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Tuesday, March 17, 2020

सत्संग का लाभ

लालूराम अपने पिता का एक मात्र पुत्र था 
उसकी पढ़ाई करने में कोई रुचि नही थी फिर भी उसने पढ़ना लिखना सिख लिया था । घर वाले उसे किसी काम के लिए कहते तो वह हा ! हूँ करके अनसुना कर देता था ।ज्यादा कुछ कहते तो वह चिढ़ कर क्रोधित हो जाता और बोलता कि तुम्हे मैं दिखता हूँ खटकता हूँ। अकड़ इतनी कि उसको सारी प्रतिभा स्वयम में ही दिखाई देती थी ।अपने खिलाफ कोई शब्द सुनने के लिए वह तैयार नही था।जब मर्जी होती तब उठता ।जब मर्जी होती तब भोजन करता। अगर इच्छा होती तो सुबह नहा लेता ।नही तो शाम को शाम को रात किसी भी समय स्नान करता ।उसने धारणाये बना ली उसे ध्वस्त करना आसान नही था।घर वाले भी उससे उकता गए थे। एक दिन वह नदी के किनारे जाकर बैठ गया ।नदी के पास पुराना मंदिर था | आश्रम और गौशाला थी वहां का माहौल देखकर लालूराम का मन वहां लग गया ।संतो के मुँह से उसे अच्छी अच्छी बातें सुनने अच्छा लगता था। लालूराम अब वही रहने लगा था। आश्रम की रसोई में जब भी कभी कोई संत महंत आते तो वह उत्साहित होकर उनके लिए भोजन बनाता। तरह तरह की आध्यात्मिक चर्चाओ रस ले लेकर सुनता। आश्रम के संत कही तीर्थ यात्रा मेलो में जाते तो वह भी उनके साथ चला जाता । उसे कार जीप चलाना आ गया था। वाहन चलाते चलाते संत उदाहरण लेकर उसे पौराणिक प्रसंगों को सुनाते  जो भीतर तक प्रभावित कर देती । शनै: शनै: लालूराम का व्यक्तित्व निखरने लगा था। उसके हृदय में दुसरो के प्रति करुणा का भाव उमड़ने लगा था। अब वह पहले जैसा लालूराम नही रहा। अब वह ललितानंद बन चुका था। गुरु के मुख से पौराणिक आख्यानों को सुन कर ।संतो के मुख से भजनों को सुनकर जो ज्ञान और अनुभूतिया प्राप्त हुई थी वे भीतर से उसे आंनदित करती रहती थी ।उसे सत्संग का अर्थ और उससे मिलने वाले लाभ समझ में आ गए थे

Tuesday, December 4, 2018

जीवन और मृत्यु

मरना एक न एक दिन सभी को है
परंतु जीवन और मृत्यु उद्देश्य पूर्ण हो तो
उसका जीना सार्थक है मरना भी सार्थक है निरुद्देश्य जीवन और दुर्घटना से हुई मृत्यु में
कोई अंतर नही है
कोई परोपकार समाज सेवा
देश धर्म के लिए जीवन जीता है तो
कोई मात्र स्वार्थ पूर्ति के लिए जीता है
कोई बीमार होकर रुग्ण शैय्य्या पर
दुर्घटना में घायल होकर मरता है
तो कोई देश की सीमा पर लड़ते लड़ते है
अपने कर्तव्य की पूर्ति में मरता है
उसे इतिहास याद रखता है
डरना मना है उस मृत्यु से जो आकस्मिक दुर्घटना से हो सकती है कभी कभी दुर्घटनाये होती नही आमंत्रित की जाती है आकस्मिक हुई दुर्घटना से हुई मृत्यु उद्देश्य पूर्ण जीवन का समापन है निरुद्देश्य जीने वाले को इससे कोई फर्क नही पड़ता ।कई बार जीवन भी मृत्यु से भयावह हो सकता है ऐसा तब होता है जब व्यक्ति का आत्म विश्वास बुरी तरह से टूट जाता है परस्पर रिश्तो का विश्वास चकनाचुर हो जाता है व्यक्ति की प्रतिष्ठा और धन नष्ट हो जाता है व्यक्ति का चरित्र समाप्त हो जाता है व्यक्ति विवेक और ज्ञान शून्य हो जाता है तब ऐसा व्यक्ति आत्मघाती कदम उठा लेता है और यही आत्महत्या का कारण भी होता है

