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Thursday, March 24, 2016

सत्य की लड़ाई

सत्य की लड़ाई में
आदमी अकेला होता है
सूरज को कभी दीपक दिखाया नहीं जाता
जल का अर्पण किया जाता है
दीपक तो चन्द्रमा को दिखाया जाता है
अँधेरे को भागने के लिए
उजाला लाने के लिये
अँधेरे को दूर कर जो
जग में उजाला भर दे
उसे दिवाकर कहते है
दिवाकर की शरण में
सत्य दूत रहते है
अपराध अन्धकार की तलाश करता है
अँधेरे के भीतर गुप् चुप रहता है
उजाला जगमगाते ही खूब रोता है
अपना अस्तित्व खोता है
इसलिए अन्धकार मिटाने के लिए
सच का उजाला होता जरुरी है

Friday, November 6, 2015

श्रीराम का संघर्ष और उसकी शुचिता

श्रीराम के पास चार कलाये 
श्रीकृष्ण के पास सोलह कलाये 
और श्री हनुमान के पास चौसठ कलाये थी
श्रीराम मर्यादा को स्थापित करने आये थे 
मर्यादित होकर सादगी पूर्ण जीवन जीने के लिए 
व्यक्ति को अपनी विशिष्टता दर्शाना
 आवश्यक नहीं होता है 
सीमित संसाधनों के बल पर 
विषम परिस्थितियों में में क्या किया जा सकता है समाज में सामूहिक चेतना जगा कर 
उसे संगठित कर अत्याचार के विरुध्द 
किस प्रकार प्रतिकार किया जा सकता है 
यह मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने प्रमाणित किया था इसके लिए श्रीराम ने वन में रहने वाले 
वनवासियों का सहयोग लिए 
अतिशयोक्ति पूर्ण भाषा में उन्हें वानर कहा गया ।वर्तमान में जो लोग नक्सलवादी सोच रखते है 
उन्हें  श्रीराम से सीखना चाहिए 
तथा अपने अभियान उसके उद्देश्य और साधनो की पवित्रता के सम्बन्ध में विचार करना चाहिए 
यदि पवित्र उद्देश्य है 
तो स्थानीय निवासियो स्थानीय संसाधनों को संघर्ष का माध्यम बनाया जा सकता है 
अपने देश की धरती पर विदेशियो से प्राप्त और शस्त्र से किया गया संघर्ष देश द्रोही बनाता है

Thursday, October 22, 2015

दशहरे पर राम की खोज

विजयादशमी जिसे दशहरा भी कहा जाता है
दशहरा इसलिए 
क्योकि इस दिन बुराईयो के प्रतीक  
रावण का दहन किया जाता है
 दहन वह विनिष्टिकरण की प्रक्रिया है
 जिससे कोई वस्तु वापस दूसरे रूप में 
प्रगट नहीं हो पाती है
 रावण का दहन इसलिए किया जाता है
 ताकि बुराइया समूल नष्ट हो जाए 
पुन अंकुरित होकर परिवर्तित रूप में 
प्रगट न हो पाये ।
विजयादशमी पर दशहरा इसलिए मनाया जाता है क्योकि जब हम बुराइयो का नाश करते है 
तब हम दशो दिशाओ से सुरक्षित हो जाते है
 दशहरे पर श्रीराम के रूप धर कर 
रावण के पुतले का दहन किया जाता है
 ऐसा इसलिए कि बुराइयो को दूर रखने की सामर्थ्य उसी व्यक्ति में होती  है
जो व्यक्ति शुचिता  और सत्य का स्वरूप होता है 
जो व्यक्ति स्वयं कई प्रकार की बुराईयो से
 घिरा होता है 
उस व्यक्ति से बुराईयो को समाप्त करने की
 न तो अपेक्षा की जाती है
 नहीं उसे ऐसा अधिकार दिया जाता है 
यदि ऐसा किया जाता है 
तो बड़ी बुराई को ख़त्म करने के लिये 
छोटी बुराई को प्रोत्साहित करने जैसा ही होगा ।
ऐसी स्थिति में कालान्तर में 
छोटी बुराई के बड़ी बुराई में बदलने की 
पूर्ण संभावना विद्यमान रहती है 
वर्तमान में इसी कारण से बुराईया 
समाप्त नहीं हो पा रही है ।
हमें बुराईयो समाप्त करने के लिए अपने बीच में 
छुपे राम को 
अपने भीतर के राम को ढूंढना होगा

