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Wednesday, September 26, 2012

क्रांति के प्रवर्तक भगवान् परशुराम




http://www.astrojyoti.com/images/p4.JPG

 सत्य का सत्ता से संघर्ष सनातन काल से चला आ रहा है
    श्री परशुराम जो भगवान विष्णु के अवतार थे 
शोषणकारी सत्ता के विरुद्ध खडे सत्य के प्रतिनिधी थे
एक और  तत्कालीन शासक सहस्त्रबाहु की
शक्तिशाली प्रभुता सम्पन्न सत्ता
दूसरी और एक अकेला सन्यासी
जिसके पास परशु रूपी सतसंकल्प था
जो शोषण की प्रतीक अहंकारी सत्ता को 
उखाडने के लिये प्रतिज्ञा बद्ध थे
शासक जो जब शोषक का रूप धारण कर लेता है
तो हजारो हाथो से हजारो पध्दतियों 
प्रक्रियाओं  से जनता का शोषण करता है
ऐसा शासक स्वतन्त्र जागरूक और विचारवान नागरिक 
के जीवन यापन के मूल एवम बुनियादी अधिकारो ,
संसाधनो का भी हरण कर लेता है
तत्कालिन समय मे सहस्र बाहु ने भी यही व्यवहार 
भगवान परशुरामएवम उनके पिता जमदग्नि के साथ किया था
तब आवश्यक हो जाता है कि उन हजारो हाथो को 
काट दिया जाय जो आम  नागरिको के शोषण के
 साधन बन गये हो
सत्य का आकलन  जन समूह की विशालता से नही 
आंका जा सकता
सत्य के संघर्ष मे कठिनाईया बहुत होती है
हर कोई सत्य का अनुगामी हो भी नही सकता
इसलिये सत्य से जुडे किसी नये विचार को
एका-एक समर्थन प्राप्त भी नही होत है
कहा जाता है की ऐसे किसी व्यक्ति या विचार को
विरोध ,आलोचना और  समर्थन के दौर से 
गुजरना होता है
भगवान परशुराम के पास न तो जन मत था
न साधन थे, किसी प्रकार की सामरिक शक्ति भी नही थी
मात्र व्रहद उद्देश्य ,द्रढ इच्छा शक्ति,
 सत्य का संबल और तप का बल
हाथो मे परशु लिये पूरा संघर्ष करते रहे
सही मायनो मे भगवान परशुराम विश्व के
 प्रथम क्रांति प्रवर्तक थे
क्या कोई व्यक्ति कल्पना कर सकता है
कि विशाल सैन्य बल एवम अपरिमित पराक्रमी
जिसे भगवान शिव का वरदान प्राप्त हो
सहस्त्रबाहू को एक चरण पादुक धारी संन्यासी
परशु के बल पर परास्त कर सकता है
भगवान परशुराम ने असंभव को संभव कर दिखाया
इसलिये भगवान परशुराम काल जयी क्रान्ति के नायक है
उन्हे किसी वर्ग विशेष से न जोड़  कर
उनके व्यक्तित्व मे सत्य की शक्ति ,क्रान्ति की प्रव्रत्ति
और वर्तमान स्थितियो मे उनकी प्रासंगिकता को देखना होगा


