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Saturday, April 6, 2019
Wednesday, July 18, 2018
मोह से मुक्त कर दो
किसी भी प्रकार का मोह
मुक्ति में बाधक है
जो मोह ग्रस्त है
वह कितनी भी पूजा पाठ
व्रत उपवास कर ले
मुक्त नहीं हो सकता है
मोह के कई प्रकार होते है
भौतिक सम्पदा से मोह
साधनो से मोह ,व्यक्ति विशेष से मोह,इत्यादि
मोह और प्रेम में अंतर होता है
प्रेम परमात्म भाव है
प्रेम में कोई अपेक्षा नहीं रहती
जबकि मोह में कई प्रकार की
अपेक्षाएं होती है
प्रेम कर्म की प्रेरणा है ऊर्जा है
जबकि मोह कर्म का बंधन है
प्रेम से उपजा कर्म
धर्म पालन में सहायक है
जबकि मोह ग्रस्त व्यक्ति
कर्म से विमुख हो निज धर्म से
पलायन कर लेना है
शास्त्रों में मोह रूपी अन्धकार कहा गया है
मंत्रो में मोह रूपी अन्धकार को
दूर करने की प्रार्थना की गई है
मोह रूपी अन्धकार से ग्रस्त हो
कई तपस्वी अपना तपोबल खो देते है
बरसो की साधना
एक क्षण में नष्ट कर देते है
प्रेम भक्ति का स्वरूप है
वात्स्ल्य का प्रतिरूप है
मोह कामना है वासना है
जबकि प्रेम सच्ची साधना है
कला से प्रेम व्यक्ति को कलाकार बना देता है
कुदरत से प्रेम व्यक्ति को
पर्यावरण विद
और साहित्य से प्रेम व्यक्ति को
महान कृतियों का जनक बना देता है
इसलिए हे !प्रभो
आप हर प्राणी के जीवन में
प्रेम का भाव भर दो मोह से मुक्त कर दो
Friday, October 28, 2016
लक्ष्य
सौंदर्य उसके लिए है
जो दृष्टि समन्न हो
वैचारिक दृष्टि से नहीं विपन्न हो
आनंद उसके लिए है
जिसके भीतर अमृत तत्व है
जो दृष्टि समन्न हो
वैचारिक दृष्टि से नहीं विपन्न हो
आनंद उसके लिए है
जिसके भीतर अमृत तत्व है
सकारात्मक सोच हो रमा हुआ सत्व है
लक्ष्य उनके लिए
जिन्हें दिखते उतुंग शिखर हो
बहता हो श्रम सीकर प्रतिभा प्रखर हो
ज्ञान उसके लिए जिन्हें जिज्ञासा हो
सदा रहे अतृप्त अनंत पिपासा हो
जीवन उसके लिए जो गतिमान हो
रचते रहे निरंतर अनेक प्रतिमान हो
Sunday, January 17, 2016
आक्रोश एवं क्रोध
आक्रोश वैचारिक विरोध और अन्याय
शोषण के कारण परिलक्षित होता है
क्रोध व्यक्तिगत स्वार्थ पर
आघात होने कारण प्रगट होता है
दीर्घ कालीन आक्रोश क्रान्ति और परिवर्तन का
कारक होता है
असहमति की उग्रता मानसिक हिंसा का रूप
धारण करती है
तब क्रोध में परिणित हो जाती है
क्रोध जब शाब्दिक हिंसा का रूप धारण
तब विवाद और कलह में परिणित होता है
क्रोध जब दीर्घ काल तक बना रहता है तो वह शारीरिक आक्रमण के रूप में सामने आता है
हिंसा में परिवर्तित हो जाता है
व्यक्ति जब क्रोधित होता है
तो वह भीतर में पल रही
नकारात्मक ऊर्जा का मात्र
२०प्रतिशत ही क्रोध के कारण ही प्रगट हो पाती है
इसका आशय यह है करने वाला व्यक्ति क्रोध अभिव्यक्त करने के पूर्व
अपने भीतर भीषण नकारात्मक ऊर्जा को झेलता है
जो अभिव्यक्त होने वाले क्रोध से
५ गुना अधिक होती है
भीतर की नकारात्मक ऊर्जा व्यक्ति के
हारमोन को विपरीत रूप से प्रभावित करती है
व्यक्ति धीरे धीरे रोग ग्रस्त होने लगता है
शारीरिक दौर्बल्य को प्राप्त कर हीनता की
भावना से ग्रस्त हो जाता है
अध्यययन में सामने आया है
