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Wednesday, March 24, 2021

तथाकथित धार्मिक लोग

धार्मिक होना अलग बात है और मार्मिक होना अलग बात है । सच्चा धार्मिक व्यक्ति करुणा दया सहानुभूति संवेदना से भरा होता है। कार्य के प्रति समर्पण और ईमानदारी उसकी पहचान होती है ।धार्मिक व्यक्ति स्वयं कठोर परिश्रमी होता है ।वह दूसरों के पसीने और मेहनत का मूल्य पहचानता है । अहंकारी नही स्वाभिमानी और स्वालंबी होता है ।दुसरो की कड़वी बाते न तो सुनना पसंद करता हैऔर नही किसी को कटु वचन बोलता है ।
                   कुछ लोग दिन रात पूजा पाठ धार्मिक अनुष्ठान प्रवचन कहते सुनते रहते है ।परंतु निरन्तर नकारात्मक विचारों का प्रवाह उनके मस्तिष्क में चलता रहता है ।ईश्वर से भी मांगते है स्वयम के लिए ।दुसरो के  अनिष्ट करने के तरह तरह के उपाय उनके दिलों दिमाग मे उठते रहते है । दान देते है यश की इच्छा के लिये लोक कल्याण की भावना न तो उनमें होती है और नही किसी का कल्याण कर सकते है ।निरन्तर निंदा स्तुति करना ही उनके जीवन का मूल मंत्र होता है ।साधना से ज्यादा साधनों को महत्व देते है । ढकोसला पाखण्ड उनकी नस नस में भरा होता है ।लोगो को भृमित करने के वे इतने अभ्यस्त होते है कि उन्हें पहचान पाना आसान नही होता
     धर्म के प्रति आम जनता का विश्वास तथाकथित ऐसे धार्मिक लोगो के कारण ही उठ जाता है । ऐसे धार्मिक लोगो के कारण धर्म काफी क्षति उठाता है । ईश्वर के प्रति श्रध्दा कम हो जाती है । सज्जनता के प्रति लोगो के मन मे आदर घट जाता है । लोग देवस्थानों और संतो के पास जाना बंद कर देते है । व्यक्ति का विश्वास अच्छाई और सच्चाई से टूट जाता है ।  एक सच्चा व्यक्ति ईश्वर से रुठ जाता है
     तथाकथित धार्मिक लोगो में हीनता की भावना इतनी गहराई तक भरी रहती है । कि वे अपने से उच्च स्तर के साधक को फूटी आंख देखना नही चाहते। वे जैसे ही ऐसे साधक को देखते उनमे एक प्रकार का शत्रु भाव पैदा हो जाता है । उनको ऐसा लगता है जैसे उनके अस्तित्व को किसी ने चुनोती दे दी है ।  येन केन प्रकारेण  उनका यह प्रयास रहता  है कि ऐसा साधक उनकी नजरो से ओझल हो जाए। ऐसे तथाकथित धार्मिक लोगो से भगवान बचाये

Saturday, September 15, 2018

उत्सव धर्मिता

उत्सव धर्मिता बहुत अच्छी है 
व्यक्ति को उत्सव प्रिय होना चाहिए 
उत्सव से व्यक्ति में उमंगें आती है 
उमंग और उत्साह की स्फूर्ति से 
व्यक्ति ऊर्जा से भरपूर हो जाता है 
उत्सव सार्वजनिक रूप से मनाया जाए तो 
सामाजिक जीवन में 
आनंद का संचार होने लगता है  
परन्तु सार्वजनिक रूप से
 उत्सव मनाने के पीछे जो उद्देश्य थे 
वे धीरे धीरे विस्मृत होते जा रहे है 
निरंतर नवीन कुरीतिया 
और गलत परम्पराये स्थान लेने लगी है 
उत्सव के बहाने 
जबरन चन्दा वसूली ने उत्सव के 
आध्यात्मिक महत्व को 
समाप्त कर दिया है 
उत्सवो  के नाम पर महिलाओ से 
छेड़ खानी कन्याओ के  प्रति  
अश्लील व्यवहार 
नव युवको की उद्दंडता ने 
हमारी शुचित सांस्कृतिक परम्पराओ 
धर्मिक मान्यताओं को 
तोड़ने का प्रयास ही किया है
सड़को पर भीमकाय प्रतिमाऔ के नाम पर 
मार्ग पर अतिक्रमण और 
 देर रात्रि तक  कोलाहल पूर्ण वातावरण 
निर्मित कर हम आवगमन को 
अवरोधित ही नहीं करते है 
अपितु अस्वस्थ और वृध्द व्यक्तियो के 
ह्रदय व्यथित करने के साथ 
विद्यार्थियों के अध्ययन में भी 
बाधा कारित करते है 
उत्सव वह है हमें अपने उत्स से जोड़े
 वह नहीं जो पारस्परिक सम्बन्धो को तोड़े 
इसलिए हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि
 हम उत्सव धर्मिता को बचाये
 




