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Thursday, April 28, 2016

समय

कस्तूरी और दुर्गा दोनों पति पत्नी  न्यायालय बाहर खड़े अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे |उनके रघु द्वारा साथ हुई मारपीट में जो बयान देने के लिए आये थे |थोड़ी देर में उन्हें पुकारा गया भीतर न्यायालय कक्ष में पहुचे रघु के वकील साब जो तारीख बढ़ाने के लिए खड़े थे |इतने देर में ही कस्तूरी और दुर्गा से रहा नहीं गया और बोल पड़े की साहब हम राजीनामा करना चाहते है |जज साहब और वकील साहब दोनों स्तब्ध हो उन्हें देख रहे थे| जज साहब ने पूछा आप राजीनामा क्यों करना चाहते हो| दोनों पति पत्नी बोल पड़े की दिन भर मजदूरी करने के बाद हमें शाम को रोटी मिलती है |हमें इतना वक़्त कहा है कि लड़ाई झगड़ा में अपना समय खराब करे |यह सुनकर अभियुक्त रघु की आँखों में पश्चात्ताप के आंसू आ गए सोच रहा था ,कि एक तरफ तो जिसने अकारण कस्तूरी और दुर्गा के साथ मारपीट की और दूसरी तरफ वे कस्तूरी दुर्गा के पास आजीविका के साधन जुटाने की व्यस्तता में लड़ाई झगड़े का भी समय नहीं है

Friday, November 13, 2015

राहुल की जिद

राहुल हर बात के लिए जिद करता था छोटी छोटी वस्तुओ की मांग पर वह अड़ जाता था जीवन मरण का प्रश्न बना लेता था आखिर उसकी जिद पूरी करने वाले उसके पिता जो थे  धीरे धीरे राहुल उम्र बढ़ती गई पिता से उसकी अपेक्षाएं भी उसी अनुपात में बढ़ने लगी महंगाई के इस युग राहुल के पिता की सीमित आय राहुल की जिद पूरी करने में समर्थ नहीं थी राहुल का स्वकेंद्रित स्वभाव कभी खुद की असीमित आवश्यकताओ के आगे सोचने का अवसर प्रदान नहीं करता परन्तु निरंतर दायित्वों के भार और ढलती हुई उम्र के कारण राहुल के पिता का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था अचानक राहुल पिता के देहांत की सूचना ने राहुल को हतप्रभ कर दिया  घर में कुआरी बहन की शादी छोटे भाई की पढ़ाई का दायित्व का खर्चा कहा से उठाये राहुल अपनी आवश्यकताओ की पूर्ति ही नहीं कर पा रहा था अब राहुल की जिद पालने वाला शख्स जो नहीं रहा जिद जिसके बलबूते राहुल हर बात मनवा लेता था अब कुंठा और तृष्णा का कारण बन चुकी थी

Monday, August 3, 2015

कमला

आज कमला उम्र के सत्तरवे वर्ष को पार कर रही थी
 पर उसका सम्मान जनक जीवन पूरी तरह समाप्त हो गया था 
जिन बच्चो  बहुत सी अपेक्षाओं के साथ बड़ा किया
 आज वे ही उसे प्रताड़ित कर रहे थे 
बात बात पर बहुए उसे शब्द बाणो  से घायल कर रही थी 
किसी भी महत्वपूर्ण कार्य में उसे अनदेखा किया जाता रहा है
लगता था जैसे उसने अपनी जिंदगी जो जीना थी जी ली 
अब तो वह अपना बुढापा खराब कर रही है 
 कमला को यह दिन क्यों देखना पड़ा ?
इस प्रश्न पर उसकी आँखों में आंसू छलक  उठे 
क्या कहती वह  उसे अपनी युवा अवस्था के दिन याद आ गए 
जब वह स्वेच्छाचारी जीवन जीती थी 
पति को तरह तरह से प्रताडित  करती  थी 
बच्चो को बुरी बुरी गालिया देकर सम्बोधित करती  
वह समय निकल गया पति परलोक गमन कर चुके 
बची बूढी वैधव्य अवस्था उसे समझ में आ चुका था 
की उसका बुढ़ापा बर्बाद होने कारण  में वह स्वयं है

