Total Pageviews

Showing posts with label कला एवं सृजन. Show all posts
Showing posts with label कला एवं सृजन. Show all posts

Saturday, April 6, 2019

बेटी में सपना साकार रहा

न मानव के अधिकार रहे

न करुणा पावन प्यार रहा

मानव मानव से दुखी रहा

और हृदयविहीन व्यापार रहा

मन के भीतर न ख़ुशी रही

नहीं खुशिया का श्रृंगार रहा

आंसू अविरल है नयन बहे

सुख सपनो का संसार ढहा

दुःख से धरती माँ सिसक रही

जन अपमानित मन चीत्कार रहा

दीन दुर्बल को यहाँ चुन चुन कर

शव क्षत विक्षत होता संहार रहा

हम दिवस मनाते अधिकारो के

हर पल हमको धिक्कार रहा

बीता जीवन अंधियारे में

और उजियारा उनके द्वार रहा

ढोता बचपन है बस्तों को

नाजुक कंधो पर भार रहा

बेटो में वत्सलता बाँट रहे

बेटी में सपना साकार रहा 


Wednesday, July 18, 2018

मोह से मुक्त कर दो


किसी भी प्रकार का मोह 
मुक्ति में बाधक है 
जो मोह ग्रस्त है 
वह कितनी भी पूजा पाठ 
व्रत उपवास कर ले
 मुक्त नहीं हो सकता है 
मोह के कई प्रकार होते है 
 भौतिक सम्पदा से मोह 
साधनो से मोह ,व्यक्ति विशेष से मोह,इत्यादि
मोह और प्रेम में अंतर होता है
 प्रेम परमात्म भाव है 
प्रेम में कोई अपेक्षा नहीं रहती 
जबकि मोह में कई प्रकार की 
अपेक्षाएं होती है
प्रेम कर्म की प्रेरणा है ऊर्जा है 
जबकि मोह कर्म का बंधन है 
प्रेम से उपजा कर्म 
धर्म पालन में सहायक है 
जबकि मोह ग्रस्त व्यक्ति 
कर्म से विमुख हो निज धर्म से 
पलायन कर लेना है 
शास्त्रों में मोह रूपी अन्धकार कहा गया है 
मंत्रो में मोह रूपी अन्धकार को 
दूर करने की प्रार्थना की गई है 
मोह रूपी अन्धकार से ग्रस्त हो 
कई तपस्वी अपना तपोबल खो  देते है 
बरसो की साधना
एक क्षण में नष्ट कर देते है 
प्रेम भक्ति का स्वरूप है 
वात्स्ल्य का प्रतिरूप है 
मोह कामना है वासना है 
जबकि प्रेम सच्ची साधना है 
कला से प्रेम व्यक्ति को कलाकार बना देता है 
कुदरत से प्रेम व्यक्ति को 
पर्यावरण विद 
और साहित्य से प्रेम व्यक्ति को 
महान कृतियों का जनक बना देता है 
इसलिए हे !प्रभो
  आप  हर प्राणी के जीवन में
 प्रेम का भाव भर दो मोह से मुक्त कर दो

Friday, October 28, 2016

लक्ष्य

सौंदर्य उसके लिए है
जो दृष्टि समन्न हो
वैचारिक दृष्टि से नहीं विपन्न  हो
आनंद उसके लिए है
जिसके भीतर अमृत तत्व है 
सकारात्मक सोच हो रमा हुआ सत्व है 
लक्ष्य उनके लिए 
जिन्हें दिखते उतुंग शिखर हो 
बहता हो श्रम सीकर प्रतिभा प्रखर हो
ज्ञान उसके लिए जिन्हें जिज्ञासा हो
सदा रहे अतृप्त अनंत पिपासा हो 
जीवन उसके लिए जो गतिमान हो 
रचते रहे निरंतर अनेक प्रतिमान हो

