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Saturday, September 5, 2026

किओटी जल प्रपात रीवा

रीवा से लगभग 35 किलोमीटर दूर, विंध्याचल की कैमूर पहाड़ियों और रीवा पठार के उत्तरी छोर पर स्थित केवटी केवल एक जलप्रपात नहीं है — यह विंध्य की वह तपोभूमि है जहाँ जल की गर्जना में मंत्रोच्चार सुनाई देता है, और चट्टानों की मौनता में ऋषियों की साधना का स्पंदन अनुभव होता है।
केवटी का सच्चा परिचय किसी एक आयाम में नहीं बँधता। यहाँ —
• जल की कलकल में भूगोल का विज्ञान है, • किले की दीवारों में क्षात्र-धर्म का स्वाभिमान है, • घाटी की निस्तब्धता में आत्मा की पुकार है। 
केवटी सचमुच त्रिवेणी तीर्थ है — जहाँ प्रकृति नेत्रों को तृप्त करती है, इतिहास हृदय में गर्व जगाता है, और अध्यात्म आत्मा को शांति देता है। एक बार जो इस विपरीत फुहार में भीगता है, वह विंध्य की इस अमर गाथा को जीवन भर नहीं भूलता।
भौगोलिक स्वरूप : प्रकृति का चमत्कार
केवटी झरना महाना नदी पर बनता है, जो टोंस (तमसा) नदी की सहायक नदी है। रीवा पठार से बहती यह नदी जब पठार के किनारे पहुँचती है, तो लगभग 98 से 130 मीटर की ऊँचाई से सीधे नीचे गिरती है — भारत का 24वाँ सबसे ऊँचा जलप्रपात। भूवैज्ञानिक दृष्टि से यह 'निक पॉइंट' (Knick Point) का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ नदी के कायाकल्प से ढलान में आकस्मिक तीव्र परिवर्तन आया और इस भव्य प्रपात का जन्म हुआ।
ऐतिहासिक गौरव
घाटी के दाहिने छोर पर, समुद्र तल से लगभग 280 मीटर ऊँची चट्टानों पर स्थित केवटी किला लगभग 1500 ईस्वी में बघेल राजपूत राजा परमाल देव द्वारा बनवाया गया था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारी ठाकुर रणमत सिंह ने इसी किले से अंग्रेज सेना को परास्त किया था — यह किला आज भी उस शौर्य का मूक साक्षी है।
आध्यात्मिक ऊर्जा : विंध्य की तपोभूमि
विंध्याचल का महात्म्य : भारतीय शास्त्रों में विंध्य पर्वत केवल पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि शक्ति का प्रतीक है। विंध्यवासिनी देवी का क्षेत्र, नर्मदा-गंगा के बीच का यह भूभाग, अनादि काल से ऋषि-मुनियों की तपस्थली रहा है। केवटी की वह गहरी घाटी, जहाँ मानव कोलाहल नहीं पहुँचता, सहज ही ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त वातावरण रचती है। यहाँ की निस्तब्धता में एक विशेष प्रकार की प्राण-ऊर्जा अनुभव होती है — मानो पर्वत स्वयं समाधि में लीन हो।

जल का आध्यात्मिक स्वरूप : भारतीय दर्शन में जल केवल पदार्थ नहीं, 'आपः' देवता है — शुद्धि, जीवन और चेतना का स्रोत। केवटी का वह जल जो सैकड़ों फीट ऊपर से गिरकर धुंध और इंद्रधनुष रचता है, स्थानीय जनमानस में आकाशगंगा के अवतरण जैसा पवित्र माना जाता है। प्रपात से उठती विपरीत फुहार (Reverse Spray) को लोग प्रकृति का अभिषेक मानते हैं — जैसे धरती स्वयं शिव का जलाभिषेक कर रही हो। मानसून में जब पूरी घाटी जल-नाद से गूँजती है, तो वह नाद 'ॐ' की अनहद ध्वनि जैसा प्रतीत होता है।