Friday, May 18, 2012

पुरुषार्थी पुरुष विश्वामित्र का भगवान् परशुराम से सम्बन्ध

परशुराम भाग  - 5

भगवान् परसुराम एवम महर्षि  विश्वामित्र में परस्पर  क्या  सम्बन्ध हो सकता है   ?
आखिर वो दिन आ ही गया जिसके लिए नियति ने खेल  खेला था रिचिक पत्नी ने जो वर ऋषि से मांग था ऋषि द्वारा उस वर की पूर्ति अब होने ही वाली थी ऋषि ने शुभ महूर्त के दिन अपनी पत्नी से कहा  आज तुम्हारी सेवा के फल स्वरूप तुम्हारे वर को पूरा करने के लिए मैं आज एक महान यज्ञ का अनुष्ठान करूंगा  तुम अपनी माँ के साथ इस यज्ञ मैं आहुति दोगी  तूम यज्ञ के लिये तेयार हों जाओ .
ऋषि ने महायज्ञ शुरू किया रिचिक पत्नी और और उनकी साँस  ने इस यज्ञ मैं आहुति दी  यज्ञ समाप्त हुआ यज्ञ समाप्त होने के पश्चात रिचिक ने प्रसाद स्वरूप चरु बनाया ( चरु - चावल , दूध , पञ्चमेवों से बनी खीर ).
और उस चरु को दो भागो मैं बराबर विभाजित कर दिया एक भाग अपनी पत्नी के लिए और दूसरा भाग अपनी सांस  के लिए रखा , रिचिक ने अपनी पत्नी से बोला देखो यज्ञ के प्रसाद स्वरुप ये चरु मैंने तुम्हारे 
और माता जी के लिए बनाया हैं ध्यान रखना दाया वाला पात्र तुम्हारे  लिए हैं और बाया वाला पात्र माता जी के लिए है  इस बात का ठीक से  ध्यान रखना रिचिक इतना कहकर कुछ  आवश्यक काम से कुछ देर के लिए आपनी कुटी मे चले गये  रिचिक पत्नी चरु लेकर अपनी माँ के पास पहुची।
माँ उन्होंने ये प्रसाद दिया है इसे आप ग्रहण कीजिये जब माँ  ने देखा की पुत्री उन्हें बड़ी सावधानी से चरु दे रही हैं  तो उन्होंने प्रश्न  किया क्या बात हैं बेटा दोनों चरु मैं कुछ अंतर हैं क्या ?
पुत्री ने कहा नही माँ ऐसी कोई बात नही हैं पर उनकी आज्ञा  हैं की मैं आप को ध्यान से बायाँ पात्र ही दूँ .

माँ ने कहा मुझे  ऐसा  लगता हैं की जमाई जी ने तुम्हारे लिए विशेष चरु बनाया हैं जिसके  पीने से तुम्हें उतम संतान की प्राप्ति होगी , ओर शायद मेरे लिए साधारण चरु बनाया है आखिर तुम उनकी पत्नी हो ,  माँ ने कहा देखो पुत्री तुम्हारा चरु मुझे दे दो आखिर तुम्हारे भाई को राजा होना हैं  माँ के अत्यधिक आग्रह करने पर पुत्री ने चरु बदल लिए दोनों ने प्रसाद लिया इतने मैं रिचिक आ गये  पत्नी का मुख देख कर वो सब समझ गये उन्होंने बोला मैने जों चरू तुम्हारे लिए दिया था वों ज्ञान और ब्राहमण  तत्व का प्रतीक था।
और जो चरु मैंने माता जी के लिए दिया था  वो युद्ध  वीरता ,शोर्य का प्रतीक था जो राजा के अनिवार्य गुण हैं परन्तु अब ठीक इसके विपरीत होगा रिचिक पत्नी ने कहा मेरा पुत्र और युद्ध क्रपा करे स्वामी  मैं ऐसा नही चाहती मुझसे गलती हो गई कुछ तो उपाए करे।  पत्नी के बार बार  आग्रह करने पर रिचिक ने चरु  का प्रभाव बाँट  दिया फल स्वरूप रिचिक के पुत्र स्वरूप जम्दागनी और जम्दग्नी के पुत्र के रूप मैं परशुराम जी का जन्म हुआ। और रिचिक पत्नी के भाई के स्वरूप विस्वामित्र का जन्म हुआ 
जो बाद मैं चरु के प्रभाव से  क्षत्रिय राजा होने पर भी तप कर ब्रहामण हूए .
जमदाग्नि के पूत्र  परशुराम जी  जो ब्रह्मिन होते हुए भी अपने युद्ध कोशल से क्षत्रिय धर्म का निर्वहन किया और 
इक्कीस बार धरती को दुष्ट हेहयक्षत्रिय राजाओ से विहीन कर दिया जो की अधर्म के स्वरूप थे और अपने बल से धरती को कष्ट दे रहें थे।
यदि सभी वर्ग व्यवस्था के अनुरूप अपने अपने धर्म का निर्वाह करे और एक दुसरे का सम्मान करे तो यही सम्पूर्ण धरा के लिए कल्याणकारी होगा धर्म होगा .

