Total Pageviews

Showing posts with label कोरोना काल. Show all posts
Showing posts with label कोरोना काल. Show all posts

Thursday, May 13, 2021

कोरोना वैक्सीनैशन

          जब से कोरोना के विरुध्द वैक्सीनेशन का अभियान चला है । लोगो मे वैक्सीन लगवाने की हौड़ लग गई है । जिन लोगो को वैक्सीन के  दोनों डोज लग गये है ।उनका ही नही उनके पूरे परिवार का आत्म विश्वास चरम पर पर है । उन्हें अपने सम्पूर्ण होने का अहसास होने लगा है ।परिवार वालो का यह कहना है कि उनके परिवार में एक ऐसा व्यक्ति है जिंसको दोनों वैक्सीन लग चुके है ।यह अहसास ठीक उसी प्रकार का प्रतीत होता है ।मानो पुराने जमाने मे किसी भारतीय परिवार का कोई सदस्य विलायत में बैरिस्टर की पढ़ाई करके आया हो ।इस प्रकार  उसके पूरे परिवार को वैक्सीन न लगते हुए भी सभी सदस्यों को वैक्सीन लगने का प्रभाव महसूस किया जा सकता है 
               वैक्सीन लगवाने की हौड़ में अब तो दो प्रकार की वैक्सीनो का तुलनात्मक विश्लेषण करने वाले लोगो की भी कोई कमी नही है । जिंसको जो वैक्सीन लगी है ,वह उसी वैक्सीन का ब्रांड एम्बेसडर बन गया है । उसमे यह सामर्थ्य है कि वह दूसरी वैक्सीन के सारे दोष बता कर उसके दुष्परिणामों पर प्रकाश डाल सके । 
           जब पूरा विश्व वैक्सीनेशन के दौर से उबर चुका था । मात्र भारत जैसे देश मे शिशुओं के टीकाकरण के उपक्रम शासकीय स्तर पर किये जा रहे थे । तब  कोरोना जैसी  महामारी  टपक पड़ी और उसने छोटे बच्चों के साथ बड़ो को भी वैक्सीनैशन की कतार में लाकर खड़ा कर दिया । शुरुआती दौर में कुछ लोग कोरोना की वैक्सीन लगवाने में संकोच कर रहे थे । जब उन्हें कोई  वैक्सीन लगवाने के लिए कहता था तो वे स्वयम को बहुत अपमानित महसूस करते थे ,परन्तु बाद में जैसे कोरोना से लाशो के ढेर होना शुरू हुए ,हॉस्पिटल से शव लेने के लिए लंबी लंबी लाईने लगने लगी। श्मसान घाटो में टोकन सिस्टम से शवो के अंतिम संस्कार होने लगे ।जब उनकी आंख खुली की वैक्सीन लगवा लिया जाये , तब तक काफी दे हो चुकी थी। जब वे वैक्सीन लगवाने को पहुंचे तो कोविड टीका करण केंद्र पर पंक्ति में कोरोना संक्रमित लोग भी मिले ।  
          अब उन लोगो के बारे में विचार करे जिन लोगो ने अधूरे मन से ही सही पहला वैक्सीन लगवा लिया था। दूसरा लगवाने का मौका आया था वैक्सीन समाप्त हो चुके थे । मात्र एक वैक्सीन का डोज लेने पर उनको ऐसा लगने लगा कि वे अमृत का अधूरा प्याला ही ग्रहण कर सके । काश पूरा प्याला पी पाते इस तरह वे राहु केतु की तरह शेष प्याले नुमा वैक्सीन का दूसरा डोज लेने के लिए बेतहाशा भटक रहे है । भगवान करे उनकी यह तलाश सीघ्र पूरी हो । ऐसे में यह खबर की एक वैक्सीन कंपनी का मालिक तरह तरह धमकियों से तंग आकर देश छोड़ चुका है वैक्सीनैशन अभियान के लिए खतरनाक मौड़ ले चुका है 
       हमारे एक परिचित ने तो वैक्सीनैशन अभियान की कछुआ चाल को देख कर वैक्सीन लगवाने से बेहतर स्वयम की इम्युनिटी बूस्ट करने की रणनीति बना ली है ।उनका यह मानना है कि वैक्सीन की शरीर में काम करने की भी एक अवधि है । अवधि व्यतीत होने के बाद वैक्सीन जनक प्रतिरोधक क्षमता समाप्त हो जावेगी इसलिए वैक्सीन लगवाने से बेहतर है इम्युनिटी बूस्ट करने के स्थाई उपायों के बारे में सोचा जाये । इसी सिलसिले में उन्होंने नाक में नींबू , तेल डालने सहित इतने विकल्पों का अविष्कार किया है कि उनके पास तद विषयक सामग्री पर्याप्त रूप से उपलब्ध है ।निकट भविष्य में वे इस विषय पर एक पुस्तक प्रकाशित करवाने के बारे में भी सोच रहे है ,परन्तु उनको कोई प्रकाशक नही मिल रहा है 
     

