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Saturday, January 10, 2026

समीक्षा- भारतीय कला के बहुआयाम


अद्विविक पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक भारतीय कला के बहु आयाम कला वैदिक काल से लगाकर जैन एवं बौद्ध युग के दौरान शिल्प सृजन भित्ति चित्रों लघु चित्रों और उनके पीछे छुपे जीवन और अध्यात्म दर्शन को स्पष्ट करती है l प्राचीन वैदिक ग्रंथों में कलाओं के बारे में संदर्भ देती है l भाषा की सहजता सरलता इस पुस्तक के अध्यायों की विशेषता है l 
       संगीत को छोड़ कर यह पुस्तक कला के विविध आयाम पर प्रकाश डालती है इस पुस्तक को पढ़ते पढ़ते निरंतर नवीनता का अहसास होता है ऊर्जा और उत्साह मिलता है 
      कला मर्मज्ञ आनंद कुमार स्वामी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित एक अध्याय हमें यह बताता है कि किस प्रकार एक भू गर्भ शास्त्री कलात्मक रुचि के कारण देशों और संस्कृतियों की सीमाओं से परे जाकर  सागर जैसा विस्तीर्ण शोध कार्य करता है  l
        महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के बारे में इस पुस्तक में समिल्लित आलेख उपनिवेश कालीन स्थितियों में  अभावों के बीच पनपती प्रतिभा का विस्तार से परिचय कराता है l सचमुच में इस पुस्तक को पढ़ने से पहले राजा रवि वर्मा और उनके भारतीय चित्रकला के प्रति योगदान के प्रति और उनकी आध्यात्मिक रुझान को जाना ही नहीं था l
   इस पुस्तक में पुरातत्वविद डॉ वाकणकर के पुरातात्विक शोध और उनके व्यक्तित्व को उल्लेखित किया है साथ ही काला के प्रति  गांधीवादी बोध को रेखांकित किया है l
     निश्चय ही यह पुस्तक कला ए बहुआयामी पक्ष की सूक्ष्मताओं को विभिन्न भारतीय रियासतों में बिखरी शैलियों से परिचित कराती है l 

Monday, April 19, 2021

बेघर -उपन्यास

 "बेघर" शीर्षक से प्रकाशित उपन्यास वयोवृद्ध एवम वरिष्ठ लेखिका श्रीमती ममता कालिया का पहला उपन्यास जो सन 1972 की अवधि के दौरान रचा गया था। समय से कही आगे और विवाह पूर्व कौमार्य भंग को लेकर भ्रांतियों पर आधारित है । उपन्यास पंजाबी पृष्ठभूमि के एक ऐसे नवयुवक के जीवन पर आधारित है । जो आजीविका के लिए मुंबई रेफ्रिजरेटर बनाने वाली कंपनी में काम करने के लिए आ जाता है और पेईंग गेस्ट के रूप में समुद्र तट के निकट पारसी अधेड़ पारसी महिला के यहां रहने लगता है 
              लोकल ट्रेन में सफर करते हुए संजीवनी नामक गुजराती  लड़की के व्यक्तित्व से बेहद आकृष्ट हो जाता है ।  संजीवनी जो बैंक में  नोकरी करती है उसकी माँ मूक है ,भाई और भाभी अपने आर्थिक अहंकार के कारण उसकी माँ की उपेक्षा करने लगते है । संजीवनी अपने माता पिता की चिंता करने करने और उनके समस्त दायित्वों के निवर्हन करने वाली आदर्श लड़की है । लेखिका ने जिस प्रकार से संजीवनी के चरित्र को गढ़ा है वह अत्यंत अदभुत है । 
         शनै: शनै:संजीवनी और पंजाबी नवयुवक परमजीत के बीच आत्मीयता से ओत प्रोत प्रेम से परिपूर्ण प्रगाढ़ संबंध पनपने लगते है । एक दिन दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हो जाते है । शारीरिक संबंध स्थापित हो जाने के दौरान परमजीत को पता चलता है कि संजीवनी का कौमार्य पूर्व से सुरक्षित नही है और यही से परमजीत के भीतर बैठा एक ऐसा पुरुष जाग्रत हो जाता है जो लड़की के सम्पूर्ण चरित्र को कौमार्य से जुड़ी परम्परागत धारण से नापने के आदि होते है ।  संजीवनी के सारे गुण एक तरफ रख परमजीत विवाह हेतु  ऐसी लड़की की तलाश में जुट जाता है जो तकनीकी रूप अक्षत कौमार्य से युक्त हो ।  परमजीत उसके समाज की ऐसी ही लड़की रमा से बेमेल विवाह कर लेता है    
            रमा से विवाह करने के उपरांत से हरजीत के जीवन मे मुसीबते  प्रारम्भ होती है , इससे परमजीत के जीवन की उर्वरकता समाप्त हो जाती है । वैचारिक विरोध और जीवन  के दोनों के भिन्न दृष्टिकोण के कारण परमजीत जीवन जीवन नही रहता है , नारकीय यंत्रणा बन जाता है । परिणाम स्वरूप परमजीत अपना सारा ध्यान अपने कार्यस्थल पर ही लगाता है । परमजीत का हृदय सच्चे प्रेम से रिक्त ही रह जाता है और अंत मे हृदयाघात के कारण उसकी असामयिक मृत्यु हो जाती है ।लेखिका ने उपन्यास में जिस प्रकार से विषय को उठाया है वह विवाह पूर्व भारतीय समाज मे विवाह योग्य लड़कियों के कौमार्य के सम्बन्ध पुरुषों की भ्रांतियों का निवारण करने में समर्थ है ।रमा और संजीवनी दोनों विपरीत स्वभाव वाली महिलाओं के व्यक्तिव का एक पुरुष के जीवन पर क्या? प्रभाव पड़ सकता है, यह उपन्यास में अधिकार पूर्वक समुचित पर से विश्लेषण किया गया है 
           यद्यपि उपन्यास का कालखंड पचास साल पूर्व का है । परंतु उसकी विषय वस्तु आज भी इन अर्थो में प्रासंगिक है कि मात्र क्षुद्र धारणाओं के आधार पर कितने ही लड़के लड़किया बेमेल विवाह कर अपने सम्पूर्ण जीवन को नष्ट कर रहे है । उपन्यास का शीर्षक"बेघर" दो अर्थो स्पष्ट होता है ।प्रथम तो महा नगरीय जीवन शैली में स्थानाभाव के कारण व्यक्ति पेईंग गेस्ट संस्कृति में रहने हेतु विवश है ।द्वितीयतः वह व्यक्ति भी बेघर है जिसके पास रहने हेतु घर तो है परन्तु बेमेल विवाह के कारण रोज रोज के पारिवारिक विवादों के चलते उसका घर मे रहना असंभव है।

