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Wednesday, March 16, 2016

सीमित विश्वास और जीवन प्रबंधन

विश्वास करना या न करना 
व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है 
परन्तु किसी पर एकदम से 
 अविश्वास कर लेना 
और हर किसी पर विश्वास करना 
भी उचित नहीं है 
जो व्यक्ति हर किसी पर
 जरुरत से अधिक विश्वास कर लेता है
 विश्वास घात उसी व्यक्ति के साथ होता है
 और जो व्यक्ति किसी पर भी
 विश्वास नहीं करता 
वह सदा संशयग्रस्त रहता है 
जीवन में व्यवहारिक दृष्टि से असफल रहते है
एक बहुत पुरानी कहावत है 
सीमित संपर्क ,सीमित विश्वास, 
सर्वोपरि आत्मविश्वास ,
सीमित विश्वास का तात्पर्य यह है कि
 किसी कार्य के लिए कौनसा व्यक्ति उपयुक्त है
 यह निर्धारित करने के बाद
 किसी व्यक्ति की कार्य क्षमता 
और उसके व्यक्तिगत गुणों का आकलन कर 
उस पर विश्वास करना 
जीवन प्रबंधन का यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है 
इसी मार्ग से समूह का नेतृत्व कर 
दक्षता पूर्वक समूह के
 प्रत्येक सदस्य से कार्य लिया जा सकता है

Saturday, February 27, 2016

अकर्मण्यता का निवारण एवम उपाय

 
व्यक्ति के व्यक्तित्व को परखने की 
कसौटी यह है कि
 वह पुरुषार्थी है या अकर्मण्य  । 
पुरुषार्थी व्यक्ति उद्यमशील होता है 
उद्यमशीलता व्यक्ति का वह गुण है
 जो उसे कर्मरत होने की प्रेरणा देती रहती है
 सच्चा पुरुषार्थी व्यक्ति वह है 
जो शून्यवत रिक्तता को भर दे 
जहा असुविधाओं को सुविधाओ में बदल दे
 अभावो अल्प साधनो में कार्य कर 
परिणाम सामने ले आये 
कहने का तात्पर्य यह है 
मरुथल की धरा को हरा कर दे 
अपनी दीनता हीनता को प्रगट न करे । 
स्वाभिमान की भावना रखे ।
ऐसे पराक्रमी पुरुषार्थी व्यक्तित्व की 
 सकारात्मक ऊर्जा को पाकर 
मानवता धन्य हो जाती है
 इसके विपरीत अकर्मण्य व्यक्ति 
मात्र पूर्व की जुटायी व्यवस्था के 
उपयोग में विश्वास करते है 
व्यवस्थाये सुविधाये मिल जाने पर
 उनमे दोष निकालते है 
अकर्मण्यता यही समाप्त नहीं होती 
वे निज सुख के लिए दूसरे व्यक्तियो की 
सुविधाओ को को भी छीन कर 
उनका उपयोग उपभोग करते है 
दुनिया में पुरुषार्थी व्यक्तियो की अपेक्षा 
 अकर्मण्य व्यक्तियो का अनुपात 
कही ज्यादा है । 
अकर्मण्य व्यक्ति अकारण 
थकान का अनुभव करता है 
वह कितना भी विश्राम कर ले 
उसकी थकान दूर नहीं होती ।
 अकर्मण्यता निवारण का उपाय क्या है?
 अकर्मण्यता नियमित दिनचर्या 
और उचित व्यायाम से दूर की जा सकती है।
अकर्मण्यता योग ध्यान उपासना अपनाने से 
दूर की जा सकती है ।
अकर्मण्यता ऊर्जा से भरपूर व्यक्तियो का 
सानिध्य पाकर दूर की जा सकती है । 
यदि सूर्य नमस्कार को 
किसी धर्म से न जोड़ा जाए 
तो नियमित सूर्य नमस्कार करने से
अकर्मण्यता दूर की जा सकती है
 