Saturday, May 8, 2021

इम्युनिटी

         इम्युनिटी क्या है ?इम्युनिटी कैसे बढ़ती है?इम्युनिटी कहा से आती है ? इत्यादि प्रश्नों के कई जबाब  है ।चिकित्सा विज्ञान के अनुसार इम्युनिटी  व्यक्ति का उत्तम स्वास्थ्य है जो रोगों से शरीर को लड़ने की क्षमता प्रदान करता है। 
            इम्यूनिटी सकारात्मक सोच से प्राप्त होती है । इम्युनिटी प्राप्त होती है उचित खान पान और अच्छी आदतों से । इम्युनिटी रहती है आस्तिकता के भाव मे जहाँ से किसी व्यक्ति को आत्मविश्वास मिलता है । इम्युनिटी एक आश्वस्ति का भाव है जो किसी व्यक्ति को आत्मीय लोगो से प्राप्त होता है ।इम्युनिटी रचनात्मक कौशल और समय के सदुपयोग  से मिलती है । इम्युनिटी मिलती है हमे नियमित जीवन और व्यायाम से अच्छे साहित्य के अध्ययन से । इम्युनिटी मिलती है सत्पुरुषों के सत्संग से । इम्युनिटी का स्त्रोत हमारे भीतर है जो हमे कुदरत से प्रेम करना सिखाता है  
                जिन लोगो में आस्तिकता का भाव नही है ,वे आत्मबल से विहीन होते है । जिन लोग का उचित खान पान नही है ,उन्हें पोषण प्राप्त नही होता । स्वाभाविक रूप से उनका स्वास्थ्य कमजोर रहता है । जो लोग नियमित व्यायाम नही करते वे उन्हें अनेक प्रकार की व्याधियों और शारीरिक पीड़ाओं से गुजरना पड़ता है । 
           जिन लोगो को परिवार और आत्मीय जन से आश्वस्ति का भाव प्राप्त नही होता है वे भीतर से स्वयम को असहाय और अकेले अनुभव करते है । जो लोग सत साहित्य और सत्पुरुषों का सानिध्य प्राप्त नही करते उनके भीतर आत्महीनता की ग्रन्थि निरन्तर सक्रिय रहती है। वे किसी के बारे में अच्छा सोच ही नही सकते । जो व्यक्ति किसी रचनात्मक गतिविधि में लिप्त होकर समय का सदुपयोग नही करता वो तरह तरह की आशांकाओ से ग्रस्त रहता है, निरन्तर नकारात्मक विचार उसे घेरे रहते है । जो व्यक्ति कुदरत के प्रति स्नेह और सरंक्षण का भाव नही रखता वो ईश्वर प्रदत्त  प्राकृतिक वरदानों से वंचित रह जाता है उस व्यक्ति को न तो झरने की कल छल सुनाई देती है और नही वह पंछियो की चहचहाहट का आनंद ले पाता है । उस व्यक्ति को बारिश की शीतलता भी बुरी लगती है वन्य प्राणियों से वह जुड़ाव महसूस ही नही कर पाता है ।भला ऐसे व्यक्ति को इम्युनिटी कहा से प्राप्त होगी 
      इम्युनिटी जीवन की इच्छा शक्ति है । बहुत से लोग ऐसे होते है। जो गम्भीर रूप से रुग्ण होने पर भी मृत्यु को प्राप्त नही होते ।अपनी इच्छा शक्ति के बल पर जीवन मृत्यु के बीच संघर्षरत रहते है और अंत मे वे म्रत्यु को मात देते है । इम्युनिटी तब समाप्त हो जाती है जब व्यक्ति तरह तरह की आशंकाओ और भय से ग्रस्त हो जाता है ।वह परिस्थितियों से पूर्णतः निराश हो जाता है । उसे जीवन के प्रति कोई आसक्ति शेष नही रह जाती है । कई लोग तो चिकित्सालयों के नकारात्मक परिवेश से घबराकर अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता खो देते है । 
          प्रायः यह देखने मे आता है । युध्द में आहत सैनिक सैकड़ो घाव सहने के बावजूद जीवित बच जाते है । इसलिये अच्छी इम्युनिटी के लिये  जीवन को योध्दा की तरह जीना आवश्यक है । जिनके जीवन का कोई उद्देश्य नही होता उन लोगो मे भी जीवन की इच्छा शक्ति का अभाव होता है । इसलिए अच्छी इम्युनिटी के लिये व्यक्ति का जीवन उद्देश्य पूर्ण होना आवश्यक है 
       