Saturday, November 24, 2018

संयुक्त परिवार

संयुक्त परिवार धीरे धीरे विघटित होते जा रहे है वैसे वैसे सामाजिक समस्याएं विकराल होती जा रही है| परम्पराये संस्कार विलुप्त होते जा रहे है आज भी मझौले शहरों में और ग्रामीण क्षेत्रों में संयुक्त  परिवारों का कही कही अस्तित्व दिखाई देता है तो सुखद अनुभूति होती है संयुक्त परिवारों में एक प्रकार का अनुशासन दिखाई देता है |छोटे सदस्यों का बड़ो के प्रति आदर का भाव बड़ो का छोटे सदस्यों के प्रति स्नेह आशीष और सरंक्षण दृष्टिगत होता है|भारतीय संस्कृति और सस्कारो अस्तित्व बहुत हद तक संयक्त परिवारों से जुड़ा हुआ है जैसे जैसे संयुक्त परिवार विघटित होते जा रहे है|व्यक्ति आत्म केंद्रित होता जा रहा है तलाक और गृह कलह जैसे परिस्थितिया  निर्मित होती जा रही है| संयुक्त परिवार में कार्य का विभाजन मह्त्वपूर्ण कारक होता है|आर्थिक और सामजिक विषयो में घर के वरिष्ठ सदस्य के निर्णयो को अधिक महत्व दिया जाता है उनके मत को बहुत अधिक गंभीरता से सूना जाता है क्रियान्वित किया जाता है संयुक्त परिवारों में व्यवसाय हेतु पूंजी का अभाव नहीं रहता है क्योकि प्रत्येक सदस्य की थोड़ी थोड़ी पूंजी मिल कर व्यवसायिक आवश्यकता हेतु वृहत रूप धारण कर लेती है सभी सदस्यों के पास आभूषण और वस्त्र समान रूप से विध्यमान रहते है किसी के पास अधिक हो तो दूसरी महिला सदस्य उसका उपयोग कर लेती है किसी सदस्य के रुग्ण होने पर उसके उपचार की व्यवस्था स्वतः हो जाती है परिवारमें विपत्ति आती है सभी महिलाये उनके पास विध्यमान आभूषणों को परिवार के हित  के लिए अर्पित कर देती है कमजोर सदस्य को आर्थिक और सामजिक सुरक्षा की आश्वस्ति रहती है  संयुक्त परिवार प्रबंधन के जीवंत उदाहरण है महाभारत हो या रामायण दैत्य हो दानव प्राचीन भारतीय परिस्थितियों में संयुक्त परिवार की अवधारणा को सभी ने अपनाया है संयुक्त परिवार के माध्यम से अपने परिवार समाज राज्य को समृध्द और पुष्ट बनाया है कई प्रकार के प्रतिरोधों का सामना किया है पर संयुक्त परिवार वह कवच  रहा है जहा से परिवार समाज  राज्य ने पुनः अपना सामर्थ्य पाया है|


Monday, September 3, 2018

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व

श्री कृष्ण जन्माष्ठमी पर 
श्रीकृष्ण के व्यक्तित्व का दर्शन करना आवश्यक है 
श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व बहु आयामी है
 प्रश्न यह है कि 
 हम उन्हें किस रूप में देखना चाहते है
श्रीकृष्ण जब गोकुल में गाये चराते थे 
तब पशु पालक थे 
श्रीकृष्ण जब रथ के सारथी थे 
 तब वे कुशल चालक थे 
श्री कृष्ण जब बासुरी बजाते थे 
तब वे संगीतकार थे 
वे जब छंद के रूप गीता का उपदेश कर रहे थे 
तब गीतकार  थे
जब ध्यान मग्न हो जाते थे
 तब वे योगी थे 
निर्धन मित्र सुदामा को सहायता पहुंचाते थे 
तब परम मित्र थे 
वे किंकर्तव्य विमूढ़ अर्जुन के भ्रम दूर कर रहे थे 
तब मार्ग दर्शक थे 
वे रण योध्दा थे ,ज्ञान के पुरोधा थे,
 सम्मोहन से मोहन थे 
नीतिज्ञ और प्रेम के प्रतीक थे
माता पिता को बंधनो से मुक्त किया
 तब वे पुत्र थे 
गुरु पुत्रो को वरुण लोक से मुक्त करवा कर लाये 
तब सच्चे शिष्य थे 
वनवासी पांडवो को वन में भेट कर 
सहायता करते थे 
तब वे सज्जनो के सहायक थे 
द्वारकाधीश थे 
तब समृध्दि और शांति के नायक थे 
उन्होंने पतित नारिया का उध्दार कर 
समाज सुधारक कार्य किया 
सामान्य मनुष्य की तरह 
प्रतिकुलताओ में जीकर 
संघर्ष का सन्देश दिया 
उन्होंने यथार्थ को स्वीकारा 
समय पूरा होने पर मृत्यु का वरण  किया
उनके व्यक्तित्व कर आज भी 
हमें नवीन दिशाए मिलती है 
मन का नैराश्य दूर होता है
 नित नवीन आशाये खिलती है 
श्री कृष्ण एक इतिहास नहीं
 वर्तमान में मिलती प्रेरणा नव है 
श्रीकृष्ण मात्र प्रतिमा नहीं 
आध्यात्मिक अनुभव है
उनके व्यक्तित्व की विशालता 
की अनुभूति हमें रोमांचित कर देती है 
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है उनकी याद 
भावनाये गोपियों से निखरती है 
 


Wednesday, August 15, 2018

भगवान् शिव के गले में नाग क्यों?

