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Saturday, April 6, 2019
Sunday, April 1, 2018
Friday, March 16, 2018
Tuesday, February 13, 2018
शिव शंकर
शिव शंकर का ध्यान करो भीतर करो प्रवेश
कुदरत से श्रंगार धरे शिव का अदभुत वेश
कुदरत से श्रंगार धरे शिव का अदभुत वेश
शिव जी शक्ति देत रहे भक्ति और आनंद
सुरभित आस्था होत रही महकी आती गंध
सुरभित आस्था होत रही महकी आती गंध
शिव की पुत्री साथ रही साथ रहे सुख चैन
रेवा मैय्या बांट रही करुणा निश्छल प्रेम
रेवा मैय्या बांट रही करुणा निश्छल प्रेम
मुक्ति की मुस्कान रहे ज्योति पुंज है जीव
भक्ति जिसके पास रही पाया उसने शिव
भक्ति जिसके पास रही पाया उसने शिव
शिव शक्ति दोउ साथ रहे साथ रहे सब जीव
पूजित शक्ति होत रही वंदित होते शिव
पूजित शक्ति होत रही वंदित होते शिव
जीवन सारा बीत गया बीत गई कई रैन
शिवरात्रि को खूब मिला व्याकुल मन को चैन
शिवरात्रि को खूब मिला व्याकुल मन को चैन
शिव श्रध्दा से जीत मिली प्रीत भरी मुस्कान
हर निश्चय को लक्ष्य मिले शिव जी दो वरदान
हर निश्चय को लक्ष्य मिले शिव जी दो वरदान
शिव व्यापत हर रूप रहे धूप रहे और छाँव
दुर्बल मन की पीर हरो डग मग होती नाव
दुर्बल मन की पीर हरो डग मग होती नाव
Saturday, December 3, 2016
बुरा जो देखन मैं चला
यह पंक्ति बहुत से संत दोहराते है कि
"बुरा जो देखन जो चला मुझसे बुरा न कोय "
ऐसा कह कर व्यक्ति को
आत्म आलोचना करने हेतु प्रेरित करते है
परन्तु व्यवहारिक जगत में
वास्तव में ऐसा नहीं होता
कुछ लोग जो मूलतः अपने स्वभाव से बुरे होते है
वे अकारण ही अच्छे लोगो को हानि पहुचाते रहते है
हम कभी कभी यह सोचने का
तलाशने का बहुत प्रयास करते है
कि जाने अनजाने हमसे ऐसी कौनसी त्रुटि हो गई
जो सामने वाला व्यक्ति हमारा अहित चाहता है
कारण तलाशने पर भी पता नहीं चलता
यदि यह दोहा वर्तमान परिस्थितियो में
सार्थक होता तो हम अच्छे और बुरे लोगो में
कोई भेद ही नहीं कर सकते
हम कोई भी क्षति होने पर
बुराई की पहचान न कर
मात्र आत्म विश्लेषण कर लेते ऐसा कर हम बुरे व्यक्तियों को बुरे कर्मो से विमुख न कर
उन्हें और अधिक स्वच्छंद और उच्छृंखल ही बनाते रहेगे और स्वयम संत्रास झेलते रहेंगे
कबीर दास का यह दोहा
वर्तमान परिस्थितियों के लिए
अधिक प्रासंगिक नहीं रहा है
कबीर दास जी ने इस दोहे की जब रचना की थी
तब कि परिस्थितियां भिन्न थी
लोग अकारण भले व्यक्तियों को संत्रास नहीं देते थे परन्तु वर्तमान में ऐसे लोगो की बहुतायत है
जो अकारण दूसरे व्यक्तियों को क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति हेतु संत्रस्त करते रहते है
तब भले व्यक्तियों के लिए यह कहना कि
"बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय"
