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Tuesday, April 20, 2021

कन्या भोज की प्रासंगिकता

             आज रामनवमी पर्व होकर चैत्र नवरात्रि का का अंतिम दिवस है । सामान्य रूप से आज के दिन लोग यज्ञ करके कन्या भोज आयोजित करते है । किंतु विगत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी कोरोना महामारी के कारण कन्या भोज का कार्यक्रम नही करवा पा रहे है । कन्या भोजन की परंपरा सनातन  में उस समय से चली आ रही है जब भारतीय समाज मे कन्याओ का परिवार और समाज मे विशेष स्थान होता था । 
                विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या?आज हमारे परिवार और समाज मे हम कन्याओ को विशेष स्थान और स्नेह संरक्षण दे पा रहे है । इसका जबाब यह होगा कि ऐसा नही हो रहा है तो फिर कन्या भोज के नाम पर इस धार्मिक ढकोसले की आवश्यकता  क्या है ?जाने अनजाने कन्याओ के माता पिता भी अपनी बेटियों का शोषण करते रहते है । कितनी ही कन्याये समुचित पोषण के अभाव में तरह तरह की शारीरिक कमजोरियों से ग्रस्त रहती है । परीक्षा परिणामो में इसके बावजूद लड़कियों का प्रदर्शन लड़को की अपेक्षा अधिक उत्साहवर्धक रहता है । 
          कई माता पिता इस बात को लेकर अत्यधिक संतुष्ट रहते है कि उनकी लडकिया अच्छी शिक्षा प्राप्त कर बहुराष्ट्रीय कंपनियों तथा प्रशासनिक एवम बैंकिग और शैक्षिणक जगत में उच्च पदों पर पदस्थ है । वैसी ही संतुष्टि अपने लड़को के बारे में प्रगट नही कर पाते है । कभी कभी तो माता पिता अपने लड़को के निराशाजनक प्रदर्शन के कारण उनके बारे में वास्तविक तथ्यों को प्रगट करने में भी संकोच करते है ।
         इस दौर में परिवेश में ऐसे परिवार भी देखने को मिलते है । जो पूरी तरह अपनी लड़कियों की आजीविका पर ही निर्भर है । यह एक अत्यंत  अपमान जनक परिस्थिति होती है फिर अपनी लड़कियों पर आश्रित माता पिता और परिवार यह कहते हुए मिल जायेंगे कि उन्हें अपनी लड़की पर गर्व है इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से अपनी लोलुप प्रवृत्ति को छुपा  लेते है । वर्तमान में यह पतन का दौर भी शुरू हो गया है कुछ लड़कियों के माता पिता विवाह कराने के उपरान्त उनकी लड़की  और उसके पति के बीच विवाद के बीज बोकर अपनी आर्थिक हितों की पूर्ति में लगे हुये है । इतनी नकारात्मक परिस्थितियों में भला देवी नव दुर्गा कन्या भोजन के माध्यम से आपकी पूजा कैसे ग्रहण कर सकेगी ।
           जब तक हमारी कथनी और करनी में अंतर समाप्त नही हो जाता।तब तक हमारी धार्मिक उपासना व्रत पूजा सब व्यर्थ है । व्यर्थ है वे सारे अनुष्ठान जो हमारे द्वारा देवी को प्रसन्न करने के लिए  किये जाते है । हम चाहे अपने कुकर्मो और गलत मंतव्यों पर कितने ही पर्दे डाल दे वह देवी सत्ता से छुप नही सकते । हमे वास्तविक अर्थो में देवियो के प्रतिरूप कन्याओ का संरक्षण पोषण और उन्नयन कर अपनी सच्ची श्रध्दा दिखलानी होगी । तभी देवी हमारे नवरात्रि के कन्याभोज को ग्रहण करेगी ।