Thursday, April 15, 2021

सौंदर्य लहरी -एक भाव यात्रा


            आद्य शंकराचार्य द्वारा अल्प आयु में अनेक दिव्य स्त्रोतों की रचना की गई ,उन्हीं में से देवी के सौंदर्य की स्तुति हेतु रचित "सौंदर्य लहरी "स्त्रोत है । सौंदर्य लहरी को नवीन दृष्टि से देखा और परखा है ,ललित निबंधकार श्री गोविन्द गुंजन ने सौंदर्य लहरी एक भाव यात्रा के माध्यम से । 
         लेखक ने इस कृति में भाषा और प्रतिभाषा को परिभाषित किया है । अनुभूतिया जो शब्द से परे हो प्रतिभाषा कहलाती है ।आत्मीय संबंधों में अनुभूतिया प्रतिभाषा के माध्यम से संचारित होती है ।ईश्वरीय अनुभूतियो को ग्रहण करने में प्रतिभाषा महत्वपूर्ण होती है ।  सौंदर्य लहरी में छुपी प्रतिभाषा को लेखक ने पद्यानुवाद और गद्यानुवाद के माध्यम से स्पष्ट किया है ।
       देवी के सौंदर्य को लेखक ने अपनी लेखनी से  भाषागत सौंदर्य से सजाया संवारा है । इस मायने में लेखक का ललित निबंधकार के साथ काव्य प्रतिभा भी कृति सृजन में बहुत काम आई है ।भाषा का लालित्य स्वरूप और कविता सरिता का प्रवाह जगह जगह देखने को मिला है।
                आद्य शकराचार्य के जीवन परिचय को एक अध्याय के माध्यम से इस कृति में समर्पित किया गया है  । पुस्तक को  भाव यात्रा शीर्षक दिया जाना इसलिये सार्थक हो जाता है क्योकि भौतिकता से दूर देवी के विशुध्द सौंदर्य को वही व्यक्ति जान समझ सकता है जो भावो से जुड़कर आत्मा के सरोवर में अवगाहन करने की सामर्थ्य रखता है।
      पुस्तक में सौंदर्य लहरी के साथ आनंद लहरी को भी स्थान दिया गया गया है सौंदर्य लहरी पर इस पुस्तक के माध्यम से लिखी गई टीका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वर्तमान में हमारे ग्रन्धों पर आधिकारिक रूप से टीका लिखने का प्रचलन लगभग समाप्त हो चुका है । 
      सौंदर्य लहरी की टीका करते हुए लेखक ने यह प्रकट किया है कि  सूर्य और चंद्रमा देवी नैत्र है ।सूर्य जहां दिन को उज्ज्वलता प्रदान करता है वही चन्द्रमा रात्रि को शीतलता । देवी जी का तीसरा नेत्र भी जो क्षितिज में संध्या और उषा के रूप में जगत को ज्ञान प्रदान करता है ।लेखक ने पुस्तक में सौंदर्य लहरी की सौंदर्य पूर्ण व्याख्या करते हुए जीवन में छुपे दैवीय सौंदर्य को उदघाटित किया है 

 

Monday, March 29, 2021

तरुण भटनागर का एक बेहतरीन कहानी संग्रह

भाषा , भाव और शिल्प की ताजगी के साथ आईसेक्ट पब्लिकेशन से प्रकाशित लेखक, कहानीकार , उपन्यासकार श्री तरुण भटनागर की दस कहानिया जंगल, जमीन, दारिद्र्य और यथार्थ पर आधारित है । प्रत्येक कहानी का विशिष्ट कथ्य है ।