की शारीरिक रूप से पुष्ट व्यक्ति
क्रोध की प्रवृत्ति अल्प होती है
क्रोध के एक स्वाभाविक प्रक्रिया है
परन्तु क्रोध को सृजनात्मक दिशा दी जाए
तो व्यक्ति में अपरिमित क्षमताये उदित हो जाती है
Friday, September 25, 2015
गणेश जी सृजन धर्मिता के प्रतीक
गणेश जी की प्रतिमा का निर्माण
जितना सहज सरल है
उनका व्यक्तित्व भी उतना ही सहज है सरल है
गणेश जी की प्रतिमा निर्माण में जितने प्रयोग हुए है
उतने प्रयोग किसी भी शिल्प निर्माण में नहीं हुए है
यथार्थ में कहो तो
गणेश जी सृजन कर्म के देव है
जो आमंत्रित करते है
सृजन और शिल्प के लिए है
सृजन कर्म में यदि लचीलापन और प्रयोग धर्मिता की गुंजाईश नहीं हो तो
नवीन विधाए कभी भी
अपना स्थान नहीं बना सकती है
और सृजन की असीम सम्भावनाओ पर
विराम चिन्ह लग जाते है
गणेश जी ने उनकी प्रतिमा के शिल्प निर्माण के माध्यम से सृजन कर्म को पूरी स्वतंत्रता प्रदान की है इसलिए गणेश चतुर्थी के पर्व से लगा कर
अनंत चतुर्दशी के मध्य के समय को हम सृजन धर्मियों का उत्सव कहे तो
अतिश्योक्ति नहीं होगी
गणेश जी अर्थात गणाध्यक्ष
गणाध्यक्ष अर्थात समूहों का नेतृत्व करने वाला
गणेश जैसा व्यक्तित्व पाकर
कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में नेतृत्व क्षमता का गुण समाहित कर सकता है
गणेश जी की प्रतिमा का सृजन से विसर्जन करना
यह दर्शाता है कि
किसी भी पदार्थ के प्रति आसक्ति ठीक नहीं
वृहद लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी प्रिय वस्तु का त्याग करने में भी संकोच नहीं करना चाहिए
Thursday, June 18, 2015
परिचय
मित्रता प्रेम या आत्मीयता हो
इन सभी का रास्ता परिचय से होकर गुजरता है
अनजान अपरिचित अजनबी लोगो से परिचय निकालना
अनजान अपरिचित अजनबी लोगो से परिचय निकालना
हर किसी के लिए सहज सरल नहीं है
जो व्यक्ति चिर परिचित व्यक्तियो के बीच कार्य करने का आदि होता है
जो व्यक्ति चिर परिचित व्यक्तियो के बीच कार्य करने का आदि होता है
वह स्वभाव से कूप मंडूक मानसिकता का होता है
निरन्तर अपरिचित लोगो के बीच रह कर अपनी आजीविका चलाना
निरन्तर अपरिचित लोगो के बीच रह कर अपनी आजीविका चलाना
एक चुनोति पूर्ण कार्य है
परन्तु कुछ लोग जो इस प्रकार के रोजगार से जुड़ जाते
धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लग जाता है
परिचय का प्रारम्भ संवाद से शुरु होता है
अपरिचित लोगो से कैसे संवाद बिना किसी सन्दर्भ के कैसे
स्थापित करना यह एक कला है
परन्तु कुछ लोग जो इस प्रकार के रोजगार से जुड़ जाते
धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लग जाता है
परिचय का प्रारम्भ संवाद से शुरु होता है
अपरिचित लोगो से कैसे संवाद बिना किसी सन्दर्भ के कैसे
स्थापित करना यह एक कला है
Tuesday, April 21, 2015
नदी की तरह जिओ
नदी की तरह व्यक्ति का जीवन हो तो
जीवन में कभी निराशा का भाव नहीं रह पाता है
जीवन में निराशा के पल आ भी जाए तो
बहती हुई नदी के किनारे बैठ कर
उसे निहारने से वह भी चला जाता है
नदी की उतरती चढ़ती लहरे यह बताती है
कि जीवन में दुःख और सुख के उतार और चढ़ाव
कितने भी आ जाए