Wednesday, April 9, 2014

कंस और श्रीकृष्ण

कंस जो भगवान् कृष्ण का मामा था
 क्या इतना क्रूर व्यक्ति था ?
क्या भगवान् कृष्ण के जन्म का एकमात्र उद्देश्य
 कंस का वध करना ही था ?
उक्त प्रश्नो के उत्तर सामान्य नहीं है 
वास्तव में देखा जाय तो कंस भले ही अच्छा शासक नहीं था 
परन्तु इतना अधिक क्रूर नहीं था कि 
अकारण अपनी सगी बहन को कारावास में डाल दे 
आकाशवाणी होने के पूर्व
 कंस उसकी बहन देवकी का आदर्श भ्राता था
 देवकी और वसुदेव का विवाह अत्यंत भव्य तरीके से
 कंस ने सम्पन्न कराया था 
कंस अपनी बहन देवकी से अत्यधिक  स्नेह रखता था 
विवाह के पश्चात जैसे ही आकाशवाणी से
 कंस को अवगत कराया गया कि
 देवकी का अष्टम पुत्र  उसका वध कर देगा 
कंस का ह्रदय परिवर्तन हो गया 
उसका बहन के प्रति स्नेह घृणा में परिवर्तित हो गया 
यही से उसकी क्रूरता प्रारम्भ हुई कंस कि यह मानसिकता 
 सामान्य मानव स्वभाव है कौन व्यक्ति चाहेगा कि
 उसका सबसे घनिष्ठ व्यक्ति ही उसका वध कर दे  
भगवान् कृष्ण के अवतार का उद्देश्य भी 
यदि कंस वध तक सीमित होता तो वे 
सत्य पर असत्य  की विजय यात्रा को 
कंस के वध के पश्चात आगे नहीं बढ़ाते 
मथुरा के राज्य के राजा बन कर सीमित अर्थो में 
अपनी उपयोगिता प्रमाणित करते 
परन्तु श्रीकृष्ण के अवतार का उद्देश्य कंस  ही नहीं 
अपितु समस्त  धरा पर कंस के सामान 
 कुशासन से जनता को मुक्ति दिलवाना था
समय -समय पर यह कार्य अनेक युग पुरुषो ने किया है
 चाहे वे अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन हो या 
दक्षिण अफ्रिका के पूर्व राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला 
 महापुरुष कभी निज उद्देश्य के लिए संघर्ष नहीं करते 
भले उनका संघर्ष  व्यक्तिगत स्तर पर शुरू हुआ हो 
परन्तु वह जनोन्मुख होकर सर्वजन हिताय हो जाता है 

Monday, March 10, 2014

रणछोड़ राय भगवान् श्रीकृष्ण

भगवान् श्रीकृष्ण को रणछोड़ राय के रूप में 
सम्बोधित किया जाता है 
भगवान् ने रण क्यों छोड़ा ?रण छोड़ राय क्यों बने ?
इन प्रश्नो के समाधान इतने सरल नहीं है
जीवन के यथार्थ में कब रणछोड़ बने ?
कब रण वीर बने ?
 यह महत्वपूर्ण होता है 
महत्वपूर्ण यह भी है कि विपक्षी के बल कि परख किये बिना 
हम रण में कूद जाए 
इसे वीरता नहीं मूर्खता कहा जाएगा 
भगवान् कृष्ण जानते थे कि 
जरा संघ कि विशाल सेना मथुरा को ध्वस्त कर देगी 
हजारो निरीह नागरिक मारे जायेगे 
इसलिए उन्होंने रण  को उन्होंने छोड़ दिया था 
उपयुक्त समय आने पर द्वंद्व युध्द में 
उन्होंने उसी पराक्रमी अजेय जरासंघ का वध 
 भीम के हाथो करवा दिया
कितनी लम्बी प्रतीक्षा पराक्रमी शत्रु को 
पराजित करने के लिए 
यह विचारणीय प्रश्न होनी चाहिए 
जीवन में समग्र विजय पाने के लिए शक्ति संचय के साथ 
सज्ज्न शक्ति के उदय कि आवश्यकता होती है 
जिसमे समय लगना स्वाभाविक होता है 
रण छोड़ बनने से लेकर जरासंघ के वध तक कि कथा 
भगवान् कृष्ण कि भूमिका इसी तथ्य को इंगित करती है 
इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण रणछोड़ होने के बावजूद 
पराजय के प्रतीक के स्थान पर विजय के पर्याय रहे

