यस्ते दद्वाॅँ इन्द्र यस्ते अस्ति दाता राधांसी शुभती।
अस्मभ्यं तत् त्वावतः स्तोतॄभ्यो रास्व सत्पते॥
दान के अनेक प्रकार होते है धन दान अन्न दान रक्त दान शिक्षा दान , अभय दान, जीवन दान इत्यादि , परन्तु दान तभी सार्थक होता है जबकि वह सुपात्र व्यक्ति को दिया गया हो l जिज्ञासु व्यक्ति की दिया शिक्षा और ज्ञान का दान व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र का भी हित करता है l दरिद्र और दुर्बल व्यक्ति को दिया गया धन का दान उसकी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है l जबकि विद्वान शिक्षक और गुरु को दिया गया गया धन का दान समाज को ज्ञान की दृष्टि समर्थ बनाता है l कभी कभी कितना भी धन हो व्यक्ति के पास अन्न की उपलब्धता नहीं होती प्रकृति विचरते कई जीव पशु पक्षी आहार न मिलने के कारण प्राण त्याग देते है l ऐसे समय अन्न दान का महत्व अत्यधिक होता है l परंतु शारीरिक और मानसिक रूप से समर्थ होने के बावजूद जो लोग भीख मांगने हेतु घूमते रहते है , उनको दिया गया कोई भी दान हानिकारक होता है l ऐसा दान व्यक्तियों में परजीवी प्रकृति और आलस्य को बढ़ावा देने के साथ व्यसनों की वृद्धि का भी कारण होता है l
परिस्थितियों से सताये गए और हमारी शरण में आए व्यक्तिऔर समाज को स्वीकार कर उनके पुनर्वास कराना भी एक प्रकार का दान है l पराजित पक्ष को उनका राज्य लौटा देना , कुछ शर्तों के साथ उन्हें जीवन दान देना , पुराना गौरव लौटा देना अभय दान कहलाता है जो प्राचीन काल में हमारे देश के पराक्रमी राजाओं में किया है l
सबसे महत्वपूर्ण है जीवन दान l वर्तमान समय में सड़क दुर्घटनाओं में घायलों की संख्या को देखते हुए तथा रक्त की अल्पता के कारण प्रसूता स्त्रियों की मृत्यु देखते हुए रक्त दान को जीवन दान कहा जाता है लेकिन हमारे समाज में ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं है जो या तो जन्मे नेत्रहीन है या बाद में किन्हीं कारणों से नैत्र ज्योति खो चुके है l ऐसे व्यक्तियों के लिए इस दुनिया का सौंदर्य व्यर्थ है l वे जीवन में अंधकार होने से दृश्य अनुभूतियों से वंचित रह जाते है l जीवन के सामान्य काम काज करने में भी कठिनाई महसूस करते है बिना किसी व्यक्ति के सहयोग के न तो घर से निकल पाते है और नहीं वांछित स्थान पर जा सकते है l अर्थ के इस युग में वे जीवनयापन हेतु योग्य होने के बावजूद आजीविका भी अर्जित नहीं कर पाते है नेत्र दान ऐसे व्यक्तियों को जीवन में प्रकाश उपलब्ध कराता है , आर्थिक स्वालंबन प्रदान करता है जीवन के आनन्द की अनुभूतियां प्रदान करता है l
इस संसार में बहुत से ऐसे लोग है l जो जीवन की आयु पूर्ण कर चुके है और उनके नेत्र स्वस्थ है l ऐसे भी लोग है जो अकाल मृत्य को प्राप्त कर चुके परंतु नेत्र स्वाभाविक अवस्था में है ऐसे लोगों में कुछ नेत्र दान कर देते है तो नेत्र हीन व्यक्तियों के जीवन में नई उम्मीद किरण जाग सकती है और वे अपना स्वाभाविक जीवन जी सकते है l ऐसे नेत्र दानी आत्माओं को परमपिता परमात्मा का प्रकाश लोक प्राप्त होता है क्योंकि उन्हें किसी व्यक्ति का जीवन प्रकाशित किया है वास्तव में ऐसे व्यक्ति प्रकाश होते है l
