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Thursday, May 13, 2021

कोरोना वैक्सीनैशन

          जब से कोरोना के विरुध्द वैक्सीनेशन का अभियान चला है । लोगो मे वैक्सीन लगवाने की हौड़ लग गई है । जिन लोगो को वैक्सीन के  दोनों डोज लग गये है ।उनका ही नही उनके पूरे परिवार का आत्म विश्वास चरम पर पर है । उन्हें अपने सम्पूर्ण होने का अहसास होने लगा है ।परिवार वालो का यह कहना है कि उनके परिवार में एक ऐसा व्यक्ति है जिंसको दोनों वैक्सीन लग चुके है ।यह अहसास ठीक उसी प्रकार का प्रतीत होता है ।मानो पुराने जमाने मे किसी भारतीय परिवार का कोई सदस्य विलायत में बैरिस्टर की पढ़ाई करके आया हो ।इस प्रकार  उसके पूरे परिवार को वैक्सीन न लगते हुए भी सभी सदस्यों को वैक्सीन लगने का प्रभाव महसूस किया जा सकता है 
               वैक्सीन लगवाने की हौड़ में अब तो दो प्रकार की वैक्सीनो का तुलनात्मक विश्लेषण करने वाले लोगो की भी कोई कमी नही है । जिंसको जो वैक्सीन लगी है ,वह उसी वैक्सीन का ब्रांड एम्बेसडर बन गया है । उसमे यह सामर्थ्य है कि वह दूसरी वैक्सीन के सारे दोष बता कर उसके दुष्परिणामों पर प्रकाश डाल सके । 
           जब पूरा विश्व वैक्सीनेशन के दौर से उबर चुका था । मात्र भारत जैसे देश मे शिशुओं के टीकाकरण के उपक्रम शासकीय स्तर पर किये जा रहे थे । तब  कोरोना जैसी  महामारी  टपक पड़ी और उसने छोटे बच्चों के साथ बड़ो को भी वैक्सीनैशन की कतार में लाकर खड़ा कर दिया । शुरुआती दौर में कुछ लोग कोरोना की वैक्सीन लगवाने में संकोच कर रहे थे । जब उन्हें कोई  वैक्सीन लगवाने के लिए कहता था तो वे स्वयम को बहुत अपमानित महसूस करते थे ,परन्तु बाद में जैसे कोरोना से लाशो के ढेर होना शुरू हुए ,हॉस्पिटल से शव लेने के लिए लंबी लंबी लाईने लगने लगी। श्मसान घाटो में टोकन सिस्टम से शवो के अंतिम संस्कार होने लगे ।जब उनकी आंख खुली की वैक्सीन लगवा लिया जाये , तब तक काफी दे हो चुकी थी। जब वे वैक्सीन लगवाने को पहुंचे तो कोविड टीका करण केंद्र पर पंक्ति में कोरोना संक्रमित लोग भी मिले ।  
          अब उन लोगो के बारे में विचार करे जिन लोगो ने अधूरे मन से ही सही पहला वैक्सीन लगवा लिया था। दूसरा लगवाने का मौका आया था वैक्सीन समाप्त हो चुके थे । मात्र एक वैक्सीन का डोज लेने पर उनको ऐसा लगने लगा कि वे अमृत का अधूरा प्याला ही ग्रहण कर सके । काश पूरा प्याला पी पाते इस तरह वे राहु केतु की तरह शेष प्याले नुमा वैक्सीन का दूसरा डोज लेने के लिए बेतहाशा भटक रहे है । भगवान करे उनकी यह तलाश सीघ्र पूरी हो । ऐसे में यह खबर की एक वैक्सीन कंपनी का मालिक तरह तरह धमकियों से तंग आकर देश छोड़ चुका है वैक्सीनैशन अभियान के लिए खतरनाक मौड़ ले चुका है 
       हमारे एक परिचित ने तो वैक्सीनैशन अभियान की कछुआ चाल को देख कर वैक्सीन लगवाने से बेहतर स्वयम की इम्युनिटी बूस्ट करने की रणनीति बना ली है ।उनका यह मानना है कि वैक्सीन की शरीर में काम करने की भी एक अवधि है । अवधि व्यतीत होने के बाद वैक्सीन जनक प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जावेगी इसलिए वैक्सीन लगवाने से बेहतर है इम्युनिटी बूस्ट करने के स्थाई उपायों के बारे में सोचा जाये । इसी सिलसिले में उन्होंने नाक में नींबू , तेल डालने सहित इतने विकल्पों का अविष्कार किया है कि उनके पास तद विषयक सामग्री पर्याप्त रूप से उपलब्ध है ।निकट भविष्य में वे इस विषय पर एक पुस्तक प्रकाशित करवाने के बारे में भी सोच रहे है ,परन्तु उनको कोई प्रकाशक नही मिल रहा है 
     