( विश्वामित्र जी  जमदागनी  ऋषि की माता के भी थे और परशुराम जी जमदागनी और रेणुका के पुत्र थे)

"जब जब होत धर्म की हानि बडत अधम असुर अभिमानी तब तब प्रभु धरी विविध शरीरा हरही हरी भव सज्जन पीरा"
जब जब धर्म की हानि होती हैं तब तब  ईश्वर भिन्न भिन्न रूपों मैं जन्म लेता हैं और सज्जनों की पीड़ा को हरता हैं (अधर्म का नाश कर और धर्म की स्थापना कर)  . 

Wednesday, March 28, 2012

परशुराम भाग - ५

परशुराम भाग - 5 ( रिचिक सेवा का फल  )

माता की सलाह को मानकर राजकुमारी( रिचिक पत्नी ) ने अपने पति रिचिक की यथोचित( कठोर ) सेवा की .
एक दिन रिचिक पत्नी सेवा से प्रसन्न होकर बोले - मुझे बहुत दुःख हैं की तुम्हे मुझसे विवाह करना पड़ा मैं जानता हूँ की मुझसे विवाह करके तुम्हे बहुत कष्ट उठाना पड़ रहा हैं, अपने महलो के सुख छोड़ कर तुम्हे मेरे साथ मेरे समान कठोर तपस्वी जीवन जीना पड़ रहा हैं मैं तो इस जीवन का आदि हूँ मैंने इसे स्वयं इसे अपनी  इच्छा से चुना हैं पर तुम इस की आदि नही हो, परन्तु मैं कर भी क्या सकता हूँ कभी कभी इश इच्छा बड़ी प्रबल होती हैं और परहित के लिए त्याग अनिवार्य हो जाता हैं.
इतने पर भी तुमने सारे कष्टों को हसते हुए सहा और अपने धर्म का पालन किया मेरी हर प्रकार से सेवा की. कहो तुम्हारी क्या कामना हैं निसंकोच कहो यदि तुम चाहो तो अपने  पिता के घर भी  जा सकती हो और वहा सुख से रह सकती हो.
प्रभु की आज्ञा मान कर मैंने तुमसे विवाह किया हैं पर मैं तुम्हे जबरन यहाँ नही रखना चाहता. और वेसे भी जो निश्चित होगा वही होकर रहेंगा.
रिचिक की बात सुनकर राजकुमारी बोली - स्वामी ये आप क्या कह रहें हैं मैं कही नहीं जाना चाहती और मुझे यहाँ किसी प्रकार का कष्ट नहीं हैं अपितु मैं तो स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली मानती हूँ की मुझे आप जेसा वर प्राप्त हुआ आप की सेवा का अवसर मिला ,धर्म, आध्यात्म, ज्ञान का ऐसा वातावरण मिला परहित करने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ अवश्य ही किसी जन्म मैं मैंने पुण्य कर्म किये हैं जिसके फलस्वरूप मुझे ये सब देखने को मिला.
रिचिक राजकुमारी की बातों को सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुए. तुम सच में एक उतम कुल की कन्या हो तुम्हारी वाणी से तुम्हारे कुल के संस्कार साफ़ दिखाई पड़ते हैं तुम सच में राजकन्या हो कहो तुम्हारी क्या इच्छा हैं कोई भी वर मांगों प्रिय. 
रिचिक के मुख से अपने लिए पहली बार इतने कोमल शब्द सुनकर राजकुमारी को पहली बार विवाहित होने का सुख मिला ऐसा लगा मानो आज रिचिक एक ऋषि के रूप में नही अपितु उनके पति के रूप में उनसे बात कर रहें हो और एक पत्नी होने के नाते पति से कुछ भी मांगने का अधिकार तो राजकुमारी को स्वत ही प्राप्त हैं.
राजकुमारी (रिचिक पत्नी) थोड़ी लज्जाती हुई बोली स्वामी यदि आप सच में मुझ पर प्रसन्न हैं यदि आप सच में मुझे कुछ देना चाहते हैं तो में आप से एक पुत्ररुपी रत्न मांगती हूँ.
और पुत्र के साथ साथ ये मांगती हूँ की मेरे पिता के पश्चात राज्य को सम्भालने के लिए व् राजा बनने के लिए  मेरी माता को एक पुत्र और मुझे एक भाई प्राप्त हो.
ऋषि मुस्कुराये वो प्रभु लीला को समझ गये उनके श्रीमुख से अमृतवचन निकले - तथास्तु 
एक सुखी ग्रहस्थी के लिए पति और पत्नी के बीच आपसी समझ होना आवश्यक हैं परिस्थिति केसी भी हो समय केसा भी हो सुख हो या दुःख दाम्पत्य जीवन मैं एक दुसरे का साथ निभाना ही ग्रहस्थ आश्रम की कुंजी हैं.
( सुख और विशवास की कुंजी जेसा  की इस प्रसंग मैं देखने मैं आता हैं.)

