त्रेता युग मे खर दूषण नामक राक्षस थे जिनके पास 14000 सैनिक थे वनवास के दौरान श्रीराम से उक्त राक्षसों से युध्द हुआ था उसमें जिस धनुष का श्रीराम द्वारा उपयोग किया गया था उसे खरारी भूषण कहा जाता है संस्कृत में अरि का अर्थ शत्रु कहा गया है श्रीराम के जीवन वह पक्ष जो वनवास गमन के पश्चात और हनुमान मिलन के पूर्व का महत्वपूर्ण है क्योंकि तब न तो उनके पास अयोध्या का वैभव और सैन्य दल था और न ही विशाल वानर सैना थी हनुमान जी जैसा सेवक भी तब उनके साथ नही था उस समय उनके पास मात्र भ्राता लक्ष्मण और पत्नी सीता सहित खरारी भूषण धनुष था एक साथ दोनो भाइयो द्वारा चौदह हजार सैनिको सहित खर दूषण दैत्यों का संहार करना चमत्कारिक है और उनकी सामर्थ्य को समझने के लिए पर्याप्त है । सत्य अर्थ में भगवान राम वह कार्य काल ही वनवास था ।स्वयं के परिश्रम से कुटिया बनाकर रहना ।वृक्षो से फल तोड़ कर भोजन करना ।बचे हुए समय मे अत्रि अगस्त्य ऋषियों से भेंट करना एक ऐसे व्यक्तित्व को हमारे सामने लाकर खड़ा करता है जो अद्भुत शक्तियों का स्वामी होते हुए सामान्य व्यक्ति की तरह संघर्ष कर जीवन अभावो में जीवन जीता है व्यक्ति जब तक अभावो का अनुभव नही करता तब तक संवेदनशील नही हो सकता ।संवेदनशीलता प्राप्त करने के लिए जीवन में साधनों प्रचुरता होना बाधक है अभाव अपमान कष्ट साधक है ऐसे में खरारी भूषण याद आता है धन्य है वह भूषण जो श्रीराम का अभावो में साथी रहा
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Sunday, July 8, 2018
Saturday, March 24, 2018
प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है
प्रेम यदि पूजा हो तो प्रेरणा प्रदान कर
वह ऊर्जा बन जीवन को प्रकाशित करता है
प्रेम यदि कामना हो तो वह व्यसन बन
व्याभिचार की और ले जाता है
प्रेम यदि भक्ति हो तो शक्ति बन जाता है
मन की शक्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक उत्थान की ले जाती है
प्रेम यदि वात्स्ल्य हो तो
ममता और पोषण प्रदान कर स्वास्थ्य प्रदान करता है
प्रेम यदि करुणा हो तो
आँसू बन कर सम्पूर्ण मानवता को सींच देता है
प्रेम यदि सेवा हो तो
वह कर्म बन धर्म को जागृति देता है
प्रेम यदि आशीर्वाद बन जाए तो
भिक्षा में शिक्षा की दीक्षा प्रदान कर
शिष्य को सम्पूर्णता प्रदान कर देता है
प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है
प्रेम की प्रतिष्ठा है प्रेम से ही जीवन गतिमान है
प्रेम की भावना जीवंत है वसंत है
प्रेम स्वयं ही एक धर्म है एक पंथ है
Monday, December 21, 2015
संवेदना की कथा
कथा में हो रहे धार्मिक और मार्मिक उपदेशो से
श्रोताऔ के भाव आखो में अश्रु के माध्यम से निकल रहे थे
कथा वाचक संत की संवेदनाये
प्रवचनों के द्वारा मुखरित हो रही थी
कथा होने के उपरान्त एक बूढी महिला ने
जीर्ण शीर्ण वस्त्रो से रखी अपनी पोटली में से
महाराज को भाव स्वरूप ५०० रूपये की राशि भेट की
जो उन्होंने चुपचाप ग्रहण कर ली
थोड़ी ही देर पश्चात एक प्रवासी भारतीय द्वारा
भूत काल में दिए गए दान की प्रशस्ति मंच पर
उद घोषित हो रही थी
अपनी कीर्ति सुन कर प्रवासी भारतीय सज्जन
फुले नहीं समा रहे थे
उनके अहंकार की तुष्टि और पुष्टि हो रही थी
बूढी वृध्दा लकड़ी को टेक टेक अपने पोते को कथा से लिए घर की ओर
भाव विभोर हो चली जा रही थी
कथा वाचक संत की संवेदना मात्र
प्रवासी भारतीय व्यक्ति की महादानी प्रवृत्ति को
नमन कर रही थी
बस मेरे मन में एक चुभता सवाल था कि
क्या संत की उपदेशो में दर्शित संवेदना
कृत्रिमता का आवरण लिए थी ?