Tuesday, May 11, 2021

यज्ञ की महत्ता

यज्ञ वातावरण की नकारात्मकता दूर कर उसे विषाणु और जीवाणुओं से मुक्त कर दैविक शक्तियों का आव्हान करता है । जिससे महामारी सहित समस्त अनिष्टों का निवारण होता है । जब से हमारे जीवन से यह वैदिक और दैविक परम्परा समाप्त हुई । 

हमे आपदाओं और महामारियों ने घेर लिया। पहले दैनिक हवन होता था। फिर पाक्षिक हुआ , फिर हवन मासिक ,फिर साल में दो बार नवरात्रियो के समय आजकल तो कोई हवन ही नही करता। जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने है।
      उल्लेखनीय है कि विषाणु और जीवाणु सूक्ष्मजीवी होने से दिखाई नही देते । इसका मतलब यह नही है कि वे होते ही नही । उसी प्रकार से दैविक शक्तियां वातावरण में होती तो है  परन्तु दिखाई नही देती । यज्ञ और मंत्रोच्चारण के अभाव में वे निष्क्रिय रहती है । जैसे ही हम वैदिक मंत्रों उच्चारण के साथ यज्ञ करते है वे  चैतन्य और सक्रिय होकर हमारे आस पास एक अदृश्य सुरक्षा चक्र बनाती है । जो हमे उत्तम स्वास्थ्य और समृध्दि प्रदान करती है । 
      कई लोग हवन या यज्ञ से करने से इसलिए बचते रहते है कि यह एक वृहद अनुष्ठान है ।इसमें काफी व्यय होता है । लोगो की यह धारणा गलत है । नियमित या साप्ताहिक हवन में अधिक व्यय नही आता है । किसी को आमांत्रित कर भोजन कराने की आवश्यकता भी नही है । हवन या यज्ञ नितान्त आध्यात्मिक पारिवारिक कार्यक्रम है । इसके माध्यम से विष्णु शिव ब्रह्मा ही नही इंद्र वरुण अग्नि सहित समस्त देवता आमांत्रित होते है और आहुतियों के माध्यम से हविष्य प्राप्त करते है 