Sunday, January 17, 2016

आक्रोश एवं क्रोध

आक्रोश वैचारिक विरोध  और अन्याय 
शोषण के कारण परिलक्षित होता है 
क्रोध व्यक्तिगत स्वार्थ पर
  आघात होने कारण प्रगट होता है 
दीर्घ कालीन आक्रोश क्रान्ति और परिवर्तन का 
कारक होता है
असहमति की उग्रता मानसिक हिंसा का रूप
 धारण करती  है
 तब क्रोध में परिणित हो जाती  है 
क्रोध जब शाब्दिक हिंसा का रूप धारण 
तब विवाद और कलह में परिणित होता है 
क्रोध जब दीर्घ काल तक बना रहता है तो वह शारीरिक आक्रमण के  रूप में सामने आता है 
हिंसा में परिवर्तित हो जाता है 
व्यक्ति जब क्रोधित होता है 
तो वह भीतर में पल रही 
नकारात्मक ऊर्जा का मात्र
 २०प्रतिशत ही क्रोध के कारण ही प्रगट हो पाती है 
इसका आशय यह है करने वाला व्यक्ति क्रोध अभिव्यक्त करने के पूर्व
 अपने भीतर भीषण नकारात्मक ऊर्जा को झेलता है 
जो अभिव्यक्त होने वाले क्रोध से 
५ गुना अधिक होती है 
भीतर की नकारात्मक ऊर्जा व्यक्ति के
 हारमोन को विपरीत रूप से प्रभावित करती है 
व्यक्ति धीरे धीरे रोग ग्रस्त होने लगता है
 शारीरिक दौर्बल्य को प्राप्त कर हीनता की 
भावना से ग्रस्त हो जाता है
अध्यययन में सामने आया है 
की शारीरिक रूप से पुष्ट व्यक्ति 
क्रोध की प्रवृत्ति अल्प होती है 
क्रोध के एक स्वाभाविक प्रक्रिया है 
परन्तु क्रोध को सृजनात्मक दिशा दी जाए 
तो व्यक्ति में अपरिमित क्षमताये उदित हो जाती है

Friday, September 25, 2015

गणेश जी सृजन धर्मिता के प्रतीक

गणेश जी की प्रतिमा का निर्माण
 जितना सहज सरल है 
उनका व्यक्तित्व भी उतना ही सहज है सरल है 
गणेश जी की प्रतिमा निर्माण में जितने प्रयोग हुए है 
उतने प्रयोग किसी भी शिल्प निर्माण में नहीं हुए है 
यथार्थ में कहो तो 
गणेश जी सृजन कर्म  के देव है 
जो आमंत्रित करते है 
सृजन और शिल्प के लिए है 
सृजन कर्म  में यदि लचीलापन और प्रयोग धर्मिता की गुंजाईश नहीं हो तो 
नवीन विधाए कभी भी 
अपना स्थान नहीं बना सकती है 
और सृजन की असीम सम्भावनाओ पर
 विराम चिन्ह लग जाते है 
गणेश जी ने उनकी प्रतिमा के शिल्प निर्माण के माध्यम से सृजन कर्म को पूरी स्वतंत्रता प्रदान की है इसलिए गणेश चतुर्थी के पर्व से लगा कर 
अनंत चतुर्दशी के मध्य के समय को हम सृजन धर्मियों का उत्सव कहे तो 
अतिश्योक्ति नहीं होगी 
गणेश जी अर्थात गणाध्यक्ष 
गणाध्यक्ष अर्थात समूहों का नेतृत्व करने वाला 
गणेश जैसा व्यक्तित्व पाकर
 कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में नेतृत्व क्षमता का गुण  समाहित कर सकता है 
गणेश जी की प्रतिमा का सृजन से विसर्जन करना 
यह दर्शाता है कि 
 किसी भी पदार्थ के प्रति आसक्ति ठीक नहीं
वृहद लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी प्रिय वस्तु  का त्याग करने में भी संकोच नहीं करना चाहिए 

Thursday, June 18, 2015

परिचय

मित्रता  प्रेम या आत्मीयता हो 
इन सभी का रास्ता परिचय से होकर  गुजरता है
अनजान अपरिचित अजनबी लोगो से परिचय निकालना 
हर किसी के लिए सहज सरल नहीं है
जो व्यक्ति चिर परिचित व्यक्तियो के बीच कार्य करने का आदि होता है
 वह स्वभाव से कूप मंडूक मानसिकता का होता है 
निरन्तर अपरिचित लोगो के बीच रह कर अपनी आजीविका चलाना 
एक चुनोति पूर्ण कार्य है 
परन्तु कुछ लोग जो इस प्रकार के रोजगार से जुड़ जाते 
धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लग जाता है 
परिचय का प्रारम्भ संवाद से शुरु  होता है
अपरिचित लोगो से कैसे संवाद बिना किसी सन्दर्भ के कैसे 
स्थापित करना यह एक कला है 