                इस कहानी संग्रह में में जहाँ तिब्बती शरणार्थियों की पीड़ा को "भूगोल के दरवाजे "के माध्यम से व्यक्त किया गया है । वही "कातिल की बीवी "दरिद्रता और अभावो और सँकरी गलियों में रहने वाले दो परिवारों के आपसी जुड़ाव और मन मुटाव को बयाँ करता है । जहां एक और विशाल भू भागो पर रह कर भी कुछ लोग अतृप्त है । वही भिन्न धर्मो के दो निर्धन परिवार किस प्रकार से एक एक इंच जमीन के लिए संघर्षरत है ।दोनों परिवार के पुरुषों में चाहे कितना भी द्वेष हो महिलाओ में आत्मीय जुड़ाव की यह कथा है 
     "जंगल मे चोरी "आदिवासी अंचल चल रहे विकास की कथा है ।जिसमे सीमेंट के गोदाम ठेकेदार और मूल निवासियों को वस्त्र प्रदान किये जाने का रोचक उल्लेख है । एक दिन शासन की और से वस्त्र वितरणकर्ता किराने वाला दुकान बंद कर लम्बे समय के लिए चला जाता है तो आदिवासी ठंड को दूर करने के लिए सीमेंट की खाली पड़ी बोरियो की चोरी करते है ।उनके लिए सीमेंट का कोई मूल्य नही होता ।यह एक करारा व्यंग्य  भी है 
         "बीते समय शहर "की कहानी अतीत के पन्नो को पलटने की कहानी है । प्रेमिका के बहाने ट्रैन में यात्रारत युवक एक ऐसे शहर और उससे जुड़ी स्मृतियों को याद करता है । जहां उसने शैक्षणिक काल मे समय गुजारा था। शहर के पास  खड़े पहाड़ को बुजुर्ग की उपमा देकर लेखक जब कहता है ।बुजुर्ग हमारे लिये उपयोगी हो या न हो उनकी उपस्थिति मात्र आश्वस्त करती है कि हमारे कंधे पर किसी का हाथ है । बीते शहर की कहानी का सम्मोहन अदभुत है । लेखक ने कहानी  को बहुत ही सूक्ष्मता से  उंकेरा है  यात्रा को विविध आयाम और स्वरूप प्रदान किये है यह कहना अतिश्योक्ति नही  होगी कि लेखक की सम्पूर्ण से प्रतिभा इस कहानी के माध्यम से हम परिचित हो जाते है 
                   और अंत मे  "दवा सांझेदारी और आदमी" नामक शीर्षक कहानी के माध्यम से लेखक ने दवा विक्रेता और ग्राहक के बीच हुए संवाद को बेहतरीन तरीके से विषय को अभिव्यक्त किया  है व्यवसायिक मजबूरिया और पेट की भूख के सामने इंसान कितना विवश हो जाता है । आदर्शो की बात करना आसान है जीना कितना मुश्किल है  

Saturday, March 27, 2021

गुनाहों का देवता -समीक्षा

गुनाहों का देवता  सुप्रसिध्द लेखक डॉ. धर्मवीर भारती का बहुत लोकप्रिय उपन्यास है । विगत दिनों यह उपन्यास मुझे ऑडियो बुक के रूप में डॉ. कुमार विश्वास की आवाज में स्टोरी टेल ऐप पर सुनने का अवसर मिला।  निस्वार्थ प्रेम पर आधारित यह उपन्यास दिल को बहुत सकून देता है । बुध्दि को खुराक और हृदय की अतल गहराईयों को स्पर्श करता है । 
      यह उपन्यास इलाहाबाद में निवासरत चंदर नामक युवक की दास्तान है । चंदर कपूर एक प्रतिभावान छात्र होता है  जिसको डॉ.शुक्ला नामक प्रोफेसर अपने पास रख कर पढ़ने और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते है । डॉ शुक्ला की लड़की सुधा जो चंदर को निश्छल और निस्वार्थ प्रेम करती है । चंदर सुधा के पवित्र प्रेम की गहराईयों को जानता है। शारीरिक वासनाओ से परे आत्मीयता से ओत प्रोत प्रेम को महत्व देता है और वैसा ही चरित्र सुधा को गढ़ने हेतु उत्प्रेरित करता है । चंदर प्रेम की मर्यादा समझता है और प्रेयसी सुधा को समझाता है।
                चंदर एक अन्य महिला पम्मी के संपर्क में भी रहता है जो वासना के संसार को छोड़कर चंदर के पवित्रतम प्रेम पर मुग्ध हो जाती है। सुधा की चचेरी बहन विनीता जो सुधा के पास आकर रहने लग जाती है । जो सुधा और चंदर के प्रेम से बेहद प्रभावित हो जाती है । कालांतर में सुधा का विवाह कैलाश नामक व्यक्ति से विवाह हो जाता है । सुधा की दृष्टि में चंदर प्रेम का देवता रहता है ।सुधा का उसके ससुराल में स्वास्थ्य गिरता जाता है और एक दिन उसका देहान्त हो जाता है 
       उपन्यास को पढ़ते और सुनते जीवन के कई दार्शनिक पहलू सामने आते है ।बिम्बो के माध्यम से धर्मवीर भारती जी ने जो भाव भरी अनुभूतियों का चित्रण किया है वह अदभुत है । जगह जगह लगता है कोई कविता पढ़ रहे है । सम्पूर्ण उपन्यास आत्मीयता का अहसास देता है। बार बार पढ़ने का मन करता है 
              