उचित प्रतीत नहीं होता है
Wednesday, April 6, 2016
आया अब सिंहस्थ
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
हरसिध्दि भी हरी भरी हरे भरे हो स्वस्थ
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
मंगल दंगल हुआ करे मिटे शंख से कष्ट
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
संतो का अब संग रहे कभी नहीं हो भ्रष्ट
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
सिंह के जैसा भाव रहे गज सा हो मदमस्त
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
क्षिप्रा रेवा मिल गई मिले संत से गृहस्थ
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
संता बंता ढूँढ रहे सिध्द मिला न हस्त
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
भीड़ में भक्ति ग़ुम गई कटी जेब से त्रस्त
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
अब तक शाही भोज किया अब शाही स्नान करो
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिहस्थ
Wednesday, March 30, 2016
अंत
अंत में संत है महंत है पूर्ण विराम है
अंत में मृत्यु का सत्य है श्रींराम है
अंत में कथा का श्रवण वैकुण्ठधाम है
अंत में क्षीणता दुर्बलता बुढ़ापा है
अनुभव की गहराई है नभ् नापा है
अंत में वैराग है संन्यास है शोक है
शाश्वत और सनातन है श्लोक है
अंत में लक्ष्य है शिखर है सागर गहरा है
अनंत ब्रह्माण्ड के भीतर तम ठहरा है
अंत में कृष्ण गीता है रामायण है
कर्तव्य से विमुख क्यों ? समरांगण है
अंत में लय है प्रलय है ताण्डव है
नर में नारायण सत्य में पांडव है
अंत में नाद है निनाद है नृत्य उत्तम है
शिव का डमरू बजता डम डम है
इसलिए अंत से आरम्भ है
आरम्भ से अंत है
सृष्टि का बीज है बीज में बसंत है
अंत में मृत्यु का सत्य है श्रींराम है
अंत में कथा का श्रवण वैकुण्ठधाम है
अंत में क्षीणता दुर्बलता बुढ़ापा है
अनुभव की गहराई है नभ् नापा है
अंत में वैराग है संन्यास है शोक है
शाश्वत और सनातन है श्लोक है
अंत में लक्ष्य है शिखर है सागर गहरा है
अनंत ब्रह्माण्ड के भीतर तम ठहरा है
अंत में कृष्ण गीता है रामायण है
कर्तव्य से विमुख क्यों ? समरांगण है
अंत में लय है प्रलय है ताण्डव है
नर में नारायण सत्य में पांडव है
अंत में नाद है निनाद है नृत्य उत्तम है
शिव का डमरू बजता डम डम है
इसलिए अंत से आरम्भ है
आरम्भ से अंत है
सृष्टि का बीज है बीज में बसंत है
Tuesday, March 29, 2016
आरम्भ और ऊँ
आरम्भ में ॐ है नम: शिवाय है
आरम्भ ही आदि अनादि भीमकाय है
आरम्भ में गंध स्पर्श झंकार है
भीगी हुई अनुभूतिया है निर्विकार है
आरम्भ में कठिनाईया है
आरम्भ ही आदि अनादि भीमकाय है
आरम्भ में गंध स्पर्श झंकार है
भीगी हुई अनुभूतिया है निर्विकार है