Saturday, April 6, 2019

बेटी में सपना साकार रहा

न मानव के अधिकार रहे

न करुणा पावन प्यार रहा

मानव मानव से दुखी रहा

और हृदयविहीन व्यापार रहा

मन के भीतर न ख़ुशी रही

नहीं खुशिया का श्रृंगार रहा

आंसू अविरल है नयन बहे

सुख सपनो का संसार ढहा

दुःख से धरती माँ सिसक रही

जन अपमानित मन चीत्कार रहा

दीन दुर्बल को यहाँ चुन चुन कर

शव क्षत विक्षत होता संहार रहा

हम दिवस मनाते अधिकारो के

हर पल हमको धिक्कार रहा

बीता जीवन अंधियारे में

और उजियारा उनके द्वार रहा

ढोता बचपन है बस्तों को

नाजुक कंधो पर भार रहा

बेटो में वत्सलता बाँट रहे

बेटी में सपना साकार रहा 


Saturday, July 14, 2018

अस्मिता

अस्मिता आत्मसम्मान 
सुनने में एक जैसे लगते है 
परन्तु आत्म सम्मान से अधिक गहरा अर्थ
 अस्मिता का होता  है 
आत्म सम्मान का सम्बन्ध 
व्यक्ति की भावना से होता है 
जबकि अस्मिता का सबंध व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा निजता 
महिला  की  सुरक्षा से होता है 
महिला की इच्छा के बिना उसकी देह को स्पर्श 
एक अपराध ही नहीं 
महिला वर्ग की अस्मिता पर प्रहार होता है 
व्यक्ति के स्वयं निर्णय लेने की क्षमता पर 
तरह तरह के प्रतिरोध  उसकी 
अस्मिता को नकारना होता है 
व्यक्ति की क्षमताओं को कैद कर 
उसे अपने अनुकूल कार्य करने को बाध्य करना 
व्यक्ति की अस्मिता को खंडित करना है
अस्मिता व्यक्ति परिवार समाज राष्ट्र की हो सकती है 
जबकि आत्म सम्मान व्यक्तिगत होता है 
संस्कृतियों पर आक्रमण 
सामाजिक अस्मिता पर चोट है 
व्यक्ति को उसके इच्छित आजीविका न करने देना
 स्वालम्बन में कठिनाइयाँ उत्पन्न करना
 किसी व्यक्ति में आत्मविश्वास को विचलित कर देना 
समाज परिवार में भय का वातारण पैदा कर देना
अस्मिता पर  प्रहार के कई तरीके हो सकते है 
अस्मिता  शब्द संस्कृत   भाषा  के अस्मि शब्द से 
बना है  जिसका शाब्दिक अर्थ है  "हूँ "
अस्मिता का पूरा अर्थ " मै  हूँ " 
किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास  का पैमाना 
अस्मिता ही होती है 
यदि किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास कमजोर 
करना हो तो उसकी अस्मिता को चोट 
पहुंचाई जाती है 
इसलिए व्यक्ति के सामाजिक सुरक्षा की गारंटी 
समृध्दि अस्मिता है 
जिस व्यक्ति में अस्मिता बोध नष्ट हो जाता है 
उसकी बहु आयामी चेतना शून्य हो जाती है 
वह  गौतम ऋषि पत्नी अहिल्या की तरह 
पाषाणवत हो जाता है मर्यादा पुरुषोत्तम 
श्री राम ने तत्समय अहिल्या की 
अस्मिता को जगाया था 
 

Saturday, May 23, 2015

सपना का त्याग

सपना मध्यमवर्गीय परिवार की लाडली लड़की थी कुशाग्र बुध्दि की बालिका परिवार के प्रति अपने दायित्व को भली भाँती समझती थी माता पिता और तीन छोटी बड़ी बहनो सहित एक भाई का सुखी और संतोषी परिवार के बीच सपना स्वयम को पा अपना जीवन धन्य समझती थी शिक्षा पूरी होने के बाद सपना एक शासकीय कार्यालय में लिपिक का पद पा चुकी तो परिवार में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई  सपना जैसी सुयोग्य कन्या पाकर कौन माता पिता ऐसे है स्वयं को भाग्यशाली नहीं समझते धीरे धीरे सपना पर बहनो की शादी का दायित्व भाई के पढ़ाई की जिम्मदारी भी आ गई  पंद्रह साल कैसे बीत गये पता ही नहीं चला सभी बहनो की शादिया हो चुकी थी भाई भी ग्रेजुएट हो चुका था पर कुछ बचा था तो वह सपना का अविवाहित दायित्वों से भरा जीवन और बूढ़े माता पिता

