गोवर्धन पूजा का भारतीय सांस्कृतिक परम्परा का अत्यधिक महत्व है। पशुपालन के साथ पर्यावरण के प्रश्न भी जुड़े है द्वापर युग मे जब बिगड़ते पर्यावरण के कारण मौसम का संतुलन बिगड़ने लगा था तो गोकुल की जनता अतिवृष्टि से त्राहि त्राहि करने लगी थी ।उस समय भगवान कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत का आश्रय लेने का विचार सामने रखा और उसकी पूजा की परंपरा प्रारम्भ की ।गोवर्धन पर्वत की पूजा का आध्यात्मिक अर्थ के साथ इस उद्देश्य को हमे समझना होगा कि पर्वत और पेड़ हमारे रक्षक है ।वृक्ष पर्वत पर होने से भूमि पर्वत श्रंखलायें हमे तेज हवाओं से बचाती है ।वर्षा का जल भूमि के भीतर पहुचाने में और मिट्टी के कटाव को रोकने में पेड़ की जड़े अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है ।गोवर्धन पर्वत को उंगली पर धारण करने का तात्पर्य यह है कि हम सभी यदि अंश मात्र भी पर्यावरण संरक्षण में सहयोग कर पाए तो हमे किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा का सामना नही करना पड़ेगा ।इसलिए आओ हम गोवर्धन पूजा के इस पर्यावरण की रक्षा का संकल्प ले ।यदि हम एक वृक्ष को बड़ा न कर पाए तो कम से कम किसी पेड़ के ध्वंस का कारण तो न बने यही सच्ची गोवर्धन पूजा होगी।
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Thursday, November 8, 2018
Wednesday, August 15, 2018
भगवान् शिव के गले में नाग क्यों?
भगवान शिव के गले में नाग क्यों रहते है
भगवान विष्णु शेषनाग पर विश्राम क्यों करते है
इसके पीछे क्या दर्शन है
भगवान विष्णु शेषनाग पर विश्राम क्यों करते है
इसके पीछे क्या दर्शन है
सनातन धर्म में प्रतीक और चित्रो के माध्यम से
जीवन के गूढ़ रहस्य समझाये गए है
परन्तु इन तथ्यों तरफ किसी ने ध्यान ही दिया
परन्तु इन तथ्यों तरफ किसी ने ध्यान ही दिया
और उन्हें पूज्य बना दिया ।
भगवान विष्णु और शिव जी ध्यानस्थ
अथवा योग निद्रा में रहते है
तब शिव के गले में नाग
और विष्णु के शैया में शेषनाग होते है
अर्थात ध्यान करने से मन के भीतर
कुविचार रूपी नाग होते है
वे बाहर निकल जाते है
तो तन मन
कुविचार रूपी जहर से मुक्त हो जाता है
ऐसे निर्मल चित्त से व्यक्ति जीवन में
कुछ निर्माण कर पाता है
अन्यथा दुनिया में दुसरो के अनिष्ट की
इच्छा पालने वाले लोग
स्वयं के तन मन को इतना विषाक्त बना लेते है
कि वे अपना स्वास्थ्य को नुक्सान पहुचाते रहते है
Monday, December 17, 2012
राज धर्म,और राम राज्य
राज धर्म, राम राज्य कितने आकर्षक और कर्णप्रिय शब्द है
परन्तु क्या राज धर्म का पालन इतना आसान है
सर्व प्रथम राज धर्म किसे कहते है
इस विषय को जानना हो तो
रामायण में श्रीराम के अनुज भरत
और उनकी प्रशासन प्रणाली की और दृष्टिपात करना होगा
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के वनवास गमन के पश्चात
उनके अनुज भरत द्वारा अयोध्या में राम राज्य की घोषणा की गई थी
स्वयं राज सिंहासन पर आसीन न होकर
श्रीराम को की चरण पादुका को सिंहासन पर स्थान दिया गया
स्वयं तपस्वी वेश में नगर के बाहर झोपड़ी बना कर रहने लगे
झोपड़ी से ही भरत प्रशासन चलाते थे
जिससे उनको आम आदमी की पीड़ा की अनुभूति होती थी
सिंहासन पर स्वयं आरूढ़ न होकर
श्रीराम की चरण पादुका रखे जाने से
उन्हें सत्ता का अहंकार नहीं रहता था
तथा सत्ता और राजसी वैभव से कोई लगाव नहीं था
वे तो स्वयम को सत्ता न समझ कर
परम सत्ता श्रीराम के प्रतिनिधि समझते थे
अर्थात वे अयोध्या राज्य को भगवान श्रीराम की अनुपस्थिति में
उनकी ही धरोहर समझ कर स्वयम को उस धरोहर का रखवाला
अर्थात न्यासी मानते थे सत्ता के प्रति यह न्यासी भाव ही
भरत को महात्मा भरत बनाता है
न्यासी भाव ही भरत की राज्याधिकारी रहते हुए महान सन्यासी बनाता
वर्तमान में क्या हमारे सत्ताधीश राज धर्म का पालन कर रहे है
महात्मा भरत की राम राज्य की भावना से देखे तो
बिलकुल नहीं
जबकि सभी लोग राज धर्म और राम राज्य की बाते करते है
परन्तु सत्ता के प्रति वह न्यासी भाव कहा है
इसके विपरीत सत्ता के प्रति भूख दिखाई देती है
Saturday, April 14, 2012
नारियल पूजा में महत्वपूर्ण क्यों ?
नारियल फल का पूजा कर्म तथा किसी विद्वान व्यक्ति के सम्मान में बहुत महत्त्व है ऐसा क्यों ?