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEg44_9gJuk4nejOvhGddGabHWIWnPYCzxZd6laTRxjgKmqfb51cpJVuFlAbILsFPKdjYotLAKKE2F9jYW09SCtaMJcq7iIvHdV9YbNA6020Z4euPBmB01gjTKHvs0-uaEMDEbY0wgO3KBp-/s1600/6957_sudarshan_chakra.jpg

Monday, September 23, 2013

सत्य क्या है

सत्य क्या है और असत्य क्या है 
स्थान परिवेश और समय के साथ साथ 
सत्य और असत्य के स्वरूप बदल जाते है 
कभी असत्य सत्य के आवरण में हमें दिखाई देता है 
तो कभी सत्य का सूरज बादलो की ओट  में
 निस्तेज और प्रभावहीन दिखाई देता है 
परन्तु जिस वक्तव्य से लोक कल्याण हो 
आत्मा की उन्नति हो वह किसी  भी रूप में हो 
वह वास्तविक सत्य होता है 
सत्य बोलने में तात्कालिक लाभ नहीं मिलता
 दूरगामी परिणाम अच्छे होते है 
जबकि असत्य भाषण से तात्कालिक लाभ 
भले ही कोई हासिल कर ले 
दूरगामी परिणाम आत्मघाती होते है 
असत्य भाषण करने वाले व्यक्ति द्वारा कही गई
 हर बात संदिग्ध दिखाई देती है 
ऐसे व्यक्ति को अपनी बात को सत्य प्रमाणित करने के लिए 
तथ्य रखने पड़ते है 
इसलिए कहा जाता है कि 

न च सभा यत्र न सन्ति वृध्दा
        वृध्दा न ते येन न वदन्ति धर्म
धर्म सानो यत्र न सत्य मस्ती
     सत्य न तत  यत  छल नानुम वृध्दिम 


सत्य के स्वरूप को जानने समझने के लिए 
एक दृष्टि की आवश्यकता होती है 
जिसे अनुभव ज्ञान एवं प्रज्ञा की दृष्टि कही जा सकती है 
ऐसी दृष्टि को  शिव के तीसरे नेत्र की उपमा दी जा सकती है 
जिस व्यक्ति को शिव  की तीसरे नेत्र की प्राप्त हो चुकी हो
उसे सत्य पर आधारित पहचाने में तनिक भी देर नहीं लगती 

Tuesday, September 3, 2013

सत्य की मंजिल को पाना होगा

परिवेश में सकारात्मकता और नकारात्मकता 
दोनों बिखरी हुई है
 प्रश्न यह है कि हमें क्या पाना है
सकारात्मकता रहती सज्जनों के पास है
 नकारात्मकता में रहते दुर्गुण है 
दुर्जनों में उसका निवास है 
सकारात्मकता में सत्य की सत्ता है 
ओज है ऊर्जा है 
नकारात्मकता में नहीं अपनापन है
 परायापन अविश्वास है 
हर रिश्ता लगता दूजा है
 जीवन में यदि सकारात्मकता चाहते हो 
जीवन से नकारात्मक भाव हटाना चाहते हो तो 
सज्जनता की और प्रयाण करो 
दुर्जनता दुर्गुणों से रहो विमुख 
दुष्टों का कभी मत गुणगान करो 
जीवन को चारो और नकारात्मक वातावरण ने घेरा है
 नकारात्मकता  के अँधेरे  में यह सारा जग ठहरा है
सकारात्मक सोच में ही सृजन का  ध्वज फहरा है
बुरे  हालात में क्यों न कुछ  अच्छा से अच्छा किया जाए
बुराईयों के बीच रह कर जीवन सच्चा जिया जाए
बस यही सही सोच अपनाना होगा 
सकारात्मकता को अपनाकर ही 
 सत्य की मंजिल को पाना होगा