Tuesday, March 20, 2012

PARSURAM BHAG - 4










परशुराम भाग - 4 


अपनी पुत्री के विवाह के कुछ समय पश्चात राजा गधिक सपत्निक अपनी पुत्री राजकुमारी से मिलने उसकी कुशल शेम लेने रिचिक ऋषि के आश्रम पहुचे.

अपने परिजनों के आगमन की सुचना पाकर राजकुमारी को अत्यंत प्रसन्नता हुई गधिक ने जेसे ही रिचिक के आश्रम की सीमा  मैं प्रवेश किया तो वे चकित रह गये आश्रम के चारो और एक दिव्या आभा चमक रही थी चारो और शुद्ध वातावरण था, वातावरण मैं अध्यात्मिकता और सकारात्मक उर्जा का वास था.
राजा गधिक और उनकी पत्नी की  समस्त चिंताए समाप्त हो गई .
रिचिक ने अपने स्वसुर और स्वास को अभिनन्दन किया,  पुत्री का अपने परिजनों से मिलन हुआ सभी प्रसन्न थे चलो पुत्री एकांत मैं चल कर बाते करते हैं (माता ने कहा)
गधिक ने रिचिक से कहा चलिए हम भी एकांत मैं चल कर कुछ वार्तालाप करते हैं आप मुझे कुछ ज्ञान उपदेश दीजिये
(ज्ञान आयु के बंधन से मुक्त होता हैं वो आयु की सीमओं से परे होता हैं इस लिए आज राजा गधिक अपने  से कम आयु और रिश्ते मैं अपने जमाई से ज्ञान उपदेश की मांग कर रहें हैं)

माँ ने पुत्री से कहा बेटी  तू प्रसन्न तो हैं ना ? 
माँ मैं सकुशल हूँ अतिप्रसन्न हूँ. 
तेरी ग्रहस्ती केसी चल रही हैं ? हमे नाना नानी बनने का सुख कब मिलेगा?
माँ सब कुछ ठीक हैं परन्तु.
परन्तु! क्या हुआ पुत्री निसंकोच बोलो . माँ ये आज भी सन्यासी की भाति ही व्यवहार करते हैं. इसलिए अभी मुझे पुत्र रत्न की कोई आसा दिखाई नहीं देती.
माता चिंतित हो गई ये तो बड़ा ही चिंता का विषय हैं. 
पुत्री  तू चिंता मत कर मेरी बात ध्यान से सुन तू अपने पति (रिचिक) की कठोर सेवा  कर  जब वो प्रसन्न हो कर तुहे कुछ देना चाहे तो वर मैं उनसे पुत्र मांग लेना और हाँ तेरे पिता के बाद राज्य सम्भालने वाला भी कोई नहीं हैं वर मैं अपने लिए एक भाई( गधिक के लिए पुत्र) भी मांग लेना ........................ '  
जब वो एक हजार दिव्या अस्व प्रकट कर सकते हैं तो वर मैं तुझे और मुझे एक पुत्र भी दे सकते हैं.