Wednesday, July 18, 2018

मोह से मुक्त कर दो


किसी भी प्रकार का मोह 
मुक्ति में बाधक है 
जो मोह ग्रस्त है 
वह कितनी भी पूजा पाठ 
व्रत उपवास कर ले
 मुक्त नहीं हो सकता है 
मोह के कई प्रकार होते है 
 भौतिक सम्पदा से मोह 
साधनो से मोह ,व्यक्ति विशेष से मोह,इत्यादि
मोह और प्रेम में अंतर होता है
 प्रेम परमात्म भाव है 
प्रेम में कोई अपेक्षा नहीं रहती 
जबकि मोह में कई प्रकार की 
अपेक्षाएं होती है
प्रेम कर्म की प्रेरणा है ऊर्जा है 
जबकि मोह कर्म का बंधन है 
प्रेम से उपजा कर्म 
धर्म पालन में सहायक है 
जबकि मोह ग्रस्त व्यक्ति 
कर्म से विमुख हो निज धर्म से 
पलायन कर लेना है 
शास्त्रों में मोह रूपी अन्धकार कहा गया है 
मंत्रो में मोह रूपी अन्धकार को 
दूर करने की प्रार्थना की गई है 
मोह रूपी अन्धकार से ग्रस्त हो 
कई तपस्वी अपना तपोबल खो  देते है 
बरसो की साधना
एक क्षण में नष्ट कर देते है 
प्रेम भक्ति का स्वरूप है 
वात्स्ल्य का प्रतिरूप है 
मोह कामना है वासना है 
जबकि प्रेम सच्ची साधना है 
कला से प्रेम व्यक्ति को कलाकार बना देता है 
कुदरत से प्रेम व्यक्ति को 
पर्यावरण विद 
और साहित्य से प्रेम व्यक्ति को 
महान कृतियों का जनक बना देता है 
इसलिए हे !प्रभो
  आप  हर प्राणी के जीवन में
 प्रेम का भाव भर दो मोह से मुक्त कर दो

Sunday, March 27, 2016

स्वास्थ्य लक्ष्मी और श्रीसूक्त

लोग माँ लक्ष्मी को मात्र धन प्रदान करने वाली देवी के रूप के में ही जानते है ऋग्वेद के श्रीसूक्त को धन ऐश्वर्य प्राप्त करने का माध्यम ही समझते है किसी का भी ध्यान अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य पर नहीं जाता जबकि स्वास्थ्य को धन से बड़ा धन माना जाता है आज हम श्रीसूक्त के उस मन्त्र की और आपका ध्यान आकृष्ट करायेगे जो लक्ष्मी जी से अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है श्री सूक्त मन्त्र  जो इस प्रकार है 
" मनस: कामनाकूति वाच: सत्यमशीमहि 
पशूनां रूप मन्नस्य मयि श्री:श्रयतां यश :
अर्थात हे लक्ष्मी मैं आपके प्रभाव में मानसिक इच्छा एवं सकल्प वाणी की सत्यता गौ आदि पशुओं के रूप {दुग्ध दध्यादि एवं यव  बीहयादी }एवं अन्नो के रूप {अर्थात भक्ष्य भोज्य चोष्य लेह्य चतुर्विध भोज्य पदार्थ }इन सभी पदार्थो को प्राप्त करू ,सम्पत्ति और यश मुझमे आश्रय ले अर्थात मैं  लक्ष्मीवान और कीर्तिवान बनू । 
उपरोक्त मन्त्र में यह कामना की गई है की हे लक्ष्मी जी मुझे ऐसा स्वास्थ्य दीजिये की में सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ ग्रहण कर सकु अर्थात चूसने चबाने खाने वाले वाले रस द्रव्य ठोस पदार्थो को दांतो से चबा सकु जिव्हा से रस लेते हुए उन्हें पचा सकू ।अप्रत्यक्ष रूप से उक्त मन्त्र से अच्छे स्वास्थ्य की कामना की गई है जिस व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा होगा वह अच्छी पाचन तंत्र का होगा ही जिस व्यक्ति के हारमोन एंज़ाइम सक्रीय होंगे वह सभी प्रकार का आहार ग्रहण कर पायेगा ।लक्ष्मी जी इस स्वरूप को स्वास्थ्य लक्ष्मी संबोधित किया जाता है जिस व्यक्ति के स्वयं तथा परिवार का स्वास्थ्य अच्छा होता है वहा बीमारिया नहीं रहती ।बीमारिया दरिद्रता का कारण होती है ।बीमारियो से मुक्त व्यक्ति और परिवार होने से धन का अपव्यय नहीं होता है 

