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Sunday, August 5, 2018
Friday, March 18, 2016
चिंतन क्या है ?
मन की तृष्णाओं का होता विराम है
चिंतन सृजन का स्त्रोत है
निर्माण की चेतना है
चिंतन दुस्साहस नहीं साहस है
अध्यात्म की ऊर्जा है
खुल जाते है पंच कोष
जुड़ जाते है सद विचार
विस्फुरित होती कुण्डलिनी
खुल जाता पुर्जा पुर्जा है
चिंतन चिंता का करता हरण है
मिट जाते है सभी विकार
अनाहद के भीतर होता अमृत तत्व
तरल अमृत का होता निरंतर झरण है
चिंता में होती वेदना है
चिंतन से जगती संवेदना है
चिंतन का वरदान उसी को मिलता है
जिसके चित्त सरोवर में
ह्रदय का कमल खिलता है
चिंतन मोक्ष दायिनी गंगा
पुण्य सलिला मैया नर्मदा है
मिल जाती है कष्टो से मुक्ति
आनंदित रहते सर्वदा है
इसलिए चिंतन उसी को मिला है
जो भगवद सत्ता के समीप है
जप तप का लंबा सिल सिला है
चिंतन एक भगत की भक्ति है
साधक की शक्ति है
चिंतन के रथ पर होकर सवार
जीवन के कर्म क्षेत्र से हर युक्ति मिल सकती है
चिंतन वासना का विराम है
किंकर्तव्य विमूढ़ मन का घनश्याम है
Thursday, February 18, 2016
पुरुषार्थ क्या है ?
पुरुषार्थ क्या है ?
पुरुषार्थ जीवन का मध्य है
पूर्वार्ध्द है उत्तरार्ध है
पुरुषार्थ जीवन का भावार्थ है
पुरुषार्थी व्यक्ति के लिए यह खुला गगन है
क्षितिज तक विस्तृत्त धरा है
विपत्तियाँ हुई बौनी विश्व हरा भरा है
पुरुषार्थ के बल पर विश्वामित्र ने
ब्रह्म ऋषि का पद पाया था
स्वर्ग और धरा के अतिरिक्त
अपना एक अलग स्वर्ग बनाया था
पुरुषार्थ एक क्रान्ति है जिसके बल पर चाणक्य ने महान मौर्य सामार्ज्य
और आर्यावर्त अखंड भारत बनाया था
पुरुषार्थी व्यक्ति
जीवन में सभी महान लक्ष्यों को पाता है
परिस्थितिया कितनी भी भीषण हो
कठिनाईयों के सुनामी चक्रवातों से टकराता है
पुरुषार्थ पुरुष होने का अर्थ है
पुरुष होने का तात्पर्य
पुरुषार्थ पाकर होना समर्थ है
पुरुषार्थी परशुराम थे
जिन्होंने पुरुषार्थी परशु पाकर
पितृ ऋण चुकाया था
मार्कण्डेय ने अल्पायु से
अमरता का वरदान पाया था
पुरुषार्थ ज्ञान अर्जन की अभिलाषा है
मौन साधना है तपस्या की भाषा है
सीधे शब्दों में कहे तो आक्रामक नहीं
सकारात्मक और रचनात्मक जीवन जीने की आशा है
पुरुषार्थी साधनो का नहीं
प्रेरणा का मोहताज होता है
प्रेरणा के अभाव में व्यक्ति अपनी ऊर्जा खोता है
इसलिए पुरुषार्थी बन कर
भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धिया पाओ
मानवीय संवेदना से हो परिपूर्ण हो
जीवन को सृजनात्मक विधाओ से सजाओ
Friday, May 30, 2014
सम्मान श्रध्दा और आस्था
सम्मान श्रध्दा और आस्था वे शब्द है
जो व्यक्ति और व्यक्ति के विचारो को
गरिमा प्रदान करता है
आस्था प्रतीकों को प्राण प्रतिष्ठित कर
शक्तिया प्रदान करती है
कहा जाता है कि जो व्यक्ति स्वयं के लिए
जो सम्मान चाहता है
उसे चाहिए की वह भी दूसरे व्यक्तियों के लिए
उसी प्रकार का सम्मान जनक व्यवहार करे
यदि हम किसी व्यक्ति को सम्मानित न कर पाये
तो कम से कम अपमानित तो न करे
श्रध्दा सम्मान की ऊपरी अवस्था है
सम्मान शिष्टाचार का सूचक है
वही श्रद्धा व्यक्ति के व्यक्तित्व प्रति
आदर आत्मीयता और प्रेम की प्रतीक है
कुछ लोग सम्मानीय हो सकते है
परन्तु श्रध्देय नहीं
सम्मान को श्रध्दा में परिवर्तित होने में
व्यक्ति का चिंतन काफी मानसिक अवस्थाओ से गुजरता है
यह मानसिक अवस्थाये व्यक्ति के कर्मो
और वैचारिक अनुभूतियों पर निर्भर करती है
सम्मानीय व्यक्ति के व्यवहार और आचरण से
व्यक्ति को कड़वे अनुभव प्राप्त होते है