Friday, April 30, 2021

ऑक्सिजन पुरुष

               जब से कोरोना रोग आया है, तब से ऑक्सिजन पुरुष अपना ऑक्सिजन का लेवल बढ़ाने में लगे हुए है । जब उन्होंने ये सुना है कि कोरोना में संक्रमित होने पर ऑक्सिजन का स्तर रक्त में कम हो जाता है वे ऑक्सिजन बढ़ाने का कोई मौका छोड़ना नही चाहते । चाहे सुबह उठकर भृमण का कार्यक्रम हो या भस्त्रिका अनुलोम विलोम प्राणायाम उन्होंने कोई उपाय नही छोड़ा है । 
                  ऑक्सिजन बढ़ाने के लिये उन्होंने तरह के एंटी ऑक्सीडेंट , मल्टी विटामिन की दवाईयां अलग से रखी हुई है ।  दिन में दो बार बाकायदा वे ऑक्सीडोमीटर से अपना ऑक्सिजन का लेवल चेक करते रहते है । उनका प्रयास यह रहता है कि किसी भी परिस्थिति में उनका ऑक्सीजन लेवल 97 से कम न रहे । पर्याप्त ऑक्सिजन का लेवल पाए जाने पर उनके चेहरे पर  संतुष्टि ही नही प्रसन्नता भी दिखाई देती है ।उनके होठो पर  एक हल्की सी मुस्कान भी तैरती रहती है । उन्हें मात्र स्वयम के ऑक्सिजन लेवल की ही चिंता नही अपितु परिवार के सभी सदस्यों को भी वे ऑक्सिजन लेवल बढ़ाने के लिए भी प्रेरित करते रहते है । 
                    उन्होंने पूरी लिस्ट बना रखी है कि कौनसा पौधा कितनी कार्बन डाई ऑक्सईड सौंखता है और कितनी ऑक्सिजन देता है । कौनसे पौधे 12 घंटे ऑक्सिजन देते है और कौनसे पौधे 24 घण्टे ऑक्सिजन देते है ।उनके ऑक्सिजन सूंघने की क्षमता अत्यंत अद्भुत है । वे किसी भी पेड़ के निकट जाकर बता देते है अभी वह कितनी ऑक्सिजन दे रहा है और भविष्य में कितनी दे सकता है 
               ऑक्सिजन लेवल को उन्होंने सीधे  प्रतिरोधक क्षमता से जोड़ रखा है ।उनका दावा है कि जब तक ऑक्सिजन का लेवल अच्छा है ।कोरोना उनका बाल भो बांका नही कर सकता है । उनकी दृढ़ मान्यता है कि आदमी कोरोना से नही मरता ऑक्सिजन का स्तर कम होने से मर जाता है ।उन्होंने ऑक्सिजन लेवल संधारित करने के आपातकालीन उपाय भी कर रखे है ।मोहल्ले के लोग आश्वस्त है कि उनके रहते किसी व्यक्ति ओक्सिजन का लेवल कम नही हो सकता ।
             उनकी ऑक्सिजन के प्रति जागरूकता देखकर लोग उन्हें ऑक्सिजन पुरुष के रूप पहचानने और जानने लगे । उनके दर्शन मात्र से ऑक्सिजन प्राप्त करने का पुण्य प्राप्त होता है । जरा सा किसी का ऑक्सिजन लेवल कम हुआ कि नही की  वह ऑक्सिजन पुरुष के दर्शन का अभिलाषी हो जाता है। मचल उठता है कि उसे किसी भी हालत में ऑक्सिजन पुरुष के दर्शन करना है। कितना भी गंभीर रोगी हो उनके दर्शन के उपरांत स्वयम को स्वस्थ अनुभव करने लगता है । उनकी ऑक्सिजन के प्रति इस आसक्ति के कारण उन्हें ऑक्सिजन अवार्ड देने की जोरो से मांग उठने लगी है । 