Friday, February 12, 2016

भगवान पशुपतिनाथ

 





भगवान पशुपतिनाथ की यह मूर्ति
 माँ शिवना के तट  पर स्थित है
 प्रतिमा उत्कृष्ट प्रकृति के संगमरमर के पत्थर पर प्राचीन समय में दशपुर नगर के 
 महाराजा यशोधर्मंन  द्वारा 
तत्कालीन शिल्पकारों से तैयार करवाई गई थी 
दशपुर नगर को वर्तमान में 
मन्दसौर नगर के रूप में जाना जाता है 
मन्दसौर नगर पौराणिक काल में 
रावण की पत्नी मंदोदरी का पीहर था 
इसलिए दशानन की प्राचीन मन्दसौर के क्षैत्र 
जिसे खानपूरा नाम से सम्बोधित करते है
 में दशहरे पर दहन नहीं किया जाता 
अपितु जामाता होने से उसकी मूर्ति की 
पूजा की जाती है 
दशपुर के राजा यशोधर्मन अत्यंत शक्ति शाली थे उन्होंने आक्रमण कारी शक हूँण  को 
पराजित किया था 
भगवान पशुपतिनाथ की यह मूर्ति 
शिवना नदी में दबी हुई एक रजक को 
उस समय प्राप्त हुई थी 
जब वह नित्य प्रतिदिन मूर्ति के मस्तक पर
 वस्त्र प्रक्षालन करता था 
काफी समय व्यतीत होने पर रजक को
 भगवान पशुपतिनाथ ने रजक को 
स्वप्न में दर्शन देकर कहा की
 मुझे नदी में से निकालो 
इस पर रजक द्वारा स्थानीय निवासियों को 
 स्वप्न की बात सुनाने पर 
जब खुदाई प्रारम्भ की गई तो
 विशाल मूर्ति जो इस वीडियो में दिखाई दे रही है मिली मूर्ति को स्वामी प्रत्यक्षानन्द महाराज द्वारा स्थापित किया गया तब से यह मूर्ति विश्व में विद्यमान  भगवान  पशुपतिनाथ की सबसे वृहद
 अष्टमुखी प्रतिमा है


Saturday, March 9, 2013

भगवान् शिव

महाकालेश्वर , ओङ्कारेश्वर ,रामेश्वर ,घ्रिश्नेश्वर भीमाशंकर ,
मल्लिकार्जुन, सोमनाथ,, विश्वनाथ वैद्यनाथ ,केदारनाथ 
इत्यादि नामो के अतिरिक्त भगवान् शिव को उज्जैंन में  
राजा के रूप में
 तो नर्मदा तट पर बसी नगरी धर्मपुरी में जागीरदार 
बिल्वामृत्तेश्वर के रूप में संबोधित किया जाता है 
आवश्यकता वातावरण क्षेत्र के अनुरूप 
भगवान शिव को हम वैसा ही मानते है पूजते है
 जैसा हमें उचित लगता है भगवान शिव ऐसे देव है
 जो न तो किसी परम्परा से बंधे है न किसी वेश परिवेश से बंधे
 जैसा श्रृंगार कर दो वे वैसे ही बन जाते है 
परन्तु मनुष्य परिवेश के अनुसार न तो वेश बदलता है
 न ही उसके आचार विचार भाषा में कोई अंतर आता है
 भगवान् शिव के भिन्न स्वरूप हमें यह प्रेरणा देते है की
 व्यक्ति को आवश्यकता के अनुसार 
अपनी भूमिका निर्धारित कर लेनी चाहिए 
तभी वह सर्वस्वीकार्य  हो  सकता है