तमसा नदी का पौराणिक संबंध : महाना नदी जिस टोंस (तमसा) में मिलती है, वह वही तमसा है जिसके तट पर महर्षि वाल्मीकि का आश्रम माना जाता है और जहाँ से रामायण की कथा का सूत्रपात हुआ। इस कारण इस समूचे जल-तंत्र को स्थानीय श्रद्धालु पुण्य-सलिला मानते हैं।
धार्मिक विशेषता और लोक आस्था
किले में देवालय : केवटी किले के भग्नावशेषों के बीच आज भी छोटे-छोटे शिवालय और देवी-स्थान विद्यमान हैं, जहाँ स्थानीय ग्रामीण विशेषकर सावन और नवरात्रि में पूजा-अर्चना करते हैं। किले के बुर्जों से झरने की ओर मुख करके की गई प्रार्थना को विशेष फलदायी माना जाता है — मानो प्रकृति स्वयं साक्षी हो।

प्रकृति-पूजा की परंपरा : आदिवासी और ग्रामीण समुदायों में केवटी घाटी के वृक्षों, जल-स्रोतों और चट्टानों की पूजा की परंपरा रही है। दीपावली के बाद और मकर संक्रांति के समय यहाँ मेले जैसा वातावरण बनता है, जहाँ लोग झरने के जल को चरणामृत की भाँति माथे से लगाते हैं।

सूर्योदय-सूर्यास्त का दार्शनिक क्षण : किले के झरोखों से जब उगते या डूबते सूर्य की किरणें जल-धुंध पर पड़ती हैं और सप्तरंगी इंद्रधनुष बनता है, तो वह दृश्य केवल सुंदर नहीं — आध्यात्मिक अनुभूति है। अनेक साधक और कवि यहाँ आकर घंटों मौन बैठते हैं; कहते हैं, केवटी का सान्निध्य मन के विकारों को धो देता है।
प्राकृतिक सौंदर्य
मानसून (जुलाई-सितंबर) में केवटी अपने पूर्ण वैभव पर होता है — घने हरे वन, गर्जना करता जल, घाटी में तैरती धुंध। विपरीत फुहार से बना इंद्रधनुष और किले से दिखता विहंगम दृश्य पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
उपसंहार : त्रिवेणी तीर्थ
केवटी का सच्चा परिचय तीन धाराओं से बनता है — प्रकृति का सौंदर्य, इतिहास का शौर्य और अध्यात्म की शांति। यहाँ जलप्रपात की गर्जना में शक्ति का उद्घोष है, किले की चट्टानों में क्षात्र-धर्म की गाथा है, और घाटी की निस्तब्धता में आत्मा की पुकार है। जो भी श्रद्धा और संवेदना लेकर केवटी आता है, वह केवल दृश्य नहीं देखता — वह विंध्य की चेतना का स्पर्श करके लौटता है।

Monday, July 20, 2026

तितलियां


 जिस प्रकार  से  हमारी  भावनाए  हमारी  संवेदनाओं  की प्रतीक होती  है  उसी  प्रकार  से नभ  में उड़ते  पंछी गण से नदी  एवं सरोवर  में  बहती  मछलियां से  उद्यान  में  उड़ती  तितलियों  से  प्रकृति  की  संवेदनाएं  प्रकट होती  है परिलक्षित होती  है      
             तितलियां  बगीचों  की  शोभा  है  l सौंदर्य  की  चेतना  है l जिस  प्रकार  गुणों  का  पारखी  न  हो  तो  गुणों  का  कोई  मूल्य  नहीं  है  उसी  प्रकार  तितलियां  और  भ्रमर  न  हो  तो  फूलों  के  सौन्दर्य और  सौरभ कोई  मूल्य  नहीं  है  l फूलों  का  सौरभ  कभी  भी  शहद  नहीं  पायेगा 
              