(संकट के समय मे जब कोई समस्या हो तो अपने बड़ो को अवश्य बता देना चाहिए वे वे सदा आपके हित की ही बात करेंगे) 

Sunday, March 11, 2012

PARSURAM BHAG - 3






परसुराम भाग -  3

( महाराज गधिक को रिचिक की भेट एवं   रिचिक का राजकुमारी से विवाह )

रिचिक ऋषि ये बात समझ गए थे की महाराज अपनी सुकुमारी पुत्री का विवाह उनसे नहीं करना चाहते और इस लिए गधिक ने एसी भेट मांगी जिसे कोई सामान्य व्यक्ति पूरा नहीं कर सकता और नाही ये मांग पूरी करना संभव था क्योकि स्वेद वर्ण वाले एसे अस्व जिनका सिर्फ  दाया कर्ण काला हो इस प्रकार के एक हजार अस्व तो क्या संभवत ऐसा एक भी अस्व मिलना सरल नहीं परन्तु गधिक को पता नहीं था की रिचिक कोई साधारण सन्यासी ब्रह्मण नहीं थे स्वयं प्रभु ने उन्हें चुना था.

रिचिक ने वेदी मैं अग्नि प्रज्वलित की और यज्ञ प्रारम्भ किया होम की अग्नि जलने लगे ऋषि सविधा डालने लगे वेद मंत्रो का उच्चारण शुरू हुआ रिचिक ने दिव्य मन्त्रो का पाद शुरू किया सारा वातावरण दिव्य हो गया.
रिचिक ने मंत्रो को तेज स्वर मैं बोलना प्रारंभ किया ॐ वरुण देवाय नमह ॐ वरुण देवाय नमह यज्ञ की अग्नि और तेज जलने लगी .

ॐ वरुण देवाय नमह ॐ वरुण देवाय नमह 

यज्ञ की अग्नि मेंसे स्वयं वरुण देव प्रकट हुए, रिचिक ने वरुण देव को प्रणाम किया और वरुण देव ने भी रिचिक को प्रणाम किया.
वरुण देव ने कहा - रिचिक आपने मेरा आह्वान किया. कहिये क्या बात हैं. 
जब एक साधारण सा मनुष्य अपनी इच्छाओ का त्याग कर देता हैं जब उसका जीवन उसके लिए नहीं जनकल्याण और  परहित के लिए हो जाता हैं, जब एक साधारण सा व्यक्ति एन्द्रिक विषयों से ऊपर उठ जाता हैं .भोगो का त्याग कर देता हैं तो उसका जीवन स्वयं यज्ञ बन जाता हैं तब ऐसे  व्यक्ति के सामने देवता भी नतमस्तक हो जाते हैं.
आज वही द्रश्य साकार हो रहा था वरुण देव रिचिक के आदेश की प्रतीक्षा कर रहें थे.
वरुण देव आपके आह्वान के पीछे मेरा कोई व्यक्तिगत उद्देश्य नहीं हैं अपितु   सर्वशक्तिमान  भगवन  की आज्ञा से जनकल्याण हेतु  मुझे दिया  हुआ एक अतिमहत्वपूर्ण  कार्य संपन्न करने के लिए मुझे आपकी आवश्यकता हैं.
सुनिए वरुण देव इस कार्य के निमित मुझे आपकी आवश्यकता हैं, 