Saturday, May 8, 2021

इम्युनिटी

         इम्युनिटी क्या है ?इम्युनिटी कैसे बढ़ती है?इम्युनिटी कहा से आती है ? इत्यादि प्रश्नों के कई जबाब  है ।चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इम्युनिटी  व्यक्ति का उत्तम स्वास्थ्य है जो रोगों से शरीर को लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। 
            इम्यूनिटी सकारात्मक सोच से प्राप्त होती है । इम्युनिटी प्राप्त होती है उचित खान पान और अच्छी आदतों से । इम्युनिटी रहती है आस्तिकता के भाव मे जहाँ से किसी व्यक्ति को आत्मविश्वास मिलता है । इम्युनिटी एक आश्वस्ति का भाव है जो किसी व्यक्ति को आत्मीय लोगो से प्राप्त होता है ।इम्युनिटी रचनात्मक कौशल और समय के सदुपयोग  से मिलती है । इम्युनिटी मिलती है हमे नियमित जीवन और व्यायाम से अच्छे साहित्य के अध्ययन से । इम्युनिटी मिलती है सत्पुरुषों के सत्संग से । इम्युनिटी का स्त्रोत हमारे भीतर है जो हमे कुदरत से प्रेम करना सिखाता है  
                जिन लोगो में आस्तिकता का भाव नही है ,वे आत्मबल से विहीन होते है । जिन लोग का उचित खान पान नही है ,उन्हें पोषण प्राप्त नही होता । स्वाभाविक रूप से उनका स्वास्थ्य कमजोर रहता है । जो लोग नियमित व्यायाम नही करते वे उन्हें अनेक प्रकार की व्याधियों और शारीरिक पीड़ाओं से गुजरना पड़ता है । 
           जिन लोगो को परिवार और आत्मीय जन से आश्वस्ति का भाव प्राप्त नही होता है वे भीतर से स्वयम को असहाय और अकेले अनुभव करते है । जो लोग सत साहित्य और सत्पुरुषों का सानिध्य प्राप्त नही करते उनके भीतर आत्महीनता की ग्रन्थि निरन्तर सक्रिय रहती है। वे किसी के बारे में अच्छा सोच ही नही सकते । जो व्यक्ति किसी रचनात्मक गतिविधि में लिप्त होकर समय का सदुपयोग नही करता वो तरह तरह की आशांकाओ से ग्रस्त रहता है, निरन्तर नकारात्मक विचार उसे घेरे रहते है । जो व्यक्ति कुदरत के प्रति स्नेह और सरंक्षण का भाव नही रखता वो ईश्वर प्रदत्त  प्राकृतिक वरदानों से वंचित रह जाता है उस व्यक्ति को न तो झरने की कल छल सुनाई देती है और नही वह पंछियो की चहचहाहट का आनंद ले पाता है । उस व्यक्ति को बारिश की शीतलता भी बुरी लगती है वन्य प्राणियों से वह जुड़ाव महसूस ही नही कर पाता है ।भला ऐसे व्यक्ति को इम्युनिटी कहा से प्राप्त होगी 
      इम्युनिटी जीवन की इच्छा शक्ति है । बहुत से लोग ऐसे होते है। जो गम्भीर रूप से रुग्ण होने पर भी मृत्यु को प्राप्त नही होते ।अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जीवन मृत्यु के बीच संघर्षरत रहते है और अंत मे वे म्रत्यु को मात देते है । इम्युनिटी तब समाप्त हो जाती है जब व्यक्ति तरह तरह की आशंकाओ और भय से ग्रस्त हो जाता है ।वह परिस्थितियों से पूर्णतः निराश हो जाता है । उसे जीवन के प्रति कोई आसक्ति शेष नही रह जाती है । कई लोग तो चिकित्सालयों के नकारात्मक परिवेश से घबराकर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता खो देते है । 
          प्रायः यह देखने मे आता है । युध्द में आहत सैनिक सैकड़ो घाव सहने के बावजूद जीवित बच जाते है । इसलिये अच्छी इम्युनिटी के लिये  जीवन को योध्दा की तरह जीना आवश्यक है । जिनके जीवन का कोई उद्देश्य नही होता उन लोगो मे भी जीवन की इच्छा शक्ति का अभाव होता है । इसलिए अच्छी इम्युनिटी के लिये व्यक्ति का जीवन उद्देश्य पूर्ण होना आवश्यक है 
       