Saturday, May 23, 2015

रतिराम का प्रायश्चित्त

रतिराम एक अच्छी नोकरी  पा चूका था I
सुन्दर पत्नी दो नन्हे प्यारे बच्चे सरकारी मकान
और नई नवेली मोटर सायकिल खुशहाल जीवन
रतिराम के तीन भाई और थे रतिराम खर्च करने में बहुत उदार था 
परिवार का सबसे बड़ा भाई होने के नाते छोटे भाईयो  को आर्थिक रूप से स्वालम्बन बनाना वह अपना दायित्व समझता था | पिता अत्यंत निर्धन गाव के सीधे साधे व्यक्ति
मंदिर से घर घर से चाय की दूकान उनकी दिनचर्या बन चुकी थी |आखिर रतिराम जैसा कमाऊ पूत जो पाया था |
धीरे धीरे रतिराम का सारा ध्यान अपनी पत्नी बच्चों से हट सारा ध्यान अपने भाईयो की और चला गया |
आज बीस साल हो गए रतिराम बहुत खुश था |अपने सभी भाइयो को आत्म निर्भर देख कर भाइयो की पत्नी और बच्चों को खुशहाल देख कर पर अगर कुछ नहीं उसके पास तो वे उसके छोटे छोटे बच्चे जो हो गए थे बड़े बिना पिता के सरंक्षण के खो चूका था रतिराम अपनी पत्नी का स्नेह और बच्चों का सानिध्य ||बची थी रतिराम के पास प्रायश्चित्त कि वह भावना कि काश वह भी अपने बच्चों की और दे पाता तो उसने भी पाये होते कमाऊ पूत

Wednesday, June 4, 2014

रिश्तो की असलियत

सविता और रतन के जो मोहल्ले में 
एक माह पूर्व ही किराए से रहने आये थे 
दोनों में आज काफी कहा सुनी  हो गई थी
 दोनों में हाथा पाई हो जाने से लहू -लुहान हो गए थे 
मोहल्ले के सारे लोग इकठ्ठे हो गए थे 
सविता बोली "मै अपने पति और बच्चो को छोड़ कर
 माता -पिता सारे सम्बन्धो को भूल कर 
रतन तेरे साथ प्रेम के पाश में बंध चली आई" 
और तू एक माह के भीतर ही आपा खो बैठा 
यह सुन कर मोहल्ले के सारे लोग स्तब्ध रह गए 
की वे जिस जोड़े को मोहल्ले का आदर्श परिवार मानते रहे
 वे नैतिक और चारित्रिक दृष्टि से पारिवारिक जिम्मेदारियों से 
भागे हुए महिला पुरुष है 
जिनके बीच दैहिक  तृष्णा के अतिरिक्त
 कोई रिश्ते का सेतु नहीं था जब ऐसी तृष्णा तृप्त हो जाती है
 तो एक माह के भीतर ही 
उनके रिश्तो की असलियत सामने आ जाती है 

Monday, October 21, 2013

पुण्य-लघु कथा

पवित्र नदी  के किनारे जब सब लोग स्नान कर पूजा पाठ कर रहे थे| मूर्तियों का विसर्जन कर नारियल प्रवाहित कर नदी के घाट  पर कर्मकांड में व्यस्त थे| तभी एक व्यक्ति आया जिसके पास एक जोड़ कपडे थे| जो भी उसने पहन रखे थे पहने हुए कपडे उतार कर वह नदी में कूद पडा| ताजगी लिए लिए नदी से बाहर निकला |शरीर  को पोछने के लिए कोई वस्त्र नहीं होने के कारण वह धूप  में इधर -उधर टहलने लगा |थोड़ी ही देर में उसके शरीर  से पानी सूख चुका था और उसके द्वारा स्नान पूर्व धोया हुआ बनियान भी |उसने धुप में सूखे बनियान को पहना और वहा -वहा दृष्टि पात किया जहा थोड़ी ही देर पहले लोग पूजा कर पूजा सामग्री छोड़ गए थे| उस व्यक्ति को अवशेष के रूप में पड़ी पूजा सामग्री में दस रूपये का नोट नजर आया |इधर -उधर लोगो की निगाह से बचते हुए वह नोट चुपचाप अपनी जेब में रख लिया |उसको नदी के किनारे से कोई पुण्य  प्राप्त हुआ हो या नहीं जीने के लिए थोड़ा सा आर्थिक संबल प्राप्त हो चुका था |

Thursday, September 19, 2013

सेवा निव्रत्ती और संकट

लक्ष्मीनारायण जी के अत्यंत दुर्बल स्वास्थ्य के बावजूद उन्हें एक तारीख को अपनी पेंशन  लेने जाना पडा ,कड़कती हुई सर्दी में सुबह सुबह जाने के कारण उन्हें शरीर  में लकवा मार गया लक्ष्मीनारायण  जी ने जीवन भर शासकीय शिक्षक की नौकरी की सेवा निवृत्ति के पश्चात वे अपने बेरोजगार और बालबच्चेदार पुत्र नरेश के साथ निवास कर रहे थे |नरेश जो विद्यार्थी जीवन में पढ़ाई में रूचि न रख अनावश्यक बातो में ध्यान देता था| रिश्तेदारों की सलाह मानकर लक्ष्मीनारायण जी ने नरेश का विवाह कर दिया तब से नरेश का एक मात्र उद्देश्य जनसंख्या वृद्दि में योगदान रह गया था| पढ़ाई अच्छी नहीं होने की वजह से नरेश की नौकरी भी नहीं लगी थी |कार्य के प्रति समर्पण के अभाव में लक्ष्मीनारायण जी के अथक प्रयास के बाद कोई व्यवसाय भी नहीं कर पाया था |ऐसे में पेंशन की आवश्यकता लक्ष्मी नारायण जी से अधिक नरेश और उसके परिवार को अधिक थी प्रत्येक माह की एक तारीख का इंतज़ार उसे सदा रहता था| संकट यह नहीं था की लक्ष्मीनारायण की स्वास्थ्य कैसे ठीक होगा परेशानी नरेश के सामने यह थी की लक्ष्मी नारायण जी के ठीक न होने पर और असमय दिवंगत होने पर नरेश और उसके परिवार का भरण पोषण कैसे होगा |