तब सम्मानीय व्यक्ति के प्रति लोगो के ह्रदय में
श्रध्दा के स्थान पर अश्रद्धा और घृणा उत्पन्न होने लगती है
इसलिए किसी व्यक्ति को इतना सम्मान भी मत दो
जिसके वह योग्य नहीं हो
किसी को इतना अधिक श्रध्देय मत बनाओ की
जब श्रध्दा के आधार खंडित हो जावे तो
व्यक्तियो की मानसिकता भी खंडित हो जावे
और प्रतीकों के प्रति आस्था भी विचलित हो जाए
Friday, January 3, 2014
अपेक्षा और उपेक्षा
हर कोई अपेक्षा रखता है कि
उसकी अपेक्षाओ पर कोई खरा उतरे
पर कोई भी व्यक्ति किसी की अपेक्षाओ पर
खरा नहीं उतरना चाहता
व्यवहारिक जीवन में हम किसी व्यक्ति से
इतनी अधिक अपेक्षाए संजो लेते है कि
उनकी पूर्ती की जाना सम्भव नहीं होती है
बहुत सी प्रतिभाये अपेक्षाओ का अधिक भार
बर्दाश्त नहीं कर पाती है
या तो अपनी स्वाभाविक क्षमता खो देती है
या सदा के वह प्रतिभा दम तोड़ देती है
अपेक्षाए अपनों से की जाती है
अपेक्षा का सम्बन्ध अधिकार की भावना से होता है
जिसे व्यक्ति अपना समझता है
उस पर अपना अधिकार मानता है
पर व्यक्ति जिस पर अपना अधिकार मानता है
अपेक्षाए संजो लेने पर व्यक्ति
सामने वाले व्यक्ति सीमाए और अधिकारिता ,
क्षमताये नहीं पहचानता है ऐसी अपेक्षाए हमेशा अतृप्त रहती है
अपेक्षाए टूटने पर व्यक्ति स्व यम को
अपेक्षाए टूटने पर व्यक्ति स्व यम को
उपेक्षित महसूस करने लगता है
इसलिए किसी भी व्यक्ति से अधिक अपेक्षाए मत रखो
अपेक्षाए रखने के पूर्व व्यक्ति योग्यता
कार्य कुशलता को भली -भाँती परखो
व्यक्ति कि क्षमता के अनुपात में की गई
अपेक्षाए सदैव पूर्ण होती है
Thursday, December 26, 2013
संन्यास और भक्ति
वृत्ति का सम्बन्ध व्यवसाय और कार्य से है
प्रवृत्ति का सम्बन्ध स्व भाव से है
निवृत्ति वह शब्द है जिसे पाकर मुक्त होना है
मुक्ति कहा है यहाँ
हर तरफ चिंताये और चिताये है
भस्म तन को ही होना है
विरक्ति में वैराग्य है त्याग है
हर तरफ चिंताये और चिताये है
भस्म तन को ही होना है
विरक्ति में वैराग्य है त्याग है
भक्ति का सम्बन्ध समर्पण से है
समर्पण क्या त्याग से बड़ा है ?
त्याग से संन्यास है और समर्पण से भक्ति
संन्यास से मुक्ति है और भक्ति से शक्ति
संन्यास में उपाय है और भक्ति निरुपाय है
बिन उपाय सब कुछ भक्ति से ही मिलता है
भक्ति में भावनाए है भावुक विव्ह्वीलता है
इसलिए हे मनुज तुम भक्त बनो
रहो पूर्णतया समर्पित न यूं ही विरक्त बनो
Saturday, June 15, 2013
अस्मिता और आत्मसम्मान
व्यक्ति महिला हो या पुरुष हो
अकारण आक्षेप लगने अपमानित हो जाता है
व्यक्ति के आत्मसम्मान का मुल्य
उसकी सम्पन्नता से नहीं आंका जा सकता
बहुत से ऐसे व्यक्ति समाज में विद्यमान है
जो अत्यधिक समृध्द होने के बावजूद
स्वाभिमान शून्य और आत्मसम्मान की
भावना से विहीन है इसके विपरीत
बहुत से दरिद्रता पूर्ण परिस्थितियों में जीवन यापन
करने वाले व्यक्ति आत्मसम्मान के लिए
जीवन तक न्यौछावर कर देते है
करने वाले व्यक्ति आत्मसम्मान के लिए
जीवन तक न्यौछावर कर देते है
आत्मसम्मान को आघात पहुचने पर
या तो वे किसी भी सीमा तक पहुचने से नहीं चुकते
इतिहास में अनेक ऐसी महिलाए हुई है
जिन्होंने आत्मसम्मान के लिए जौहर किया
चित्तोड गढ में विजय स्तम्भ के समीप
स्थल इस तथ्य का साक्षी है
जहाँ रानी पद्मिनी ने सैकड़ो अन्य महिलाओं के साथ
अपनी अस्मिता को बचाने के लिए
अग्नि शिखा में कूदकर जौहर किया था
त्रेतायुग में देवी अहिल्या जो गौतम ऋषि की भार्या थी
इंद्र के द्वारा छल से शील भंग किये जाने से
शापित हुई कहा जाता है की वह
पाषाण का रूप धारण कर चुकी थी
