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Tuesday, February 2, 2016

समय और सफलता

कुछ लोग का समय काटे नहीं कटता है
कुछ लोगों के पास समय का अभाव होता है
परन्तु समय का वास्तविक अभाव
 बहुत कम लोगो के पास होता है
समय के अभाव का रोना अक्सर वे लोग रोते है
जो समय का सबसे अधिक दुरुपयोग करते है
बीता हुआ समय कभी नहीं आता है
बुध्दिमत्ता यही है कि 
बीते हुए समय का अफ़सोस न किया जाए और वर्तमान का सही उपयोग किया जाए 
समय का समुचित उपयोग 
सभी लोग नहीं कर पाते है
व्यक्ति अपने व्यस्तता के पलो से भी 
समय चुरा सकता है 
समय की यह चोरी सीमित समय में 
व्यक्ति को कार्य करने में सक्षम बनाती है 
समय कभी एक सा नहीं रहता
 समय की गति जिसने पहचान कर 
सफलता हेतु जिसने रणनीति बनाई है 
सफल होकर उस व्यक्ति ने ही मंजिल पाई है
 समय को कोसने से कोई फ़ायदा नहीं है
समय को कोसने वाले व्यक्ति 
अपने दुर्भाग्य को आमंत्रित करते है
 समय से सामन्जस्य स्थापित करना एक कला है 
धन कमाया जा सकता है 
पर समय कमाया नहीं जा सकता है 
समय का मात्र सद उपयोग किया जा सकता है
 समय का सद उपयोग कर 
सुनहरा भविष्य बनाया जा सकता है 
अच्छे समय को याद कर वर्तमान में दुखी होना 
और अच्छे वर्तमान में 
बुरे समय की याद में डूबे  रहने से 
कोई फायदा नहीं है यह प्रवृत्ति मात्र 
अवसाद को जन्म देती है 
धीरे धीरे मनोरोग का कारण बन जाती है

Tuesday, January 12, 2016

संकल्प सेवा और विवेकानंद


संकल्प में बल होता है |
संकल्प में साहस होता है|
संकल्प के दम पर मधुमास आस पास होता है | 
संकल्प में दिशा है |
सुधर जाती हर दशा है
संकल्प के भीतर कितने लक्ष्य है
|
हर लक्ष्य के भीतर परिश्रम है
धैर्य रचा बसा है |
संकल्प वह दीप है
|
जो निर्विकल्प निर्विकार है
संकल्प से भरे हुए हृदय में रहे शुध्द विचार है
संकल्प से संसार ने भागीरथी को पाया है
संकल्प के सहारे महापुरुषों ने की मानवता की सेवा
हर इंसान के भीतर नारायण को विवेकानंद ने पाया है
संकल्प गीता है उपनिषद है वेद की ऋचा है
संकल्प से ब्रह्मा ने रची है सृष्टि
बृम्हाण्ड अनन्त प्रकाश वर्षो को रचा है
संकल्प जिसने पाया है
सुख चैन उसने त्यागा है
समस्त कामनाओ को छोड़
साधक वैराग्य और भक्ति की और भागा है
इसलिए संकल्पों की शिखा से  ही
मुश्किल और धुंधला अक्स भी दिखा है
संकल्पों से भरा इंसान कितना भी हो जाए मजबूर 