Tuesday, December 25, 2012

तृष्णा ,तृप्ति और परम तत्व


तृष्णा और तृप्ति 
दोनों परस्पर विपरीत अर्थ वाले शब्द है
जहा तृप्ति संतुष्टि प्रदान करता है 
वहा तृष्णा व्याकुलता असंतोष का परिचायक है
प्रत्येक व्यक्ति तृष्णा के विषय भिन्न -भिन्न हो सकते है 
पैमाने अलग -अलग हो सकते है
किस व्यक्ति की तृष्णा किस विषय वस्तु से जुडी है 
किस व्यक्ति को किस विषय वस्तु से तृप्ति प्राप्त हो सकती है 
यह उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचायक होता है
तृष्णा का कोई अंत नहीं है जबकि तृप्ति का है
तृप्ति का सीधा सम्बन्ध व्यक्ति के संतुष्टि के स्तर पर निर्भर होता है
संतुष्टि की अनुभूति किसी व्यक्ति को मात्र कुछ अंश 
प्राप्त होने से हो सकती है
जबकि बहुत से व्यक्तियों को जीवन में बहुत कुछ मिलने के बाद भी वे सदैव असंतुष्ट अतृप्त रहते है
ऐसे व्यक्ति वास्तव में कहा जाय तो 
मानसिक रूप से दरिद्र होते है
इसलिए वास्तविक तृप्ति आंतरिक दरिद्रता 
दूर किये जाने से ही प्राप्त हो सकती है
जो व्यक्ति आंतरिक रूप से सम्पन्न होते है 
उन्हें जीवन में सफलता सीघ्र प्राप्त होती है
आंतरिक दरिद्रता अच्छी पुस्तको के अध्ययन सत्संग से संभव है
महाभारत में दुर्वासा एवं उनके हजारो शिष्यों के 
वनवासी पांडवो के घर आना
भोजन के लिए व्यवस्था किये जाने के लिए कहना 
 और भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा पांड्वो के बर्तनों में से अवशेष रहे खाद्य पदार्थ का तुलसी पत्र से सेवन करने पर 
दुर्वासा और उनके शिष्यों का अचानक स्नान किये जाने के 
दौरान तृप्ति का अनुभव करना यह दर्शाता है
परमपिता परमात्मा परम तृप्ति का पर्याय है
तात्पर्य यह है जो व्यक्ति परमात्मा के जितने समीप है 
वह उतना ही तृप्त है संतृप्त है
जो व्यक्ति अतृप्त है तृष्णाओ से घिरा हुआ है 
वह मानसिक रूप से दरिद्र होने के साथ- साथ
परम तत्व से दूर है

Monday, December 17, 2012

रक्त बीज


माँ दुर्गा जिसे नवरात्रि में प्रसन्न करने के लिए
जप तप व्रत अनुष्ठान किये जाते है
कुछ लोग स्वयम को ईश्वरीय मात्र सत्ता के
समीपता का अनुभव करते हुए मिथ्याभिमान पाल लेते है
दुर्गा सप्त शती में उल्लेख है रक्त बीज नामक राक्षस
जिसकी प्रत्येक रक्त बूँद से नवीन राक्षस उत्पन्न हो जाता था
क्या कभी हमने सोचा है की प्रत्येक व्यक्ति के भीतर
एक रक्त बीज विद्यमान है
जिसे हमारे ह्रदय में विराजमान ईश्वरीय सत्ता संहार करना चाहती है
पर हम अपने भीतर के रक्त बीज को पोषण देते रहते है
परन्तु ह्रदय में विराजमान ईश्वरीय शक्ति को जाग्रत नहीं करते
रक्त बीज हमारे मन में विद्यमान कुविचार है
कुविचार हमें करते कुकर्म की और प्रवृत्त करते है
विचार की श्रृंखला एक बार प्रारम्भ होने पर आसानी से टूट नहीं पाती है
एक कुविचार को कई कुविचारो और कुकर्मो को जनक होता है
नवरात्री में साधना के दौरान हमारे भीतर की
दैवीय सत्ता जैसे ही एक कुविचारो का दमन करती है
वैसे दूसरा कुविचार तीव्र गति से उठ जता है
दूसरा कुविचार को पुन दैवीय शक्ति समाप्त करती है
तो तीसरा कुविचार शिर उठाने लगता है
यह संघर्ष जब अंतहीन होने लगता है
तो हमें अपने भीतर स्थित माँ नव दुर्गा का आश्रय लेना होता है
अर्थात क्रिया की त्रि-शक्ति को अवलंबन लेना होता है
तब हमारे भीतर स्थित देवीय शक्ति मन में उठने वाले
दुष्ट विचारों का शमन न कर वध करती है
वध भी इस प्रकार से करती है की दूसरा तीसरा या कोई भी
कुविचार पुन उत्पन्न हो ही नहीं
इस प्रकार से हमारी नव दुर्गा साधना सफल होकर
हमें सच्चे अर्थो में दैवीय आशीर्वाद प्रात होता है