          फूलों  के  जितने  रंग  होते  हैं  तितलियां  भी  उतनी  ही  रंग  बिरंगी  होती  है  l कब  लार्वा  से  प्यूपा और  प्यूपा से  तितली  बन  जाये  पता  ही  नहीं  चलता l 
               तितलियां  अल्पजीवी  होती  है l वह  जीवन  की  क्षण  भंगुरता  की  निरन्तर याद दिलाती  है  l  तितली  की  कोमल काया  जब  किसी  फूल  की  कोमल  पंखुड़ियों  से  टकराती  है  तो  आह  नहीं  होती  उसका  सुखद  स्पर्श  फूल  पाकर  अधिक  प्रफुल्लित  और  सुरभित  हो  उठता  है.                
            तितली का  चंचल   और  अल्हड  स्वभाव देख कर यह  मन  भी   तितली  होना  चाहता  है l तितलियों  में  यह  क्षमता  होती  है  कि  फूल  पत्तों  डालियों  में  स्वयं को  छुपा  ले  l  
     तितलियां उद्यान की प्रमुख शोभा होती है l जिस उद्यान में तितलियां दिखाई देती है वह इस तथ्य को दर्शाता है कि वहां रासायनिक उर्वरकों का और कीटनाशकों का उपयोग नहीं किया गया होगा l 
    तितलियां हमारे पर्यावरण की संकेतक है l जो यह संकेत देती है l प्रकृति में मानव का हस्तक्षेप नियंत्रित है l प्रकृति ने अपनी मौलिकता को बचाए रखा है l
         तितली का  जीवन  अनुपम  है  अद्भुत  है  तितली  बिना  शोर गुल  निकल  जाती  है  और  बिना  शोर  गुल  किए  आ  जाती  है l तितलियों  के  इस  मौन  ने  कुछ  कहा  है l तितलियों  ने  कभी  घनघोर  बारिश  और  कभी  कड़ी  सर्दी  को  सहा है l 
         ये  सच  है  कि  बारिश  में  तितलियां  अधिक  दिखाई  देती  है  l परंतु  हर  मौसम  में  एक  अलग  प्रजाति  की  तितली  होती  है l तितली  ने  नीरस  वातावरण  को  सरस बनाया  है l तितलियों के  मौन  को  कौन  सुन  पाया  है 
         हम भले ही तितलियों के उद्यान बना ले l लेकिन अधिक मानवीय हस्तक्षेप उनके अनुकूल नहीं होने से वे अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाएगी    
             
             

Saturday, May 2, 2026

खेल के बहु आयामी प्रभाव


इलेक्ट्रॉनिक  संचार  एवं  कंप्युटर  युग  में  एक  ही  स्थान  पर  बैठकर  दृश्य  श्रव्य  माध्यम से  मनोरंजन  किया  जा सकता  है  l व्यायाम  के  माध्यम  से  तन  को  पुष्ट  और  बल  दिया  जा सकता  है l प्रात  एवं  सायंकाल  भ्रमण  कर  शरीर  को  सक्रिय  किया  जा सकता  है .परंतु  खेल  ही वह
माध्यम  है  जिससे  तन  को  स्वस्थ रखने  के  साथ  साथ  मन  को  भी  उल्लास  दिया  सकता  है 
       व्यक्ति  बच्चा  बूढ़ा  हो  या  जवान  शौक  हर  व्यक्ति  के  होते  है l शौक  मे  किये  जाने  वाले  कार्य में  थकान  अनुभव  नहीं  होती l व्यक्ति  का  व्यक्तित्व  यह  बताता  है  कि  उसका  कौन  से  खेल  से  जुडाव  है l जीवन  के  उसका  दृष्टिकोण  उसका  कैसा  है  l 
       खेल  से  व्यक्ति  के  व्यक्तित्व  का  निर्माण  होता  है  l खिलाड़ी  व्यक्ति  जीवन  की  चुनौतियों  को  सहज ही  स्वीकार  कर  लेता  है  l अपवादीत परिस्थितियों  को  छोड़ कर  खिलाड़ी  अवसाद  से  ग्रस्त  नहीं  होता l वह  व्यसन  विहीन  होता  है  l
         जो  लोग  यह  कहते  है  कि  शारीरिक   व्याधियों  के  कारण वे  कोई  खेल  गतिविधि  नहीं  कर  पाते  उन्हें  दिन  में  एक  बार  उस  खेल  के  मैदान  में  अवश्य  जाना चाहिए  जहां  प्रत्येक  आयु  वर्ग  व्यक्ति  भिन्न  भिन्न  प्रकार  की  खेल  गतिविधियों  में  संलग्न  हो l 
   एक  बीमार  व्यक्ति  भी  खेलते  हुए  बच्चों  देख कर  स्वस्थ  हो  सकता  है  l खेल  से  जुड़े  व्यक्ति  की  मानसिकता  योद्धा  के  समान  हो  जाती  है l वह  बार  बार  हारता  पर  हार  स्वीकार  नहीं  करता l  खेल  वह भावना है  जो  जीवन  के  प्रत्येक  क्षैत्र  उपयोगी  साबित  होती  है खेल  गीता  के  कर्मयोग  के  व्यवहारिक  प्रयोग  है   इसलिए  जहा हो  सके  किसी  खेल  से  जुड़े l 