वृध्दा के भाव मौन होकर भी भगवत सत्ता की
अनुभूति से मन को अभिभूत अभी भी करा रहा है
Tuesday, October 23, 2012
संवाद संवेदना और अध्यात्म
सम्वाद के लिये क्या शब्द और ध्वनि आवश्यक है ?
एक सीमा तक यह तर्क सही लगता है
किन्तु सदैव ऐसा नही होता
सम्वाद का सीधा सम्बन्ध सम्वेदना से होता है
सम्वेदना प्रखर होने पर समान सम्वेदना के स्तर वाले
व्यक्तियो मे अनुभूतियो के स्तर पर सम्वाद होता है
इसको हम इस प्रकार से समझ सकते है कि
जब कोई परम प्रिय व्यक्ति किसी प्रकार के कष्ट मे होता है
तो दूरस्थ आत्मीय जन को उसके कष्ट की सहज ही
अनुभूति हो जाती है
यह दो व्यक्तियो के मध्य स्थापित आत्मीयता की मात्रा
एवम सम्वेदना अनुपात पर निर्भर करती है
सम्वेदना जितनी प्रखर होगी
सम्वाद उतना ही गहरा और स्पष्ट होगा
प्राचीन काल मे कहते है महाभारत मे द्रुपदि का
करूण रुदन सुन कर
भगवान श्री कृष्ण सहायता के लिये आ पहुंचे थे
चाहे वह चिर -हरण का प्रसंग हो या दुर्वासा के हजारो शिष्यो का
पाण्डवो के वनवास काल के दौरान अचानक भोजन के लिये
अतिथि के रुप मे आगमन
आधुनिक काल मे जितनी मात्रा मे दुरसंचार के
साधनो मे व्रद्धि हुई है
हमारे संवेदना के स्तर का क्षरण हुआ है
शब्दो के स्तर पर हम चाहे कितनी चर्चाये कर ले
भावनाओं के स्तर पर हम परस्पर दूरी बनाये हुये है
निरन्तर ऐसा प्रतीत होता है मानो ध्वनि सम्वाद से जुडा
व्यक्ति और हमारे मध्य कुछ और छुपा है
अथवा कुछ तथ्य छुपाये जा रहे है
सम्वेदना के स्तर पर सम्वाद को हम
मूक ,बधिर,नैत्रहीन व्यक्तियो से
क्रिया प्रतिक्रिया से समझ सकते है
वे कितनी कुशलता से संकेतो की भाषा को समझ सकते है
सम्वेदना के स्तर पर सम्वाद का सम्बन्ध अन्त चेतना से होता है
अन्त चेतना का सम्बन्ध हमारी आत्मा से होता है
आत्मा की चेतनता अध्यात्मिक क्रियाओं उत्पन्न होती है
हिन्दु धर्म मे विवाह संस्कार के पूर्व वर एवम वधु के गुणो का
मिलान किये जाने का आशय भी यह है
कि परिणय सूत्र मे बॅधने वाली दो आत्मा के संस्कार
और उनके गुण धर्म क्या है
जितनी अधिक समानताये होगी उतना ही
उनका सम्वेदना का स्तर समान होगा
सम्वेदना का स्तर समान होने से जीवन भर
उनमे सम्वाद की मात्रा संतोषप्रद स्थिति मे रहेगी
यदि किसी कारण से भाषाई स्तर पर सम्वादहीनता
उत्पन्न हो भी गई हो तो
सम्वेदना के स्तर पर सम्वाद प्रारम्भ हो जाने से
उनमे अलगाव के स्थान पर लगाव स्थापित हो जावेगा
बिना बोले ही भावो की समझने की क्षमता
सम्वेदनशील व्यक्ति मे होती है
इस क्षमता सम्पन्न व्यक्ति प्रत्येक व्यक्ति की भावनाये
समझने मे सक्षम होता है
भावनाये दोनो प्रकार की हो सकती है
दुर्भावनाये या सदभावनाये