Monday, November 19, 2012

त्रिदेव और लोकतंत्र तीन स्तम्भ


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लोकतंत्र के मुख्य रूप से तीन स्तम्भ
विधायिका ,कार्यपालिका,न्यायपालिका है
कभी हमने सोचा है कि त्रिदेव ब्रह्मा,विष्णु ,महेश,के
व्यक्तित्व से भी तीनो स्तम्भो की भूमिका को हम भली भाॅती समझ सकते है,
यदि विधायिका का कार्य एवम अाचरण अौर भूमिकाब्रह्म देव के समान हो
तथा कार्यपालिका अर्थात प्रशासनिक अधिकारियो का कार्य एवम
अाचरण अौर भूमिका भगवान विष्णु के समान हो
व न्यायपालिका की भूमिका महेश अर्थात शिव के समान हो
तो तीनो स्तम्भ एक दूसरे के पर्याय रहेगे
एेसा लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिये शुभ रहेगा
जिस प्रकार प्रत्येक कल्प के ब्रह्मा अलग-अलग होते है
उसी प्रकार से प्रत्येक पाच वर्षो के अन्तराल के पश्चात
जनता निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से नई विधायिका का गठन करती है
विधायिका अर्थात लोकसभा ,राज्य सभा ,विधान सभा
जिस प्रकार से समय समय पर अावश्यकता के अनुरूप विधेयको को पारित कर
अधिनियमो का निर्माण करते है
उसी प्रकार से ब्रहम देव स्रष्टि मे अावश्यकता के अनुरुप
जीवो,वनस्पतियो,ग्रहो ,उपग्रहो,ब्रह्माण्ड की रचना कर उनकी अायु अाकार प्रकार
अौर भूमिका निर्धारित करते है
विधायिका देश के सभी समुदायो का प्रतिनिधीत्व कर
उनके हितो के प्रति जबाब देह होती है
उसी प्रकार से ब्रह्म देव उनके नर ,दानव ,देवता,गन्धर्व इत्यादि को
उनके प्रारब्ध अौर पुरुषार्थ के अनुसार वरदान अौर उचित योनि मे जन्म प्रदान करते है
परिणाम चाहे जो हो वे अपने विधान को बदलते नही है
विधायिका के सदस्यो अर्थात जन प्रतिनिधियो को
उसी प्रकार से अपने चिन्तन ,ग्यान अौर दर्शन की
चहू दिशाये तथा सम्वाद के सभी मार्ग खुले रखने चाहिये
जिस प्रकार से बह्म देव चारो दिशाअो मे चार मुखो से अौर अाठ अाॅखो से
स्थितियो का समुचित अध्ययन करते रहते है तथा सम्वादरत रहते है
ब्रह्मदेव का कमल अासन पर विराजित होना हाथो मे किसी प्रकार का
अस्त्र नही होकर वेद ग्रन्थ होना इस तथ्य का प्रतीक है कि
विधायिका मे बाहुबली या अपराधी तत्वो को निर्वाचित नही होना चाहिये
सज्जन अौर ऐसे सतोगुणी का निर्वाचित होने चाहिये
जिन्हे विधी या सामाजिक सन्दर्भो से जुडे विषयो का पर्याप्त ग्यान या
अनुभव हो या जो इनमे रूचि रखते हो
विधायका को कार्यपालिका अौर न्याय पालिका के प्रति उसी प्रकार से
सम्मान का भाव रखना चाहिये जिस प्रकार से ब्रह्मदेव
भगवान विष्णु अौर शिव के प्रति रखते है
हम यह देखते है कि भगवान विष्णु प्रत्येक प्रकार का कार्य करने हेतु
तत्पर रहते है तथा उन्होने जितने अवतार धारण किये है
उतने किसी भी अन्य देवता ने अवतार धारण नही किये है
अवतारो के माध्यम से भगवान विष्णु ने निरन्तर समाज को समधान प्रदान किये है
उसी प्रकार से कार्यपालिका को विविध अायामो मे प्रवेश कर समाज अौर देश की
समस्याअो को सुलझाने हेतु तत्पर रहना चाहिये
भगवान शिव जो लोकतंत्र के तीसरे स्तम्भ अर्थात न्याय पालिका
के प्रतीक के रूप मे है का व्यक्तित्व यह बताता है
न्याय पालिका के कनिष्ठतम से वरिष्ठतम न्यायाधीश का व्यक्तित्व कैसा होना चाहिये
भगवान शिव जैसा वैरागी स्वभाव , सर्वहारा वर्ग के लिये संवेदना की भावना
,समाज के अभिजात्य वर्ग से लगाकर उपेक्षित वर्ग तक समानता का भाव
,गरिमापूर्ण अाचरण शिव जी को सभी देवो मे विशिष्ट बना कर महादेव बनाता है
उसी प्रकार से न्यायपालिका का सच्चा प्रतिनिधि शिव के व्यक्तित्व का न्यायाधिश
समाज के प्रत्येक व्यक्ति मे न्याय के प्रति श्रद्धा की भावना उत्पन्न करता है