भगवान शिव के गले में नाग क्यों रहते है
भगवान विष्णु शेषनाग पर विश्राम क्यों करते है
इसके पीछे क्या दर्शन है
 सनातन धर्म में प्रतीक और चित्रो के माध्यम से 
जीवन के गूढ़ रहस्य समझाये गए है
परन्तु इन तथ्यों तरफ किसी ने ध्यान ही दिया
 और उन्हें पूज्य बना दिया । 
भगवान विष्णु  और शिव जी ध्यानस्थ 
अथवा योग निद्रा में रहते है 
तब शिव के गले में नाग 
और विष्णु के शैया में शेषनाग होते है
 अर्थात ध्यान करने से मन के भीतर 
कुविचार रूपी नाग होते है 
वे बाहर निकल जाते है 
तो तन मन 
 कुविचार रूपी जहर से मुक्त हो जाता है
 ऐसे निर्मल चित्त से व्यक्ति जीवन में 
कुछ निर्माण कर पाता है 
अन्यथा दुनिया में दुसरो के अनिष्ट की 
इच्छा पालने वाले लोग
 स्वयं के तन मन को इतना विषाक्त बना लेते है 
कि वे अपना स्वास्थ्य को नुक्सान पहुचाते रहते है 

Friday, July 20, 2018

मै उसे पूजन कहूंगा

Listen to जो मरण को जन्म समझे मैं उसे जीवन कहूँगा -स्व.हरिनारायण शर्मा" निर्भीक" by Rajendra Sharma #np on #SoundCloud https://soundcloud.com/rajendra-sharma-7/tut9e347pill

Wednesday, July 18, 2018

धार्मिक या धर्मांध

 धर्म कोई सा भी हो
 धार्मिक होना बहुत अच्छा है
परन्तु धर्मांध होना बिलकुल गलत है 
धार्मिक व्यक्ति उदार सहिष्णु 
उदार मना होता है 
जबकि धर्मांध मात्र 
अपने धर्म को ही श्रेष्ठ समझता है 
दुसरो के धर्म को
 हेय  और निकृष्ट समझता  है 
धर्मांध व्यक्ति के मस्तिष्क की स्थिति
 उस कक्ष की तरह होती है 
जिसमे मात्र एक ही दरवाजा होता है 
हवा और प्रकाश के आने जाने के लिए कोई खिड़किया उजालदान नहीं होते है 
जिस प्रकार से बंद कक्ष में 
ऑक्सीज़न की कमी से घुटन सी होती है 
उसी प्रकार धर्मांध व्यक्ति का 
मस्तिष्क जीवन के संजीवनी 
प्रदान करने वाले चिंतन के अमृत से 
वंचित रह जाता है
धार्मिक व्यक्ति अपने धर्म को 
अच्छा मानने के अतिरिक्त 
प्रत्येक धर्म के 
सकारात्मक पक्ष को महत्व देता है 
उसके चिंतन के झरोखो से
 निरंतर ताजे विचारो की प्राण वायु 
आंतरिक चेतना की
 अभिसिंचित करती  रहती है 
धर्मांध व्यक्ति क्रूर हो सकता है 
जबकि धार्मिक व्यक्ति 
संवेदना  से भरपूर होता है 
धार्मिक व्यक्ति कला साहित्य संगीत का 
मर्मज्ञ  होता है प्रगतिशील होना
 उसकी पहचान होती है 
इसलिए जो व्यक्ति धार्मिक होते है 
वे निरंतर प्रगति पथ पर उन्मुख रहते है
इसलिए धार्मिक बनो धर्मांध नहीं 
 

Friday, May 11, 2018

आत्म तत्व और मंत्र शक्ति

मंत्र जीवित रहते व्यक्ति की आत्म बल को बढ़ाता है
परन्तु व्यक्ति के मृत हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव आत्मा के साथ बना रहता है किसी भी मंत्र का जप नियमित रूप से दीर्घ अवधि तक किया जाता है तो वह आत्मा का संस्कार बन जाता है देह की अचेतन अवस्था मे वह आत्मा के पंख की तरह क्रियाशील हो जाता है आत्मा मंत्र रूपी पंखो के सहारे इच्छित दिशा में चलायमान होने में समर्थ होती है वह स्वयं के निर्णय लेने में समर्थ रहती है नकारात्मक शक्तियां मंत्र शक्ति से परिपूर्ण आत्मा को प्रभावित नही कर सकती है इसलिए जीवन मे नियमित मंत्र जाप अत्यंत उपयोगी है

Friday, October 28, 2016

माँ शारदा का वाहन हंस क्यों है ?