वरुणदेव - आप कहिये ऋषिवर मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ.
वरुण देव मुझे स्वेद वर्ण वाले ऐसे अश्वो की आवश्यकता हैं जिनका दया कर्ण कला हो मुझे ऐसे एक हजार अस्वो की आवश्यकता हैं,
वरुण देव ने बिना विलम्ब  किये एक हजार दिव्य अस्वो को प्रकट कर दिया .
मुनिवर ये दिव्य अस्व हैं आप जेसा कहैंगे ये आपकी आज्ञा का वेसा ही पालन करेंगे.
रिचिक ने वरुण देव को धन्यवाद दिया वरुणदेव पुनह अग्नि के धुएं मैं विलीन हो गए रिचिक उन हजार अस्वो को लेकर अगले ही दिन  राजा गधिक के पास चल दिए.
महाराज गधिक को जब ये पता चला की रिचिक उन्हे भेट देने के लिए उनकी इच्छा अनुसार एक हजार अस्व लेकर आये तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ वो भागते हुए रिचिक के पास पहुचे उन्होंने देखा रिचिक उसी प्रकार के एक हजार अस्वो के साथ खड़े थे जिनका वर्णन उन्होंने किया था , और आज तो भेट के अनुसार दूसरा दिन ही प्रारंभ हुआ था.
गधिक को अपनी आँखों पर विशवास नही हुआ.
देखिये महाराज आपकी इच्छानुसार मैं अस्वो को ले आया भेट स्वीकार कीजिये.
गधिक रिचिक के तप सामर्थ्य को समझ गए.और दुःख भरे स्वर मैं बोले ऋषिवर मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया हैं मैं समझ गया हूँ मेरी पुत्री के लिए आप से श्रेष्ट  वर नहीं हो सकता मैं अपनी पुत्री का विवाह आप से करके स्वयं को धन्य समझूंगा मेरी पुत्री का ये सोभ्ग्य होगा की उसे आप जेसा पुरुष वरन करे .
 जब दुनिया को किसी व्यक्ति की शमता का पता चलता हैं, उसके सामर्थ्य का ज्ञान होता  हैं जब व्यक्ति अपने आप को सिद्ध कर देता हैं जब दुनिया को उसकी शक्ति का पता चलता हैं , तो वही दुनिया उसकी प्रसंसा करते नहीं थकती जिसे कल तक वो स्वीकारने को तेयार नहीं थी.जिसका त्याग कर दिया गया  था पर अब  वही  उनके लिए सम्माननीय हो जाता हैं  जेसा आज राजा गधिक और रिचिक के प्रसंग से देखने मैं आता हैं
राजा गधिक ने अपनी सुकुमारी पुत्री का रिचिक से भव्य विवाह किया रिचिक ने राजा गधिक से जाने की अनुमति ली और अपनी नवविवाहित वधु को लेकर प्रस्थान किया............................................(शेष भाग भाग ही समय बाद )

Friday, March 9, 2012

PARSURAM BHAG -2







परशुराम  भाग - २ ( रिचिक की राजा गधिक से भेट )


