून्य हो जाता है 
             स्वाभिमान का जनक संघर्ष और जननी विपदा है । स्वाभिमानी व्यक्ति कितने ही अभावो में घिरा हो वह अपने ईमान की कीमत पर कभी समझौता नही करता । अभिमानी व्यक्ति स्वाभिमान व्यक्ति को झुकाने के लिए सदैव प्रयत्नरत रहते है। स्वाभिमान चरित्र का निर्माता है ।वही अभिमान चारित्रिक पतन का कारक ।इसलिए अभिमानी नही स्वाभिमानी बनो

Thursday, December 23, 2021

माँ नर्मदा का भारत माता को नमन

कुदरत तरह तरह से अपने रंग और रूप बिखेरती है । कभी कभी यह अविश्वसनीय लगता है । परन्तु नदी के बीच द्वीप नुमा यह आकृति दर्शाती है कि भारत को यूं ही माता नही कहा जाता ।भारत देश जमीन का टुकड़ा नही यह  ईश का आशीष है। प्राचीन काल मे इसलिए जम्बू द्वीप कहा जाता था। चित्र में दिखाई दे रही यह संरचना मानव निर्मित नही है । यह कुदरत ने स्वयं बनाई है ।इंदौर से बॉम्बे की और जाने वाले राज मार्ग पर धार जिले की खलघाट से जब हम बड़वानी की और अग्रसर होते है तो जो नर्मदा नदी पर पूल पड़ता है ।वहा तनिक देर खड़े रह कर देखे तो हमे नदी के भीतर द्वीप नुमा यह आकृति दिखाई देती है जो ठीक भारत के नक्शे की तरह दिखती है । बारिश में कितनी ही बाढ़ आ जाये । बाढ़ में कितनी रेत बह जाये , तटो की मृदा का कितना भी क्षरण हो जाए । अन्य भोगौलिक स्थितियों में कितना भी परिवर्तन हो जाये । यह सरंचना यथावत है 

Thursday, October 21, 2021

लोक विद्या आंदोलन


विगत दिनों काशी तीर्थाटन का सौभाग्य प्राप्त हुआ । तीर्थाटन के दौरान अस्सी घाट पर एक सत्संग संडली हमे ढोल मंजीरों के साथ कीर्तन करते हुए मिली । उत्सुकता वश हम उसका लाभ लेने सत्संग हेतु बैठ गए। कुछ देर भजन सुनने के बाद जब व्याख्यान सुना तो पता चला कि यह सत्संग मंडली दूसरी मंडलियों से भिन्न थी । इसका उद्देश्य धार्मिक नही परमार्थिक सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ था । लोक विद्या और उनसे जुड़ी कार्य कुशलता को महत्व मिले इस दिशा में यह एक आंदोलन है ऐसा चर्चा के दौरान ज्ञात हुआ ।लोक विद्या के इस आंदोलन से मैं प्रभावित हुए बिना नही राह सका।
        लोक विद्या अर्थात समाज के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त वे स्वाभाविक कार्य कुशलताये जिनके लिए किसी भी संस्थागत प्रशिक्षण की आवश्यता नही रहती ।वे स्वतः व्यक्ति में या तो स्वयं विकसित होती है या परम्परा से प्राप्त होती जाती है ।किसी विश्वविद्यालय द्वारा उनकी इस कार्य कुशलता के लिए कोई प्रमाण पत्र जारी किया जाता ।
        लोक विद्या हमारे परिवेश चारो और बिखरी हुई है ।लोक विद्या के बिना छोटा हो या बड़ा हो  कोई भी  सृजनात्मक कार्य सम्पादित नही किया जा सकता । कितना भी प्रशिक्षित अभियंता हो वह कुशल मिस्त्री के बिना भवन पुल शिल्प निर्माण नही कर सकता । बाढ़ आपदाओं में नाविकों और कुशल तैराकों की आवश्यकता होती है जिनकी सहायता के बिना लोगो को राहत नही दी जा सकती ।वस्त्रो की सिलाई .आभूषणों के निर्माण , देशी जड़ी बूटियों से उपचार इत्यादि अनेक आयाम है लोक विद्या के जिनकी और किसी का ध्यान तक नही जाता ।ऐसे लोगो की प्रोत्साहित और पुरस्कृत करने की दिशा में यह आन्दोलन मुझे भीतर तक छू गया । 
https://www.facebook.com/lokvidya/videos/2969266693391494/