व्यक्ति को नदी की तरह गतिशील रहना चाहिए
जो लोग नदी में कूद कर आत्म ह्त्या कर लेते है
उन्हें कुछ पल रुक कर नदी के किनारे बैठकर
अपने निर्णय कुछ देर अवश्य करना चाहिए
इस बात की को पुरे विश्वास के साथ कह सकते हैकि
व्यक्ति नदी के भीतर की चेतना को निहारने के बाद
कितना भी निराश हो आत्म ह्त्या नहीं करेगा
इसलिए कहते है की पवित्र नदी में स्नान से ही नहीं
अपितु दर्शन मात्र से पुण्य की प्राप्ति होती है
गतिशील नदी अपने जल का परिशोधन स्वयं करती है
वह सक्षम है
परन्तु उसे किसी प्रकार प्रवाह में अवरोध नहीं चाहिए
नदी की यह क्षमता व्यक्ति को स्वयं के जीवन में
आत्मसात करनी चाहिए
यदि व्यक्ति नदी तरह अपने जीवन में गतिशील रहे तो
जीवन से सारे विकार शनैः शनै समाप्त हो जायेगे
ठीक उसी प्रकार से ऊर्जा का संचार हो जाएगा
जिस प्रकार से नदी के प्रवाहित जल से
अद्भुत विद्युत ऊर्जा उतपन्न हो जाती है
नदी अपना रास्ता स्वयं नहीं चुनती मात्र दिशा तय करती है
उसे मालुम है उसे कहा जाना है
रास्तो की जटिलता उसे विचलित कर सकती
इसके विपरीत रास्तो की भौगोलिक स्थितियां का
वह लाभ उठा कर प्रवाह को प्रबल कर लेती है
इसलिए नदी की तरह जिओ
Tuesday, September 10, 2013
मिटटी की महिमा
मिट्टी से प्रतिमा है बनती मिटटी से बनता है घर
मिटटी में ही मिल जाएगा अहंकार अब तू न कर
मिट्टी में है तेरा बचपन मिटटी पर है तू निर्भर
मिटटी में भगवान् रहे है मिटटी में रहते शंकर
मिट्टी से माता की मूर्ति मिट्टी से लम्बोदर
मिटटी खाए कृष्ण कन्हैया मिटटी को हांके हलधर
कही छाँव है कही है धुप माटी का है उजला रूप
माटी के भीतर है ऊर्जा माटी से तू अब न डर
मिटटी में ही मिल जाएगा अहंकार अब तू न कर
मिट्टी में है तेरा बचपन मिटटी पर है तू निर्भर
मिटटी में भगवान् रहे है मिटटी में रहते शंकर
मिट्टी से माता की मूर्ति मिट्टी से लम्बोदर
मिटटी खाए कृष्ण कन्हैया मिटटी को हांके हलधर
कही छाँव है कही है धुप माटी का है उजला रूप
माटी के भीतर है ऊर्जा माटी से तू अब न डर
Thursday, October 18, 2012
पाषाण और हिमखंड
पाषाण को सरल भाषा मे पत्थर और हिमशिला को बर्फ
कहा जाता है।
दोनो के गुण धर्म मे भिन्नता होती है।
जहां पाषाण सरलता पूर्वक आकार नही बदलता
वही हिमखण्ड वातावरण मे थोड़ी सी उष्णता बढने पर
अपना मूल आकार खो देता है।
पाषाण मे किसी भी प्रकार की आकृति बनाना
चित्र रूप देना आसान नही होता।
परन्तु हिमखण्ड को योजना अनुसार
किसी भी प्रकार की आकृति दी जा सकती है।
हम पाषाण से निर्मित प्रतिमा को पूजते है।
पाषाण को प्राण प्रतिष्ठित करते है।
पाषाण पर रची गई कृतियाँ दीर्घकाल तक बनी रहती है।
हजारो वर्षो तक अपना मूल स्वरूप कायम रखती है।
पूरे मनोयोग से पाषाण पर रचे गये शिल्प सजीव और
जीवंत हो उठते है।
फिर किसी व्यक्ति को पाषाण ह्रदय कह कर
क्यो ?निष्ठुर ठहराया जाता है।
निष्ठाये पाषाण की तरह हो तो विश्वास साकार हो जाता है।
आस्थाये पाषाण की प्रतिमा के प्रति जग जाये
तो ईश्वरीय सत्ता की अनुभूति होती है।
उत्क्रष्ट प्रकृति का पाषाण अथवा पत्थर
रत्न के रूप धारण कर लेता है।
तथा मूल्यवान बन जाता है।