हंस  माँ शारदा का वाहन  है 
परन्तु माँ शारदा ने हंस को ही 
वाहन के रूप में क्यों चुना 
 यह विचारणीय प्रश्न  है
हंस का स्वभाव होता है 
वह दूध  में जल होने पर दूध को पी लेता है 
जल को  छोड देता है 
कंकड़ और मोती के मिश्रण में से 
मोती को चुग लेता है कंकड़ को छोड़ देता है 
सत्पुरुषों का लक्षण यही होता है कि 
 सत  और असत्य का भेद कर
 असत्य  छोड कर सत्य को ग्रहण का लेते है 
ज्ञान और अज्ञान में भेद कर 
अज्ञान को छोड़ ज्ञान को ग्रहण कर लेते है 
सत्पुरुषों का आचरण उज्ज्वल  होता है 
 इसलिए हंस का रूप भी धवल होता है
माँ शारदा उसी व्यक्ति की बुध्दि में 
विराजमान होती है 
हंस के समान सत  और असत  में
 भेद करने में समर्थ होता है 
ऐसे व्यक्ति की बुद्धि नीर क्षीर विवेक से युक्त होने से उसे सहज ही आविष्कारक दृष्टि प्राप्त होती है 
हंस के समान कल्पना और सृजना के पंख 
उसे उपलब्ध होते है

Wednesday, June 22, 2016

स्वाध्याय

स्वाध्याय व्यक्ति को निरंतर प्रबुध्द बनाता है 
स्वाध्याय भीतर के अन्धकार को दूर कर 
ज्ञान की रोशनी लाता है 
स्वाध्याय अहम का भाव दूर करता है 
विद्वता  का मिथ्याभिमान चूर चूर करता है 
स्वाध्याय जिज्ञासाएं शांत करता है 
अशांत और अतृप्त कामनाओं से मुक्ति प्रदान करता है 
स्वाध्याय योग मार्ग का वह सूत्र है 
जो आत्मा को परमात्मा से मिलन का एक कारण है 
स्वयं का आत्मनिरीक्षण है
 भ्रांतियों का करता निवारण है 
स्वाध्याय में वह सुख है 
जो हर किसी को नहीं मिल पाता  है 
स्वाध्याय का अनुरागी व्यक्ति 
अध्ययन से ज्ञान की शुध्दि 
और अध्यापन से शिक्षा का उजाला फैलाता है 
स्वाध्याय में स्वयं की चेतना है 
बाह्य और आंतरिक जागरण है 
जीवन में भौतिकता संजो लेना का और आध्यात्मिकता पाने का व्याकरण है 
इसलिए जीवन में मित्र स्वाध्यायी बनो 
ज्ञान के दीप  निरन्तर जलाते हुए 
नित नए सपनो को बुनो

Friday, February 20, 2015

श्रीराम और श्रीकृष्ण में भेद

श्रीराम और श्रीकृष्ण दोनों भगवान विष्णु के अवतार थे 
श्रीराम को भगवान विष्णु के अंशावतार 
तथा श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्णावतार माना जाता है 
परन्तु दोनों में महत्वपूर्ण भेद है 
जहा श्रीराम ने जीवन भर यह प्रमाणित करने का प्रयास किया है  
कि वे ईश्वर नहीं एक सामान्य मानव है

 वही  श्रीकृष्ण ने यह प्रमा णित करने का प्रयास किया  
कि  वे सामान्य मनुष्य नहीं ईश्वर है 
इस हेतु उन्होंने बचपन से लगा कर कई प्रकार की लीलाये रची 
श्रीकृष्ण का ध्यान और दर्शन जहा व्यक्ति में
 आत्म विश्वास  का भाव पैदा   करता है 
जीवन में प्रेम का उद्भव  और उल्लास का भाव लाता है 
वही  श्रीराम के दर्शन से  अहंकार का नाश होता है
 ऐश्वर्य से विरक्ति हो जाती है 
अभावो में रहने का अभ्यास होता है 
जीवन की कठिन परिस्थितियों में दोनों के व्यक्तित्व 
हमारा मार्ग दर्शन करते है 
जब व्यक्ति के जीवन में अहंकार उत्पन्न हो जाए
  भोग ऐश्वर्य के प्रति आसक्ति होने लगे 
पाखण्ड और प्रदर्शन की और मन उन्मुख हो जाए 
तो श्रीराम का ध्यान दर्शन श्रेष्ठ है 
जब व्यक्ति के मन में हताशा विषाद और घृणा की 
भावना पैर जमाने लगे 
मानसिक रूप से व्यक्ति दरिद्र होने लगे 
किंकर्तव्य विमूढ़ मन स्थिति हो तो  
  श्री कृष्ण के दर्शन और ध्यान करना चाहिए 



Sunday, June 8, 2014

वामन अवतार में जीवन दर्शन

प्राचीन हिन्दू ग्रंथो में उल्लेख आता है |  
भगवान विष्णु के वामन अवतार 
जो दैत्य वंश के राजा बलि के द्वार पर 
एक बौने ब्राह्मण का रूप धारण करके
 भिक्षा माँगने के लिए गए थे 
और उन्होंने तीन पग धरती मांगी थी
 राजा बलि द्वारा तीन पग धरती दान देते ही
 भगवान विष्णु ने अपना बौना रूप त्याग कर 
विशाल रूप धारण किया इतना विशाल की 
पैर धरती पर थे और मस्तक अनंत आकाश की ऊंचाई पर 
उक्त दृष्टान्त से हमारे व्यवहारिक जीवन का 
बहुत गहरा सम्बन्ध है |  
  सामान्य रूप से जो लोग ऊँचे सपने सजाया करते है|  
   वे यह नहीं जानते की हमें कहा छोटा होना है  
 और कहा बड़ा होना
  हर जगह बड़प्पन के अहंकार में रहना उचित नहीं है 
यदि जीवन में उपलब्धिया प्राप्त करनी हो तो 
अपना स्वरूप लघु कर लेना चाहिए |
  इस सिध्दि का प्रयोग पवन पुत्र हनुमान जी ने कई बार किया 
और वांछित कार्य में सफलता प्राप्त की 
 इसी प्रकार उपरोक्त दृष्टान्त हमे यह भी सिखाता है
 हम कितने ही बड़े व्यक्ति बन जाए 
हमारे पैर  यथार्थ के धरातल पर ही टिके रहना चाहिए 
पर चिंतन का स्तर वामन अवतार के ऊंचाई धारण करने वाले
 मस्तक के साम होना चाहिए