कोरोना काल की मान्यताये और मिथक

कोरोना काल ने कई मिथकों को तोड़ा है । कई को जोड़ा है । कई मान्यताये ध्वस्त हुई । कितने ही सिद्धान्त खंडित हुए । कितने ही मंडित हुए  है। कोरोना काल के पूर्व उस व्यक्ति को सर्वाधिक सफल माना जाता था । जो लोगो से मिलता जुलता हो , व्यवहार कुशल हो । अंतर्मुखी न हो । समूह में रहने का अभ्यस्त है , जिसके कई मित्र हो ।  परन्तु कोरोना ने उक्त सभी धारणाओं को ध्वस्त किया है । कोरोना ने हमे यह बताया है कि जीवन मे सफलता के साथ साथ स्वस्थ रह कर जीवन जीना भी जरूरी है । मात्र व्यवहार कुशलता काम नही आती है व्यक्ति को एकांत में रहने का भी अभ्यास भी होना आवश्यक है ।  कोरोना से बचाव का मूल मंत्र सोशल  डिस्टेंसिग बन चुका है । आत्मीयता दर्शाने के तरीकों में कई प्रकार के बदलाव आये है 
           व्यक्ति कितना ही धनी हो उसका कोई महत्व नही है व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक रूप से फिट रहना जरूरी है । कोरोना ने रोग प्रतिरोधक क्षमता को नवीन आयाम दिये है । वर्तमान में इस महामारी ने कई बलवान और शक्तिशाली लोगो को भी नही छोड़ा है वही गरीब और अमीरी के भेद को भी समाप्त किया है । जहाँ किसी जमाने मे कुछ लोग हॉस्पिटल जाना पसन्द  नही करते थे, परन्तु आजकल हर व्यक्ति  हॉस्पिटल में  और  बेड वेंटिलेटर की तलाश कर रहा है । 
           वैज्ञानिकों का यह मत है कि एक वृक्ष कम से कम 200 पौंड ऑक्सिजन  दिन भर में देता है । जिसके परिसर में जितने अधिक वृक्ष है वह उतना ही प्राणवान है यह मान्यता बलवती हुई है कि बलवान और धनवान होने की अपेक्षा व्यक्ति को प्राणवान होना जरूरी है  । किसी व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता में एक दिन में वृध्दि नही हो सकती है । यह दीर्घकालिक और सतत प्रक्रिया है जो नियमित जीवन आहार विहार और समुचित व्यायाम से ही सम्भव है ।
                   जिन लोगो को किसी जमाने मे यह कहते हुए सुना जा सकता था कि पेड़ो की छाया के कारण उन्हें सूरज की धूप नही मिलती , पेड़ के पत्ते गिरने से घर आँगन में कचरा बहुत होता है । पेड़ की डालियो पर पक्षियों के बैठने से उनकी बीट गिरती है जिससे उन्हें दुर्गंध अनुभव होता है । फलदार वृक्षो से आकर्षित होकर आए दिन बंदर आते रहते है । उन्हें कोरोना से संक्रमित होने के फलस्वरूप शरीर मे  ऑक्सिजन के अल्प स्तर की समस्या से जूझते हुए देखा जा सकता है ।  अब उन्हें याद आती है वे पेड़ की घनी डालिया । शीतल छाया , उड़ते हुए खगदल और उनके घोसले । यह कोरोना काल  का सकारात्मक पक्ष ही है । ऐसे लोग किसी भी कीमत पर ऑक्सिजन के सिलेण्डर क्रय करने को तैयार बैठे है । 
         वे लोग जो किसी व्यक्ति की यह कह कर मजाक उड़ाते थे कि वह व्यक्ति अंर्तमुखी प्रवृत्ति का है । अव्यवहारिक है । स्वयं में डूबा रहता है । अत्यधिक धार्मिक है , किताबी कीड़ा है , दार्शनिक है , स्वयम को बहुत बड़ा कलाकार या साहित्यकार समझता है, अप्रासंगिक विषयों पर विचार करता रहता है । समाज से कटा रहता है । आज उस उस व्यक्ति की उन सब बुराईयो में उन्हें अच्छाईयां दिखाई देती है और सोचते है कि काश वे ऐसा बन पाते तो वे वे कोरोना काल मे समुचित शारीरिक और मानसिक प्रतिरोधक क्षमता के साथ महामारी से मुकाबला कर पाते 
                 कोरोनाकाल के पूर्व एक यह भी मान्यता थी कि  हम तो बूढ़े हो चुके । हमने हमारी जिंदगी जी ली है अब नये युवा लोगो को देखना कि वे क्या कर सकते है । कोरोना ने इस धारणा को ध्वस्त कर सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों को अपनी आंतरिक और बाहरी  क्षमताओं का परिचय देना का मौका दिया है  जैसे जैसे कोरोना संक्रमण से मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है । व्यक्ति कम आयु हो या या अधिक का अपने स्वास्थ्य की चिंता प्रत्येक व्यक्ति को होने लगी है आयु वर्ग वाले लोगो ने यह कहना शुरू कर दिया है कि हमने तो हमारा जीवन जी लिया तुम अपनी चिन्ता करो । ऐसी स्थिति में युवा लोगो ने भी यह जबाब देने लगे कि 