Thursday, May 13, 2021

कोरोना वैक्सीनैशन

          जब से कोरोना के विरुध्द वैक्सीनेशन का अभियान चला है । लोगो मे वैक्सीन लगवाने की हौड़ लग गई है । जिन लोगो को वैक्सीन के  दोनों डोज लग गये है ।उनका ही नही उनके पूरे परिवार का आत्म विश्वास चरम पर पर है । उन्हें अपने सम्पूर्ण होने का अहसास होने लगा है ।परिवार वालो का यह कहना है कि उनके परिवार में एक ऐसा व्यक्ति है जिंसको दोनों वैक्सीन लग चुके है ।यह अहसास ठीक उसी प्रकार का प्रतीत होता है ।मानो पुराने जमाने मे किसी भारतीय परिवार का कोई सदस्य विलायत में बैरिस्टर की पढ़ाई करके आया हो ।इस प्रकार  उसके पूरे परिवार को वैक्सीन न लगते हुए भी सभी सदस्यों को वैक्सीन लगने का प्रभाव महसूस किया जा सकता है 
               वैक्सीन लगवाने की हौड़ में अब तो दो प्रकार की वैक्सीनो का तुलनात्मक विश्लेषण करने वाले लोगो की भी कोई कमी नही है । जिंसको जो वैक्सीन लगी है ,वह उसी वैक्सीन का ब्रांड एम्बेसडर बन गया है । उसमे यह सामर्थ्य है कि वह दूसरी वैक्सीन के सारे दोष बता कर उसके दुष्परिणामों पर प्रकाश डाल सके । 
           जब पूरा विश्व वैक्सीनेशन के दौर से उबर चुका था । मात्र भारत जैसे देश मे शिशुओं के टीकाकरण के उपक्रम शासकीय स्तर पर किये जा रहे थे । तब  कोरोना जैसी  महामारी  टपक पड़ी और उसने छोटे बच्चों के साथ बड़ो को भी वैक्सीनैशन की कतार में लाकर खड़ा कर दिया । शुरुआती दौर में कुछ लोग कोरोना की वैक्सीन लगवाने में संकोच कर रहे थे । जब उन्हें कोई  वैक्सीन लगवाने के लिए कहता था तो वे स्वयम को बहुत अपमानित महसूस करते थे ,परन्तु बाद में जैसे कोरोना से लाशो के ढेर होना शुरू हुए ,हॉस्पिटल से शव लेने के लिए लंबी लंबी लाईने लगने लगी। श्मसान घाटो में टोकन सिस्टम से शवो के अंतिम संस्कार होने लगे ।जब उनकी आंख खुली की वैक्सीन लगवा लिया जाये , तब तक काफी दे हो चुकी थी। जब वे वैक्सीन लगवाने को पहुंचे तो कोविड टीका करण केंद्र पर पंक्ति में कोरोना संक्रमित लोग भी मिले ।  
          अब उन लोगो के बारे में विचार करे जिन लोगो ने अधूरे मन से ही सही पहला वैक्सीन लगवा लिया था। दूसरा लगवाने का मौका आया था वैक्सीन समाप्त हो चुके थे । मात्र एक वैक्सीन का डोज लेने पर उनको ऐसा लगने लगा कि वे अमृत का अधूरा प्याला ही ग्रहण कर सके । काश पूरा प्याला पी पाते इस तरह वे राहु केतु की तरह शेष प्याले नुमा वैक्सीन का दूसरा डोज लेने के लिए बेतहाशा भटक रहे है । भगवान करे उनकी यह तलाश सीघ्र पूरी हो । ऐसे में यह खबर की एक वैक्सीन कंपनी का मालिक तरह तरह धमकियों से तंग आकर देश छोड़ चुका है वैक्सीनैशन अभियान के लिए खतरनाक मौड़ ले चुका है 
       हमारे एक परिचित ने तो वैक्सीनैशन अभियान की कछुआ चाल को देख कर वैक्सीन लगवाने से बेहतर स्वयम की इम्युनिटी बूस्ट करने की रणनीति बना ली है ।उनका यह मानना है कि वैक्सीन की शरीर में काम करने की भी एक अवधि है । अवधि व्यतीत होने के बाद वैक्सीन जनक प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जावेगी इसलिए वैक्सीन लगवाने से बेहतर है इम्युनिटी बूस्ट करने के स्थाई उपायों के बारे में सोचा जाये । इसी सिलसिले में उन्होंने नाक में नींबू , तेल डालने सहित इतने विकल्पों का अविष्कार किया है कि उनके पास तद विषयक सामग्री पर्याप्त रूप से उपलब्ध है ।निकट भविष्य में वे इस विषय पर एक पुस्तक प्रकाशित करवाने के बारे में भी सोच रहे है ,परन्तु उनको कोई प्रकाशक नही मिल रहा है 
     

Tuesday, May 11, 2021

यज्ञ की महत्ता

यज्ञ वातावरण की नकारात्मकता दूर कर उसे विषाणु और जीवाणुओं से मुक्त कर दैविक शक्तियों का आव्हान करता है । जिससे महामारी सहित समस्त अनिष्टों का निवारण होता है । जब से हमारे जीवन से यह वैदिक और दैविक परम्परा समाप्त हुई । 

हमे आपदाओं और महामारियों ने घेर लिया। पहले दैनिक हवन होता था। फिर पाक्षिक हुआ , फिर हवन मासिक ,फिर साल में दो बार नवरात्रियो के समय आजकल तो कोई हवन ही नही करता। जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने है।
      उल्लेखनीय है कि विषाणु और जीवाणु सूक्ष्मजीवी होने से दिखाई नही देते । इसका मतलब यह नही है कि वे होते ही नही । उसी प्रकार से दैविक शक्तियां वातावरण में होती तो है  परन्तु दिखाई नही देती । यज्ञ और मंत्रोच्चारण के अभाव में वे निष्क्रिय रहती है । जैसे ही हम वैदिक मंत्रों उच्चारण के साथ यज्ञ करते है वे  चैतन्य और सक्रिय होकर हमारे आस पास एक अदृश्य सुरक्षा चक्र बनाती है । जो हमे उत्तम स्वास्थ्य और समृध्दि प्रदान करती है । 
      कई लोग हवन या यज्ञ से करने से इसलिए बचते रहते है कि यह एक वृहद अनुष्ठान है ।इसमें काफी व्यय होता है । लोगो की यह धारणा गलत है । नियमित या साप्ताहिक हवन में अधिक व्यय नही आता है । किसी को आमांत्रित कर भोजन कराने की आवश्यकता भी नही है । हवन या यज्ञ नितान्त आध्यात्मिक पारिवारिक कार्यक्रम है । इसके माध्यम से विष्णु शिव ब्रह्मा ही नही इंद्र वरुण अग्नि सहित समस्त देवता आमांत्रित होते है और आहुतियों के माध्यम से हविष्य प्राप्त करते है