Wednesday, October 30, 2013

महा सरस्वती ,महालक्ष्मी , महाकाली

महा देवियो में महा सरस्वती महालक्ष्मी  
महाकाली मान्य है 
महालक्ष्मी  महा सरस्वती  और महाकाली के मध्य में
 विराजित होती है 
सभी लोग इस चित्र को देखते है पूजते है 
 परन्तु महालक्ष्मी  महा सरस्वती  और महाकाली के मध्य में 
विराजित क्यों रहती है ?
इस रहस्य को जानने और समझने का 
कोई प्रयास कोई नहीं करता 
प्राचीन काल से हमारे ऋषि मुनि तरह तरह से
 जीवन में अध्यात्मिक उपलब्धियों के साथ -साथ 
भौतिक उपलब्धियों को सहेजने के सूत्र बताते आये है 
हमने उन्हें समझने और सीखने के पूर्व ही 
पूजना  प्रारम्भ कर दिया 
आज इस महालक्ष्मी  महा सरस्वती  और महाकाली के चित्र को ही परिभाषित करने का प्रयास करते है 
महालक्ष्मी धन कि प्रतीक होती है 
महाकाली शक्ति और महा सरस्वती विद्या ज्ञान 
और सद बुध्दि कि प्रतीक  होती  है
जब  धन को बुध्दि का सरंक्षण प्राप्त होता है 
तो उसका संवर्धन होता है 
और जब धन को शक्ति का सरंक्षण प्राप्त होता है 
तो उसका सुरक्षा होती है 
ऐसा धन जिसे शक्ति का सरंक्षण प्राप्त नहीं हो
 उसका  हरण  हो जाता है 
अपराधी तत्वो के हाथो पहुच जाता है 
बुध्दि और ज्ञान का सरंक्षण जब धन को प्राप्त होता है 
धनवान व्यक्ति उसे सही प्रकार से निवेश करता है 
व्यसनो में लिप्त नहीं होता 
सही प्रकार से निवेश किये जाने से 
धन में संवर्धन होने लगता है 
तब धन सम्पदा में दिन दुगुनी 
और रात चौगुनी वृध्दि होने लगती  है 
इसलिए महालक्ष्मी  को   महा सरस्वती  और महाकाली कि सुरक्षा दी गई है 

Tuesday, August 6, 2013

माँ दुर्गा में निहित जीवन के सूत्र


http://www.newsonair.nic.in/feature-image/Durga-mata.jpg
माँ  दुर्गा जिनकी नवरात्रि में आराधना की जाती है 

नारी में शक्ति का प्रतीक है 
मात्र माँ दुर्गा की पूजा से ही कोई  महिला 
या  पुरुष शक्तिशाली नहीं हो जाता 
माँ  दुर्गा द्वारा  अतुल पराक्रमी दैत्यों का वध 
किया गया 
रक्त बीज नामक राक्षस 
जिसके हर रक्त की बूँद एक नए राक्षस को जन्म देती थी 
का भी देवी दुर्गा द्वारा संहार किया गया 
आखिर इतनी शक्ति आई कहा से 
नारी समाज के लिए 
यह स्वयं में शक्ति जगाने का सूत्र हो सकता है 
सर्व प्रथम विचार करते है तो पाते है
 शिव साधना इसका प्रथम सूत्र है 
माँ दुर्गा का अंश महाकाली शिव साधक थी 
जिन्होंने कठोर तप  किया था 
दूसरा  सूत्र है अगाध सौन्दर्य की स्वामिनी होने के बावजूद 
चारित्रिक दृढ़ता थी
कथा आती है महिषासुर तथा अन्य  दैत्यों द्वारा
 विवाह के प्रस्ताव भेजे जाने के बावजूद 
उन्होंने शिव के प्रति अपनी निष्ठा  को नहीं छोड़ा था 
तीसरा  सूत्र  है निर्भयता 
 सामान्य रूप से सभी प्राणी सिंह  के डरते  है 
परन्तु माँ  दुर्गा  द्वारा  सिंह  की सवारी की जानी 
यह दर्शाता  है की सच्ची वीरांगना  को 
निर्भीकता  पूर्वक बुराइयो से मुकाबला करना चाहिए 
चौथा  सूत्र है दूर दर्शिता वर्तमान की समझ 
और अतीत से सीख लेने की प्रवृत्ति को अपनाना 
माँ  दुर्गा के शास्त्रों में त्रिशूल भी शामिल है 
जिसके तीनो भाग भूत भविष्य और वर्तमान के द्योतक है 
पांचवा  सूत्र है अच्छे  लोगो का साथ 
माँ  दुर्गा  के साथ सभी दैवीय शक्तिया  थी 
उनके अग्र  भाग में महावीर हनुमान और प्रष्ट भाग में भैरव देव रहते थे 
जिसका  तात्पर्य यह है की अच्छे  और सत्पुरुषो से
 निरंतर  मार्ग दर्शन प्राप्त करना  चाहिए 
और ऐसे सत्पुरुषो के साथ रहने का परिणाम यह होता  है 
की कोई पीठ पीछे भी विश्वासघात नहीं कर पाता  है 
इसलिए दुर्गा  उपासना  के साथ-साथ 
कोई नारी उपरोक्त सूत्रों का पालन करती है तो 
माँ  दुर्गा  के सामान उसे बल की प्राप्ति होती है 