Friday, July 10, 2020

वैधानिक गल्प - उपन्यास समीक्षा

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उपन्यास वैधानिक गल्प लेखक चंदन पांडेय द्वारा अभिलिखित है ।वैधानिक उपन्यास अर्जुन नामक ऐसे व्यक्ति से आरम्भ होती है जो लेखक और कथाकार के साथ प्रकाशन समूह का संपादक भी है ।  अर्जुन जिसकी पत्नी अर्चना है को तब झटका लगता है जबकि एक दिनअर्जुन  उसकी पूर्व प्रेमिका अनसूया का  नोमा नामक कस्बे से फोन आता है । अनसूया अर्जुन को बताती है कि  उसका पति रफीक कही गायब हो गया है ।।      
                    रफीक रंग कर्मी के साथ कॉलेज में संविदा प्राध्यापक भी रहा है। अर्जुन अनसूया की मदद के लिए पहुँचता है ।  अर्जुन अनसूया को थाने में पुलिस द्वारा अपमान जनक तरीके से पूछताछ करते हुये पाता है । थाने के आतंक पूर्ण वातावरण को महसूस करता है । अनसूया से गर्भ से है को अर्जुन थाने से उसके घर ले जाने के बाद कुछ दिनों के लिए अर्जुन नोमा ही रुक जाता है । प्रकाशन समूह के मालिक की मदद से अर्जुन को थाने का प्रभारी शलभ का सहयोग प्राप्त होता है ।परंतु स्थानीय राजनीति के चलते रफीक का नाम लव जेहाद में जुड़ जाता है क्योंकि रफीक के गायब होने के साथ उसकी छात्रा जानकी के गायब होने की जानकारी भी उसे प्राप्त होती है 
          रफीक की तलाश किये जाने के सिलसिले में अर्जुन को रफीक की डायरी प्राप्त होती है जिसके गीले और फटे हुये  पन्नो पर लिखी इबारत को पढ़ने का प्रयास करता है ।जिसके माध्यम से अर्जुन गायब होने के पूर्व रफीक की क्या मानसिकता थी । इसे समझने चाहता है ।इसी दौरान अर्जुन को निलम्बित पुलिस उपनिरीक्षक अमन दीप मिलता है जिसके ऊपर आर्थिक गबन का आरोप है ।परंतु गहराई से जांचने पर ज्ञात होता है ।अमन दीप को निलंबित किये जाने की वजह कुछ और है। जिसमे अमन दीप ने एक व्यक्ति को प्रायोजित भीड़ द्वारा की गई हिंसा से बचाये जाने के कारण स्थानीय राजनेता की नाराजगी है  उपन्यास के अंत तक गायब हुए रफीक और जानकी का पता नही चलता। 
          उपन्यास के माध्यम से लेखक ने यह तथ्य कहने का प्रयास किया है कि प्रत्येक मामले को लव जेहाद का रंग देने की आवश्यकता नही है ।कितने संविदा अध्यापकों और प्राध्यापको को लंबे समय से नियमित न किया जाकर उनका शोषण किया जा रहा है । उपन्यास के माध्यम से लेखक ने पुलिस की कार्य प्रणाली और पुलिस स्थानीय राजनेताओ के साथ साठ गांठ को रेखांकित किया है । लेखक ने यह प्रश्न भी उठाया है ।पुलिस में संवेदनशीलता का अभाव है वह एक प्रसूता के साथ पेशेवर अपराधी की तरह व्यवहार करती है ।  

Tuesday, June 23, 2020

बेनियाज़ मियाद के पार-कहानी समीक्षा

जहाँ हमारे देश मे मानसिक अवसादों पर बहुत कम साहित्य लिखा गया है वही हिंदी उपन्यासकारा और वरिष्ठ लेखिका श्रीमती मृदुला गर्ग की द्वारा अभिलिखित कहानी "बेनियाज़ मियाद पार" में  मनोवैज्ञानिक समस्याओं की और गंभीरता से ध्यान आकृष्ट किया गया है। कहानी में बताया गया है कि किस प्रकार से कोई व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर विचारो के भ्रांतियों का शिकार हो जाता है ।चिकित्सक भी समझ नही पाते है कि यह शारीरिक रुग्णता है या मनोवैज्ञानिक ऐसी स्थिति में व्यक्ति निराशाओ से घिरता जाता है ।
              बेनियाज़ मियाद पार को लेखिका का आत्मानुभव कहे तो ज्यादा अच्छा होगा।लेखिका की आयु 80 वर्ष होना बताई गई है बुजुर्ग व्यक्तियों की आयु जनित अंग शिथिलताओ के साथ मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी पैदा होने लगती है । कहानी में उकेरी गई अनुभूतियो से हमे बुजुगों की मानसिक स्थितियों को समझने में सहायता मिलती है ।कहानी जिस प्रकार से कही गई है उससे पाठक का मन गुदगुदाता है ।
      कहानी का संदेश यह है कि कब कोई मानसिक समस्या शारीरिक समस्या बन जाती है हमे पता ही नही चलता ।यह कहानी ऐसे लोगो की अनुभूतियो को शब्द प्रदान करती है ।जो तरह तरह की मानसिक पीड़ाओं से घिरे रहते है और जो अपनी पीड़ा को सही प्रकार से प्रगट ही नही कर पाते है ।कहानी में लेखिका के रूप में प्रकाशन जगत से जुड़ी चिंताओं को इस रूप में प्रगट किया है लेखक को पता ही नही चलता कि उसके द्वारा अभिलिखित कृति से प्राप्त निधि का प्रकाशक द्वारा किस प्रकार व्ययन किया गया है 
       कहानी हमे इस तथ्य से अवगत कराती है हमारे देश मे कुशल मानसिक चिकित्सक नही होने से और मनोरोगियों को गलत दवाईया दिए जाने से किस प्रकार से मरीज साइड इफ़ेक्ट का शिकार होता जाता है ।