Tuesday, April 14, 2026

भाव और भावनाए


भाव  और  भावनाए  व्यक्ति  की  आंतरिक  चेतना  है  |
किसी  व्यक्ति  के  भाव  और  भावनाओं  का  स्तर  कम  या  अधिक  हो  सकता  है,  परंतु  यह  सम्भव  नहीं  है  कोई  व्यक्ति  पूर्ण  रूपेण  भावना  विहीन  हो  |
       भावनाओं  को  किसी  व्यक्ति  के  व्यवहार  चेहरे  की  भाव  भंगिमा  से  जाना जा सकता  है | चालाक  और  धूर्त  लोग  की  भावनाए  न  तो  चेहरे  जानी  जा सकती  है  और  नहीं  शब्दों  से  उनके  भीतर  कुछ  और  चल  रहा  होता  है  बताया  जा  सकता  है कहा  कुछ  जाता  है किया  कुछ और    जाता  है  वे  अभिनय  कौशल  मे  पारंगत  होते  है | 
      सहज , सरल ,सच्चे  और  भोले  व्यक्तियों  को  अपनी  भावनाए  छुपाना  नहीं  आती  है | उनके  भावों  उनके  चेहरे  और  शब्दों  से  पकड़ा  जा सकता  है  | ऐसे  व्यक्तियों  के  जीवन  को  खुली  किताब  कहते  है | पारदर्शिता  होने  से  उनके  पास  छुपाने  के  लिए  कुछ  नहीं  होता  है  | इस  पारदर्शिता  उन्हें  नुकसान  भी  उठाना  पड़ता  है |
     कभी कभी व्यक्ति  हृदय  विदारक  घटनाओं  के  आघात कुछ  समय  के  लिये  भाव  शून्य  हो  जाता  है l उसे  संसारिक  संबंधों  से  विश्वास  उठ  जाता  है  | किसी  भी  विषय  में  रुचि  नहीं  रहती  | कुछ  समय  के  लिए  वैराग्य  की  भावना को  श्मशान  वैराग्य  कहा जाता  है |
     कुछ  लोग  थोड़ी  सी  खुशी  मिलने  अत्यधिक  प्रसन्न थोड़ा  सा  दुख  मिलने  पर  अत्यधिक  दुखी  ,थोड़ी  सी  परेशानी  मिलने  पर  अत्यधिक  विचलित  , थोड़ा  सा  धन  मिलने  पर  अत्यधिक  व्यय  करने  वाले  , थोड़ा  से  अभाव  में  दीनहीन  हो  जाते है  l ऐसे  भावुक  व्यक्तियों  से भरोसे  कोई  भी  बड़ा  लक्ष्य  न  परिवार  हासिल  कर सकता  है   और  न  कोई  संस्था  या  समाज  भरोसे  रह  सकता  है |
     भावनाओं  पर  नियंत्रण  रखना  हर  किसी  के  लिए  सम्भव  भी  नहीं  है | बड़ी  योजनाओं  के  क्रियान्वयन  के  लिए  भावनाओं  को  परे  रख  कर  स्थिर  चित्त  से  विचार  किया  जाना  आवश्यक होता  है  | भावनाओं  में  बह  कर  लिये  गये  निर्णय  व्यक्ति  परिवार  समाज और  देश  के  लिये  घातक  होते  है  |
    समुचित  और  संतुलित  भावनाये  व्यक्ति  को  सम्वेदनशील  बनाती  है  | भावनाए  समाज, राष्ट्र  ,संस्कृति,  साहित्य,  संगीत, कला ,नृत्य, खेल  ,पर्यावरण, से  जुड़ जाती  है  तो वे सार्थक  हो  जाती  है  | भावनाए  स्वयं से  जुड़  जाती  है  तो  व्यक्ति  स्वार्थी  हो  जाता  है  | भावनाओं  का  विस्तार  है  व्यक्तित्व  का  विस्तार  है 