Wednesday, September 3, 2014

हर तालिका तीज व्रत

हर तालिका तीज व्रत सहित कई व्रत कन्याये 
शिव सामान पति पाने की मनोकामना लिए करती  है 
विवाहित महिलाये अपने पति की दीर्घायु के लिए 
शिव को प्रसन्न करने के लिए करती  है 
स्त्रीया शिव सामान पति क्यों चाहती है ?
जबकि शिव जी तो तपस्वी श्मशानवासी है 
शिव के सामान पति प्राप्त करने  से स्त्रीयो को 
उसी प्रकार शक्ति प्राप्त होती है 
जिस प्रकार से माँ पार्वती को प्राप्त हुई थी 
 माँ पार्वती शक्ति स्वरूपा है 
शिव जैसा पति प्राप्त करने का आशय यह है 
की स्त्रियों को पार्वती सामान संतान सुख की प्राप्ति होती है 
शिव के पास धन नहीं था परन्तु वे जब चाहते थे 
 तब धन के देव कुबेर उनकी सेवा के लिए तैयार हो जाते थे 
शिव आराधना से स्त्रीयो को उसी प्रकार से 
अनुचर और सेवक प्राप्त होते है 
जिस प्रकार से माँ पार्वती  को शिव के गण प्राप्त थे


Saturday, November 2, 2013

महालक्ष्मी पूजा के निहितार्थ

अकेली महादेवी लक्ष्मी उल्लू पक्षी पर आरूढ़ रहती है 
अर्थात जो व्यक्ति मात्र धन के पीछे भागता है 
लालच वश वह मुर्ख बन कर ठगा जाता है
हम  ऐसे कई लोगो को पहचानते है जिन्होने धन लोलुपता के कारण 
गलत प्रकार से गलत योजनाओ में धन का निवेश किया और 
अपने जीवन भर कि कमाई गँवा बैठे
जब महादेवी लक्ष्मी भगवान् विष्णु के साथ रहती है 
भगवान् विष्णु कर्म के देव होने से उनकी अनुगामिनी हो जाती है 
जहां कर्म है वहा धन के स्त्रोत अपने अपने आप उत्पन्न  हो जाते है 
यथार्थ में  हम ऐसे कई लोगो को देखते है 
जो एक समय कुछ भी नहीं थे 
उनके पास किसी प्रकार कि धन सम्पत्ति नहीं थी 
परन्तु कर्मरत रहने से धीरे धीरे वे सम्पन्न होते चले गए
महालक्ष्मी जब भगवान् गणेश के साथ रहती है तो 
धन  के साथ ऐश्वर्य भौतिक सुख आरोग्य कि प्राप्ति   होती है
गणेश के साथ महालक्ष्मी की  पूजा से 
स्थिर लक्ष्मी सहज ही प्राप्त हो जाती है 
इसलिए महालक्ष्मी पूजा के समय उपरोक्त तथ्यो को  
याद रखना आवश्यक है

Saturday, February 2, 2013

सीता जी का सत्याग्रह


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प्राचीन काल में हिन्दू धर्म में महान नारियो की
लम्बी श्रृंखला रही है
जब कभी विद्वता की बात आती है
तो गार्गी और मैत्रेय ऋषि पत्नियों के नाम सामने आते है
चारित्रिक गुणों के आधार पर भी नारियो ने
अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किये है
चारित्रिक गुणों के आधार पर महान स्त्रियों को
सतियो के रूप में संबोधित किया है
महान सतियो में दैत्य कुल की स्त्रिया भी थी
जिनमे दशानन की पत्नी मंदोदरी
मेघनाथ की पत्नी सुलोचना ने जो आदर्श स्थापित किये
इससे इस तथ्य को बल मिलता है
की चरित्र किसी समाज या कुल की संपदा न
होकर सार्वदेशिक गुण है
जब सतित्त्व की बात आती है तो
सती सावित्री का उदाहरण दिया जाता है
जिसने अपने पति सत्यवान के प्राणों के लिए
मृत्यु के देव यमराज से संघर्ष कर लिया था
परन्तु महानता की पराकाष्ठा को पहुचने वाली नारियो में
महान सती श्रीराम भार्या सीता एवं
 ऋषि पत्नी अनुसूया रही है
सीता जी सतीत्व अन्य नारियो की अपेक्षा श्रेष्ठ क्यों है
ऐसा इसलिए है की कोई भी नारी 
अपहरण होने की अवस्था में
स्वयं को असहाय अनुभव करती है
किन्तु सीता ने तत्कालीन दैत्य शक्ति और वैभव के द्योतक
रावण के बंदी रहते मात्र सत्य के बल पर लंबा संघर्ष किया
जिसकी तुलना वर्तमान में अहिंसक आन्दोलन
या सत्याग्रह से हम कर सकते है
सीता जी का सत्याग्रह विश्व में सत्य का सर्वप्रथम प्रयोग था
सीता जी का सत्याग्रह मात्र लंका में ही नहीं
बल्कि श्रीराम की रावण पर विजय के बाद भी जारी रहा
अयोध्या आगमन के पश्चात श्रीराम द्वारा परित्याग
किये जाने के उपरान्त
सीता जी चाहती तो अपने पिता राजा जनक 
के पास चली जाती
या प्रतिकूल परिस्थितियों में
किसी अन्य व्यक्ति का आश्रय प्राप्त कर लेती
परन्तु सीता जी ने ऐसा न कर घनघोर वन में भी
सात्विक प्रकृति के संत वाल्मीकि जी के आश्रम
को अपना आश्रय स्थल बनाया
और अपने अबोध शिशुओ का लालन पालन किया
सीता जी के जीवन का यह पक्ष उन स्त्रियों के लिए दिशा -निर्देश है जिनको पतियों द्वारा परित्यक्त किया जा चुका है