Friday, June 19, 2020

हसीनाबाद-उपन्यास समीक्षा

लेखिका गीता श्री द्वारा अभिलिखित उपन्यास जो वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है ।यह उपन्यास समाज के एक ऐसे वर्ग की पीड़ा को बयान करता है जिनके बारे में लोग खुले मुँह बात करना पसंद नही करते  अर्थात ग्रामीण क्षेत्र के सामन्तवादी लोगो की वासनाओ की तृप्त करने वाली महिलाओं और उनके बच्चों की दास्तान का नाम है हसीनाबाद।
           वैसे तो देश के कई हिस्सों में हसीनाबाद जैसी बस्तियां दिखाई देती है परंतु उपन्यास में उल्लेखित हसीनाबाद बिहार के वैशाली जिले से सम्बंधित है  उपन्यास की केंद्रीय पात्र सुंदरी जिसे कुछ लोग बचपन मे उसके गांव उठाकर ले जाते है और बाद में उसे है हसीनाबाद में ठाकुर सजावल सिह ठाकुर की कामनाओ का शिकार होना पडता है ।सुंदरी जिसे अपनी नियति मान लेती है । कालांतर में सुंदरी को ठाकुर सजावल सिंह से एक पुत्र रमेश और एक पुत्री गोलमी पैदा होती है । उपन्यास की सम्पूर्ण कथा सुंदरी की पुत्री गोलमी के इर्द गिर्द घूमती है ।हसीना बाद में सुंदरी जैसी अनेक स्त्रियां होती है जो अलग अलग ठाकुरों की यौन इच्छाओ की पूर्ति की साधन मात्र होती है ।परम्परा के तहत ठाकुर उनके जीवन यापन की सारी व्यवस्था करते है ।ऐसी महिलाओं की लड़कियों को पुनः अनैतिक कृत्यों में लिप्त होना पड़ता है कला संगीत नृत्य के माध्यम से ठाकुरों अगली संतति की तृष्णाएं शांत करनी पड़ती है ।लड़को को ठाकुरों सेवा में रह कर लठैतों की भूमिका निभाना पड़ती है ।।                                 कथानक के अनुसार हसीनाबाद मूल भूत सुविधाओ से वंचित रहता है ।महिलाओं के बच्चे अशिक्षित ।ऐसे में एक दिन सुंदरी गांव के मंदिर में अन्य स्थान से आई भजन मंडली के सदस्य  सुगन महतो के साथ प्रेम प्रसंग के रहते अपनी पुत्री गोलमी को लेकर भाग जाती है और सूजन महतो जो पूर्व से अन्य महिला से विवाहित है रहने लगती है । सुंदरी की पुत्री गोलमी और उसकी सहेली रज्जो गांव के अन्य लड़के खेचरु और अढाई सौ के बचपन को उपन्यास में लेखिका द्वारा बहुत खूबसूरती से चित्रित किया गया है। कथा के अनुसार सुंदरी गोलमी को पढ़ाना चाहती है परंतु गोलमी नृत्य और संगीत में रुचि रखती है । उधर सुंदर पुत्र रमेश जिसे वह मालती देवी के पास छोड़कर आ गई थी। वह उपेक्षित बचपन बीताते हुए बड़ा होता जाता है अपनी माँ और बहन के प्रति मन मे घृणा का भाव रखता है । रमेश अपने मित्र उस्मान जो ईट के भट्टे पर मजदूर है तथा ठाकुरों के निर्देशों पर क्रूर कृत्यों को अंजाम देता है के साथ आत्मीयता और सामीप्य का अनुभव करता है ।गोलमी अपनी नृत्य और संगीत में रुचि के चलते नृत्य कला मंडली का गठन कर गांव गांव में लोगो का मनोरंजन करती है । नृत्य कला मंडली में गोलमी का साथ रज्जो खेचरु अढाई सौ देते है इसी दौरान एक राजनेता राम बालक सिंह की दृष्टि गोलमी पर पड़ती जो गोलमी की नृत्य और गीत की कथ्य शैली से प्रभावित होकर उन्हें अपनी पार्टी के चुनाव के प्रचार हेतु मना लेते है ।
         समय के साथ गोलमी कला के सोपान के माध्यम से राजनीति के शिखर पर पहुँच जाती है और रमेश कुशल राजनेता के रूप में स्वयम को स्थापित कर लेता है 
          उपन्यास  अंग्रेजो के समय के पुराने सामन्तवाद  को आजादी के नवीन रूप धारण करते बताया गया है । किस प्रकार राज नेता राम खिलावन के पिता संग्राम सिंह जो प्रथम कोटि के शराबी थे फर्जी तौर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित रोचक कथा के माध्यम से प्रगट किया गया है  । सामंतवादियों द्वारा यौन शोषण की गई महिलाएं जब वृध्दावस्था को प्राप्त होती उनकी मानसिक स्थितियों को सूक्ष्मता से विश्लेषित  किया गया है ।कथा में वरिष्ठ लेखक प्रभात रंजन जी की कृति "कोठागोई" में उल्लेखित चतुर्भुज और उनसे जुड़ी नृत्यांगनाओ और उनके जुड़े संदर्भो को स्पर्श किया है ।उपन्यास की भाषा मे कही कही काव्यात्मकता नज़र आती है ।