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Tuesday, March 10, 2026
नेत्रदान
मानव जीवन में दान आध्यात्मिक के महत्व के साथ सामाजिक महत्व भी है l दान की महिमा का हमारे ग्रंथों में महिमा बताई गई है
ऋग्वेद के मण्डल 5, सूक्त 39, मंत्र 3 में कहा गया है
Saturday, January 10, 2026
समीक्षा- भारतीय कला के बहुआयाम
अद्विविक पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक भारतीय कला के बहु आयाम कला वैदिक काल से लगाकर जैन एवं बौद्ध युग के दौरान शिल्प सृजन भित्ति चित्रों लघु चित्रों और उनके पीछे छुपे जीवन और अध्यात्म दर्शन को स्पष्ट करती है l प्राचीन वैदिक ग्रंथों में कलाओं के बारे में संदर्भ देती है l भाषा की सहजता सरलता इस पुस्तक के अध्यायों की विशेषता है l
संगीत को छोड़ कर यह पुस्तक कला के विविध आयाम पर प्रकाश डालती है इस पुस्तक को पढ़ते पढ़ते निरंतर नवीनता का अहसास होता है ऊर्जा और उत्साह मिलता है
कला मर्मज्ञ आनंद कुमार स्वामी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित एक अध्याय हमें यह बताता है कि किस प्रकार एक भू गर्भ शास्त्री कलात्मक रुचि के कारण देशों और संस्कृतियों की सीमाओं से परे जाकर सागर जैसा विस्तीर्ण शोध कार्य करता है l
महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के बारे में इस पुस्तक में समिल्लित आलेख उपनिवेश कालीन स्थितियों में अभावों के बीच पनपती प्रतिभा का विस्तार से परिचय कराता है l सचमुच में इस पुस्तक को पढ़ने से पहले राजा रवि वर्मा और उनके भारतीय चित्रकला के प्रति योगदान के प्रति और उनकी आध्यात्मिक रुझान को जाना ही नहीं था l
इस पुस्तक में पुरातत्वविद डॉ वाकणकर के पुरातात्विक शोध और उनके व्यक्तित्व को उल्लेखित किया है साथ ही काला के प्रति गांधीवादी बोध को रेखांकित किया है l
निश्चय ही यह पुस्तक कला ए बहुआयामी पक्ष की सूक्ष्मताओं को विभिन्न भारतीय रियासतों में बिखरी शैलियों से परिचित कराती है l
Thursday, April 24, 2025
कर्तव्य
जो व्यक्ति समूह या समाज निरंतर अपने अधिकारों की मांग करता रहता है और कर्तव्यों को भूल जाता अथवा उनकी उपेक्षा कर देता है l वह व्यक्ति समूह या समाज स्वत:अपने अधिकारों को खो देता है l जबकि जो व्यक्ति समूह या समाज अपने कर्तव्यों का निरंतर पालन करने को तत्पर रहता है और समय समय पर उन्हें अपने करता रहता है ,वह व्यक्ति समूह या समाज अपने अधिकार स्वत:प्राप्त कर लेता है l
हमारे समाज कई व्यक्ति समूह या समाज अपने अधिकारों की निरंतर मांग करते रहते है अपने कर्तव्यों की और बिल्कुल ध्यान नहीं देते है l वे अपने कृत्यों से स्वयं ही अपना बहुत बड़ा नुकसान कर रहे है l दूसरी और जो लोग अपने कर्तव्यों का भली भांति पालन कर समाज और देह हित में बहुत बड़ा योगदान दे रहे है वे न केवल अपने स्वाभाविक अधिकार प्राप्त कर रहे है अपितु उनका व्यक्तित्व और कृतित्व निरंतर नवीन ऊंचाईयों को भी छू रहा है,l