Sunday, December 23, 2012

अव्यक्त व्यथा


वर्तमान में समाज में
ऐसी महिलाओं की संख्या बढती जा रही है
जिन्हें किन्ही कारणों से उनके पति द्वारा परित्यक्त कर दिया गया है
ऐसी महिलाओं के साथ नन्हे बच्चे हो तो स्थिति विकट हो जाती है महिला और बच्चो के सम्मुख जीवन मरण का प्रश्न खडा हो जाता है परिस्थतियो से समझौता करना उनकी नियति बन जाती है
कालान्तर में जाकर ऐसी महिलाओं पर
जार कर्म के आरोप लगा दिए जाते है
वस्तुत: क्या ऐसे पतियों का महिला पर जार कर्म का आरोप लगाने का क्या अधिकार शेष रह जाता है ?
जिसने अपनी पत्नी और बच्चो का समुचित भरण पोषण न कर आजीविका के मूलभूत साधन तक छीन लिए हो
पति और पत्नी के मध्य संताने सेतु का कार्य करती है
संतानों के प्रति उपेक्षा यदि किसी जनक द्वारा की जाती है
तो संतानों के ह्रदय में अपने पिता के प्रति विद्रोह उत्पन्न होना स्वाभाविक है
ऐसे पिटा जो अपनी संतानों की उपेक्षा कर देते है
उनका समाज में कही भी सम्मान जनक स्थान नहीं रह जाता है
तथा ऐसी संतानों के माता पिता के मध्य सुलह की संभावना भी क्षीण रह जाती है
शनै शनै ऐसा दायित्वबोध से विहीन पति
और पिता परिवार और समाज में अपनी उपयोगिता खो देता है
उसका देहिक रूप से विद्यमानता अनौचित्य पूर्ण हो जाती है
हमारे में ऐसे पुरुषो की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है
जो अपने जीने के अर्थ खो चुके है
सामान्य रूप से व्यक्ति अपने लिए
अपने परिवार अपने समाज के लिए
अपने देश के लिए जीवन व्यतीत करता है
जो व्यक्ति न तो देश के लिए समाज के लिए
न परिवार के लिए अपना जीवन की सार्थकता प्रमाणित न कर पाया हो वह व्यक्ति स्वयं के उत्थान के लिए कुछ प्रयास कर रहा होगा
इसमें संशय है