Thursday, June 11, 2020

चन्दावती-उपन्यास की समीक्षा

अनुज्ञा  प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास चन्दावती जो सुप्रतिष्ठित नवगीतकार श्री भारतेन्दु मिश्र द्वारा लिखित है ।एक ऐसी ग्रामीण महिला जिसका नाम चन्दावती है के जीवन पर आधारित है ।जो बाल विधवा हो गई है और उसे उसके ससुराल वालों ने ससुराल से बहिष्कृत कर दिया है ।चन्दावती तेली समाज की हैऔर वह रामलीला में सीता जी की भूमिका निभाती रही है ।गांव में ही रहने वाले और चन्दावती से आयु में अधिक ब्राह्मण समाज के विधुर व्यक्ति हनुमान दादा जो रामलीला में रावण की भूमिका निभाते रहे है और पहलवानी के शौकीन है का चन्दावती से प्रेम हो जाता है ।दोनों एक दूसरे से विवाह कर लेते है ।बाद में चन्दावती को पता चलता है कि हनुमान दादा कुश्ती में आई चोट के कारण संतानोत्पत्ति में असमर्थ है । मैले में लगने वाले जड़ी बूटियों के दवाखाने में उपचार हेतु सपत्नीक जाते है जहाँ बाबा चन्दावती को नियोग की सलाह देते है चन्दावती उपरोक्त परिस्थितियों में स्वयं को ठगा हुआ पाती है 
       चन्दावती को ब्राह्मण समाज से भिन्नं तेली समाज की सदस्य होने के कारण हनुमान दादा के परिवार के लोग उनके भाई और भतीजा शिवप्रसाद तरह तरह से अपमानित करते है।एक बाल विधवा को कितनी प्रकार की मानसिक यातनाएं झेलना पड़ती है यह उपन्यास में बहुत अच्छी तरह से दर्शाया है लोग ऐसी महिलाओं से अनैतिक संबंध बनाना चाहते है पर विवाह कोई नही करना चाहता है ।निचले तबके की विधवा महिला से विवाह करने वाले सवर्ण पुरुष को भी हेय दृष्टि से देखा जाता है ।चन्दावती जिसने अपने भतीजे शिवप्रसाद को पुत्रवत स्नेह दिया ।शिवप्रसाद के विवाह उत्सव के दौरान जिस उत्साह का प्रदर्शन किया ।उसी के द्वारा चन्दावती के पति की मृत्यु हो जाने पर जिस प्रकार से चन्दावती को घर से बाहर निकाल दिया जाता है ।वह अत्यंत हृदय विदारक है लेखक द्वारा विवाह उत्सव पर बारात प्रस्थान के पश्चात महिलाओं द्वारा किये जाने वाले प्रहसनों को जिस मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है वह अद्भुत है ।चन्दावती को उसके भतीजे शिव प्रसाद द्वारा घर से बाहर निकालने पर चन्दावती द्वारा जिस प्रकार प्रतिकार किया जाता है वह उल्लेखनीय है धरना प्रदर्शन देवी दल का गठन, ग्रामीण महिलाओं में रचनात्मक शक्ति का निर्माण , अपनी आवाज को सर्वोच्च स्तर पर पहुचाना, इन सभी उपक्रमो का उपन्यास में बहुत अच्छी प्रकार से समावेश किया गया है ।ग्रामीण आंचलिक महिलाओं की कठिनाइयों के बारे नगरों की अभिजात्य वर्ग की महिलाओं और उनसे जुड़े आंदोलनों को पता ही नही है 
        उपन्यास में आगे चन्दावती के उसके पति की सम्पति के अधिकारों के संघर्ष को लेकर गांव की कुंताबाई और उसकी लड़कियों द्वारा सहयोग दिया जाता है ।चन्दावती के संघर्ष में उसका भाई शंकर भोजाई रजना भी सहयोग करती है ।गांव की राजनीति , पुलिस प्रशासन का धन बल के सहारे  चन्दावती भतीजे शिवप्रसाद द्वारा अपने पक्ष में उपयोग कर चन्दावती को कुचलने के किस प्रकार प्रयास किया जाता है ।यह हमारे पंचायती राज और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई प्रश्न चिन्ह खड़े कर देता है इसी कड़ी में एक हद तक लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ को भी उपन्यास ने कठघरे में खड़ा किया है । अंत मे चन्दावती और कुंता शिव प्रसाद द्वारा रचे गए षडयंत्रो के तहत मारी जाती है परन्तु चन्दावती द्वारा जो आंदोलन स्वयम के अधिकारों के लिए प्रारम्भ किया गया था। वह अंचल की समस्त नारी समुदाय के लिये बन जाता है। जिस मकान से चन्दावती को बहिष्कृत किया गया था।वह देवी दल का कार्यालय और जो जमीन उसे मिलना थी उस विद्यालय निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है
         उपन्यास की अंतर्वस्तु और भाषा सरस हैं ।मूल रूप यह उपन्यास अवधी भाषा मे लिखा गया है बाद में हिंदी में अनुवाद किया गया है इसलिए अवधी भाषा के अंचल में प्रचलित लोक गीतों को पढ़ने का अवसर भी मिल जाता है।कुल मिला कर इस उपन्यास की विशेषता यह है कि जो पाठक इसके कथानक से जुड़ जाता है तो वह पढ़ते चला जाता है कथा में निरन्तर प्रवाह है । कथानक की परिस्थितियां कृत्रिम नही लगती ।पात्र जीवंत प्रतीत होते है 