Friday, February 19, 2016

सरलता के साथ सफलता

कहते है संत का स्वभाव सरल होता है
सरल स्वभाव से परिपूर्ण व्यक्ति को
अल्प साधना में ही 
ईष्ट की कृपा प्राप्त हो जाती है
जिसका स्वभाव सरल नहीं हो
भले वह संन्यास धारण कर ले 
संत नहीं हो सकता है
हर वह व्यक्ति संत है जिसका स्वभाव सरल है
चाहे उसने सांसारिक जीवन का 
त्याग नहीं किया है
प्रश्न यह उठता है 
सरल स्वभाव की कसौटी क्या है
सरल स्वभाव को किस प्रकार से परिभाषित
किया जा सकता है
जिस व्यक्ति के पास छुपाने लायक कुछ नहीं हो
जिसके भीतर की निश्छलता बाहर से
साफ़ साफ़ पढ़ी जा सके
 वह सरल है
उसका स्वभाव निर्मल जल की तरल है
सरल स्वभाव के व्यक्तियो को मुर्ख समझना
सबसे बढ़ी मूर्खता होगी
ऐसा नहीं है कि 
सरल व्यक्ति दूसरे के मंतव्यों को न पढ़ सके 
सरलता के बल पर 
सरल व्यक्ति सूक्ष्म अनुभूतियों का स्वामी होता है इसलिए उसकी संवेदनाये प्रखर होती है 
वह सीघ्र ही दुष्ट व्यक्ति और उसके मंतव्यों को 
 पहचान लेता है
 जीवन में सरलता का सुख जिसने पाया है 
उसे वैराग्य धारण करने की
 आवश्यकता भी नहीं रहती
 वह तो सहज वैरागी 
भगवद सत्ता का सहज अनुरागी होता है 
सरलता महानता की पहली कसौटी है
 जो भीतर से पावन है वह सरल है 
जो भीतर से प्रसन्न है वह सरल है 
इसलिए सरलता मार्ग ही सर्वोत्तम है 
सरल व्यक्ति के सारे कार्य सरलता से
 निष्पादित हो जाते है 
जीवन के जटिल से जटिल प्रश्नो के समाधान 
उसे सरलता से प्राप्त हो जाते है

Saturday, May 16, 2015

व्यक्तित्व निर्माण की पाठशाला

इस दुनिया में दो प्रकार के स्वभाव वाले व्यक्ति होते है एक प्रकार के वे लोग है जिनको ये पता नहीं होता कि वे क्या बोल रहे है उन्हें क्या बोलना चाहिए ऐसे व्यक्तियो की बात का कोई मूल्य नहीं होता समाज में कोई स्थान नहीं होता भले ही वे स्वयं को कितना ही महत्वपूर्ण व्यक्ति समझ ले बड़ी बड़ी डींगे हांकना अनावश्यक निंदा स्तुति ऐसे व्यक्तियो का स्वभाव होता है  दूसरे प्रकार के वे व्यक्ति होते है जिनके शब्दों का मूल्य होता है अनावश्यक न तो किसी की प्रशंसा करते है न ही किसी की निंदा ऐसे व्यक्ति क्षमता और प्रतिभा से परिपूर्ण होते है उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं होता  ऐसे व्यक्तियो को स्वयं के बारे में कोई भ्रान्ति नहीं होती अपितु समाज में उनकी बात को ध्यान से सूना जाता है और उसको महत्व दिया जाता है  हमें स्वयं का मूल्यांकन कर सोचना चाहिए कि हमारा स्वभाव क्या है यही मानदंड हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते है व्यक्तित्व निर्माण की यही पाठशाला है

Thursday, October 17, 2013

समस्या प्रबंधन

लोग अलग अलग समस्याओं के लिए 
अलग ग्रहों की शान्ति के उपाय करते है
कुछ लोग राहू  केतु तो कुछ लोग शनि मंगल ,को 
प्रसन्न करने के लिए ज्योतिषियों से मंत्रणा करते है
भूल जाते है की नव गृह का मुखिया सूर्य देव है
 फिर क्यों नहीं लोग मात्र सूर्य की उपासना से 
अपने सारे कष्ट कर लेते है 
समझदार व्यक्ति समस्याओं के निवारण के लिए
 समस्याओं की परिधि को स्पर्श न कर 
समस्याओं के केंद्र का संधान करते है
 इससे व्यर्थ के परिश्रम में अपव्यय होने वाली ऊर्जा से 
बचा जा सकता है 
जीवन समस्याओं से घिरा हुआ है
 परन्तु सभी समस्याओं  की जड़ 
कोई एक मुख्य समस्या हुआ करती  है 
मुख्य समस्या हल होते ही शनै शनै आनुषांगिक समस्याए 
निराकृत होने लगती  है
 इसलिए समस्याओं से उबरने का सही उपाय है
 मुख्य समस्या का समाधान करे 