किसी भी परिस्थिति में नहीं बिका है 

Wednesday, December 30, 2015

जिज्ञासा एवम् मूल्यांकन

सीखना एक सतत प्रक्रिया है कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता है कि वह परिपूर्ण हो चूका है अब सीखने की कोई उसे कोई आवश्यकता नहीं है सीखता वही है जिसमे जिज्ञासा अर्थात जानने सीखने की लगतार प्रवृत्ति होती है जो व्यक्ति यह मान लेता है कि वह परिपूर्ण हो चुका है वह समग्र रूप से कुशलता प्राप्त हो चुका है उसमे उत्थान की सम्भावनाये समाप्त हो जाती है व्यक्ति कितना भी कुशल हो जाए उसके कार्य में दोष निकाला जा सकता है जो लोग दूसरे लोगो का मूल्यांकन करते है और भिन्न भिन्न प्रकार की कमिया निकालते है वही कार्य उनसे करवाये जाने पर वे भी उतनी ही त्रुटियों करते पाये जायेगे क्योकि कार्य का मूल्यांकन आदर्श परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते किया जाता है यथार्थ के धरातल वास्तविक समस्याएं कल्पना से परे पाई जाती है उनका हल तत्कालिक व्यवहारिक परिस्थितियों को देख कर तत्क्षण निर्णय लेकर ही किया जा सकता है इसलिए जब भी किसी व्यक्ति के कार्य का मूल्यांकन करो स्वयं को उस व्यक्ति के स्थान पर रखते हुए करो कि आप उस व्यक्ति के स्थान पर होते तो क्या करते ऐसी स्थिति जो भी मूल्यांकन करेंगे वह वास्तविक और सटीक मूल्यांकन होगा

Sunday, April 20, 2014

इसलिए जीवन में लक्ष्य आवश्यक है

कहा जाना है? किधर जाना है?
 कैसे जाना है?   
सफर में कितनी ऊर्जा की आवश्यकता होगी 
कितनी ऊर्जा कब बचाई जा सकती है 
 यह  मालुम हो तो
 राहे सुगम और सफर आसान हो जाता है । 
पता  ही नहीं चलता 
और रास्ता कब कट जाता है
 सफर में थकान नहीं होती 
थकान के स्थान पर 
अद्भुत ऊर्जा का आभास होने लगता है
 तन मन में जोश और उल्लास छा जाता है
 जब पता ही नहीं हो कि 
मंजिल कहा है किधर है
 रास्ते अज्ञात हो तो थोड़ी सी दूरी भी 
बहुत अधिक लगने लगती है
सफर शुरू हो उसके पहले ही 
साँसे फूलने लगती  है
संकल्प निर्बल होने से 
पल पल भारी सा प्रतीत होने लगता है
लक्ष्य सुनिश्चित हो तो 
 संकल्प को बल मिलता है
पल पल प्रतिपल प्रेरणा मिलती रहती है
सफर में कब रुकना है कितना रुकना है
कब चलना है कितनी गति से पहुचना है 
यह पूर्व निर्धारित होने से 
सफर एक यंत्रणा न होकर उत्सव लगने लगता है
 इसलिए जीवन में लक्ष्य आवश्यक है

Tuesday, December 31, 2013

आप किसे पाना चाहते हो ?

संसार में ईर्ष्या भी है प्रीत भी
 यह आप पर निर्भर है कि आप किसे पाने चाहते हो 
संसार में आनंद भी है अवसाद भी 
यह आप पर निर्भर है आप किसे पाना चाहते हो 
संसार में लोभ भी है संतोष भी
 यह आप पर निर्भर है कि आप किसे पाना चाहते हो 
संसार में भोग और रोग भी है योग भी  
यह आप पर निर्भर है कि आप किसे पाना चाहते हो
संसार में  संस्कार भी है विकार भी
 यह आप पर निर्भर है कि  किस और जाना चाहते हो 
संसारिक सम्बन्धो में सौहार्द भी है कलह भी 
यह आप पर निर्भर है कि आप किसे निभाना चाहते हो 
सबंधो में स्वार्थ भी है परमार्थ भी है 
यह यह आप पर निर्भर है  
आप किस भाव को अपने व्यक्तित्व में समाना चाहते हो 
संसार में सम्भावना भी है शून्य भी 
 यह आप पर निर्भर है कि आप किसे पाना चाहते हो