Sunday, December 23, 2012

भाग्य और पुरुषार्थ


भाग्य और पुरुषार्थ एक सिक्के के पहलु है
कुछ व्यक्ति भाग्य के भरोसे रहते है
अर्थात
वह अपने पुरुषार्थ पर विश्वास नहीं करते
कुछ लोग पुरुषार्थ पर ही विश्वास करते
भाग्य के भरोसे नहीं रहते
भाग्य वादी दर्शन के कारण कितने भविष्य वक्ता अपना भाग्य बना रहे है भविष्य वक्ताओं से भ्रमित होकर
कई भाग्य वादी अपना वर्तमान और भविष्य खराब कर रहे है
कई लोग जीवन में प्राप्त हो रही असफलताओं
के पीछे अपना दुर्भाग्य होना बता रहे है
वास्तव में भाग्य और पुरुषार्थ के सिद्धांतो में से
कौनसा सिद्धांत सही है
किस मार्ग का अनुसरण हमारे लिए श्रेयस्कर होगा
इस विषय पर यह हमें यह विचार करना चाहिए की
आखिर भाग्य क्या है ?
भाग्य भगवान् शब्द से बना है
अर्थात जो व्यक्ति भाग्य पर भरोसा करता है
उसे भगवान् पर भरोसा करना चाहिए
यदि कोई व्यक्ति भगवान पर भरोसा करता है
तो यह बात समझनी चाहिए की
भगवान् कभी अकर्मण्य व्यक्तियों का सहयोगी नहीं हो सकता है
यद्यपि कुछ व्यक्तियों को जीवन में कुछ उपलब्धिया
भाग्य के कारण हासिल हुई दिखाई देती है
परन्तु सूक्ष्मता से देखने पर ज्ञात होगा की
वह उस व्यक्ति के पूर्व कर्मो का परिणाम है
भौतिक जगत में हमारी दृष्टि व्यक्ति के मात्र वर्तमान
जन्म से जुड़े कर्मो को ही देख पाती है
जबकि व्यक्ति तो आत्मा और देह का सम्मिश्रण है
आत्मा प्रत्येक जन्म में भिन्न भिन्न देह धारण करती है
देह की आयु पूर्ण होने पर व्यक्ति का भौतिक स्वरूप देह नष्ट हो जाती है आत्मा के साथ व्यक्ति के संस्कार और कर्म रह जाते है
जो व्यक्ति के भावी जन्मो में उसका भाग्य निर्धारित करते है
इसलिए पुरुषार्थ को भाग्य से भिन्न नहीं माना जा सकता है
क्षमतावान और पुरुषार्थी व्यक्ति सदा आस्तिक रहता है
अर्थात वह एक हाथ में भाग्य और दुसरे हाथ में पुरुषार्थ रख कर
कर्मरत रहता है
गीता में इस सिध्दांत को कर्मयोग के रूप में संबोधित किया है
ऐसा व्यक्ति अपना कर्म पूर्ण समर्पण परिश्रम से करता है
परन्तु अहंकार की भावना को परे रख कर
स्वयम की कार्य क्षमता को ईश्वरीय कृपा ही मानता है
परिणाम स्वरूप ऐसा व्यक्ति कभी भी दुर्भाग्य को दोष नहीं देता
ऐसे व्यक्ति को ही भगवान् अर्थात भाग्य की कृपा प्राप्त होने लगती है