Tuesday, April 21, 2015

नदी की तरह जिओ

नदी  की तरह व्यक्ति का जीवन हो तो 
जीवन में कभी निराशा का भाव नहीं रह पाता  है 
जीवन में निराशा के पल आ भी जाए तो 
बहती हुई नदी के किनारे बैठ कर 
उसे  निहारने से वह भी चला जाता है 
नदी की उतरती चढ़ती लहरे यह बताती है 
कि जीवन में दुःख और सुख के उतार और चढ़ाव 
कितने भी आ जाए 
व्यक्ति को नदी की तरह गतिशील रहना चाहिए 
जो लोग नदी में कूद कर आत्म ह्त्या कर लेते है 
उन्हें कुछ पल रुक कर नदी के किनारे बैठकर 
अपने निर्णय  कुछ देर अवश्य करना चाहिए 
इस बात की को पुरे विश्वास  के साथ कह सकते हैकि 
व्यक्ति नदी के भीतर की चेतना को निहारने के बाद 
कितना भी निराश हो आत्म ह्त्या नहीं करेगा
 इसलिए कहते है की पवित्र नदी में स्नान से ही नहीं 
अपितु दर्शन मात्र से पुण्य की प्राप्ति होती है 
गतिशील नदी अपने जल का परिशोधन स्वयं करती  है 
वह सक्षम है
 परन्तु उसे किसी प्रकार प्रवाह में अवरोध नहीं चाहिए 
नदी की यह क्षमता व्यक्ति को स्वयं के जीवन में 
आत्मसात करनी चाहिए 
यदि व्यक्ति नदी तरह अपने जीवन में गतिशील रहे तो 
जीवन से सारे विकार शनैः शनै समाप्त हो जायेगे 
ठीक उसी प्रकार से ऊर्जा का संचार हो जाएगा 
जिस प्रकार से नदी के प्रवाहित जल से
 अद्भुत विद्युत ऊर्जा उतपन्न हो जाती है 
नदी अपना रास्ता स्वयं नहीं चुनती मात्र दिशा तय करती  है 
उसे मालुम है उसे कहा जाना है
 रास्तो की जटिलता उसे विचलित कर सकती
 इसके विपरीत रास्तो की भौगोलिक स्थितियां का 
वह लाभ उठा कर प्रवाह को प्रबल कर लेती है 
इसलिए नदी की तरह जिओ

Tuesday, September 10, 2013

मिटटी की महिमा

मिट्टी  से प्रतिमा है बनती मिटटी से बनता है घर
मिटटी में ही  मिल जाएगा अहंकार अब तू न कर

मिट्टी  में है तेरा बचपन मिटटी पर है तू निर्भर
मिटटी में भगवान् रहे है मिटटी में रहते शंकर

मिट्टी   से माता की  मूर्ति मिट्टी  से लम्बोदर
मिटटी खाए कृष्ण कन्हैया मिटटी को हांके हलधर

कही छाँव है कही है धुप माटी  का है उजला रूप
माटी  के भीतर  है ऊर्जा माटी से तू अब न डर