शेष से आगे ............ तपस्वी ऋषि रिचिक महाराज गधिक के राज्य मैं पहुंचे  राजा को जब उनके आगमन की सुचना मिली तो उन्होंने उनका भव्य सत्कार किया. धर्मानुसार सेवा की तब राजा बोले ऋषिवर आप ने पधार कर  मुझ पर विशेष कृपा की मुझे अपने आथित्य के योग्य समझा ये मेरा सोभाग्य हैं  कहिये मैं आपकी किस प्रकार से सेवा कर सकता हूँ.
रिचिक बोले महाराज मेरे यहाँ आने का उदेश्य  अतिविशेष हैं मैं यहाँ एक महान कार्य को प्रसस्त करने के लिए आया हूँ.
ये कार्य मुझे सर्वशक्तिमान भगवान् ने स्वयं करने को कहा हैं और इसके लिए आदेश दिया हैं  , गधिक बोले आप आज्ञा करे महाराज मैं आपकी क्या सेवा सहायता कर सकता हूँ 
रिचिक बोले राजन जिस कार्य की मैं बात कर रहा हूँ उसका उद्देश्य समाज मैं संतुलन लाने  और धर्म की संस्थापना से हैं, धर्म जिसकी  संस्थापना के लिए स्वयं भगवान् विष्णु जन्म लेंगे १ ऋषि ने गधिक को वर्तमान स्थिति से अवगत करवाया गधिक को समझ नहीं आया की भगवान् के आगमन और समाज के संतुलित करने मैं वो किस प्रकार सहायता  कर सकते हैं 
तब ऋषि ने कहा राजन मैं आप से एक वचन चाहता हूँ और आशा  करता हूँ  की आप उस वचन को पूरा करेंगें.
गधिक बोले - आप आज्ञा करे मैं अपना सर्वस्व इस कार्य के लिए दे सकता हूँ . तब ऋषि रिचिक ने कहा महाराज मुझे इश्वर ने ये आज्ञा दी हैं की मैं आपकी पुत्री से विवाह करूँ इस कार्य के उद्घाटन के लिए यही प्रथम चरण हैं.
महाराज गधिक ये सुनकर स्तब्ध रह गए.
ये आप क्या कह रहें हैं ऋषिवर ये केसे संभव हैं आप एक सन्यासी हैं तपस्वी हैं वैरागी हैं और मेरी पुत्री राजपुत्री हैं आप कुशा के घर मैं निवास करते हैं और मेरी पुत्री राजमहल मैं आप ने हर सुख का त्याग कर रखा हैं और मेरी पुत्री सुखो में रही हैं, दुःख कभी उसके निकट नहीं आया नहीं नहीं मेरी पुत्री का विवाह आपसे नहीं हो सकता ये असम्भव हैं. रिचिक को इस बात का अंदेशा था की राजन इस बात के लिए   राजी नहीं होंगें तत्पचात उन्होंने राजन को कठोर शब्दों में कहा महाराज ये स्वयं प्रभु  की आज्ञा हैं आपको इस का पालन करना होगा.
जब व्यक्ति को समाज और स्वयं के हित में से किसी एक का चुनाव करना पड़ता हैं तो वो असमंजस में पड़ जाता हैं और कई बार वो स्वयं के हित को प्राथमिकता देता हैं.
और यहाँ तो बात महाराज की इकलोती पुर्त्री की हो रही हैं जो महाराज को अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं एक पिता होने के कारन गधिक रिचिक के वचन और स्थिति की गंभीरता को भूल गए.
रिचिक बोले महाराज एक पिता होने के कारन आप निर्णय नहीं ले पा रहें है की आप का धर्म क्या हैं प्राथमिकता क्या हैं इसमें कुछ गलत नहीं पर महाराज जब बात राष्ट्र और अपने परिवार में  से किसी एक के हित की हो किसी एक की रक्षा की हो जब इन दोनों में से किसी एक का चुनाव करना हो तब व्यक्ति को चाहिए की वो अपने राष्ट्र समाज को प्राथमिकता दे आप तो एक राजा हैं प्रजा हित को समझते हैं आप को संसय में नहीं पड़ना चाहिए,
जब राष्ट्र ही नहीं रहेगा तो शेष कुछ भी शेष नहीं रहेगा और महाराज इसका  दोष आपको लगेगा. कुछ विचार करिए.
महाराज गधिक को ऋषि की कोई बात प्रभवित नहीं कर पा रही थी वे संतान मोह में अंधे हो चुके थे पर इस बात से भी चिंता में थे की संसार उन्ही को दोष देगा अतः उन्होंने एक युक्ति सोची.

गधिक बोले महाराज में अपनी सुकुमारी पुत्री का विवाह आपसे करने के लिए तेयार हूँ पर इसके लिए आप को हमारी एक मांग पूरी करनी होगी 
रिचिक बोले कहिये महाराज क्या मांग हैं आपकी, गधिक बोले सुनिए ऋषि  हमारे यहाँ पुत्री के विवाह में एक रीती परम्परा हैं जिसके अनुसार वर वधु पक्ष में अपने स्वसुर को स्वसुर की इच्छा अनुसार कुछ भेट में देता हैं.
रिचिक समझ गए की राजन विवाह टालने की युक्ति कर रहें हैं पर वे शांत रहें, कहिये राजन क्या मांग हैं आपकी  में आप को क्या भेट करूँ ?
गधिक बोले मेरी आपसे ये मांग हैं की रीती के अनुसार आप मुझे श्वेत वर्ण वाले अस्व जिनका दया कर्ण(कान) काला हो एसे एक हजार अस्व मुझे भेट स्वरूप चाहिए.
गधिक को लगा की ऋषि ये मांग पूरी नहीं कर पाएंगे "
और न रहेगा बांस और ना बजेगी बांसुरी लोकोक्ति सार्थक होगी ...........
ऋषि मन ही मन हस दिए और राजा से कहा राजन में आपकी  मांग पूरी करने का प्रयास करूँगा  गधिक बोले ये भेट दस दिनों के भीतर पूरी करने का रिवाज हैं में आपको वचन देता हूँ की यदि आप इस रीती का पालन करदे तो में अपनी सुकुमारी पुत्री को विवाह आप से कर दूंगा.
इसके बाद रिचिक भेट लाने की बात कहकर चल दिए......................
में शीग्र्हा पधारुन्गा महाराज आप विवाह की तेयारी कीजिये रिचिक चल  दिए ........................................( शेष भाग  कुछ ही समय में  )