Monday, April 26, 2021

कोरोना काल के सबक

जिनके विचारो में सकारात्मकता  की प्राणवायु होती है उन्हें कुदरत से सहज ही प्राणवायु अर्थात ऑक्सिजन सुलभ हो जाती है । जिन लोगो को इस दौर में ऑक्सिजन प्राणवायु के सिलेण्डर की आवश्यकता महसूस हुई हो । वे संकल्प ले कि वे प्राणवायु देने वाले वृक्षो का रोपण ही न करे अपितु उन्हें सिंचित कर बड़ा भी करे।
          जिन लोगो के रिश्तेदारों कोरोना काल मे अंतिम संस्कार हेतु लकड़ीयो की कमी से जूझना पड़ा हो उनको यह संकल्प लेना चाहिये कि वे  अपने जीवन काल मे पर्याप्त लकड़ीया देने वाले वृक्षो को बोकर उन्हें छाया देने वाले  विशाल वृक्षो रूप में परिवर्धित करे ।कुदरत को जो हमने दिया है वही उसने हमें लौटाया है कुदरत से हमने पेड़ छीने कुदरत ने हमे ऑक्सिजन के लिए तरसाया है 
        जब ऑक्सिजन के लिए करोड़ो के प्लांट लगाए जा रहे है तब हमें शून्य बजट में ऑक्सिजन देने वाले नीम बरगद और पीपल याद आ रहे है ।ऑक्सिजन की ताजगी पहले विचारो में आती है बाद में दिलो दिमाग मे होकर फेंफड़ो तक चली जाती है ।
             रोगों की प्रतिरोधक क्षमता तन की ही नही मन की भी होती है । मन से रोगी व्यक्ति स्वतः ही तन की प्रतिरोधक क्षमता खो देता है कोरोना रोग के कहर ने हमे एक सबक सिखलाया है रहो एकांत और शान्त माहौल में रखो स्वस्थ काया है 
     