Wednesday, March 25, 2026

आत्म सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा

आत्मसम्मान  प्रत्येक व्यक्ति का होता है l व्यक्ति का जब आत्म सम्मान आहत होता है तो वह गहन निराशा से ग्रस्त हो जाता है  l व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक हैसियत से उस व्यक्ति के आत्मसम्मान के स्तर का अनुमान नहीं लगाया जा सकता l बल्कि यह भी संभव है कि किसी गरीब व्यक्ति का किसी धनाढ्य व्यक्ति से अधिक आत्म सम्मान हो l 
   परजीवी परावलंबी और नैतिक दृष्टि से पतित और भ्रष्ट व्यक्ति में आत्मसम्मान का अभाव होता है  l आत्मसम्मान से  परिपूर्ण व्यक्ति स्वालंबन का राही होता है l आत्मसम्मान से युक्त व्यक्ति अल्प साधनों में जीवनयापन करने वाला होकर  मितव्ययी होता है l  
   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति आत्मसम्मान से परिपूर्ण हो यह आवश्यक नहीं l व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बाह्य आवरण है l बाह्य आवरण छद्म भी हो सकता है l आत्म सम्मान का संबंध व्यक्ति के भीतर स्थित आत्म भावना से होता है l इसलिए ऐसा कहते है कि व्यक्ति दूसरों की नजर से गिर जाए पर खुद की नजर से नहीं गिरना चाहिए l 
      जब व्यक्ति खुद की नजर से गिर जाता है तो  वह आत्मविश्वास से विहीन हो जाता है l ऐसा व्यक्ति बाहर से स्वयं को कितना भी धार्मिक तथा आदर्शवादी बताता हो वह भीतर से कमजोर मानसिकता वाला होता है उसमें आत्मबल नहीं होता l विपरीत परिस्थितियों में वह भीतर से टूट जाता है l इसलिए यह देखने में आता है तथाकथित कई प्रतिष्ठित लोग आत्म हत्या कर लेते है l

Tuesday, March 10, 2026

नेत्रदान


मानव जीवन में दान आध्यात्मिक के महत्व के साथ सामाजिक महत्व भी है l दान की महिमा का हमारे ग्रंथों में महिमा बताई गई है
 ऋग्वेद के मण्डल 5, सूक्त 39, मंत्र 3 में कहा गया है 

यस्ते दद्वाॅँ इन्द्र यस्ते अस्ति दाता राधांसी शुभती।

अस्मभ्यं तत् त्वावतः स्तोतॄभ्यो रास्व सत्पते॥

दान के अनेक प्रकार होते है धन दान अन्न दान रक्त दान शिक्षा दान , अभय दान, जीवन दान  इत्यादि , परन्तु दान तभी सार्थक होता है जबकि वह सुपात्र व्यक्ति को दिया गया हो l जिज्ञासु व्यक्ति की दिया शिक्षा और ज्ञान का दान व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र का भी हित करता है l दरिद्र और दुर्बल व्यक्ति को दिया गया धन का दान उसकी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है l जबकि विद्वान शिक्षक और गुरु को दिया गया गया धन का दान समाज को ज्ञान की दृष्टि समर्थ बनाता है l कभी कभी कितना भी धन हो व्यक्ति के पास अन्न की उपलब्धता नहीं होती प्रकृति विचरते कई जीव पशु पक्षी आहार न मिलने के कारण प्राण त्याग देते है l ऐसे समय अन्न दान का महत्व अत्यधिक होता है l परंतु शारीरिक और मानसिक रूप से समर्थ होने के बावजूद जो लोग भीख मांगने हेतु घूमते रहते है , उनको दिया गया कोई भी दान हानिकारक होता है l ऐसा दान व्यक्तियों में परजीवी प्रकृति और आलस्य को बढ़ावा देने के साथ व्यसनों की वृद्धि का भी कारण होता है l 

    परिस्थितियों से सताये गए और हमारी शरण में आए व्यक्तिऔर  समाज को स्वीकार कर उनके  पुनर्वास कराना भी एक प्रकार का दान है l पराजित पक्ष को उनका राज्य लौटा देना  , कुछ शर्तों के साथ उन्हें जीवन दान देना , पुराना गौरव लौटा देना अभय दान  कहलाता है जो प्राचीन काल में हमारे देश के पराक्रमी राजाओं में किया है l 