Monday, October 28, 2013

नेतृत्व

नेतृत्व  वह गुण है 
जो समूह  की  शक्ति को जाग्रत करता है 
संगठित शक्ति देश हो समाज या कोई संस्था हो 
 में क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है 
नेतृत्व का सम्बन्ध लोग राजनीति से जोड़ते है 
जबकि यह तो नेतृत्व का एक पक्ष है 
नेतृत्व के कई आयाम होते है 
नेतृत्व प्रदान करने वाले व्यक्ति को 
नेता के रूप सम्बोधित किया जाता है 
जबकि कोई औद्योगिक का प्रबंधक 
जब मजदूरो यंत्रियों उपयंत्रियो के कार्य कौशल्य का 
बेहतरीन इस्तेमाल करता है 
प्रत्येक श्रमिक यंत्री लिपिक कि 
व्यक्तिगत क्षमताओ के बीच समुचित सामंजस्य
 समन्वय स्थापित करता है 
तो समग्र  व्यक्तिओ कि क्षमताओ एकत्रितकरण से 
जो ऊर्जा प्रस्फुटित होती है 
तो देखते देखते ही छोटी सी औद्योगिक ईकाई 
विशाल औद्योगिक समूह बन जाता है 
अकेले व्यक्ति द्वारा अपनी प्रतिभा के अनुसार कार्य करना आसान है 
बहुत से व्यक्ति व्यक्तिगत क्षमता के कारण 
किसी क्षैत्र में निपुणता से कार्य करते है 
परन्तु नेतृत्व क्षमता के अभाव  में वे 
बहुत से लोगो से कार्य नहीं ले पाते है 
नेतृत्व के गुण से परिपूर्ण व्यक्ति भले 
अपनी कार्य क्षमता का अच्छा प्रदर्शन  न कर पाये पर 
वह अपनी टीम के प्रत्येक सदस्य कि क्षमता का 
समुचित दोहन कर कीर्तिमान बना लेते है 
                    अच्छे नेतृत्व के परिवेश के ऐसे कई उदाहरण है 
                     उनसे प्रेरणा ग्रहण करने कि आवश्यकता है
 

Saturday, September 7, 2013

पूजा या अनुसरण

पूजा का मार्ग श्रेष्ठ है या महापुरुषों के अनुसरण का
 मार्ग मंदिर हो या गुरुद्वारा हो 
या गिरजा घर या हो कोई स्तूप स्तम्भ 
महापुरुषों की चोराहो पर विराजित  प्रतिमा
 हम देवी देवता दिगंबर पैगम्बर तिर्थंकरो की पूजा करते है 
परन्तु हम उनकी पूजा क्यों करते है 
कोई कहता है आत्मा की शान्ति के लिए
 तो कोई कहता है लोक कल्याण और विश्व शान्ति के लिए
 कोई तर्क देता ईष्ट से हमें आशीष प्राप्त होता है 
मनोकामनाये पूर्ण होती है
 पर सच्छाई यह है की पूजा का मार्ग सरल है 
अनुसरण का मार्ग कठिन है 
कुछ लोग धर्म स्थलों  पर इसलिए जाते है 
 ताकि दूसरे लोग उन्हें धार्मिक समझे 
धर्म के आवरण में उनके व्यक्तित्व के नकारात्मक पहलू 
उजागर न हो छुपे रहे
जो व्यक्ति पूजा के मार्ग को अधिक महत्त्व देते है
 वे व्यक्ति विशेष ,सम्प्रदाय विशेष को  महत्व  देते है 
वास्तव में वे साम्प्रदायिक होते है 
अपने भीतर के  आत्मविश्वास के अभाव में 
सदा तरह तरह के गुरुओ की तलाश में लगे रहते  है
कर्म की आराधक
तो देवताओं प्रतीकों से प्रेरणा पाते है 
महापुरुषों द्वारा स्थापित आदशो का अनुसरण करते ऊर्जा पाते है

Wednesday, May 22, 2013

महान और सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति


महान और सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति आयु की 
 प्रारम्भिक अवस्था से लगाकर
 अंत तक समाज और राष्ट्र के लिए जीते है 
 सामान्य   व्यक्ति एक आयु तक स्वयं के लिए जीता है 
उसके पश्चात वह अपनी संतानों के लिए
 और आयु का महत्वपूर्ण अंश व्यतीत हो जाने के 
पश्चात अपने परिवार कुल के लिए 
अपनी क्षमताओं को न्यौछावर कर देता है 
व्यक्ति का व्यक्तित्व जब सम्पूर्णता प्राप्त कर लेता है
 जब वह अपनी सारी जिम्मेदारियों को पूर्ण करने के पश्चात
 अपना जीवन समाज और राष्ट्र को समर्पित कर देता है
 तथा वह समाज और राष्ट्र के लिए जीता है 
सामाजिक  परिवेश में अधिसंख्य व्यक्ति ऐसे है
 आयु के पूर्वार्ध्द से लगाकर आयु के उत्तरार्ध्द तक
 मात्र स्वयं के लिए जीते है
 ऐसे व्यक्ति अत्यंत स्वार्थी व्यक्ति होते है 
अपने स्वार्थ के सामने पारिवारिक ,सामाजिक, 
राष्ट्रीय हितो को महत्व नहीं देते 
उनका स्वकेंद्रित सोच परिवार समाज और राष्ट्र को
 पतन की और ले जाता है 
हमारा प्रयास यह होना चाहिए की 
हम महान व्यक्तियों का अनुसरण करे उनकी पूजा नहीं 
सामान्य व्यक्ति की तरह हम निज स्वार्थ से शनै शनै 
पारिवारिक स्वार्थ और निरंतर अग्रसर होते हुए
 राष्ट्रीय हितो की और उन्मुख हो जाए 