Tuesday, April 13, 2021

कोरोना पुराण

कोरोना एक बीमारी नही एक सोच है । सोच जो आदमी को निकम्मा बना देती है । कुछ लोगो को कोरोना भयावह लगता है तो कुछ लोगो को कोरोना काल न काम करने का उपाय ।कोरोना आया है चला जायेगा परन्तु सोच ऐसी है जो रहती आई है रह जायेगी। कोरोना की आड़ में कई घपले है । कोरोना कब कहा आएगा, कब जाएगा ,यह उसकी इच्छा पर नही है । नीति निर्धारकों की इच्छा पर  निर्भर है । आकड़ो के लिहाज से कितने संक्रमित हुए ,कितने संक्रमण से मुक्त हुए हुए ।कितने मरे यह या तो चिकित्सक जाने या पैथालॉजी प्रयोगशालाएं  जाने ।बेचारा आम नागरिक तो लक्षणों के भरोसे ही यह उपधारणा कर सकता है कि वह कोरोना से संक्रमित है या नही । कोई बोलता है तेज बुखार के साथ सूखी खांसी  तो कोई बोलता है कि स्वाद चखने और सुगंध सूंघने की ग्रंथियों की क्षमता में कमी , कोई बोलता है कि शरीर मे असाधारण दर्द ,कोई बोलता साँस लेने में कठिनाई सबके अपने अपने विचार है । इन सब उलझनों से मुक्त होने के लिए विशेषज्ञ लोगो ने एक नया विचार दिया है "बिना लक्षणों वाला कोरोना "मानो कोरोना एक बीमारी न हुई एक बला हो गई जो कभी भी किसी भी रूप कही भी प्रकट हो जाने को तैयार हो।
       कहते है बिना लक्षण वाला कोरोना को पहचानना मुश्किल ही नही नामुमकिन है ।डॉन  को तो सोलह मुल्कों की पुलिस तलाश कर रही थी परन्तु कोरोना को सम्पूर्ण विश्व की पुलिस भी तलाश नही कर पा रही है । उसके स्वरूप और प्रकृति को जानने के लिए कितने ही जीव वैज्ञानिक दिन रात एक कर लगे हुए है । तरह तरह के वैक्सीन नुमा हथियार एक छोटे से सूक्ष्मजीवी के लिए तैयार भी कर लिए है । हर देश अपने वैक्सीन को श्रेष्ठ और दूसरे के वैक्सीन को कमतर बताने में कोई कसर नही छोड़ रहा है । अपनी अपनी मान्यताये है, पर हमारे देश ने विश्व बंधुत्व और शांति  पूर्ण सह अस्तित्व की भावना को अंगीकार करते हुए अपने देश के वैक्सीन को निर्यात करने तथा अन्य देशों द्वारा निर्मित वैक्सीन को आत्मसात करने का  फैसला कर लिया है । 
