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Sunday, April 24, 2022

मित्रता और शत्रुता

मित्र होते नही ,मित्र बनाये जाते है ।उसी प्रकार से दुश्मन होते नही ,दुश्मन पैदा किये जाते है। जितना कठिन है अच्छे मित्र बनाना। उतना ही आसान है दुश्मन तैयार करना । बुरे लोगो में जितनी जल्दी मित्रता हो जाती है । उतनी ही जल्दी वे दुश्मन भी बन जाते है अच्छे लोगो में परस्पर मित्रता बहुत कठिनाई से हो पाती है । 
         सज्जन लोगो मे मित्रता का प्रारम्भ परिचय से होता है। भली भांति परिचित होने के बाद ही वे परस्पर विश्वास कर पाते है । विश्वास सहयोग और सहयोग घनिष्ठता में कब बदल जाता है पता ही नही चलता ।  फिर भी वे एक दूसरे को मित्र बताते नही पर सभी लोगो जो उन्हें जानते है वे मित्र के रूप में ही जानते है ।
     मित्र और परिचित के बीच एक और कड़ी होती वो हितैषी के रूप में कहलाते है । कुछ लोग वास्तव में हितैषी होते है तो कुछ लोग हितैषी होने का दम्भ भरते है और मुफ्त की सलाह दे दे कर भृमित करने में निपुण होते है । 
    कहा जाता है मूर्ख मित्र से बेहतर है समझदार शत्रु का होना। यह  कहावत वर्तमान परिस्थितियों में बिल्कुल स्टीक बैठती है । क्योकि शत्रु अगर समझदार हो तो वह कितनी चोट पहुंचाना कब चोट पहुचाना सब कुछ दूरगामी दृष्टिकोण रख कर तय करता है , जबकि मूर्ख मित्र नजदीकी का लाभ उठा कर स्वयं सबसे बड़ा हितचिंतक बताते हुए अपरिमित क्षति पहुचा भी देता है और स्वीकार भी नही करता है कि उसने कितनी बड़ी गलती की है । 
      कुछ लोग दुश्मन पैदा करने की कला में इतने दक्ष होते है कि उनके पास दुश्मन पैदा करने के अनेक तरीके होते है।अकारण किसी व्यक्ति की आलोचना करना । किसी के कार्य मे अनावश्यक हस्तक्षेप करना । दूर दूर तक संबंध नही होने के बावजूद किसी व्यक्ति के चरित्र और आचरण के बारे में  टीका टिप्पणी करना , सदैव अप्रासंगिक बातो को लेकर चिंतित रहना ।इनमें से कुछ तरीके हो सकते है ऐसे लोगो का कोई दुश्मन नही होता । वे स्वयं अपने दुश्मन होते है फिर उन्हें नित्य  और निरन्तर नवीन दुश्मनो की तलाश रहती है 

Monday, March 22, 2021

सौंदर्य और सौरभ

गुलाब और जीवनबाहरी सौंदर्य के साथ व्यक्ति में आंतरिक सौन्दर्य भी हो तो वह गुलाब की तरह महकता है । विचारो की सुगन्ध जब चारो और फैलती है तो व्यक्तित्व विशालता पाता है । जैसे कोई बरगद और वट वृक्ष तले राही विश्राम पाता है । कोई थका हुआ खगदल डालियो से खेलता , तिंनको को चुनता  घोसला बनाता आश्रय पाता है । व्यक्तित्व की सुरभि पाकर जो भी किसी के पास आता है । निकट आकर बैठता है बैठा रह जाता है । यह जरूरी नही कि जो बाहर से सुन्दर हो वह भीतर से उतना ही सुरभित हो । भीतर का सौंदर्य तो तब सामने आता है जब कोई व्यक्ति मुस्कराता है । मधुर बोलो से कोई स्वर गुनगुनाता है । चित्रकला संगीत नृत्य और कविता,लेखन सृजन के माध्यम से आनंद

परिवेश में बिखराता है| आंतरिक सौदर्य का महत्व हमे तब समझ मे आता है जब कोई इंसान लगातार हमारे संपर्क में रहता है और अचानक हमे छोड़ कर सदा के लिए बिछुड़ जाता  है । इस दुनिया को छोड़ कर चला जाता है। तब रह जाती है उसकी वैचारिकता चरित्र और कृतित्व की खुशबू  जिसकी स्मृति मात्र हमे सुरभित कर देती है 
     सुंदरता वस्तु या व्यक्ति में नही होती ।देखने वाले की दृष्टि में होती है । जिसे हम चाहते है भले ही वह औसत चेहरे का हो हमे विश्व का सम्पूर्ण सौंदर्य उसमे दिखाई देता है । जिसे हम न चाहे वह चाहे कितना भी खूबसूरत हो हमे बिल्कुल सुहाता नही  निरन्तर आंखों में खटकता रहता है।
दुर्लभ और खुरदरा पाषाण का पिण्ड भी अमूल्य हो जाता है और चिकना संगमरमर के पत्थर भी शिल्पकार की राह तकता रह जाता है । हमारा देखने का दृष्टिकोण हमारे वैचारिकता को नवीन आयाम देता है । हमारी कल्पनात्मकता सृजनात्मकता का स्त्रोत होती है । इसलिए हमें वैचारिक दृष्टि सदा समृध्द रहना चाहिये । हम जिन लोगो के बीच मे रहे भले ही आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्न न हो ज्ञान और अनुभव और प्रतिभा की दृष्टि से वे हमसे अधिक श्रेष्ठ हो