Sunday, November 11, 2012

धन तेरस एवं कुबेर देव

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दीपावली के त्यौहार पर धन तेरस की तिथि पर
लोग स्थावर अथवा चल संपत्ति का क्रय -विक्रय करते है
मान्यता है की धन तेरस को कुबेर देवता की
पूजा किये जाने से स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है
प्रश्न यह है कि कुबेर देवता की पूजा से
स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति क्यों होती है ?
कुबेर देवता देवताओं के कोषाध्यक्ष है
देवताओं का कोष अक्षय रहता है
संपत्ति अक्षय रहे इसके लिए संपदा का
दैविक होना अनिवार्य है
आसुरी संपदा सरलता से प्राप्त हो सकती है
क्षणिक सुख सुविधाए प्रदान कर सकती है
परन्तु उसकी अक्षयता और स्थिरता
उसकी प्राप्ति किये जाने के साधनों पर निर्भर रहती है
कुबेर देव रावण के भ्राता थे तथा स्वर्णिम लंका के अधिपति थे
 लंका की रचना भगवान् विश्वकर्मा द्वारा
 पवित्र साधनों से अर्जित धन संपदा से की गई थी
लंका में सम्पूर्ण रूप से वैभव सुख सुविधाओं से
सुसज्जित होकर चहु और सिन्धु जल से सुरक्षित थी
परन्तु रावण द्वारा अपनी आसुरी शक्ति के बल पर
अपने भ्राता कुबेर से छीन लिया गया
कुबेर देव राज्य विहीन हो गये
किन्तु उन पर माता महालक्ष्मी की असीम आशीष था
इसलिए वे देवताओं के कोषाध्यक्ष बने
उन्हें देवताओं का अक्षय कोष प्राप्त हुआ
कालांतर में कुबेर देव से छीन ली गई
स्वर्णिम लंका और अवैध रूप एकत्र किये गये धन को
मारुतिनंदन हनुमान द्वारा भस्म कर दिया गया
अर्थात रावण आसुरी संपदा का स्वामी था
जो क्षयशील अवस्था में रही
कुबेर देव दैविक संपदा के स्वामी थे
इसलिए उनसे छल-बल पूर्वक संपदा
रावण द्वारा हर लिए जाने के बावजूद
उन्हें देवताओं का अक्षय राज कोष प्राप्त हुआ
तात्पर्य यह है की स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए
यह आवश्यक है की
उसकी प्राप्ति श्रेष्ठ साधनों द्वारा की जाय
तथा कुबेर देव जैसी सात्विक मानसिकता रखी जाय
लुटी हुई किसी से छीनी गई ,चुराई गई संपदा
कभी भी स्थिर और अक्षय नहीं रहती है




Thursday, November 1, 2012

जरासन्ध अर्थात जरा+सन्ध

http://krishnasmercy.files.wordpress.com/2010/09/bhima_jarasandha.jpg?w=204&h=268