अब प्रश्न यह है कि कर्तव्य क्या है? कर्तव्य अलग अलग व्यक्तियों के लिए अलग अलग हो सकते है l सभी के लिए एक ही प्रकार के कर्तव्य नहीं हो सकते l मूल बात यह है कि व्यक्ति की समाज परिवार या संस्था में जो भी स्थिति है उस स्थिति के अनुरूप प्राथमिकता का निर्धारण कर पूरी क्षमता से किए जाने वाले कार्य को पूर्ण करे l संस्था परिवार समाज देश के विश्वास को बनाए रखे l
Sunday, February 9, 2025
कर्मयोगी
जन्म और मरण से कोई व्यक्ति परे नहीं है ।परन्तु व्यक्ति का जन्म कहा होगा ,किस परिवेश में होगा , इसका निर्धारण उस व्यक्ति के संचित पुण्य के आधार पर होता है l इसी प्रकार से व्यक्ति की पूरी आयु होने के बाद जब वह संसार से जाता है तो उस व्यक्ति को उसके सत्कर्मों और परोपकार के कार्यों से जाना जाता है I इस संसार में कई महापुरुष जन्म लेते है और ईश्वर द्वारा सौंपे गए दायित्वों का निर्वहन कर संसार से प्रयाण कर जाते है Iउन महापुरुषों के कर्म की कीर्ति भावी पीढ़ी का मार्ग प्रशस्त करती है
उन्हीं महापुरुषों में से शाकल्य परिवार के पितृ पुरुष ब्रह्मलीन डा, श्रीधर शाकल्य थे l डा, श्रीधर शाकल्य साहब को सभी लोग वैद्य राज जी के नाम से जानते थे l उन्होंने परोपकार की भावना से चिकित्सक की भूमिका का भली भांति निर्वहन किया I चिकित्सा व्यवसाय के प्रति उनका कितना समर्पण था, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता था कि उन्हें स्वयं अस्वस्थ होते हुए हमने अशक्त रोगियों के घरों पर वृद्धावस्था में चिकित्सा हेतु जाते आते हुए देखा हैं दूसरों की पीड़ा के सामने उन्हें स्वयं की पीड़ा नगण्य दिखाई देती थीं I
परम श्रध्देय डा, श्रीधर जी शाकल्य साहब कर्मयोगी थे l जिन्होंने गीता के सार को जीवन में जिया थाl सांसारिक दायित्वों की पूर्ति करते हुए उन्होंने आध्यात्मिक ऊंचाइयों को भी स्पर्श किया है l मेरी उनसे कई बार भेट हुई थी,पर मुझे कभी नहीं लगा कि वे स्वयं भी अस्वस्थ थे l उनका बाह्य स्वरूप जितना तेजस्वी था , आंतरिक स्वरूप उतना ही दिव्य प्रतीत होता था l उन्होंने गायत्री परिवार के इस आदर्श वाक्य को साकार किया था, कि,,,"गृहस्थ एक तपोवन है जिसमें संयम सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है"
कहते है जिस प्रकार लोग तीर्थाटन करते हुए पुण्य अर्जित करते है उसी प्रकार से इस संसार में महापुरुष भी तीर्थ समान होते है l जैन धर्म में महान संतो को तीर्थंकर कहा गया है l मुझे ब्रह्मलीन डा, श्रीधर जी शाकल्य साहब से मिल कर तीर्थ दर्शन की अनुभूति होती थी l यद्यपि ऐसे महापुरुष के लिए कोई स्मारिका उनके कार्य का मूल्यांकन नहीं हो सकती है परन्तु महापुरुष के गुणों स्मरण और प्रकाशन से समाज में सकारात्मकता जागृत होती है l और सद्गुणों को प्रोत्साहन मिलता है
ब्रह्म लीन डा श्रीधर शाकल्य साहब के लिए मै अपनी इन पक्तियों से श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहूंगाl
,,,, "दीन दुखियों का दर्द हरेगा सच्चे ईश को पाएगा
मातृ भूमि के चरणों में ही अपना जीवन चढ़ाएगा