Saturday, August 17, 2013

राजा की भूल -लघु कथा

प्राचीनकाल में एक राजा ने निम्न वर्ण और कुल  की एक  कन्या के रूप से मोहित होकर उससे विवाह कर लिया
 तद पश्चात वह वह कन्या महारानी की तरह 
 राजसी भोग विलास कर महल में रहने लगी 
कालान्तर में कन्या को महल का राजसी वातावरण कचोटने लगा 
शनै शनै उसकी मित्रता महल की दासियों हो गयी
दासियों द्वारा किया जाने वाले महल के छोटे मोटे कार्य भी 
उसके द्वारा किये जाने लगे 
रानी के इस स्वभाव को देखकर दासियों में
 रानी के प्रति सम्मान में कमी आने लगी
 महल में दासियों द्वारा  रानी के आदेशो की 
जाने लगी  रानी अपने कुल के संस्कारों के अनुरूप
 पर पुरुषो के प्रति भी आसक्त होने लगी 
महल में राजा के विरुध्द के षड़यंत्र  रचे जाने लगे 
गुप्तचरों से राजा को  उसके विरुद्ध रचे जा रहे 
षड्यंत्रों तथा उसके कारणो  की जानकारी लगने
पर राजा को अपनी गलती समझ  में  आई 
की विवाह हेतु कन्या का रूप ही नहीं
 उसके गुण कर्म कुल संस्कार भी महत्वपूर्ण होते है

Friday, July 26, 2013

लघु कथा -रामकिशन

पारिवारिक जिम्मेदारियों से पलायन कर 
रामकिशन शान्ति की खोज में 
गंगा तट के किनारे एक महात्मा के आश्रम पर पहुंचा 
आश्रम की व्यवस्था के अनुसार
 प्रत्येक आश्रमवासी की एक नियत दिनचर्या थी 
सौपे गए कुछ कार्य थे गोशाला ,पाक शाला ,
 गुरुसेवा ,अतिथि सेवा जिसमे शामिल थी 
कुछ दिनों तक आश्रम में रहने के बाद 
राम किशन को भान हुआ की 
यह सब तो वह अपने परिवार में 
रह कर भी तो कर सकता था
 फिर वह क्यों शान्ति की खोज में गंगा तट पर आया
 और कर्म से पलायन किया 
तब उसे समझ में आया की कर्म ही धर्म है 


Saturday, July 6, 2013

चरित्र और नियति -लघु कथा

 एक अत्यंत  रूपवान कन्या के माता  पिता ने बहुत प्रयास के पश्चात  कन्या के लिए  सुयोग्य  और गुणवान   वर  की तलाश  की|  विवाह  उपरान्त  कन्या अपने  पति  के घर  पहुंची  पति  व्याख्याता  के पद  पर  कार्यरत  था|  व्याख्याता  के निवास  स्थान  के पास  एक  व्यक्ति निवास करता था जो राजस्व विभाग में  पटवारी के रूप में पदस्थ  था , वह  न तो रूप में था न गुणवान था परन्तु भ्रष्ट आचरण में लिप्त होकर अवैध धनार्जन  की और  उन्मुख था | रूपवान  कन्या उस व्यक्ति  की आय को देख कर विचलित  हो  उठी  अपने  पति को  छोड़  उस व्यक्ति को  अपना  सर्वस्व लुटा कर  उसके साथ  रहने  लगी  कालान्तर  में  लोकायुक्त  के  दल ने पटवारी  को रिश्वत  के आरोप  में धर  दबोचा पटवारी  अपनी  आजीविका  खो चुका  था और रूपवान  कन्या धन  लिप्सा  में अपना  चरित्र  

Sunday, May 26, 2013

तीर्थ यात्रा -लघु-कथा

नर्मदा नदी के तट पर एक बुजुर्ग दम्पत्ति जिनकी आयु साठ वर्ष की पार कर चुकी थी 
 पुण्य सलिला में  स्नान करने के पश्चात 
तट पर बिखरे पत्थरो को एकत्र कर छोटा घर का प्रतिरूप बनाया 
पूछने पर बताया की जीवन स्वयं का घर बने यह उनका सपना है 
माँ नर्मदा उनकी मनोकामना पूरी करेगी 
मैंने उनसे पूछा की आयु के इस मुकाम तक क्या उन्होंने 
इतना भी संचय नहीं किया की वे घर बना पाए 
 जीवन भर उन्होंने क्या किया ?
उनका जबाब था की जीवन भर वे तीर्थ यात्रा करते रहे