 सबसे महत्वपूर्ण  है जीवन दान l  वर्तमान समय में सड़क  दुर्घटनाओं में घायलों की संख्या को देखते हुए  तथा रक्त की अल्पता के कारण प्रसूता स्त्रियों की मृत्यु देखते हुए रक्त दान को जीवन दान कहा जाता है लेकिन हमारे समाज में ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं है जो या तो जन्मे नेत्रहीन है या बाद में किन्हीं कारणों से नैत्र ज्योति खो चुके है l ऐसे व्यक्तियों के लिए इस दुनिया का सौंदर्य व्यर्थ है l वे जीवन में अंधकार होने से दृश्य अनुभूतियों से वंचित रह जाते है l  जीवन के सामान्य काम काज करने में भी कठिनाई महसूस करते है बिना किसी व्यक्ति के सहयोग के न तो घर से निकल पाते है और नहीं वांछित स्थान पर जा सकते है l   अर्थ के इस युग में वे जीवनयापन हेतु योग्य होने के बावजूद आजीविका भी अर्जित नहीं कर पाते है नेत्र दान ऐसे व्यक्तियों को जीवन में प्रकाश उपलब्ध कराता है , आर्थिक स्वालंबन प्रदान करता है   जीवन के आनन्द की अनुभूतियां प्रदान करता है l 

 इस संसार में बहुत से ऐसे लोग है l जो जीवन की आयु पूर्ण कर चुके है  और उनके नेत्र स्वस्थ है  l ऐसे भी लोग है जो अकाल मृत्य को प्राप्त कर चुके परंतु नेत्र स्वाभाविक अवस्था में है ऐसे लोगों में कुछ नेत्र दान कर देते है तो नेत्र हीन व्यक्तियों के जीवन में नई उम्मीद किरण जाग सकती है और वे अपना स्वाभाविक जीवन जी सकते है l ऐसे नेत्र दानी आत्माओं को परमपिता परमात्मा का प्रकाश लोक प्राप्त होता है क्योंकि उन्हें किसी व्यक्ति का जीवन प्रकाशित किया है वास्तव में ऐसे व्यक्ति प्रकाश होते है l 

Saturday, January 10, 2026

समीक्षा- भारतीय कला के बहुआयाम


अद्विविक पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक भारतीय कला के बहु आयाम कला वैदिक काल से लगाकर जैन एवं बौद्ध युग के दौरान शिल्प सृजन भित्ति चित्रों लघु चित्रों और उनके पीछे छुपे जीवन और अध्यात्म दर्शन को स्पष्ट करती है l प्राचीन वैदिक ग्रंथों में कलाओं के बारे में संदर्भ देती है l भाषा की सहजता सरलता इस पुस्तक के अध्यायों की विशेषता है l 
       संगीत को छोड़ कर यह पुस्तक कला के विविध आयाम पर प्रकाश डालती है इस पुस्तक को पढ़ते पढ़ते निरंतर नवीनता का अहसास होता है ऊर्जा और उत्साह मिलता है 
      कला मर्मज्ञ आनंद कुमार स्वामी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित एक अध्याय हमें यह बताता है कि किस प्रकार एक भू गर्भ शास्त्री कलात्मक रुचि के कारण देशों और संस्कृतियों की सीमाओं से परे जाकर  सागर जैसा विस्तीर्ण शोध कार्य करता है  l
        महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के बारे में इस पुस्तक में समिल्लित आलेख उपनिवेश कालीन स्थितियों में  अभावों के बीच पनपती प्रतिभा का विस्तार से परिचय कराता है l सचमुच में इस पुस्तक को पढ़ने से पहले राजा रवि वर्मा और उनके भारतीय चित्रकला के प्रति योगदान के प्रति और उनकी आध्यात्मिक रुझान को जाना ही नहीं था l
   इस पुस्तक में पुरातत्वविद डॉ वाकणकर के पुरातात्विक शोध और उनके व्यक्तित्व को उल्लेखित किया है साथ ही काला के प्रति  गांधीवादी बोध को रेखांकित किया है l
     निश्चय ही यह पुस्तक कला ए बहुआयामी पक्ष की सूक्ष्मताओं को विभिन्न भारतीय रियासतों में बिखरी शैलियों से परिचित कराती है l