Friday, April 30, 2021

ऑक्सिजन पुरुष

               जब से कोरोना रोग आया है, तब से ऑक्सिजन पुरुष अपना ऑक्सिजन का लेवल बढ़ाने में लगे हुए है । जब उन्होंने ये सुना है कि कोरोना में संक्रमित होने पर ऑक्सिजन का स्तर रक्त में कम हो जाता है वे ऑक्सिजन बढ़ाने का कोई मौका छोड़ना नही चाहते । चाहे सुबह उठकर भृमण का कार्यक्रम हो या भस्त्रिका अनुलोम विलोम प्राणायाम उन्होंने कोई उपाय नही छोड़ा है । 
                  ऑक्सिजन बढ़ाने के लिये उन्होंने तरह के एंटी ऑक्सीडेंट , मल्टी विटामिन की दवाईयां अलग से रखी हुई है ।  दिन में दो बार बाकायदा वे ऑक्सीडोमीटर से अपना ऑक्सिजन का लेवल चेक करते रहते है । उनका प्रयास यह रहता है कि किसी भी परिस्थिति में उनका ऑक्सीजन लेवल 97 से कम न रहे । पर्याप्त ऑक्सिजन का लेवल पाए जाने पर उनके चेहरे पर  संतुष्टि ही नही प्रसन्नता भी दिखाई देती है ।उनके होठो पर  एक हल्की सी मुस्कान भी तैरती रहती है । उन्हें मात्र स्वयम के ऑक्सिजन लेवल की ही चिंता नही अपितु परिवार के सभी सदस्यों को भी वे ऑक्सिजन लेवल बढ़ाने के लिए भी प्रेरित करते रहते है । 
                    उन्होंने पूरी लिस्ट बना रखी है कि कौनसा पौधा कितनी कार्बन डाई ऑक्सईड सौंखता है और कितनी ऑक्सिजन देता है । कौनसे पौधे 12 घंटे ऑक्सिजन देते है और कौनसे पौधे 24 घण्टे ऑक्सिजन देते है ।उनके ऑक्सिजन सूंघने की क्षमता अत्यंत अद्भुत है । वे किसी भी पेड़ के निकट जाकर बता देते है अभी वह कितनी ऑक्सिजन दे रहा है और भविष्य में कितनी दे सकता है 
               ऑक्सिजन लेवल को उन्होंने सीधे  प्रतिरोधक क्षमता से जोड़ रखा है ।उनका दावा है कि जब तक ऑक्सिजन का लेवल अच्छा है ।कोरोना उनका बाल भो बांका नही कर सकता है । उनकी दृढ़ मान्यता है कि आदमी कोरोना से नही मरता ऑक्सिजन का स्तर कम होने से मर जाता है ।उन्होंने ऑक्सिजन लेवल संधारित करने के आपातकालीन उपाय भी कर रखे है ।मोहल्ले के लोग आश्वस्त है कि उनके रहते किसी व्यक्ति ओक्सिजन का लेवल कम नही हो सकता ।
             उनकी ऑक्सिजन के प्रति जागरूकता देखकर लोग उन्हें ऑक्सिजन पुरुष के रूप पहचानने और जानने लगे । उनके दर्शन मात्र से ऑक्सिजन प्राप्त करने का पुण्य प्राप्त होता है । जरा सा किसी का ऑक्सिजन लेवल कम हुआ कि नही की  वह ऑक्सिजन पुरुष के दर्शन का अभिलाषी हो जाता है। मचल उठता है कि उसे किसी भी हालत में ऑक्सिजन पुरुष के दर्शन करना है। कितना भी गंभीर रोगी हो उनके दर्शन के उपरांत स्वयम को स्वस्थ अनुभव करने लगता है । उनकी ऑक्सिजन के प्रति इस आसक्ति के कारण उन्हें ऑक्सिजन अवार्ड देने की जोरो से मांग उठने लगी है । 