Monday, December 10, 2012

अास्तिकता मे निज अस्तित्व का बोध


विश्व कितने ही धर्म हो दर्शन हो सिध्दान्त हो
सम्पूर्ण विश्व मे दो प्रकार के व्यक्ति विद्यमान है
पहले वे जो ईश्वर के प्रति अास्था रखते है
ऐसे लोगो को अास्तिक के रुप मे सम्बोधित किया जाता है
दूसरे वे लोग होते है जो ईश्वरीय सत्ता को नकारते है
ऐसे लोग नास्तिक कहलाते है
प्रश्न यह है कि दोनो प्रकार के व्यक्तियो के व्यवहारिक जीवन मे 
 भेद कहा होता है
अास्तिक रहने क्या लाभ है ?
नास्तिक व्यक्ति को किस प्रकार की हानिया होती है या उन्हें लाभ भी होते है
नास्तिक व्यक्ति या तो इसलिये होता है
कि उसे अतीत मे ईश्वरीय अास्था की भारी कीमत चुकानी पडी होगी
या उसे स्वयम की क्षमता पर जरूरत से अधिक विश्वास होता है
या उसे यह ज्ञात होता है कि अास्तिक बने रहने मे 
अत्यधिक कठिनाईया है
रीति -नीती परम्पराअो संस्कारो का पालन करना उसकी विवशता रहेगी
ईश्वरीय भय से निरन्तर उसे ग्रस्त रहना होगा
ऐसे मे वह सुविधा भोगी जिन्दगी जी नही पायेगा
परन्तु ऐसे मे नास्तिक व्यक्ति यह भुल जाता है
कि प्रत्येक व्यक्ति की सीमीत क्षमता होती है
व्यक्ति कितना ही परिश्रम कर ले असफलता की सम्भावना बनी रहती है
असफल होने के कारण नास्तिक व्यक्ति निराशा के अन्धकार से घिर जाता है
परिणाम स्वरूप वह तरह -तरह के व्यसनो मे लिप्त हो जाता है
अन्तत ऐसा व्यक्ति अात्म हत्या की अोर अग्रसर हो जाता है
नास्तिक व्यक्ति को ईश्वरीय सत्ता का भय न होने से
तरह-तरह के अधम कर्मो मे लिप्त रहता है
अन्तत वह अपराध जगत मे प्रवेश कर क्रूर अपराधो की अोर प्रव्रत्त होता है
अास्तिक होने के कई लाभ है
प्रथम लाभ यह है कि व्यक्ति निरन्तर निश्चिंत रहता है
सतत उसे स्वयम पर ईश्वरीय अाशीष की अनुभूति प्रतीत होती रहती है
कठिन परिश्रम करने पर उसे सफलता मिल जाती है
तो वह उसे ईश्वर का अाशीर्वाद समझ कर
सफलता को प्रसाद के रूप ग्रहण कर परम सन्तुष्टि 
परमानन्द का अनुभव करता है
अास्तिक व्यक्ति को असफलता प्राप्त होने पर वह निराश नही होता
उसे ईश्वर की इच्छा मान कर नये सिरे से 
लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रयत्न रत हो जाता है
समय अाने पर ऐसा व्यक्ति वांछित लक्ष्य तो प्राप्त करता ही है
साथ ही उसे ईश्वरीय अाशीर्वाद के रूप मे 
पूरक परिणाम भी प्राप्त हो जाते है
जिनसे उसके लक्ष्य का मूल्य कई गुना हो जाता है
अास्तिक व्यक्ति निराश होने पर कभी भी अात्म हत्या नही करता है
अास्तिक व्यक्ति व्यसनो का अादि नही होता
एेसे व्यक्ति जो अास्तिक रहते हुये व्यसनो के अादि होते है
उनमे व्यसनो से मुक्त होने की पर्याप्त सम्भावना बनी रहती है
अास्तिक होने का दूसरा लाभ यह है
ऐसा व्यक्ति के साथ ईश्वरीय सत्ता की
निरन्तर उपस्थिति उसे अधम कर्म करने से रोकती है
पाप पुण्य स्वर्ग -नरक की अवधारणाये
उसे अपराध की अोर प्रव्रत्त नही होने देती
जिससे व्यक्ति महानता को प्राप्त करता है
इसलिये हे नास्तिक तुम अास्तिक बनो
अास्तिक बन कर अच्छे नागरिक बनो