जिनका उध्दार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम ने किया था
यहाँ पाषाण वत होने का आशय समझना होगा
क्या वास्तव में अहिल्या पत्थर बन चुकी थी
पत्थर तो प्रतीक है
जिस व्यक्ति में संवेदना का भाव समाप्त होता है
भाव विहीन हो जाता है
उसे पत्थर दिल ही कहा जाता
अहिल्या जो आत्मसमान से युक्त महिला थी
छल से अपनी अस्मिता खो देने के बाद
पति गौतम ऋषि द्वारा परित्यक्त की जा चुकी थी
अकारण उपेक्षा और अपमान के कारण
अपनी सुध-बुध खो चुकी थी
संवेदनाये खो कर भाव विहीन अर्थात
पाषाण वत हो चुकी थी
भगवान् राम जो युग पुरुष थे के द्वारा ऐसी महिला के प्रति
सहानुभूति प्रकट किये जाने पर
और सम्मान प्रकट किये जाने पर
आत्मविश्वास पाकर मानवीय संवेदना से परिपूर्ण चुकी थी
इसलिए कहते है देवी अहिल्या का श्रीराम द्वारा उध्दार किया गया था
वर्तमान में अकारण अपनी अस्मिता खो देने वाली
अह्ल्याये जो पाषाण वत हो चुकी है
के उध्दार हेतु मर्यादा पुरुषोत्तम की भूमिका कोई
निभाने वाला है या नहीं यह ज्वलंत प्रश्न हमारे सामने उपस्थित है


Tuesday, July 10, 2012
चित्र +गुप्त
हिन्दू धर्म में मान्यता रही है
चित्रगुप्त देव पाप पुण्य का लेखा -जोखा रखते है ,
चित्रगुप्त का संधि विच्छेद करने पर चित्र +गुप्त होता है
अर्थात जो व्यक्ति गुप्त रूप से किसी भी कृत्य का चित्र खींचता हो वर्तमान में इलेक्ट्रोनिक मीडिया में
अर्थात जो व्यक्ति गुप्त रूप से किसी भी कृत्य का चित्र खींचता हो वर्तमान में इलेक्ट्रोनिक मीडिया में
इस प्रकार का प्रचलन देखा जा रहा है
किकुछ पत्रकार किसी भी प्रकार के अपराध का
पर्दाफ़ाश करने के लिए उसके चित्र गुप्त तरीके से खिंच लेते है
जब तक ऐसे व्यक्तियों को मानसिकता
स्वस्थ होती है
स्वस्थ होती है
तब तक वे चित्रगुप्त देव के प्रतिनिधि होते है
जैसे वे गुप्त रूप से खींचे गए चित्रों को निज स्वार्थो की पूर्ति के लिए करते है
वे भगवान् चित्रगुप्त की दृष्टि में आ जाते है
कहा जाता है की भगवान् के घर देर होती है अंधेर नहीं होती
कहा जाता है की भगवान् के घर देर होती है अंधेर नहीं होती
जिस प्रकार वर्तमान न्याय प्रशासन व्यक्ति प्रतिरक्षा एवं सुनवाई का पूरा मौका देता है
अपराध के अन्वेषण के प्रक्रम पर सम्पूर्ण साक्ष्य एकत्र की जाती है साक्ष्य एकत्र होने पर
अभियोग पत्र न्यायालय में प्रस्तुत होता है
विचारण के दौरान भी अभियुक्त को आरोप
,अभियोजन साक्ष्य ,अभियुक्त परिक्षण ,प्रतिरक्षा साक्ष्य के
प्रक्रम की प्रक्रिया से गुजरना होता है
उसी प्रकार व्यक्ति जिसके अपराधो को जिसे मानव रचित न्याय प्रशासन विचारण न कर पाया हो
ईश्वर अपने गुप्त कैमरे से खीच लेता है
चित्रों का संग्रहण कर
व्यक्ति की आयु पूर्ण होने पर
व्यक्ति की आयु पूर्ण होने पर
उनका उपयोग उस व्यक्ति से जुडी आत्मा की
नियति तय करने के लिए करता है
तब वह व्यक्ति जो अपने बुरे कर्मो को भूल जाता है
और मात्र अच्छे कर्मो को याद रखता है के सामने एक -एक कर वे सारे चित्र ईशवर उसके सामने रखता है
और उस व्यक्ति के लिए ईश्वरीय दंड निर्धारित करता है
इस प्रक्रिया में भगवान् चित्रगुप्त की ही भूमिका रहती है
इसलिए कहा जाता है की भगवान से कुछ भी छुपा हुआ नहीं है
अगर आप ईश्वर के सामने
अपने अपराधो को स्वीकार करो तो
अपराध बोध की भावना जाग्रत होगी
अपराध बोध की भावना जाग्रत होने से
व्यक्ति प्रायश्चित करेगा
अन्यथा ईश्वर भगवान् चित्र गुप्त द्वारा अंकित साक्ष्य के आधार पर कठोर दंड देते है
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