Thursday, May 28, 2020

उपन्यास -शिगाफ

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास शिगाफ  महिला लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित है। उपन्यास का आरम्भ कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार की एक युवती अमिता जो स्पेन के बार्सिलोना और मेड्रिड शहर में निवास करती है कि आत्मकथा के रूप में लिखी जाने वाली डायरी से होता है । लेखन और अनुवाद के व्यवसाय से जुड़ी  कश्मीरी युवती का संपर्क प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े इयान ब्रान से होता है। अमिता और इयान के प्रेम और प्रणय की परिस्थितियों के बीच उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है , जो बार बार स्पेन और कश्मीर के बीच की सामाजिक परिस्थितियों और राजनैतिक पृष्ठभूमियो के विश्लेषण तक पहुचती है 
        अमिता उपन्यास की कथा के अनुसार आत्मानुभव अपने  भाई अश्वथ से ब्लॉग के माध्यम  से बाँटती है ।कालांतर में अमिता भारत में आ जाती है। दिल्ली शहर में अमिता उसके पिता और उसके अंकल जो कश्मीर से विस्थापित हो कर कठिन परिस्थितियों में रह रहे है ।उनके कश्मीर की समस्या के प्रति दृष्टिकोण और अनुभूतियो को देखती है ।जम्मू के शरणार्थी शिविरों में कश्मीरी पंडितों की यंत्रणा पूर्ण जिन्दगो को यह उपन्यास परिचित कराता है 
   उपन्यास की कथा के दौरान अमिता कश्मीर के श्रीनगर और पहलगाम पहुचती है जहाँ उसके भाई अश्वत्थ का रंगकर्मी मित्र वजीर मिलता है जो उसके पैतृक निवास स्थान पर ले जाता है अमिता के सामने वे भावुक पल होते है जब उन्हें आधी रात को उसके परिवार सहित कश्मीर से खदेड़ा गया था । कश्मीर में अमिता उसके शिक्षक रहमान सर से मिलती है ।रहमान सर की लड़की यास्मीन जो अमिता की बचपन की सहेली होती है उसकी डायरी जब अमिता को रहमान सर से प्राप्त होती है ।तब उपन्यास यास्मीन की आत्मकथा के रूप में प्रारम्भ होता है ।जिसमे यास्मीन का निकाह एक विधुर से कर दिया जाता है।।कश्मीरी युवतियों को आतंकवादियों द्वारा प्रेमपाश में फांस कर किस प्रकार मानवबम के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ,यह उपन्यास में अच्छी तरीके से बताया गया है ।कश्मीर समस्या पर उपन्यास के माध्यम से विभिन्न दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है । कश्मीर समस्या के फलस्वरूप उपन्यास में यह तो बताया ही गया है कि कश्मीर में किस प्रकार कश्मीरी पंडितो पर नृशंस अत्याचार कर बेदखल किया है साथ मे यह भी बताया गया है एक आम कश्मीरी किस प्रकार से आर्मी और आतंकवादियों के बीच मे बुरी तरह फंसा हुआ है ।कई गांव पुरुष विहीन हो चुके है मात्र महिला, बच्चे और वृध्द बचे हुए है ।उपनयास का अंत भूकम्प की त्रासदी से होता है
       उपन्यास की मुख्य पात्र अमिता निरन्तर प्रेम और प्रणय के निश्चय अनिश्चय में झूलती रहती है ।कभी वह इयान ब्रान के प्रति तो कभी कश्मीरी पत्रकार जमाल के तो कभी आर्मी के जवान शांतनु में अपना प्रेम तलाशती है ।उपन्यास में अलग अलग प्रक्रमो पर अलग अलग पात्र आत्मकथा के रूप उपन्यास की कहानी को आगे बढ़ाते है ।उपन्यास में पात्रो द्वारा स्वयम से संवाद भी किया गया है ।संवाद की भाषा और भाव काव्यात्मक होकर अनुभूतियो की प्रखरता को प्रकटित करते है 

Friday, May 22, 2020

उपन्यास 84

सत्य व्यास द्वारा लिखित 84 चौरासी उपन्यास 1984 के सिख विरोधी दंगो पर आधारित है । उपन्यास का प्रारम्भ लेखक द्वारा उपन्यास के महत्वपूर्ण पात्रो मनु , मनु की माँ मनु के पिता छाबड़ा साहब और ऋषि जो मनु के मकान का किरायेदार होता के परिचय कराने से प्रारम्भ होता है । छाबड़ा साहब बाहर कही से आकर ओद्योगिक नगर में रहने के लिए आते है और वे मकान खरीद कर अपने व्यवसाय  चलाते है ।मकान का किरायेदार ऋषि स्कूल के बच्चो को ट्यूशन पढ़ाता है ।मोहल्ले के अंदर जो ऋषि की साफ छवि होती है, मोहल्ले के बाहर इसके विपरीत उसका उद्दंड व्यक्तित्व होता है 
        छाबड़ा साहब की एक मात्र लड़की मनु जो मन ही मन ऋषि की और आकर्षित होती है , वह कॉलेज की छात्रा होते हुए ऋषि से ट्यूशन पढ़ने का आग्रह करती है ।ऋषि के मना करने पर उसे भावनात्मक दबाव में ले लेती है, फिर मनु को पढ़ाने के लिये मान जाता है। अंततः मनु और ऋषि में निश्चय अनिश्चय के बीच मन मोहक संवादों और भाव भंगिमाओं के बीच प्रेम की परिणीति होती है । इसी दौरान बिहार में सूर्य पूजा के त्यौहार हलछठ पर मनु और ऋषि के मध्य उपस्थित हुए प्रेम प्रसंग महत्वपूर्ण हो जाते है ।लेखक ने हलछठ के उत्सव  और उससे जुड़ी परम्पराओ का उल्लेख बहुत ही विस्तृत किया है । प्रेमी युगल के बीच उपजे प्रसंगों  और भावनाओं को काव्यात्मक रूप से रेखांकित किया है  । 
   उपन्यास  में मोड़ तब आता है जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की उनके अंग रक्षको की हत्या के परिणाम स्वरूप सिख समुदाय के विरुध्द लोगो आक्रोश घृणा  पैदा होता है ।जिसके कारण ऋषि द्वारा उसकी प्रेमिका मनु और उसके परिवार को आक्रामक भीड़ से बचाने के प्रयास किये जाते है और इन प्रयासों के दौरान भीड़ का हिस्सा रहते हुए चुनोतियो का सामना करना पड़ता है ।हिंसा के दृश्यों को लेखक द्वारा शब्द चित्रों के माध्यम बहुत ही बेहतर तरीके से दर्शाया है। दंगा समाप्त होने के उपरांत ऋषि द्वारा मनु और उसके  परिवार को सफलता पूर्वक बचा लेने के बाद जो प्रेमी और प्रेमिका  का बिछोह होता है वह दुखांत है जो गंगा सागर की यात्रा तक समाप्त होता है 