नारियल फल का उद्गम समुद्र के किनारे होता है
इसके पेड़ ऊँचे ऊँचे होते है नारियल पेड़ की जड़े गहरी होती है नारियल फल भीतर से स्वादिष्ट मृदु जल से भरा तथा बाहर से खुरदरा रेशेदार कठोर कवच वाला होता है
व्यवहारिक जीवन में हम देखते है
की संसार सागर ईर्ष्या परस्पर घृणा रूपी लवण से भरा है
सज्जन व्यक्ति को संसार विद्वेष रूपी लवण सागर के निकट रह कर भी ऐसे लवण युक्त जल से पर्याप्त दुरी रखते हुए
मानवीय गहराईयों से सद्गुणों के नीर को लेकर जीवन में मृदु जल रखना चाहिए
तथा जिससे जीवन का मधुर स्वाद ग्रहण किया जा सकता है
नारियल के बाहरी कवच कठोर होने तथा कवच रेशेदार होने का आशय यह है कि
जो मृदु जल एवम और मधुर स्वाद सद्गुणों का ग्रहण किया है
उन्हें सांसारिक बुराईयों से सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा हमारे व्यक्तित्व की अच्छाईयों को दुर्गुणों का संक्रमण लग सकता है
हमें नारियल की तरह जीवन में सद्गुणों व्यक्तित्व के सद्गुणों का संपोषण एवम संरक्षण करना चाहिए
ऐसे व्यक्ति को ईश्वर उसी प्रकार पसंद करते है जिस प्रकार ईश्वर को नारियल फल उन्हें प्रिय होता है
Wednesday, April 11, 2012
कमल पुष्प ईश्वर को प्रिय क्यों ?
कमल ,पंकज ,इत्यादि नामो से संबोधित किये जाने वाला पुष्प देवताओं को क्यों प्रिय है
कमल सतोगुण का प्रतीक है यह पुष्प बताता है
की किस प्रकार अभाव रूपी कीचड़ में अंकुरित होकर रवि किरणों से जीवन प्रेरणाओ को पाकर प्रफ्फुलित ,पुलकित ,होना है
जबकि गुलाब पुष्प रजो गुण का प्रतीक है
जो अच्छी गुणवत्ता वाली मिटटी में तथा समुचित पोषण से ही खिलता है
भारतीय संस्कृति में सदा ही सत्य
एवम उससे जुड़े सतो गुण को महत्त्व दिया है
इसलिए महालक्ष्मी कमल पुष्प उत्तिष्ठ मुद्रा में
तथा ब्रह्म देव कमल पर विराजित मुद्रा में दिखाई देते है
कमल गट्टे की माला से महालक्ष्मी की
दिवाली के अवसर पर पूजा की जाती हैजबकि गुलाब पुष्प प्रारम्भ से ही प्रेम ,विलासिता ,उपभोक्तावादी सोच का पर्याय रहा है
अर्थात यह पुष्प स्वयं सुविधा पूर्ण वातावरण में पल्लवित होता है
तथा सुविधाभोगी वर्ग की प्रिय पसंद रहा है
गुलाब पुष्प की रंगों एवम सुगंध की दृष्टि से जितनी प्रजातिया पाई जाती है
उतनी कमल की नहीं पाई जाती है
इसके अतिरिक्त गुलाब पुष्प के पौधे की प्रत्येक डाली की कलम बनाकर
नवीन स्वतंत्र पौधे में परिवर्तित किया जा सकता है जो प्राचीन समय में रक्त-बीज राक्षस की विशेषता थी कि उसकी जहा भी रक्त बूंद गिरती थी
वहा एक नया राक्षस उत्पन्न हो जाता था
अर्थात सतोगुण व्यक्ति रंग एवम सुगंध बदलने में माहिर नहीं होते है
इसके विपरीत रजोगुणी एवम तमोगुणी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार रंग एवम सुगंध बदलने में निपुण होते है
उन्हें सहज ही समझ पाना कठिन होता है
तथा ऐसे व्यक्तियों की संख्या में देखते देखते वृध्दि होती जाती है
इसके विपरीत रजोगुणी एवम तमोगुणी व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार रंग एवम सुगंध बदलने में निपुण होते है
उन्हें सहज ही समझ पाना कठिन होता है
तथा ऐसे व्यक्तियों की संख्या में देखते देखते वृध्दि होती जाती है
कमल पुष्प रूपी सतोगुणी व्यक्ति संख्या में अल्प होते है
उनमे न तो शीघ्रता से संख्या में वृध्दि होती है
और नहीं उनमे अचानक मित्रता एवं स्थापित होती है कहने का आशय यह है
ईश्वर को कमल पुष्प के समान स्वभाव वाला व्यक्ति प्रिय है
उनमे न तो शीघ्रता से संख्या में वृध्दि होती है
और नहीं उनमे अचानक मित्रता एवं स्थापित होती है कहने का आशय यह है
ईश्वर को कमल पुष्प के समान स्वभाव वाला व्यक्ति प्रिय है
इसलिए पूजा में कमल पुष्प का ही अधिक महत्त्व है
ईश्वर को गुलाब जैसे रंग एवम सुगंध की विविधता लिए स्वभाव वाले व्यक्ति प्रिय नहीं है
इसलिए ईश पूजा में गुलाब पुष्प का अधिक महत्त्व नहीं है
परमात्मा का प्रिय बनना है तो जप ,तप,साधना के साथ स्वभाव से कमल पुष्प सा स्वभाव विकसित करना होगा
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