किया नहीं प्राणों का अर्पण करे समर्पित जो जीवन
देश प्रेमी और कर्मयोगी वह कालपुरुष बन जाएगा"
Sunday, December 29, 2024
पर्यावरण उद्यान
मानव मन का स्वभाव है उसे सौंदर्य दूरस्थ दिखाई देता है अपने आस पास दिखाई नहीं देता है l बुराइयां अपने निकट रहने वाले व्यक्तियों में दिखाई देती है l अच्छाईयां या तो स्वयं में दिखाईं देती या दूर के लोगों में दिखाई देती है l हमे। चाहिए कि हम अपने आस पास परिवेश में बिखरे सौंदर्य और सद गुणों को देखे l
सामान्यत यह भी देखा जाता है सौंदर्य पूर्ण कृतियों को बनाने के लिये महंगी और दुर्लभ वस्तुएं एकत्र कलाकारों द्वारा की जाती है तदोपरांत संरचनाएं और कृतियां बनाई जाती रही है ,वहीं कोई यह कहे कि दैनिक जीवन में उपयोग कर फेंकी गई वस्तुओं से भी संरचनाएं और कला कृतियां बनाई जा सकती है तो लोग आश्चर्य करेंगे
इसे साकार किया है झाबुआ के लोगों ने जिन्होंने र्प्लास्टिक की बोतल, गाड़ी के टायर ट्यूब, पुराने कपड़े, टूटे हुए पाइप , फटे हुए जूतों से पर्यावरण उद्यान में तरह तरह की कृतियां तैयार की है
झाबुआ नगर में इन सब चीजों से तैयार कर अम्बेडकर गार्डन में कई प्रकार की संरचनाएं सजा कर रखी गई है l गार्डन मे कही तो प्लास्टिक की पुरानी फेंकी गई बोतलों से हेलीकॉप्टर तो कही शेड बना कर बैठने योग्य स्थान बनाया गया है l पुराने टायरों और ट्यूब से कुर्सियां और टेबल जैसी आकृतियां बनाईं गई है
इस युग की यह आवश्यकता हैं कि हम आस पास बिखरी बिल्कुल निरूपयोगी हुई चीजों को पर्यावरण के अनुकूल बनाए उन्हें अच्छे प्रयोजन के लिए काम में लाए l इसी प्रकार से समाज से बहिष्कृत उपेक्षित वर्ग को अपनाए उन्हें उचित स्थान प्रदान कर देश और समाज निर्माण में उन्हें भागीदार बनाये
Wednesday, December 4, 2024
लोक गीत
राजस्थानी लोक गीत हमारी लोक परम्परा और लोक संस्कृति परिचायक है l लोक गीतों के माध्यम से हमारे लोक गायक और गायिकाएं विलुप्त होते वाद्य यंत्रों से संगीत देकर लोक देवताओं की स्तुति करते है
इस प्रकार के लोक गीत सुनने में अत्यंत मधुर लगते है l लोक गायक और गायिकाओं को भले ही औपचारिक रूप से संगीत की शिक्षा न मिली हो, परन्तु उनके स्वर की विशिष्टता हमारे तन मन में ताजगी भर देती है
Friday, November 15, 2024
हमारी लोक परंपराएं लोक उत्सव
जैसे जैसे हम डिजिटलाइजेशन की और बढ़ते जा रहे है l हम अपनी लोक परंपराओं लोक गीतों लोक उत्सवों लोक कलाओं, लोक देवताओं से परे होते जा रहे है l
संध्या उत्सव मालवा और निमाड़ में मनाया जाने वाला लोक उत्सव है l जिन्हें बालिकाएं प्राकृतिक रूप से उपलब्ध गाय के गोबर फूल पत्तियों से दीवारों पर तरह तरह की आकृतियां बनाती है और समूह में इकट्ठी होकर लय में उत्साह पूर्वक लोक गीतों को गाकर लोक देवी संध्या का आव्हान करती है
इस प्रकार के लोक उत्सव हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण के साथ साथ हमारी नई पीढ़ी में सृजनात्मक कौशल भरने का काम भी करते है
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