Sunday, May 17, 2020

"प्रेम लहरी " एक उपन्यास

हाल ही में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित "प्रेम लहरी " एक ऐसा उपन्यास है जो मुग़ल  बादशाह शाहजहाँ के शासन काल के समय प्रचलित व्यवस्था सामाजिक परिवेश उनकी पारिवारिक स्थितियो को दर्शाता है शाहजहाँ  की बेगम मुमताज के प्रति उनके प्रेम की परतो को खोलता है शाहजहां की १४ सन्तानो की उत्पत्ति को लेकर उनकी प्रेम के नाम पर कामुक भावनाओ का परिचय देता है |   वैसे तो इस उपन्यास में मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओ के प्रति तीर्थ यात्रा को लेकर लिए जाने वाले कर का उल्लेख किया गया है तथा बिना शासकीय अनुमति के हिंदु  मंदिरो के निर्माण  किये जाने के निषेध सम्बंधित विधि की और ध्यान दिलाया गया है |  परन्तु  शाहजहाँ और उसके पुत्र दाराशिकोह को  हिन्दू मान्यताओं पर विश्वास  करने सम्बंधित प्रसंग भी बताये गए है |  त्रिलोकी नाथ पांडेय द्वारा अभिलिखित इस उन्यास को पढ़ते समय लगता है कि  हम उस युग में प्रवेश कर रहे है ।उपन्यास को पढ़ते समय कथानक के समस्त पात्रो के चित्र और स्थान हमारी कल्पना के पटल पर उतरते चले  आते है |
 उपन्यास का मुख्य पात्र पंडित जगन्नाथ के व्यक्तित्व का प्रभावी रूप से उल्लेख किया गया है पंडित जगन्नाथ की काव्यात्मक प्रतिभा और शारीरिक क्षमता का एक साथ होना शाहजहाँ  की सबसे छोटी पुत्री लवंगी के ह्रदय में प्रेम अंकुरित कर देता है | जहाँ  पंडित जगन्नाथ और लवंगी के बीच निश्छल प्रेम जो आध्यत्मिक उंचाईयों को छूता  है | वही शाहजहाँ  की बड़ी पुत्री जहां आरा  के बादशाह के साथ अनैतिक सम्बन्ध और रोशन  आरा के कामुकता  पूर्ण स्वेच्छाचारिता विचलित  कर देती है |  उपन्यास में पंडित जगन्नाथ के गुरु पंडित कवींद्र  के बारे में काफी अच्छे तरीके से बताया गया है | तत्कालीन समय में जो उनकी हिन्दू समाज में उपस्थिति दर्शाई गई है वह काफी महत्वपूर्ण है |  उपन्यास में एक पात्र आता है वैद्य  सुखदेव | वैद्य सुखदेव आर्युवेदिक ओषधियो  को  बाादशाह हेतु तैयार कर करता है और किस प्रकार बादशाह तैयार की गई वाजीकारक ओषधियो का उपयोग कर अपनी वासनाओ की तुष्टि करते है यह बहुत ही चुटीले अंदाज बताया गया है | 
         उपन्यासकार द्वारा भाषा का चयन  पात्रो के अनुसार किया है |  उपन्यास में यथा  स्थान पात्रो के संवाद जिस चुटीली भाषा में अंकित किये गए है उनसे राग दरबारी की याद आ जाती है | विशेष रूप से काशी में एक निः संतान सेठ को संतान प्राप्ति पर शिव मंदिर निर्माण का घटनाक्रम में उपजे शब्द चित्र उपन्यासकार श्री  लाल शुक्ल के उपन्यास "राग  दरबारी "की याद दिला देते है |  प्रेम लहरी उपन्यास में पात्रो के माध्यम से लेखक ने कई भजनो ,श्लोको आर्युवेदिक ओषधियो के सूत्रों का उल्लेख किया है | उपन्यास पढ़ते समय लगता है लेखक ने उपन्यास  वर्णित काल को जिया है \उपन्यास के अंत में प्रेमी जोड़े पंडित जगन्नाथ एवं शहजादी लवंगी का विवाह धर्म की दीवारों के कारण असंभव होना दर्शाते हुए \बादशाह शाहजहाँ  को एक हिन्दू विधवा चंद्रशिला के शीलभंग  के प्रयास और प्रयास के दौरान चंद्रशिला द्वारा आत्महत्या की जा बताया है \ कुल मिलाकर यह उपन्यास पाठको की ऐतिहासिक  जिज्ञासाओं को शांत करता है \शाश्वत प्रेम के प्रति आस्था जाग्रत करता है \ मुग़ल बादशाह शाह जहां के तथाकथित प्रेम के प्रति भ्रांतियों का निवारण करता है