Thursday, November 29, 2012

स्वाभिमान


स्वालम्बन का सीधा सम्बन्ध स्वाभिमान से होता है
स्वाभिमानी व्यक्ति को अात्म सम्मान से बहुत अधिक प्यार होता है
वह किसी भी कीमत पर अपने अात्म सम्मान के ठेस लगने पर
समझौता नही करता
अात्मसम्मान को ठेस लगते ही
वह कितने ही बडे प्रलोभन को एक क्षण मे ठुकरा देता है
स्वालम्बन जीवन मे उत्थान का प्रथम लक्षण है
स्वाभिमान व्यक्ति को उर्जा प्रदान करता है
व्यक्ति उसमे निहित क्षमता से स्वयम को प्रमाणित करने हेतु
अतिरिक्त क्षमता से कार्य करता है
स्वाभिमानी व्यक्ति विश्वसनियता की प्रतिमूर्ति होता है
ऐसा व्यक्ति पहली बार देखने मे अभिमानी स्वभाव का प्रतीत होता है
परन्तु शनै :शनै :परिचय होने पर उसका
वास्तविक स्वरुप समझ अा जाता है
मिथ्याभिमान अयोग्यता का प्रतीक होता है
ऐेसा व्यक्ति निरन्तर एक प्रकार की भ्रान्ति मे विचरण करता है
मानो वह बहुत अधिक योग्यता धारण करने वाला व्यक्ति है
ऐसे व्यक्ति अपने मिथ्याभिमान से स्वयम का नुकसान तो करते ही है
साथ ही वह स्वर्णिम अवसरो का लाभ भी नही उठा पाते है
मिथ्याभिमानी व्यक्ति का अभिमान जितनी जल्दी दूर हो जाये वह श्रेयस्कर है

Wednesday, October 24, 2012

दायित्व बोध

जीवन प्रबंधन ,व्यवसाय प्रबंधन के क्षेत्र में
दायित्व बोध का अत्यधिक महत्व है
व्यवहारिक जीवन में दो प्रकार के लोग होते है
प्रथम वे जो अपने दायित्व को भलीभांति समझते है
चाहे परिवार के प्रति दायित्व हो ,समाज के प्रति दायित्व हो ,
व्यवसाय के प्रति दायित्व हो या देश के प्रति दायित्व हो
प्रत्येक प्रकार के दायित्व को उठाने के लिए सदा तत्पर रहते है
दूसरे वे व्यक्ति होते है जिनमे दायित्व बोध की भावना नहीं होती
किसी प्रकार का दायित्व ऐसे व्यक्तियों पर डाला जाय तो
 वे यथा संभव उससे बचने का प्रयास करते है
दिए गए दायित्व से से वे पलायन करते है
जीवन में चहु और वे व्यक्ति सफलता प्राप्त करते है
जिनमे दायित्व बोध की भावना कूट -कूट कर भरी होती है
जिस व्यक्ति में जिस अनुपात में दायित्व वहन करने की क्षमता होती है
उतने ही अनुपात में उन पर दायित्व का भार डाला जाता है
जिस व्यक्ति पर दायित्व का भार जितनी अधिक मात्रा में होता है
उस व्यक्ति के अधिकारों का विस्तार उतना ही अधिक होता है
जिस व्यक्ति को जितने अधिकार प्राप्त होता है
वह व्यक्ति उतना ही अधिक सामाजिक रूप से
शक्ति सम्पन्न तथा विश्वसनीय व्यक्ति होता है
दायित्व से पलायन करने  वाले
व्यक्ति अकर्मण्य, अधिकारों से विहीन ,
एवं आत्मविश्वास से विहीन होते है
जीवन में ऊर्जा पाने के लिए यह आवश्यक है
कि हम दायित्व वान व्यक्तियों से जुड़े
स्वयं में दायित्व बोध कि भावना जाग्रत करे