ऐसा व्यक्ति व्यक्ति को समझने मे किसी प्रकार की त्रुटि नही करता
सम्वेदनशील व्यक्ति को ईश्वरीय कृपा प्राप्त होता है
या ऐसा भी कह सकते है कि जिस व्यक्ति को ईश्वरीय आशीर्वाद प्राप्त होता है ,वह सम्वेदनशील होता है
ईश्वर से सम्वाद स्थापित करने हेतु किसी भाषा की
आवश्यकता नही होती आत्मा का परमात्मा का मौन सम्वाद ही मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करती है
Saturday, December 17, 2011
पात्रता प्राप्ती एवम परमेश्वर
सामान्य रूप से यह देखा जाता है ।
कि कोई सामान्य व्यक्ति किसी अति विशिष्ट व्यक्ति से मिलने हेतु उसके निकट जाता है ।
तो उसे सर्वप्रथम पूर्व अनुमति लेना पडती है।
अनुमति मिलने पर ही कोई सामान्य व्यक्ति विशिष्ट व्यक्ति से मिल पाता है।
किन्तु बात ईश्वर कि हो तो उसके लिये अनुमति ही नही बल्कि कठोर साधना
समर्पण एवम निश्छल ह्रदय कि अावश्यकता होती है ।
भगवान राम जो विष्णु भगवान के अंश थे।
यदि अयोध्या के राजा राम होते ,तो क्या उनसे घनघोर वन मे निवास रत
केवट निषाद , दलित महिला शबरी ,सुग्रीव ,इत्यादि का मिलना संभव था ।,
क्या राक्षस कुल मे उत्पन्न त्रिजटा का महा देवी महालक्ष्मी की अंश सीता जी से मिलना संभव था।
,बिल्कुल नही
किन्तु इन सभी को भगवान राम एवम देवी सीता मिले ही नही अपितु इनके साथ सुख दुख भी बॅाेटे ।
यह क्या एक अाश्चर्य से कम नही कि
भिन्न भिन्न भौगोलिक परिस्थितियो समाज प्रदेशो मे उत्पन्न व्यक्तियों की
परमात्म रूप से भिन्न भिन्न प्रकार से मिलने कि स्थितिया बनी ।
मात्र यही कारण नही हो सकता कि भगवान राम को वनवास मिला हो ।
सूक्ष्मता से चिन्तन करने पर हमे यह ज्ञात होगा ।
कि उक्त स्थितियो अर्थात वन मधुबन विरक्ति अासक्ति जीवन म्रत्यु का
विश्व रुप परम पिता परमात्मा के लिये का कोई महत्व नही है ।
भगवान राम या माता सीता वन मे रहते या महल मे
उनमे ईश अंश होने से कोई बडा अंतर नही अा जाता।
मात्र परमात्म अंश श्रीराम को तो उन अात्माअों के निकट जाना था ।
जो परिस्थितियो वश उनसे मिलने मे समर्थ नही हो पा रही थी, वनवास भोगना तो मात्र निमित्त था ।
अाशय यह है कि यदि पात्रता नही हो तो कोई भी व्यक्ति कितना ही समय निकाल कर
किसी विशिष्ट व्यक्ति अथवा ईश्वर से मिलने के कितने उपाय कर ले उसका प्रयोजन सफल नही होगा ।
,यदि व्यक्ति मे पात्रता हो तो परमात्मा ऐसी स्थितियो का निर्माण करता है ।
कि पात्र व्यक्ति से स्वयम ही वांछित विशिष्ट व्यक्ति स्वतः मिल जाता है ।
यहा तक कि भगवान स्वयम भक्त की खोज मे वन वन भटकते उसके घर अा जाते है ।
अौर पात्र व्यक्ति के साारे मनोरथ पूर्ण होते है
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