Thursday, October 18, 2012

पाषाण और हिमखंड

-->
पाषाण को सरल भाषा मे पत्थर और  हिमशिला को बर्फ 
कहा जाता है
दोनो के गुण धर्म मे भिन्नता होती है
जहां पाषाण सरलता पूर्वक आकार  नही बदलता
वही हिमखण्ड वातावरण मे थोड़ी सी उष्णता बढने पर
अपना मूल आकार  खो देता है
पाषाण मे किसी भी प्रकार की आकृति  बनाना
चित्र रूप देना आसान  नही होता
परन्तु हिमखण्ड को योजना अनुसार
किसी भी प्रकार की आकृति  दी जा सकती है
हम पाषाण से निर्मित प्रतिमा को पूजते है
पाषाण को प्राण प्रतिष्ठित करते है
पाषाण पर रची गई कृतियाँ  दीर्घकाल तक बनी रहती है
हजारो वर्षो तक अपना मूल स्वरूप कायम रखती है
पूरे मनोयोग से पाषाण पर रचे गये शिल्प सजीव और
 जीवंत हो उठते है
फिर किसी व्यक्ति को पाषाण ह्रदय कह कर 
क्यो ?निष्ठुर ठहराया जाता है
निष्ठाये पाषाण की तरह हो तो विश्वास साकार हो जाता है
आस्थाये पाषाण की प्रतिमा के प्रति जग जाये
तो ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति होती है
उत्क्रष्ट प्रकृति का पाषाण अथवा पत्थर 
रत्न के रूप धारण कर लेता है
तथा मूल्यवान बन जाता है
वर्तमान मे लोगो के पारस्परिक विश्वास 
जिस प्रकार से समाप्त हो रहे है
निष्ठाये जिस प्रकार से परिवर्तित हो रही है
 ऐसे मे पाषाण मे उत्कीर्ण सृजनात्मकता 
 हमारे लिये एक मात्र प्रेरणा स्त्रोत रह गये है
हिमखण्डो मे रचा गया शिल्प शाश्वत नही रहता  
,आकर्षक  हो सकता है
किसी व्यक्ति या वस्तु की बाह्य कोमलता 
सम्वेदनशीलता का आधार नही हो सकती
बाह्य कोमलता भ्रान्ति उत्पन्न कर सकती है
किन्तु व्यक्ति या सामाज मे क्रान्ति और  
सम्वेदना पैदा करने के लिये
आतंरिक  कोमलता ,निर्मलता विशालता ,होनी आवश्यक  है
उसके लिये विचारो की दृढ़ता  भी होनी चाहिये
नारियल फल के बाहरी कवच की कठोरता 
उसके भीतर के भाग को कोमल बना देती है
और  आंतरिक  जल को निर्मलता ,मधुरता प्रदान करती है
नदियो मे रहते पाषाण कण (रेत) कितने ही 
वृहद् निर्माण के आधार  है
निर्मल नीर के जनक है
इसलिये हे! पाषाण के भीतर बसे देव 
हमारे मन मे निर्मलता बनाये रखो
ह्रदय को कोमलता प्रदान करो !
हमारे मन से उद्विग्नता तथा चंचलता समाप्त करो!
मन स्थिरता, शांती,तथा व्यक्तित्व को कान्ति प्रदान करो!
ताकि हमारी निष्ठाये अविचलित ,विश्वास अडिग हो
संकल्प अटल हो हम भीतर से निश्छल हो
 

Wednesday, December 21, 2011

कल्पना भावना संवेदना एवम अध्यात्मिक चेतना

कल्पना किसी भी अविष्कार की पहली सीढी होती है
कल्पना के बिना किसी भी कृति की रचना संभव नही है
चाहे वह कविता गीत गजल या चित्रात्मक कृति  हो
कल्पना वह अंकुर है जो पल्लवित होकर विशाल व्रक्ष बन जाता है
कल्पना वह छोटा जल स्त्रोत है जो निर्झर से सागर बनने का उपक्रम है
कल्पना से शून्य व्यक्ति रचनाधर्मिता से विहीन होता है
लेकिन कल्पना का उदगम मनुष्य की संवेदना ,भावना ,से होता है
भावना एवम संवेदना से शून्य व्यक्ति कल्पना विहीन होता है
उस व्यक्ति में सृजन की सम्भावना नहीं होती
कविता शब्द शिल्प के माध्यम से हृदय की अनुभूतियो को
लय में सजाना है जिसे भिन्न -भिन्न अलंकारों एवम बिम्बों से सुसज्जित किया जाता है
कविता का रचा जाना एक अध्यात्मिक अनुभव भी है
अचानक ऐसे भावो का प्रकट होना जिनका  स्वत स्फुरण हो
ईश्वरीय अनुभूति होते है
प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि इसी अंत प्रज्ञा से वेद की ऋचाये  रचते थे
शनै शनै उनका संग्रह ग्रंथो से  निर्माण हो जाता था
श्लोको का सृजन भी इसी अंत प्रज्ञा से हमारे विद्वान कर लिया करते थे
भगवान् कृष्ण जो सभी प्रकार की सिद्दियो से संपन्न थे उनमे भी
काव्य सृजन का सिध्दी थी इसीलिए उपनिषद जैसे जटिल ग्रन्थ को गीता के रूप में सरलीकृत कर दिया
काव्य सृजन हो या संगीत कला दोनों में ही व्यक्ति का आत्मोत्थान होता है यह अवश्य है उक्त कार्य व्यक्ति को समर्पण एवम निस्पृह भाव से करना होते है
व्यक्ति की अध्यात्मिक उन्नति कुण्डलिनी जागरण की अवस्था पर भी निर्भर करती है
नाद योग से हमारे कई संगीतज्ञो का कुण्डलिनी जागरण हुआ है
आशय यह है व्यक्ति को सृजन कर्म में रत रहना चाहिए
इसी में व्यक्ति परिवार समाज ही नहीं आत्मा का भी कल्याण है