Monday, December 10, 2012

उर्मिला


रामायण मे जितना ध्यान
भगवान श्रीराम की भूमिका पर दिया गया है
उतना उनके अनुज लक्ष्मण
तथा उनकी पत्नि उर्मिला
की भूमिका पर नही दिया गया है
जबकि लक्ष्मण जैसा भ्राता
जिसने अपने भ्रात्र प्रेम के कारण अपनी नव विवाहिता पत्नि को
चौदह वर्षो के लिये त्याग दिया हो
विश्व मे कही भी ऐसा उदाहरण नही है
जितना त्याग लक्ष्मण ने किया उतना ही त्याग उनकी पत्नि
उर्मिला ने भी किया
चारो युग मे उर्मिला जैसी स्त्री मिलना संभव नही है
जिसने अपने पति लक्ष्मण को त्याग करने का अवसर दिया हो
वर्तमान मे जहॅा महिलाये अपने तुच्छ एवम संकिर्ण स्वार्थो की पूर्ति के लिये
परिवार मे कलह का वातावरण निर्मित कर देती है
उन महिलाअो के लिये महासति उर्मिला अनुकरणीय उदाहरण है
क्या कोई स्त्री का व्यक्तित्व इतना महान हो सकता है
जो विवाह के तुरन्त पश्चात चौदह वर्ष की दीर्घ अवधि तक
पति के विरह का दुख भोग सके
वास्तव मे इस प्रकार से कोई महिला तभी
तत्पर हो सकती है
जिसने अपने ह्रदय के अन्तकरण से किसी
पुरुष को चाहा हो वर लिया हो
मात्र देहिक अाकर्षण के अाधार पर जीवन साथी नही बनाया हो
इसलिये ऐसी महिला हो उर्मिला के रुप मे संबोधित किया गया है
उर अर्थात ह्रदय उर्मिला का अाशय यह है कि
जिसने ह्रदय से ह्रदय को जोडा हो
उर्मिला ने मात्र स्वयम को ही अपने अाप को
अपने पति लक्ष्मण के ह्रदय से नही जोडा
अपितु लक्ष्मण के ह्रदय को श्रीराम 
के ह्रदय को जुडने भी
महति भूमिका निर्वाह की
वर्तमान मे भी उर्मिला की भूमिका प्रासंगिक है
उर्मिला जैसे अाचरण की स्त्रिया जिस परिवार मे हो
वहा लक्ष्य प्राप्ति को तत्पर लक्ष्मण बनना
किसी भी व्यक्ति के लिये संभव है
अौर लक्ष्मण जैसे व्यक्ति को
श्रेष्ठ उद्देश्य रूपी राम को पाने से कौन रोक सकता है

Tuesday, November 27, 2012

स्नेह


स्नेह जब ममत्व का रूप धारण करता है
तो ममता कहलाता है
स्नेह जब करूणा का रूप धारण करता है
तो मानवता कहलाता है
स्नेह जब पीठ थपथपाकर अाशीष देता है
तो पित्रत्व का भ्रात्रत्व का  भाव कहलाता है
स्नेह जब मधुर भावना से अाहार खिलाता है
अाहार मे सौहार्द सदभाव मिलाता है
तो भीतर से उर्जा को बाहर ले अाता है
स्नेह के कई रूप होते है
कभी शीतल सी भावना तो कभी तेज
अौर अोज की धूप होते है
स्नेह कभी भगवान क्रष्ण बनते है
राधा के रूप मे सम्वेदना के तार बुनते है
स्नेह बनता है शबरी तो ,झुठे बैर श्रीराम खाते है
जात -पात अस्पर्श्यता की दूरियो को वे मिटाते है
योगेश्वर श्रीक्रष्ण का समस्त जीवन स्नेह से भरा है
स्नेह शुन्य व्यक्तित्व तो ​​मरा है अधमरा है

Tuesday, November 6, 2012

करवा चौथ के निहितार्थ

क्या कारण है कि ?
 करवा चौथ को महिलाये छलनी में से पति की छवि निहारती है
उसके बाद चन्द्र दर्शन करती है 
इसका अध्यात्मिक तर्क कुछ भी हो 
किन्तु तार्किक अर्थ यह है कि 
अक्सर पति पत्नी में विवाद का कारण परदोष दर्शन 
अर्थात छिद्रान्वेषण होता है 
पति कि छवि छलनी में से निहारने का तात्पर्य यह है कि 
पत्नी पहले स्वयं के दोष अर्थात अपने स्वभाव में छिद्रों को देखे 
दिन भर निराहार रह कर मनन चिंतन करे
 उसके बाद चन्द्रमा कि शीतल रात्री में शीतल मनो मष्तिष्क से
पति को निहारे उसके स्वभाव छुपे छिद्रों का अन्वेषण करे 
तो उसको जो दृष्टि प्राप्त होगी
वह चन्द्रमा के सामान शीतल स्वभाव देने वाली होगी 
उसके पश्चात वह गणेश देव कि पूजा कर गणेश पुत्री माँ संतोषी कि तरह सदा संतुष्ट रहने वाली होगी 
ऐसे परिवार में क्यों न गणपति
कि द्वि -भार्या रिध्दी -सिध्दी रहे?
अर्थात सुख वैभव एवं सर्व कार्य सिध्द होना सुनिश्चित रहे

Wednesday, May 2, 2012

नारी एवम नदी

नारी और नदी को एक दूसरे का पर्याय माना जाता है 
नदी की नियति  नारी की नियति से भिन्न नहीं होती नदी अपने प्रवाह एवं प्रकृति के अनुसार अपना मार्ग 
एवं अपनी दिशा तय करती  है 
उसी प्रकार  नारी अपने आचरण एवं चरित्र के अनुसार 
समाज में अपना सम्मान एवम स्थान तय करती है 
जहा पुण्य  सलिला ;नदि गंगा भगवान् विष्णु के चरणों से