Tuesday, October 16, 2012

गहराई


जीवन में जितनी ऊँचाई सार्थकता रखती है
उतनी गहराई सार्थकता रखती है
व्यक्तित्व में जितनी
ऊँचाई आवश्यक नहीं
उतनी गहराई आवश्यक है
बिना गहराई लिए ऊँचा लंबा व्यक्ति हो
व्यक्तित्व हो या ईमारत  उसका आधार कमजोर होता है
गहरा चिंतन ,गहरा सोच ,गहरी योजनाये ,गहरी भावनाए ,
व्यक्ति को शांत और सौम्य बनाती है
जबकि व्यक्तित्व का उथलापन व्यक्ति को चंचल और और अस्थिर बनाता है
जीवन में समग्रता प्राप्त करने के लिए
कठोर परिश्रम के साथ विषय तथा तथ्य के प्रति गहरा अध्ययन अनिवार्य है
भक्ति हो ,प्रीती हो ,या नीति हो उसमे गहराई से डूब जाना होता है
इसलिए गहराई से डरने की नहीं सवरने की आवश्यकता है
समग्र गहराईया  जब हम अपने व्यक्तित्व में समा लेते है
तो हम स्वयं को सामर्थ्यवान और सशक्त बना लेते है
आशय यह है की सागर की तरह गहरा और सुधीर बनो




http://starsgrant.com/images/deep-water-01.jpg

Friday, October 12, 2012

क्रिकेट एवम कैरियर तथा व्यवसाय प्रबंधन


क्रिकेट एवम कैरियर तथा व्यवसाय प्रबंधन का परस्पर सम्बन्ध है
इस विषय पर मौलिक दृष्टिकोण स्पष्ट करना आवश्यक है
क्रिकेट मै खिलाड़ी अलग अलग स्थितियों में अलग अलग भूमिका में रहते है
सभी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है
यह आवश्यक है की सम्बंधित खिलाड़ी अपनी भूमिका के महत्व समझे
सर्वप्रथम हम क्रिकेट मै बल्लेबाज की स्थिति मै खेल रहे खिलाड़ी को देखे
तो वह बल्लेबाज
सफलता पूर्वक रन बनाता है
जो प्रत्येक गेंद पर चौके छक्के न लगा कर सही गेंद का इन्तजार करे
अन्यथा वह अच्छा खेलने का अवसर खो सकता है
खतरनाक गेंद सुरक्षित तरीके से खेल कर अपना  विकेट सुरक्षित रख कर
वह अपना खेल जारी रख सकता है 
तथा अच्छी गेंद का मिलने पर वह चौके छक्के बरसा सकता है
इसका तात्पर्य यह है की कैरियर हो या व्यवसाय
उसमे उतार चढ़ाव आना स्वाभाविक है
विपरीत परिस्थियों मै व्यक्ति को चाहिए की मात्र
वह अपने अस्तित्व को बचाए रखे अनुकूल स्थितिया उपलब्ध होने पर
वह अपने  कैरियर तथा व्यवसाय का विस्तार करे
क्रिकेट में दूसरा भूमिका खिलाड़ी गेंद बाज होती है
कई बार खेल में ऐसा होता है
की किसी गेंद बाज की गेंद पर लगातार बल्लेबाज चौके छक्को की बरसात कर देता है
तब यदि गेंद बाज विचलित हो जाता है
तो बल्लेबाज और अधिक आक्रामक हो जाता है
इसके स्थान पर गेंद बाज मानसिक संतुलन बनाए रखते हुए
सधी हुई गेंद बाजी लगातार करता रहे
तो दूसरे क्षण बल्लेबाज आउट हो जाता है
और खेल की बाजी पलट जाती है
इसका यह तात्पर्य यह है की व्यक्ति को बुरे वक्त में धैर्य नहीं खोना चाहिए
और निरंतर एक जैसी गति से संतुलित रहते हुए कर्म करते रहना चाहिए
किसी समय सफलता मिल सकती है
क्रिकेट में मैदान पर खड़े क्षेत्र रक्षको की भूमिका भी महत्त्व पूर्ण होती है
सामान्य रूप से ऐसे क्षेत्र रक्षक जो यह सोचते है कि
उनकी और गेंद नहीं आ सकती इसलिए वे शिथिल अवस्था में रहते है
अगले ही क्षण कोई बल्लेबाज गेंद को बल्ले से उसी गेंदबाज कि उठा देता है
यदि क्षेत्र रक्षक सावधान है तो वह गेंद को कैच कर बल्लेबाज को आउट कर देता है
आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में स्वर्णिम अवसर आता है
उसे उचित अवसर पर अपनी भूमिका को समझना होता है