Friday, May 4, 2012

पांडव भ्राता एवं परिवार प्रबंधन

 सामान्यत  किसी भी परिवार में  का एक व्यवसाय होता परिवार में जितने भाई होते है 
वे सभी एक ही प्रकार के व्यवसाय में संलग्न रहते है
 तथा एक ही प्रकार की कार्य कुशलता उनमे पाई जाती है 
परिणाम स्वरूप एक सीमा के बाद एक ही परिवार के भाइयो के बीच 
व्यवसायिक स्पर्धा प्रारम्भ.हो जाती है 
ऐसी स्थिति में परिवार के व्यवसाय में वृध्दि  के स्थान पर व्यवसाय में ठहराव तथा
 परिवार के सदस्यों में परस्पर विद्वेष भाव पनप जाता है 
परिवार में सामंजस्य स्थापित करते हुए 
किस प्रकार से व्यवसायिक कुशलता प्राप्त की जाय 
परिवार में.सौहार्द का भाव कैसे बनाए रखा जाए 
इन प्रश्नों के उत्तर महाभारत के पांडव भाइयो में निहित है पांडव  भाइयो मे परस्पर जितना सौहार्द तथा अपने अपने क्षेत्र में जितने कुशल थे 
वैसा अनुपम उदाहरण इतिहास में मिलना मुश्किल है 
पांडवो में सबसे बरिष्ठ भ्राता युधिष्ठर सत्य वादिता एवं द्युत क्रीडा में पारंगत माने जाते थे 
वे घनघोर प्रतिकूल परिस्थतियो में स्थिर भाव में रहने की  सामर्थ्य रखते थे  उनका यह गुण अज्ञातवास ,कुरुक्षेत्र में युध्द के दौरान काम आया 
दूसरा भाई भीम का पाक कला में प्रवीण गदा युध्द का महारथी  अत्यंत बलशाली  होना उनके जीवन में आई सभी चुनौतियों को सुलझाने में
 काम आया 
तीसरा भाई अर्जुन का धनुर्विद्या में तथा नृत्य कला में प्रवीण होना 
तत्कालीन परिस्थितियों में पांडवो के लिए वरदान सिध्द हुआ 
इसी प्रकार चतुर्थ भ्राता  नकुल 
 तलवार चलाने का कौशल्य होना दुर्लभ था 
 पाचवे  भ्राता सहदेव अश्वपालन तथा अश्व संचालन में 
दक्ष होना महाभारत युध्द में प्रयोग किये जाने वाले मुख्य वाहन अश्वो की देख रेख के लिए 
अति महत्वपूर्ण थे इसलिए परिवार की सफलता के लिए सभी सदस्यों में भिन्न -भिन्न क्षेत्रों में प्रतिभा एवं कुशल प्रबंधन आवश्यक है   

Wednesday, January 11, 2012

ब्रह्मा जी एवम जीवन के सूत्र

ब्रहमा जी वह देवता है जो सृष्टि के रचनाकार है
सृष्टि कितनी ही बार नष्ट हो ब्रह्मा जी उसे बार बार निर्मित करते है
ब्रह्मा जी से यह सूत्र सीखने को मिलता है की हमें कभी निराश नहीं होना चाहिए
जितनी बार हमारे प्रयत्न निष्फल हो हार न मानते हुए पुन नव निर्माण में लग जाना चाहिए
ब्रह्मा जी का निवास कमल पुष्प पर होता है कमल को पंकज भी कहा जाता है
पंकज संस्कृत के पंक +अज दो शब्दों से मिल कर बना होता है
अर्थात वह पुष्प जिसका जन्म कीचड़ से हुआ हो
हम सभी यह जानते है की कमल तालाब अर्थात सरोवर में उगते है
जिस तालाब में जितना कीचड़ होता है वहा उतनी ही मात्रा में कमल खिलते है
तालाब का जल स्थिर जल होता है अर्थात प्रवाहमान जल में कमल का अंकुरित होना असम्भव होता है
ब्रह्मा जी का आसन कमल होना यह दर्शाता है की असुविधाओ के कीचड़ में  प्रतिभाये पैदा होती है
इतिहास साक्षी है की विश्व में जितने में प्रतिभावान महान व्यक्ति उत्पन्न हुए है
वे घोर दरिद्रता ,असुविधाओ में ,विषम परिस्थितियों में पले बड़े है
ज्ञान अर्जन हेतु कठिन साधना और परिश्रम करना पड़ता है प्रतिभाये साधनों की मोहताज नहीं होती
जिस प्रकार स्थिर जल में कमल पैदा होता है
उसी प्रकार प्रतिभा संपन्न व्यक्ति को भी ज्ञान अर्जन हेतु अपनी दैनिक दिन चर्या को संयमित और मति को स्थिर रखने की आवश्यकता होती है
जीवन में स्थिरता प्राप्त किये बिना किसी भी संकल्प का साकार नहीं किया जा सकता है
इस प्रकार ब्रह्मा जी के चार मुख होते है
इसका आशय यह है व्यक्ति को ज्ञान के सभी क्षेत्रों में जिज्ञासु होना चाहिए
जहा से जैसे भी हो ज्ञान के प्रति जिज्ञासा शांत करने के प्रयत्न करने चाहिये 
इसलिए ब्रह्मा जी तरह जो व्यक्ति असुविधाओ के कीचड़ में उत्पन्न प्रतिभा  रूपी कमल आसन पर विराजमान होकर ज्ञान के अध्ययन से सभी विषयो समग्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए के लिए प्रयत्न रत होता है
वह स्वयं का ही नहीं समस्त लोगो का हित साधने की क्षमता रखता है
ऐसा व्यक्ति उसके स्वप्न कितनी बार टूटे फिर नए संकल्प के साथ नवीन सृजन कर्म करने को उद्यत हो जाता है