आरम्भ में कठिनाईया है
विघ्न है बाधा है
आरम्भ हो गया तो कार्य सफल हो गया आधा है
आरम्भिक अवस्था में
हर व्यक्ति सकुचाता है घबराता है
भय और संकोच के कारण आगे नहीं बढ़ पाता है
आरम्भ में उत्साह है रंग है तरंग है
होती विषम समस्याएं पर जीती जाती जंग है
आरम्भ में अर्पण तर्पण है समर्पण है
आरम्भिक प्रयासों से ही दिख जाता
आरम्भ हो गया तो कार्य सफल हो गया आधा है
आरम्भिक अवस्था में
हर व्यक्ति सकुचाता है घबराता है
भय और संकोच के कारण आगे नहीं बढ़ पाता है
आरम्भ में उत्साह है रंग है तरंग है
होती विषम समस्याएं पर जीती जाती जंग है
आरम्भ में अर्पण तर्पण है समर्पण है
आरम्भिक प्रयासों से ही दिख जाता
भावी का दर्पण है
इसलिए आरम्भ होना चाहिए
इसलिए आरम्भ होना चाहिए
उत्तम और भव्य है
उत्तम और सार्थक प्रयासों से
उत्तम और सार्थक प्रयासों से
मिल जाता गंतव्य है
आरम्भ में साधना है परिश्रम है
आरम्भ में साधना है परिश्रम है
तो जीवन योग है
तृप्त हो जाती सभी कामनाये
तृप्त हो जाती सभी कामनाये
मिल जाता आरोग्य है
Saturday, February 13, 2016
तू दे कला ,माँ वत्सला और लेखनी को धार दे
माँ शारदे तू तार दे
जीवन मेरा संवार दे
हुआ विषम कठिन जीवन
नवीन सृजन विचार दे
बढे चरण बढे चरण
सदा मेरे बढे चरण
है कामना यही मेरी
विमल मति तेरी शरण
तू दे कला ,माँ वत्सला
और लेखनी को धार दे
सरल तरल कमल नयन
हो हंस सा धवल हो मन
सृजन फसल का अंकुरण
रहे गति ,नहीं क्षरण
हो शत्रुता कही नहीं
माँ मित्र दे और प्यार दे
Monday, December 28, 2015
मौसम
सर्द हवाओ ने मचा दी हल चल
गहरी संवेदनाओ को खरौचा है |
मौसम को गाली दे दे कर
किस कमबख्त ने उसको कोसा है ?
मौसम अनुभूतियों का सुखद स्पर्श है
गहरी संवेदनाओ को खरौचा है |
मौसम को गाली दे दे कर
किस कमबख्त ने उसको कोसा है ?
मौसम अनुभूतियों का सुखद स्पर्श है
प्रकृति माँ का लाड है दुलार है
मौसम की खूबसूरत उंगलियो से
विधाता लुटाते प्यार है
गहरी सर्द रातो में होती गहरी शान्ति है
नदिया सरोवर समुद्र तट पर होता
शब्दहीन संवाद मिट जाती समस्त भ्रान्ति है
इसलिए हम मौसम नहीं लड़े
हँसते खेलतें मौसम की मस्ती में
हो जाए खड़े
मौसम हमे भीतर से तर
बाहर से बेहतर बना देगा
मौसम का पावन अनुभव
आध्यात्मिक सुगंध की तरह सदा
हमारी आत्मा के संग रहेगा
विधाता लुटाते प्यार है
गहरी सर्द रातो में होती गहरी शान्ति है
नदिया सरोवर समुद्र तट पर होता
शब्दहीन संवाद मिट जाती समस्त भ्रान्ति है
इसलिए हम मौसम नहीं लड़े
हँसते खेलतें मौसम की मस्ती में
हो जाए खड़े
मौसम हमे भीतर से तर
बाहर से बेहतर बना देगा
मौसम का पावन अनुभव
आध्यात्मिक सुगंध की तरह सदा
हमारी आत्मा के संग रहेगा
Monday, November 2, 2015
आंसू की बूंदे
अश्रु ममता भाव भरा अश्रु करुणा जल