जरासन्ध का सन्धि विच्छेद किये जाने पर
जरा+सन्ध होता है जरा अर्थात व्रद्धावस्था
सन्ध अर्थात सन्धि
जरासन्ध का शाब्दिक अर्थ व्रद्धावस्था की आयु
तथा युवावस्था की आयु का सन्धि काल
कोई भी युवा व्यक्ति बुढापे की अचानक अग्रसर नही होता
बुढापा शनै: शनै: व्यक्ति को अपना शिकार बनाता है
जरासन्ध और भगवान क्रष्ण के बीच कई बार युद्ध हुये थे
कहते है जरासन्ध ने मथुरा पर सोलह बार आक्रमण किये थे
जो भगवान क्रष्ण ने विफल कर दिये थे
बुढापा भी जीवन को प्रकारो क्षीण करता है
कभी तो व्यक्ति के जोडो मे दर्द होता है
तो कभी आँखों से कम दिखाई देना शुरू होता है
कभी त्वचा पर झुर्रिया पडना प्रारंभ होती है
तो कभी ह्रदयाघात से प्राण संकट मे पड जाते है
या उच्च रक्तचाप निम्न रक्तचाप तन मन मे बैचेनी बडा देता है
जरासन्ध की विशाल सेना से मथुरा को बचाने के लिये
भगवान क्रष्ण ने अपने राज्य को समुद्र के मध्य
द्वारका के नाम से राज्य स्थापित किया था
समुद्र के बीच द्वारका स्थापित किये जाने का तात्पर्य
यह है कि ऐसा स्वास्थ्य जो यम नियम के आसन प्राणायाम
के चहु रक्षा दिवारो से रक्षित हो ऐसे स्वास्थ्य मे साँसे फेफडो मे
और रूधिर धमनियो मे ,चेतना तंत्रिका-तंत्र मे उसी प्रकार से
संचरण करती है जिस प्रकार श्री क्रष्ण की द्वारका मे जन -जन
सुख शांती और सम्रद्धि से निवास कर विचरण करते थे
जरासन्ध का वध भीम के द्वारा द्वन्द्व युद्ध के
 माध्यम से करवाया गया
आशय यह है कि बुढापा के युवावस्था पर सोलह 
प्राण घातक प्रहार होते है
जो सोलह प्रकार की शारीरिक दुर्बलताओ  को देते है
अन्त मे बुढापा व्यक्ति के प्राण हर लेता है
यदि बुढापे के जरासन्ध को परास्त करना है तो
हमे भगवान क्रष्ण द्वारा निर्धारित नीति के अनुसार जीवन यापन करना होगा
दिनचर्या को नियमित करना होगा
आहार विहार संयमित करना होगा
यम नियमो का पालन करने होगा
तभी हम बुढापे को युवावस्था के सन्धि स्थल से प्रथक 
किया जाना संभव होगा
हमे अपनी युवा वय एवम शारीरिक स्वास्थ्य को बचाने के लिये
महाबली भीम का अवलम्बन लेना होगा
अर्थात अधुरे प्रयास न कर भीम अर्थात भरसक प्रयास करना होगे
एक-एक कर सारी दुर्बलताओ को दूर करनी होगी
तथा जरासन्ध का वध कर युवावय को दीर्घ काल तक 
बनाये रखना होगा
वर्तमान मे सुखी और स्वस्थ जीवन का यही मन्त्र है

Thursday, October 25, 2012

विजयादशमी राम और रावण













विजयादशमी राम और रावण


विजयादशमी अर्थात  विजय का दिन अधर्म पर धर्म की विजय का दिन , असत्य पर सत्य की विजय का दिन रावण पर राम की विजय का  दिन .
रावण - रावण अति विद्वान पंडित, सास्त्रो का ज्ञाता, ज्योतिष्य विद्या मैं निपुण , महान कवि , एक अच्छा संगीतकार ,
शिव का परम भक्त ,
युद्ध एवं राजनीती का कुशल . अति बलवान , अस्त्र सस्त्र और सास्र्त्रो का धनि , स्वर्ण लंका का स्वामी.  देवो पर विजय प्राप्त  . 
और भी अनेक गुणों और कलाओ मैं महारथी रावण सर्वगुण सम्पन्न ,
एक ही व्यक्ति मैं जब इतने गुण हो जितने दस लोगो मैं होते हैं तो उसे दसानंद कहने मैं कोई अतिश्योक्ति नही हैं . रावण ने अपने  पुरसार्थ 
के द्वारा इतनी  योग्यता प्राप्त की के  देवता भी उससे भयभीत रहते सारी धरा उसकी शक्ति के आगे डोलने लगती परन्तु जब एसा ज्ञानवान गुणवान बलवान व्यक्ति अपने ज्ञान और बल का प्रोयोग दुसरो को कष्ट देने दुसरो का मान सम्मान हरने और सम्पूर्ण धरा जन जीवन पर अतिक्रमण करने के लिए करे , अपने अहं और भोगजनित वासनाओ की पूर्ति के लिए करे  तो उत्तम कुल मैं जन्म लेने के बाद भी एसा व्यक्ति असुर अर्थात राशस हो जाता हैं जेसा रावण के साथ हुआ पुल्स्थ  ऋषि के उत्तम वंश  मैं उत्तपन होने के बाद भी हम  रावण को राशस के रूप मैं ही याद रखते हैं. और जिसकी मृत्यु पर संसार हर्ष मनाता हैं . इसलिए हमे रावण से सीखना चाहिए के किस प्रकार एक व्यक्ति अपने  पुरसार्थ 
से सम्पूर्ण धरा को भी अपने अधीन कर सकता हैं   परन्तु  हमे  चाहिए की हम अपने ज्ञान और बल का उपयोग सबके हित मैं करे कल्याण के लिए करे जेसा की श्री राम ने किया .