कोरोना काल की मान्यताये और मिथक

कोरोना काल ने कई मिथकों को तोड़ा है । कई को जोड़ा है । कई मान्यताये ध्वस्त हुई । कितने ही सिद्धान्त खंडित हुए । कितने ही मंडित हुए  है। कोरोना काल के पूर्व उस व्यक्ति को सर्वाधिक सफल माना जाता था । जो लोगो से मिलता जुलता हो , व्यवहार कुशल हो । अंतर्मुखी न हो । समूह में रहने का अभ्यस्त है , जिसके कई मित्र हो ।  परन्तु कोरोना ने उक्त सभी धारणाओं को ध्वस्त किया है । कोरोना ने हमे यह बताया है कि जीवन मे सफलता के साथ साथ स्वस्थ रह कर जीवन जीना भी जरूरी है । मात्र व्यवहार कुशलता काम नही आती है व्यक्ति को एकांत में रहने का भी अभ्यास भी होना आवश्यक है ।  कोरोना से बचाव का मूल मंत्र सोशल  डिस्टेंसिग बन चुका है । आत्मीयता दर्शाने के तरीकों में कई प्रकार के बदलाव आये है 
           व्यक्ति कितना ही धनी हो उसका कोई महत्व नही है व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रहना जरूरी है । कोरोना ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को नवीन आयाम दिये है । वर्तमान में इस महामारी ने कई बलवान और शक्तिशाली लोगो को भी नही छोड़ा है वही गरीब और अमीरी के भेद को भी समाप्त किया है । जहाँ किसी जमाने मे कुछ लोग हॉस्पिटल जाना पसन्द  नही करते थे, परन्तु आजकल हर व्यक्ति  हॉस्पिटल में  और  बेड वेंटिलेटर की तलाश कर रहा है । 
           वैज्ञानिकों का यह मत है कि एक वृक्ष कम से कम 200 पौंड ऑक्सिजन  दिन भर में देता है । जिसके परिसर में जितने अधिक वृक्ष है वह उतना ही प्राणवान है यह मान्यता बलवती हुई है कि बलवान और धनवान होने की अपेक्षा व्यक्ति को प्राणवान होना जरूरी है  । किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में एक दिन में वृध्दि नही हो सकती है । यह दीर्घकालिक और सतत प्रक्रिया है जो नियमित जीवन आहार विहार और समुचित व्यायाम से ही सम्भव है ।
                   जिन लोगो को किसी जमाने मे यह कहते हुए सुना जा सकता था कि पेड़ो की छाया के कारण उन्हें सूरज की धूप नही मिलती , पेड़ के पत्ते गिरने से घर आँगन में कचरा बहुत होता है । पेड़ की डालियो पर पक्षियों के बैठने से उनकी बीट गिरती है जिससे उन्हें दुर्गंध अनुभव होता है । फलदार वृक्षो से आकर्षित होकर आए दिन बंदर आते रहते है । उन्हें कोरोना से संक्रमित होने के फलस्वरूप शरीर मे  ऑक्सिजन के अल्प स्तर की समस्या से जूझते हुए देखा जा सकता है ।  अब उन्हें याद आती है वे पेड़ की घनी डालिया । शीतल छाया , उड़ते हुए खगदल और उनके घोसले । यह कोरोना काल  का सकारात्मक पक्ष ही है । ऐसे लोग किसी भी कीमत पर ऑक्सिजन के सिलेण्डर क्रय करने को तैयार बैठे है । 
         वे लोग जो किसी व्यक्ति की यह कह कर मजाक उड़ाते थे कि वह व्यक्ति अंर्तमुखी प्रवृत्ति का है । अव्यवहारिक है । स्वयं में डूबा रहता है । अत्यधिक धार्मिक है , किताबी कीड़ा है , दार्शनिक है , स्वयम को बहुत बड़ा कलाकार या साहित्यकार समझता है, अप्रासंगिक विषयों पर विचार करता रहता है । समाज से कटा रहता है । आज उस उस व्यक्ति की उन सब बुराईयो में उन्हें अच्छाईयां दिखाई देती है और सोचते है कि काश वे ऐसा बन पाते तो वे वे कोरोना काल मे समुचित शारीरिक और मानसिक प्रतिरोधक क्षमता के साथ महामारी से मुकाबला कर पाते 
                 कोरोनाकाल के पूर्व एक यह भी मान्यता थी कि  हम तो बूढ़े हो चुके । हमने हमारी जिंदगी जी ली है अब नये युवा लोगो को देखना कि वे क्या कर सकते है । कोरोना ने इस धारणा को ध्वस्त कर सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों को अपनी आंतरिक और बाहरी  क्षमताओं का परिचय देना का मौका दिया है  जैसे जैसे कोरोना संक्रमण से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है । व्यक्ति कम आयु हो या या अधिक का अपने स्वास्थ्य की चिंता प्रत्येक व्यक्ति को होने लगी है आयु वर्ग वाले लोगो ने यह कहना शुरू कर दिया है कि हमने तो हमारा जीवन जी लिया तुम अपनी चिन्ता करो । ऐसी स्थिति में युवा लोगो ने भी यह जबाब देने लगे कि 

Monday, April 26, 2021

कोरोना काल के सबक

जिनके विचारो में सकारात्मकता  की प्राणवायु होती है उन्हें कुदरत से सहज ही प्राणवायु अर्थात ऑक्सिजन सुलभ हो जाती है । जिन लोगो को इस दौर में ऑक्सिजन प्राणवायु के सिलेण्डर की आवश्यकता महसूस हुई हो । वे संकल्प ले कि वे प्राणवायु देने वाले वृक्षो का रोपण ही न करे अपितु उन्हें सिंचित कर बड़ा भी करे।
          जिन लोगो के रिश्तेदारों कोरोना काल मे अंतिम संस्कार हेतु लकड़ीयो की कमी से जूझना पड़ा हो उनको यह संकल्प लेना चाहिये कि वे  अपने जीवन काल मे पर्याप्त लकड़ीया देने वाले वृक्षो को बोकर उन्हें छाया देने वाले  विशाल वृक्षो रूप में परिवर्धित करे ।कुदरत को जो हमने दिया है वही उसने हमें लौटाया है कुदरत से हमने पेड़ छीने कुदरत ने हमे ऑक्सिजन के लिए तरसाया है 
        जब ऑक्सिजन के लिए करोड़ो के प्लांट लगाए जा रहे है तब हमें शून्य बजट में ऑक्सिजन देने वाले नीम बरगद और पीपल याद आ रहे है ।ऑक्सिजन की ताजगी पहले विचारो में आती है बाद में दिलो दिमाग मे होकर फेंफड़ो तक चली जाती है ।
             रोगों की प्रतिरोधक क्षमता तन की ही नही मन की भी होती है । मन से रोगी व्यक्ति स्वतः ही तन की प्रतिरोधक क्षमता खो देता है कोरोना रोग के कहर ने हमे एक सबक सिखलाया है रहो एकांत और शान्त माहौल में रखो स्वस्थ काया है 
     