अश्रु से है प्यार हरा सम्वेदना कल छल
अश्रु से है प्यार हरा सम्वेदना कल छल
आँसू मीठी प्रीत रही आँसू विरह गीत
आँसू के ही साथ रही गिरधर तेरी प्रीत
आँसू के ही साथ रही गिरधर तेरी प्रीत
आसु निकले राज है आँसू के कई काज
आँखों मोती रूप रहा आँसू है सरताज
आँखों मोती रूप रहा आँसू है सरताज
राधा तेरी प्रीत से मोहन क्यों अनजान
आँसू भक्ति रीत रही आंसू रस की खान
आँसू भक्ति रीत रही आंसू रस की खान
आंसू जल की बूँद नहीं ,शब्दहीन है गीत
फुट फुट रोये श्याम है मित्रवत है रीत
फुट फुट रोये श्याम है मित्रवत है रीत
Friday, October 30, 2015
फिर भी करवा चौथ
मन व्यापे विश्वास नहीं फिर भी करवा चौथ
तृप्ति में भी प्यास रही कैसा है ये बोध
तृप्ति में भी प्यास रही कैसा है ये बोध
व्रत से शक्ति बनी रहे व्रत भक्ति का रूप
भक्त बसे परमात्मा भक्ति भाव स्वरूप
भक्त बसे परमात्मा भक्ति भाव स्वरूप
सूरज संध्या संग रहा चंदा संग है रात
सजना सजनी संग रहे मंजिल होगी साथ
सजना सजनी संग रहे मंजिल होगी साथ
यहाँ देखता दंग रहा अपनों का व्यवहार
नित बदले रूप रंग है जैसे सात प्रकार
नित बदले रूप रंग है जैसे सात प्रकार
Saturday, June 29, 2013
ह्रदय में पीड़ा रहती है
किनारा पास है
सांस हार मत पथिक
उजाला पास है
तू हार मत पथिक
तेरा विश्वास में
युगों का बल है बाकी
तू मत निराश हो
भले कठिनाई हो अधिक
सफ़र की है थकन तो क्या
तू आशा का मोती है
तू पथ पर कदम रख दे
बुलाती नवीन ज्योति है
चमक तारो सी है झील मिल
न जाने कब कैसे खोती है
सफलता क्यों नहीं मिलती
फिसलती जाती रेती है
तू नयनो में न भर आंसू
ह्रदय में पीड़ा रहती है
Wednesday, November 28, 2012
नदी
नदी गतिशील हो ,सागर
को नापती है
नदी
की हिम्मत से,सीमाये
काॅपती है
नदी
नदी नही,बहती
हुई
सदी है
नदी
की गति से ऊॅचाई पर्वत की हाॅफती
है
Tuesday, November 6, 2012
स्वदेशी को शोक
गांधी जी के नाम पर हुई वोटो की लूट
स्वदेशी से करे घृणा ,विदेशी को छूट
उपभोक्ता बाजार में विज्ञापन का रोग
परदेशी प्रसन्न हुए ,स्वदेशी को शोक
परदेशी तो पुष्ट हुए स्वदेशी कंगाल
ओद्यौगिक व्यवस्था का यही हुआ है हाल
वित्त व्यवस्था देश की हो गई है विकराल
बची खुची को लुट रहे ये परदेशी लाल
हिन्दुस्तानी माल है हिन्दुस्तानी श्रम
स्वदेशी की ओट में विदेशी उपक्रम
स्वदेशी से करे घृणा ,विदेशी को छूट
उपभोक्ता बाजार में विज्ञापन का रोग
परदेशी प्रसन्न हुए ,स्वदेशी को शोक
परदेशी तो पुष्ट हुए स्वदेशी कंगाल
ओद्यौगिक व्यवस्था का यही हुआ है हाल
वित्त व्यवस्था देश की हो गई है विकराल
बची खुची को लुट रहे ये परदेशी लाल
हिन्दुस्तानी माल है हिन्दुस्तानी श्रम
स्वदेशी की ओट में विदेशी उपक्रम
Wednesday, October 31, 2012
क्षणिकाये
(1)
