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Saturday, November 15, 2014

बचपन

व्यक्ति जब बड़ा हो जाता है तो 
वह अपने बचपन को याद करता है 
बचपन की स्मृतियों में खो जाता है
 बचपन की मस्ती को याद करता है 
कहता है की काश मेरा बचपन वापस लौट आये 
परन्तु उम्र  की दृष्टि से बचपन की आयु प्राप्त करना संभव नहीं है
इसके विपरीत आयु बढ़ती  ही जाती है 
काया जीर्ण शीर्ण और जर्जर होने लगती  है 
प्रश्न यह उठता है की हम बचपन की ओर 
  इतने अधिक आकृष्ट क्यों होते है 
बचपन में व्यक्ति के स्वभाव में 
 सहजता ,सरलता ,चंचलता ,रहती है 
बच्चा परिवार का एक सच्चा सदस्य होता है 
उसके स्वभाव में पक्षी के तरह उन्मुक्तता 
अनंत आकाश में उड़ने की अभिलाषा रहती है
 संत की फकीरी समाई रहती है 
 बच्चे की अनुभूतियाँ और भावनात्मक अभिव्यक्ति  का स्तर
 प्रखर होता है 
क्या बचपन के ये सारे गुण  हम अपने स्वभाव में अंगीकार कर
 किसी भी उम्र में अपने बचपन को नहीं जी सकते
जी सकते है बशर्ते हमें अपने मन के विकार अहंकार
 धूर्तता स्वार्थ भाव को त्यागना पडेगा 
अपने स्वभाव में पारदर्शिता लाना होगी 
फिर हमारे वचन मूल्य वान  हो जायेगे 
हम शारीरिक रूप से स्वस्थ हो सकेंगे 
यह सत्य है की बड़े होने पर व्यक्ति की व्यवसायिक
 और पारिवारिक जिम्मेदारिया बढ़ जाती है 
परन्तु समस्त जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए 
व्यक्ति को अपने भीतर के बालक को 
ज़िंदा रखना चाहिए

Wednesday, November 5, 2014

सहयोग या सहानुभूति

सहानुभूति बहुत अच्छा भाव है जो मानवीय  भावना को प्रगट करता है
परन्तु अतिरिक्त  सहानुभूति व्यक्ति को कमजोर और भावुक बना देती है
इसी कमजोरी का धूर्त लोग फायदा उठा लेते है
जिस व्यक्ति को किसी के भी सहानुभूति नहीं मिलती वह भीतर से ताकतवर बन जाता है
भीतर की ताकत व्यक्ति की विषम परिस्थितियों में टूटने नहीं देती
इसलिए अतिरिक्त सहानुभूति प्रगट करने वाले व्यक्तियो से 
 सावधान  रहो 
याद रखो हमे किसी की दया या सहानुभूति की आवश्यकता नहीं अपितु सहयोग की आवश्यकता है