राम - रघुकुल सिरोंमणि , आदर्श की प्रतिमूर्ति , सत्य के प्रतीक , धर्म के रक्षक , धनुर्धरो मैं सर्वश्रेष्ट , ज्ञान और बल मैं सम्पूर्ण, सदाचारी , विनम्र , महान त्यागी , दुसरो के लिए कष्ट सहने वाले परमार्थी, छोटे से छोटे व्यक्ति को भी समान सम्मान देने वाले. आज्ञाकारी पुत्र , आदर्श पति. आदर्श भाई , आदर्श मित्र, नरो मैं नरोतम  , पुरषों मैं पुर्शोतम , दीनदयाल , सबके कष्ट हरने वाले , श्री राम.

श्री  राम के यही गुण उन्हें विश्व मैं पूजनीय भगवान् बनाते हैं श्री राम ने हमे सिखाया की किस प्रकार एक मनुष्य अपने धर्म का पालन करते हुए सत्य पर अडिग रहकर  विश्व और समाज  के हित मैं अपने व्यक्तिगत सुखो का त्याग कर के मनुष्य से इश्वर बन जाता हैं  मनुष्य को चाहिए की धन से अधिक धर्म को प्राथमिकता दे,
जेसे श्री राम ने पिता की आज्ञा और तत्कालीन परिस्थितयो को देख कर अयोध्या का राज्य त्याग कर वन गमन किया रावण वध उनका व्यक्तिगत शत्रुता का युद्ध नही था ,
क्योकि जब ऋषि विस्वामित्र ने उन्हें तत्कालीन समस्याओ से अवगत कराया के किस प्रकार राक्षस लोग जो की रावण के बल की छत्रछाया मैं  सज्जन, व्  साधू लोगो को कष्ट देते हैं उनकी क्रूर हत्या करते हैं,
गौ माता किस प्रकार दुखी हैं किस प्रकार वह लोग बलात माताओ व  बहिनों  का हरन कर उनका शील भंग करते हैं यज्ञ आदि  धर्मिक अनुष्ठानो मैं विघ्न पहुचाते हैं ,  तो श्री राम को  यह  सब देख सुन कर बहुत दुःख हुआ  और उन्होंने उसी वक्त धरती को निसाचर दुष्ट राक्षसों  से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया ,

" निशिचर निकल सकल मुनि खाए देख रघुवर नयन जल आये"  "निसिचर हिन् करहु जग माहि भुज उठाये किंह पर्ण ताही"
  
अत : ये कोई व्यग्तिगत युद्ध नही अपितु धर्म युद्ध था .
इसीलिए हम विजयदसमी पर्व मनाते हैं  हमे चाहिए की अपने अंदर के रावण को मारे और राम के आदर्शो का पालन करे 
                                                                 जय श्री राम 

Friday, October 5, 2012

क्षमता का आकलन और कार्य में सिध्दी

व्यक्ति जीवन मे न तो स्वयम का आकलन कर पाता है
और नही परिस्थितियो का आकलन कर पाता है
जिसके कारण पूर्वानुमान सारे ध्वस्त हो जाते है
परिणामस्वरूप हमे जीवन मे असफलता हाथ लगती है
जीवन प्रबन्धन के विषय मे समुचित आकलन
उचित अनुमान आवश्यक  है
पवन पुत्र हनुमान का व्यक्तित्व इस दिशा मे हमारे सम्मुख
आदर्श प्रस्तुत करता है
रामायण मे यह प्रसंग महत्वपूर्ण है कि
सीता की खोज मे समुद्र के किनारे ॠक्षराज जाम्बवंत के द्वारा
हनुमान जी को उनमे निहीत शक्ति का आभास  कराया जाता है
तब हनुमान जी को शक्ति का आभास होता है
अपनी वास्तविक शक्ति का आभास होने पर भी
हनुमान जी समुद्र को लांघने के लिये तत्क्षण तत्पर नही होते है
अपितु सिंधु तट पर खडे रह कर समुद्र की चौडाई का 
ठीक ठीक आकलन  करते है
सोचते है तत्पश्चात अपनी क्षमता का आकलन  करते है
अनुमान लगाते है कि समुद्र लांघना  का कार्य उनकी क्षमता के अनुरुप है
या नही
समुचित आकलन  के पश्चात ही वे समुद्र लाघने  हेतु अग्रसर होते है
जिसमे कितनी बाधाये उपस्थित होने पर भी वे सफलता पूर्वक
समुद्र को पार कर लंका मे पहुचते ही नही
बल्कि सौपे गये कार्य का निष्पादन कर लंका दहन कर वापस लौट आते है
कहने का आशय यह है कि व्यक्ति को किसी की झूठी प्रशंसा से प्रसन्न न हो
अपनी क्षमता का समुचित मूल्यांकन कर उत्तरदायित्व का वहन करना चाहिये
अन्यथा असफलता ही हाथ लगती है