प्रगट होंकर भगवान  शिव जी के मस्तक पर विराजमान

होकर सृष्टि  को सिंचती है 
उसीप्रकार से माँ नर्मदा शिव जी के स्वेद से उत्पन्न होकर 
अपने प्रवाहित होने की सार्थकता  प्रतिपादित करती  तो दोनों नदिया पूज्यनीय बन जाती है 
उसी तरह श्रेष्ठ नारिया संस्कारित परिवारों में संस्कार चरित्र ,ज्ञान के द्वारा सम्पूर्ण समाज के मध्य सम्मान माता के सम्मान पाती है 
और अपनी सृजनात्मकता से अपने जीवन को सार्थक बनाती है 
यदि कोई स्त्री भगवान् विष्णु एवं  शिव जैसे संस्कारवान  वातावरण से युक्त परिवेश में अपने जीवन को गतिमान नहीं करती है 
तो उसकी नियति ठीक उस नदी की तरह होती है 
जो बरसात में बाढ़ और गर्मी में सूख जाती है  अर्थात उस स्त्री के स्वभाव में निरंतरता नहीं  रहती  
जिस प्रकार से ऐसी नदिया उनके किनारों पर बीहड़ बनाती है

उसी  प्रकार  से  उन स्त्रियों का
जीवन प्रतिकूलताओ से भरा हुआ रहता है 
वे अपने साथ मगरमच्छ  जैसी समस्याओं को साथ लेकर चलती है
 तथा ऐसी स्त्रियों के जीवन में ईर्ष्या एवम घृणा उसी 
प्रकारसे रहते है जिस प्रकार से बीहड़ से युक्त नदी के
 बीहड़ो में  जहरीले सर्प अजगर व डाकू रहते है 

Tuesday, January 3, 2012

त्रिजटा

त्रिजटा रामायण की वह पात्र है 
जिसको मात्र अशोक वाटिका में माता सीता को सांत्वना देने के लिए जाना जाता है किन्तु क्या कभी यह सोचा गया है की त्रिजटा का यह कार्य कितना महान था  
त्रिजटा ने सीता जी को सांत्वना देते समय जो उनका सामीप्य प्राप्त किया था क्या वह किसी भी देवी साधक के लिए सुलभ था
सीता जो अच्छाई की प्रतिक थी वह चारो और बुराई की प्रतिक लंका निवासियों अर्थात राक्षसों से घिरी हुई थी
वहा मात्र त्रिजटा द्वारा उन्हें मनोबल दिया जाने का महत्व वही व्यक्ति जान सकता है
जो चारो और धूर्तो एवम दुष्टों से घिरा हुआ हो वहा उसे कोई ऐसा व्यक्ति मिल जाय जो अच्छाई को बल प्रदान करे 
तब उस व्यक्ति को ऐसा प्रतीत होता है मानो विशाल मरुथल में एक बूँद आशा का जल मिल गया है 
हम बहुत से ऐसे लोगो को जानते है जो ईशवर की आराधना में अत्यधिक समय व्यतीत करते है 
त्रिजटा न तो कोई बहुत बड़ी भक्त थी और नहीं ज्यादा पूजा पाठ में रूचि रखती थी
परन्तु उसके द्वारा माता सीता को बुरे वक्त में दी गई सांत्वना भक्ति तथा साधना से श्रेष्ठ ही थी
जब सभी और बुराइयों का साम्राज्य हो तब कोई व्यक्ति किसी अच्छे विचार या व्यक्ति का समर्थन करे उसे बल प्रदान करे महत्त्व इसी  तथ्य का होता है 
यह कार्य पूजा पाठ एवम ईश आराधना से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है 
यही कार्य पवन पुत्र हनुमान ने भी सुग्रीव को बुरे वक्त में सांत्वना देते समय किया था तथा भगवान कृष्ण ने वनवासी पांडवो के साथ किया था 
इसका तात्पर्य यह है की जो व्यक्ति अच्छाई का साथ दे अच्छे व्यक्ति को बुरे वक्त में मनोबल प्रदान करे उस पुनीत कार्य का मूल्यांकन भक्ति एवम पूजा से नहीं किया जा सकता ऐसा कार्य स्वयम में ईष्ट की साधना होती है क्योकि सज्जनों में ईश्वर का वास होता है