   अब तो कोरोना के नये नये स्टैन आ जाने से बुध्दिजीवीयो और छिद्रान्वेषी लोगो को बोलने का मौका दे दिया है । लोग यह कहने से भी नही चुक रहे है कि क्या फायदा  वैक्सीन  लगवाने से ?जो वैक्सीन उपलब्ध है वे पुराने कोरोना प्रतिरूप से सामना करने के लिए निर्मित है।कोरोना के नए प्रतिरूप के लिए नही ।इसके लिए जब तक कोई वैक्सीन नहीं आएगा तब तक वे वैक्सीनशन नही करवायेगे। इस तरह के तर्क देकर वे कितने ही बार वैक्सीन लगवाने से बच चुके है । यदि शरीर मे ऑक्सिजन का स्तर जांच के दौरान कम पाया जाये वे इसे अपनी योगशक्ति प्राणायाम की उपलब्धि बताते हुए सनातन भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों पर अपनी श्रध्दा व्यक्त करने लगते है । उनके इसी भ्रांति ने कितने लोगों को मौत के समीप पहुंचा दिया है और स्वयं की श्वसन क्षमता को अत्यधिक कम कर चुके है । उन्हें पता ही नही उनके फेफड़े कितनी मात्रा में क्षतिग्रस्त हो चुके है। उन्हें कोई किसी प्रकार की जांच करवाने के लिये कहना भी अपराध है ।
       कोरोना से होने वाली मौतों के आंकड़ों को देखते हुए तथाकथित आधुनिक मनीषियों ने नए जीवन सूत्र दिए है ।उनका चिन्तन कोरोना समाधान के नवीन आयाम स्पर्श कर रहा है । उनका सोच यह यह है जितने लोगो कोरोना के संक्रमण से नही मर रहे है उससे कही ज्यादा कोरोना के भय और अकेलेपन के अवसाद से मर रहे है । इस सोच से आकृष्ट होकर शासन ने ऐसे कोविड सेंटर बनाये है , जो कोरोना संक्रमितों के अकेलेपन को दूर कर रहे है । आजकल कोविड सेंटरो में सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन की खबरे भी सुनने में आने लगी है । विधान सभा , लोकसभा चुनाव में जुटाने वाली भीड़ इसी प्रयास के उपक्रम है । कोरोना में चुनावी सभाओ में एकत्र भीड़ की आलोचना उन्हें लोकतंत्र विरोधी भावना प्रतीत होती है । 
        लोग व्यर्थ ही कोरोना को कोसने में लगे हुए है ।कोरोना ने कई लाइलाज बीमारियों का इलाज किया है ।जो आंदोलन दिल्ली पुलिस लाखो प्रयासों के बाद नही तोड़ पाई । ऐसे शाहीन बाग धरना कार्यक्रम और किसान आन्दोलन की कोरोना ने ही तो कमर तोड़ी है । देश की अर्थ व्यवस्था में कोरोना का अद्भुत योगदान है । चाहे कर्मचारियों की वेतन वृध्दि हो या वेतन आयोग की सिफारिशो का क्रियान्वयन उन पर तब तक स्थगन रहेगा ।जब तक कोरोना रहेगा । प्रदूषण मुक्ति की योजनाओ को भी कोरोना से भारी बल मिला है ।नदियों की स्वच्छता , वायु की गुणवत्ता में काफी अनुकूल प्रभाव कोरोना देव के कारण ही तो पड़ा है । जरूरत से ज्यादा आस्तिक प्रकृति के लोगो की ओर  से तो यह घोषणा भी की जाने लगी है कि कोरोना महामारी नही ईश्वरीय अवतार है ।जो समाज मे संतुलन और अनुशासन स्थापित करने आये है