Tuesday, December 27, 2011

त्रिदेव एवम जीवन दर्शन

त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश के कार्यो में मूलभूत अंतर क्या है 
सामान्य रूप से कहा जाता है ब्रह्मा सृष्टि का  निर्माण करते है 
विष्णु जी पालन तथा शिव जी संहार करते है
किन्तु यह उनके कार्यो का अधूरा परिचय है 
वैसे ब्रह्मा जी के कार्यो परिचय के सम्बन्ध यह कहना महत्वपूर्ण होगा की शब्द को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है
ब्रहमा जी ने समय समय पर राक्षसों को वचन देकर वरदान दिए है 
इसलिए उनको वचन का देवता भी कहा जा सकता है 
बोलचाल की भाषा में किसी महत्वपूर्ण वाक्य को ब्रह्म वाक्य कहा जाता है 
अर्थात वह वाक्य जो सत्य हो अटल हो तथा फलीभूत हो  
शब्द में ब्रहम होने का मतलब यह है की जो भी हम बोलते है वह शब्द सुनने वाले पर उच्चारित शब्द के अनुसार प्रतिक्रिया करता है 
चाहे वह सकारात्मक प्रतिक्रिया करे या नकारात्मक प्रतिक्रिया करे यह उस शब्द की प्रकृति पर निर्भर करता है 
इसलिए शब्द में ही ब्रह्म अर्थात ब्रह्मा जी का वास होता है
दुसरे स्थान पर विष्णु का सम्बन्ध कर्म से होता है 
इसका तात्पर्य यह है की जब तक सृष्टि है तब तक जीवन है 
कर्म के बिना जीवन जड़ है कर्म ही जीवन में चेतनता प्रदान करता है
चेतना कई प्रकार की हो सकती है जहा चेतना है वहा कर्म है जहा कर्म है फल है 
सत्कर्म में ईश्वर का अर्थात विष्णु भगवान् का वास होता है 
इसलिए भगवान् विष्णु के सभी अवतारों ने कर्म की आराधना पर बल दिया है 
कर्म शील व्यक्ति के साथ भगवान् विष्णु का आशीर्वाद होता है
भगवान शिव सहिष्णुता तथा उत्तरदायित्व,प्रबंधन  के देवता है 
भगवान् शिव ने माता गंगा के अतिरिक्त ऐसे जीव जन्तुओ तथा भूत प्रेत पिशाचो पशुओ के प्रति भी उत्तरदायित्व का निर्वहन किया जिन्हें सभी देवगण ने त्यक्त कर रखा था 
समस्त राक्षसों के भी आराध्य देव शिव रहे है
जहा तक सहिष्णुता का बात की जाय शिव जी जैसा सहिष्णु देव मिलना असम्भव है 
सामान्य रूप से जिस व्यक्ति को कही सम्मान नहीं मिलता उसे उसके ससुराल में तो सम्मान तो मिलता ही है
किन्तु शिव जी को उनके ससुराल में सार्वजनिक रूप से ससुर द्वारा अपमानित किया गया फिर भी वे मौन रहे
अंत में उनकी पत्नी माता सती को क्रोध आने पर जब हवन कुण्ड माता सती ने आत्मदाह किया
तब जाकर शिव जी धैर्य टूटा इसलिए धैर्य सहिष्णुता एवम दायित्व का पाठ भगवान् शिव से हमें ग्रहण करना चाहिए 
शिव जी प्रबंधन में अद्वितीय थे इसलिए भिन्न भिन्न प्रकार के प्राणी उनके साथ होने के बावजूद उन्होंने सभी के लिए गणा अध्यक्षों की नियुक्ति कर रखी थी 
और स्वयं तपस्या रत रहते थे 
आशय यह है की वर्तमान जीवन में कोई व्यक्ति  शब्द को सिध्द कर हर वचन का मुल्य समझता  है तथा वाणी के माध्यम से शब्द को मुख से बहार निकालता है 
उसकी जिह्वा एवम कंठ में सरस्वती का वास होता है अर्थात शब्द ब्रह्म की अनुगामिनी वाणी स्वरूपा सरस्वती होती है 
कोई यदि जीवन को सत्कर्मो को करते हुए सृजनरत रहता है तो उसे लक्ष्मी स्वरूपा लक्ष्मी की प्राप्त होती है 
लक्ष्मी के बल पर पुन नव कर्मो में रत होता जाता है तो लक्ष्मी बहु गुणित होती जाती है 
इसलिए कर्म के देवता विष्णु की अनुगामिनी लक्ष्मी माता को कहा जाता है 
जो व्यक्ति सहिष्णुता पूर्वक तथा कुशलता पूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन कुशल प्रबंधन के माध्यम से भलीभांति करता है वह अद्भुत शक्ति का अनुभव करता है 
उसे असीम बहु आयामी शक्तिया प्राप्त होती है वह शिव में समाहित होकर शक्ति संपन्न हो जाता है