वर्तमान मे लोगो के पारस्परिक विश्वास
जिस प्रकार से समाप्त हो रहे है।
निष्ठाये जिस प्रकार से परिवर्तित हो रही है।
ऐसे मे पाषाण मे उत्कीर्ण सृजनात्मकता
हमारे लिये एक मात्र प्रेरणा स्त्रोत रह गये है।
हिमखण्डो मे रचा गया शिल्प शाश्वत नही रहता
,आकर्षक हो सकता है
किसी व्यक्ति या वस्तु की बाह्य कोमलता
सम्वेदनशीलता का आधार नही हो सकती
बाह्य कोमलता भ्रान्ति उत्पन्न कर सकती है
किन्तु व्यक्ति या सामाज मे क्रान्ति और
सम्वेदना पैदा करने के लिये
आतंरिक कोमलता ,निर्मलता विशालता ,होनी आवश्यक है
उसके लिये विचारो की दृढ़ता भी होनी चाहिये
नारियल फल के बाहरी कवच की कठोरता
उसके भीतर के भाग को कोमल बना देती है
और आंतरिक जल को निर्मलता ,मधुरता प्रदान करती है
नदियो मे रहते पाषाण कण (रेत) कितने ही
वृहद् निर्माण के आधार है
निर्मल नीर के जनक है
इसलिये हे! पाषाण के भीतर बसे देव
हमारे मन मे निर्मलता बनाये रखो
ह्रदय को कोमलता प्रदान करो !
हमारे मन से उद्विग्नता तथा चंचलता समाप्त करो!
मन स्थिरता, शांती,तथा व्यक्तित्व को कान्ति प्रदान करो!
ताकि हमारी निष्ठाये अविचलित ,विश्वास अडिग हो
संकल्प अटल हो ।हम भीतर से निश्छल हो।
Wednesday, December 21, 2011
कल्पना भावना संवेदना एवम अध्यात्मिक चेतना
कल्पना किसी भी अविष्कार की पहली सीढी होती है
कल्पना के बिना किसी भी कृति की रचना संभव नही है
चाहे वह कविता गीत गजल या चित्रात्मक कृति हो
कल्पना वह अंकुर है जो पल्लवित होकर विशाल व्रक्ष बन जाता है
कल्पना वह छोटा जल स्त्रोत है जो निर्झर से सागर बनने का उपक्रम है
कल्पना से शून्य व्यक्ति रचनाधर्मिता से विहीन होता है
लेकिन कल्पना का उदगम मनुष्य की संवेदना ,भावना ,से होता है
भावना एवम संवेदना से शून्य व्यक्ति कल्पना विहीन होता है
उस व्यक्ति में सृजन की सम्भावना नहीं होती कविता शब्द शिल्प के माध्यम से हृदय की अनुभूतियो को
लय में सजाना है जिसे भिन्न -भिन्न अलंकारों एवम बिम्बों से सुसज्जित किया जाता है
कविता का रचा जाना एक अध्यात्मिक अनुभव भी है
अचानक ऐसे भावो का प्रकट होना जिनका स्वत स्फुरण हो
ईश्वरीय अनुभूति होते है
प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि इसी अंत प्रज्ञा से वेद की ऋचाये रचते थे
शनै शनै उनका संग्रह ग्रंथो से निर्माण हो जाता था
श्लोको का सृजन भी इसी अंत प्रज्ञा से हमारे विद्वान कर लिया करते थे
भगवान् कृष्ण जो सभी प्रकार की सिद्दियो से संपन्न थे उनमे भी
काव्य सृजन का सिध्दी थी इसीलिए उपनिषद जैसे जटिल ग्रन्थ को गीता के रूप में सरलीकृत कर दिया
काव्य सृजन हो या संगीत कला दोनों में ही व्यक्ति का आत्मोत्थान होता है यह अवश्य है उक्त कार्य व्यक्ति को समर्पण एवम निस्पृह भाव से करना होते है
व्यक्ति की अध्यात्मिक उन्नति कुण्डलिनी जागरण की अवस्था पर भी निर्भर करती है
नाद योग से हमारे कई संगीतज्ञो का कुण्डलिनी जागरण हुआ है
आशय यह है व्यक्ति को सृजन कर्म में रत रहना चाहिए
इसी में व्यक्ति परिवार समाज ही नहीं आत्मा का भी कल्याण है
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