Tuesday, April 20, 2021

कन्या भोज की प्रासंगिकता

             आज रामनवमी पर्व होकर चैत्र नवरात्रि का का अंतिम दिवस है । सामान्य रूप से आज के दिन लोग यज्ञ करके कन्या भोज आयोजित करते है । किंतु विगत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी कोरोना महामारी के कारण कन्या भोज का कार्यक्रम नही करवा पा रहे है । कन्या भोजन की परंपरा सनातन  में उस समय से चली आ रही है जब भारतीय समाज मे कन्याओ का परिवार और समाज मे विशेष स्थान होता था । 
                विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या?आज हमारे परिवार और समाज मे हम कन्याओ को विशेष स्थान और स्नेह संरक्षण दे पा रहे है । इसका जबाब यह होगा कि ऐसा नही हो रहा है तो फिर कन्या भोज के नाम पर इस धार्मिक ढकोसले की आवश्यकता  क्या है ?जाने अनजाने कन्याओ के माता पिता भी अपनी बेटियों का शोषण करते रहते है । कितनी ही कन्याये समुचित पोषण के अभाव में तरह तरह की शारीरिक कमजोरियों से ग्रस्त रहती है । परीक्षा परिणामो में इसके बावजूद लड़कियों का प्रदर्शन लड़को की अपेक्षा अधिक उत्साहवर्धक रहता है । 
          कई माता पिता इस बात को लेकर अत्यधिक संतुष्ट रहते है कि उनकी लडकिया अच्छी शिक्षा प्राप्त कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा प्रशासनिक एवम बैंकिग और शैक्षिणक जगत में उच्च पदों पर पदस्थ है । वैसी ही संतुष्टि अपने लड़को के बारे में प्रगट नही कर पाते है । कभी कभी तो माता पिता अपने लड़को के निराशाजनक प्रदर्शन के कारण उनके बारे में वास्तविक तथ्यों को प्रगट करने में भी संकोच करते है ।
         इस दौर में परिवेश में ऐसे परिवार भी देखने को मिलते है । जो पूरी तरह अपनी लड़कियों की आजीविका पर ही निर्भर है । यह एक अत्यंत  अपमान जनक परिस्थिति होती है फिर अपनी लड़कियों पर आश्रित माता पिता और परिवार यह कहते हुए मिल जायेंगे कि उन्हें अपनी लड़की पर गर्व है इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से अपनी लोलुप प्रवृत्ति को छुपा  लेते है । वर्तमान में यह पतन का दौर भी शुरू हो गया है कुछ लड़कियों के माता पिता विवाह कराने के उपरान्त उनकी लड़की  और उसके पति के बीच विवाद के बीज बोकर अपनी आर्थिक हितों की पूर्ति में लगे हुये है । इतनी नकारात्मक परिस्थितियों में भला देवी नव दुर्गा कन्या भोजन के माध्यम से आपकी पूजा कैसे ग्रहण कर सकेगी ।
           जब तक हमारी कथनी और करनी में अंतर समाप्त नही हो जाता।तब तक हमारी धार्मिक उपासना व्रत पूजा सब व्यर्थ है । व्यर्थ है वे सारे अनुष्ठान जो हमारे द्वारा देवी को प्रसन्न करने के लिए  किये जाते है । हम चाहे अपने कुकर्मो और गलत मंतव्यों पर कितने ही पर्दे डाल दे वह देवी सत्ता से छुप नही सकते । हमे वास्तविक अर्थो में देवियो के प्रतिरूप कन्याओ का संरक्षण पोषण और उन्नयन कर अपनी सच्ची श्रध्दा दिखलानी होगी । तभी देवी हमारे नवरात्रि के कन्याभोज को ग्रहण करेगी ।