PARSURAM BHAG -1







परसुराम भाग - एक

भगवान परशुराम भगवन विष्णु के दस अवतारों मैं से एक हैं. जिनका अवतार दुष्ट अत्याचारी शक्त्रिया राजाओ के विनाश  के लिए हुआ . शक्त्रियो को वर्ण व्यवस्था मैं ऊँचा स्थान  मिला हुआ था राज्य करने का अधिकार उन्ही  के पास सुरक्षित था क्यों की वो वीर युद्ध करने वाले होते सम्पूर्ण समाज की रक्षा का दायित्व इन्ही शक्त्रियो पर था इन्ही की तरह बाकी अन्य तीनो वर्ण भी अनपे अपने कार्य को भली प्रकार से कर के समाज और राष्ट्र के लिए अपना दायित्व निभाते,
ब्रहामन वर्ण यज्ञ धर्म और समाज को ज्ञान का मार्ग दिखता 
वैश्य वर्ण व्यापार आदि करके  लोगो की आवश्यकताओ की पूर्ति करता 
और शुद्र वर्ण समाज के सेवा करता 
इन चारो मैं से यदि एक भी अपना धर्म नहीं निभाए तो समाज की रचना संभव नहीं हो सकती थी परन्तु कुछ ऐसा ही हुआ 
हैहय वंश के शक्त्रिया अपने दायित्व को भूल गए और मनमानी करने लगे अपनी शक्ति और पद का दुरपयोग करने लगे वे अत्याचारी हो गए जिस कारण समाज का संतुलन बिगड़ गया और इसी संतुलन को पुनह स्थपित करने के लिए भगवान परसुराम का जन्म हुआ 
जिसकी कथा इस प्रकार हैं.............................................................१ 

रिचिक ऋषि नाम के एक बहुत तपस्वी युवा सन्यासी थे जो यज्ञ आदि अनुष्ठान करते  वे महान सिधियो के स्वामी थे इश्वर की उन पर विशेष कृपा थी और ये सब उनके तप का ही प्रभाव था.
उनका ये समाज कल्याणकारी तपो यज्ञ इसी तरह चल रहा था एक दिन वो ध्यानमग्न होकर प्रभु का चिंतन कर रहें थे उसी  समय उन्हें एक इश्वानी सुनाई दी हे ऋषिवर ध्यान से सुनिए आपको एक महान कार्य करना हैं रिचीक बोले प्रणाम प्रभु आप किस कार्य की  बात कर रहें हैं, इश्वानी ने कहा सुनिए ऋषि आज  समाज का  संतुलन बिगड़ चूका हैं शक्त्रिया अपनी मर्यादाओ को लाँघ चुके हैं और अपने दायित्व को भूल गए हैं, अतः  अब पुनह समाज को संतुलित  कर और इन दुष्टों का  नाश कर इन्हें दंड देने का समय आ गया हैं इसके लिए अब स्वयं मैं ( भगवान् विष्णु ) अवतार लूँगा और धर्म की संस्थापना करुगा. ऋषि बोले हे प्रभु आप आज्ञा करे .
सुनिए रिचिक आपको गधिक नामक धर्मात्मा राजा की पुत्री से विवाह करना होगा.
ऋषि आश्चर्य से बोले प्रभु मैं तो सन्यासी हु ब्र्म्चारी हूँ  मैं विवाह केसे कर सकता हु प्रभ बोले हे रिचिक कभी कभी धर्म की रक्षा के लिए और समाज कल्याण के लिए अपने संकल्पों  मैं परिवर्तन करना आवश्यक हो जाता हैं ,इस वक़्त आप का तप - यज्ञ और संन्यास नहीं हैं इस समय आप का दायित्व समाज के संतुलन मैं सहायता करना हैं और इस के लिए आपका विवाह करना अतिआवश्यक हैं.
रिचिक इस मर्म को समझ गए और प्रभु की आज्ञा और समाज कल्याण के पथ पर गधिक महराज की राज्य सभा की और चल दिए.....................................................! (शेष भाग कुछ ही समय बाद  )