Monday, November 26, 2012

व्यक्तित्व निर्माण मे अनुकूलन क्षमता

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व्यक्तित्व निर्माण के क्षैत्र मे एक महत्वपूर्ण सूत्र है
स्वयम मे अनुकूलन क्षमता का विकसित करना
अनुकूलन क्षमता का सीधा सम्बन्ध विपरीत परिस्थितियो
स्वयम की क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है
अथवा नितान्त जीवन के लिये अनुपयुक्त परिस्थितियो मे
जीवन निर्वाह कर लेना अनुकूलन क्षमता होती है
अनुकूलन क्षमता के प्रमाण प्रक्रति मे चारो तरफ बिखरे पडे है
हाइड्रिला नामक जलीय पौधा का निरन्तर 
जल मे मग्न रहते जीवित रहना
,नागफनी का पौधे का मरूथल मे जीवन को बचाये रखना
वनस्पतिक अनुकूलन क्षमता है
हम बहुत से ऐसे लोगो को जानते है
जो निरन्तर परिस्थितियो का रोना रोते रहते है
मौसम को कोसते है
अपनी असफलताअो के लिये दूसरो को दोषी मानते है
वे व्यक्ति जीवन मे कभी सफल नही हो सकते है
सफल वह व्यक्ति होता है जो घोर विषम परिस्थितियो मे भी
धैर्य नही खोता ,परिस्थितियो से सन्तुलन स्थापित कर
अपने लक्ष्य की अोर निरंतर अग्रसर होता जाता है
प्रत्येक परिस्थिति मे संतुष्ट रहता है
अपनी वास्तविक क्षमता अौर कमजोरियो को अच्छी तरह जानता है
निरन्तर अात्म मुल्यांकन करता रहता है
अपनी मौलिक क्षमता के अनुरुप लक्ष्य निर्धारित करता है
असफल होने पर निराश नही होता है
असफलता मे सफलता के बीज तलाश करता है
ऐसा व्यक्तित्व विपरित परिस्थितियो रोना नही रोता
अपितु प्रतिकूलताअो को अपने लिये वरदान बना लेता है
इतिहास साक्षी है सम्राट चन्द्रगुप्त , योगेश्वर श्रीक्रष्ण
शैशव काल से ही घनघोर प्रतिकूलताअो मे रहे
पर वे कभी दुखी नही हुये स्वयम दुखो से घिरे होने के बावजुद
 दूसरो के दुख कम किये
संसार प्राणीयो की अाॅखो से अाॅसू पौछे
अनुकूलन क्षमता का अाशय यह नही है कि
विचारो से समझौता कर पतन की राह पर चले जाना
अनुकूलन क्षमता सकारात्मक सोच को 
अागे बढाने वाली होनी चाहिये
जिस प्रकार हमारे महापुरुष महाराणा प्रताप ने
वनवासियो की तथा भगवान राम ने वानरो की क्षमताअो
का उनके बीच रह कर समाज कल्याण 
तथा राष्ट्र रक्षा के लिये उपयोग किया
नकारात्मक विचारो प्रभावित हुये बिना
अपने सर्वोच्च अादर्शो पर टिके विचारो से 
जन -मन को प्रभावित किया था