Saturday, July 6, 2013

दान से धन की शुध्दि

 जब हम यह कहते है दान से धन की शुध्दि होती है 
तब यह भी प्रतिध्वनित होता है की
 अशुध्द साधनों से अर्जित धन भी दान योग्य हो सकता है
 इस प्रकार के विचार से 
धर्म और समाज सेवा के क्षेत्र में  
ऐसे धन के  दान की प्रवृत्ति बदती है 
जो शोषण और अपराध  द्वारा अर्जित किया गया हो 
तब धर्म और समाज सेवा क्षेत्र में इस प्रकार की घटनाएं होने लगती है जो पहले न तो कभी पढ़ी और न कभी सुनी थी
 इसलिए इस दृष्टि कोण में बदलाव आवश्यक है 
अन्यथा धर्म और समाज सेवा के क्षेत्र में
 कालेधन का प्रवेश होता जाएगा 
ऐसी स्थिति में धर्म व्यवसाय का रूप धारण कर लेगा
 वर्तमान में धार्मिक क्षेत्र में हो रहे पतन का कारण 
इसी प्रकार की व्यवसायिक प्रवृत्ति है 
यदि हमें धर्म को बचाना है तो 
इस मानसिकता पर अंकुश लगाना होगा 
और  दान में ऐसे धन को ही बढ़ावा देना होगा 
जो शुध्द हो पवित्र हो 
शास्त्रों में दान को यग्य  की संज्ञा दी गई है 
यग्य में जो द्रव्य के रूप में  घृत की अवस्था होती है 
वही अवस्था दान में धन की होती है 
यग्य में अशुध्द घृत का प्रयोग नहीं किया जा सकता 
तो फिर दान में अशुध्द साधनों से अर्जित धन को 
कैसे लिया जा सकता है 

Saturday, January 5, 2013

धृतराष्ट्र मानसिकता



महाभारत मे द्रोपदि के चीर हरण का प्रसंग आता है
जिसमे यह विशेष रूप से उल्लेख है कि
द्रोपदि के चीर हरण का विरोध मात्र जुए मे स्वयम को हार चुके
पाण्डव हारी हुई मानसिकता के साथ तथा
कौरवो मे से दुर्योधन का अनुज विकर्ण ही करते है
कौरव सभा मे उपस्थित शेष महारथी अपने नितान्त निजी कारणो से
विरोध न कर मूक दर्शक बने बैठे रहते है
माना कि ध्रतराष्ट्र नैत्रहीन थे परन्तु मूक और बधिर नही थे
क्या उन्हे द्रोपदि की करूण पुकार सुनाई नही दी
क्यो उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया?
कहने को सम्पुर्ण कुरुसभा मे ध्रतराष्ट्र अन्धे थे
किन्तु भीष्म ,द्रोण,क्रपाचार्य ,अश्वत्थामा ,कर्ण इत्यादि महान योद्धा
जो सभी प्रकार की शस्त्र विधाओं मे पारंगत और सर्वगुण सम्पन्न थे
नैत्रवान थे पर द्रष्टि सम्पन्न नही थे
आज भी हमारे समाजिक राष्ट्रिय परिवेश मे हमे यही स्थिति दिखाई देती है
तथा कथित बुद्धिजीवी ,विचारक,समाज सेवक , पराक्रमी पहलवान,
प्रतिभा से सम्पन्न खिलाडी,राजनेता,
अनेक ज्वलंत विषयो पर उसी प्रकार से मौन है
जिस प्रकार से कुरुसभा मे द्रोपदि चीर हरण के प्रसंग पर
तत्कालीन भद्रजन मौन थे
उस समय ईश्वरिय सत्ता के प्रतीक श्रीक्रष्ण
अन्याय का प्रतिरोध करने हेतु सामने आये थे
पर वर्तमान स्थितियो मे क्या कोई व्यक्ति श्री क्रष्ण
अथवा विकर्ण की भूमिका अपनाने के लिये तत्पर है
संभवतया नही हम स्वयम अपने आस -पास व्याप्त
अन्याय पूर्ण घटनाओं के प्रति कितनी संवेदन शीलता
मन वचन कर्म से दर्शा पा रहे है
इस विषय पर हमे आत्म विश्लेषण की आवश्यकता है
यदि हमारी संवेदनाये मर चुकी है
हम किसी पीडीत व्यक्ति की पीडा हरण करने मे
किंचित भी योगदान नही कर पाये तो
फिर हमे क्या अधिकार बनता है कि
हम स्वयम को सनातन परम्परा का प्रतिनिधि तथा
श्री क्रष्ण रुपी शाश्वत सत्ता के अनुयायी माने