वे भ्रष्टाचार उन्मूलन प्रकोष्ठ के है
पदाधिकारी
मिल जायेगी उनके पास
सभी भ्रष्टाचारियो की जानकारी
जिसे दबाने के लिए वे लेते है
रिश्वत भारी
मिल जायेगी उनके पास
सभी भ्रष्टाचारियो की जानकारी
जिसे दबाने के लिए वे लेते है
रिश्वत भारी
(2)
हाथ से निकले हुए
धन के सूत्र है
क्योकि
वे माता सरस्वती के पुत्र है
धन के सूत्र है
क्योकि
वे माता सरस्वती के पुत्र है
(3)
वे कौमी एकता के
हिमायती कहलाते है
और कौम के नाम पर
परस्पर विरोधी तस्करों को
एक ही मंच पर लाते है
हिमायती कहलाते है
और कौम के नाम पर
परस्पर विरोधी तस्करों को
एक ही मंच पर लाते है
Monday, October 29, 2012
पूनम से हे! देव मिले ,सरस सुधा रसपान
शरद
शीत प्रारम्भ है ,
हुई
सर्द हर रात
शरद पूर्णिमा मे करता है,नभ अमृत बरसात
शारदीय
नवरात गई,शक्ति
भक्ति के साथ
तापमान
गिरता गया,हिमवत
भए जजबात
क्षीर पीकर संतृप्त हुये,त्रप्त हुआ अब व्योम
त्रिशक्ति
जो साध सके,मिलते
उसको ओ३म्
चन्दा
मामा झाँक रहे ,झिल-मिल
चंचल नीर
मातु
हमे भव तार दे,मन
से हर ले पीर
देवो
से है स्वर्ग भरा,
धरा
मनुज का गाँव
शरद
चन्द्रमाँ बरस रहा ,हर्षित
है उर भाव
रहे
चन्द्र सा मेरा मन ,तन
मन हो घनश्याम
पूनम
से हे देव मिले ,सरस
सुधा रसपान
शरद पूनम की अति भायी
कोमल कोपल पर ठहरी बुँदे
निशा की उमस में इतराती है
उषा से ऊर्जा ले रूप पाती है
पाकर ठंडक वह हिम लाती है
दूब की हरीतिमा है उसकी माई
दूब के भीतर से ही वह बन पाई
खग ,भ्रमर भी अब खुशिया लाये
सर्दी के भीतर रह पल मुस्काये
शरद के संग संग अब मन गाये
चेतनता को पा हम बन पाये
सूरज से शीतलता सकुचाई
शीतलता भीतर तक अब आई
प्राणों ने दीप्ती है चमक पाई
शरद पूनम की अति भायी
हर पल के भीतर खुशबू छाई
निशा की उमस में इतराती है
उषा से ऊर्जा ले रूप पाती है
पाकर ठंडक वह हिम लाती है
दूब की हरीतिमा है उसकी माई
दूब के भीतर से ही वह बन पाई
खग ,भ्रमर भी अब खुशिया लाये
सर्दी के भीतर रह पल मुस्काये
शरद के संग संग अब मन गाये
चेतनता को पा हम बन पाये
सूरज से शीतलता सकुचाई
शीतलता भीतर तक अब आई
प्राणों ने दीप्ती है चमक पाई
शरद पूनम की अति भायी
हर पल के भीतर खुशबू छाई
Sunday, October 14, 2012
माँ
ह्रदय में ममत्व रहता , समत्व और सदभाव है
वात्सल्य में कोमल्य है ,वात्सल्य माँ की छाव है
माँ का आँचल है हिमाचल,कैलाश शिव का गाँव है
ममता का माँ है सरोवर ,ममता बिन बिखराव है
जिन्हें हम झूलो में झुलाते है और दूध पिलाते है
लाडले ऐसे निकले निठल्ले बुढापे में रुलाते है
रात भर गीले में सोई रो रो कर आँखे भिंगोई
पूत कपूत निकले माँ की लाठी कहा बन पाते है
वात्सल्य में कोमल्य है ,वात्सल्य माँ की छाव है
माँ का आँचल है हिमाचल,कैलाश शिव का गाँव है
ममता का माँ है सरोवर ,ममता बिन बिखराव है
जिन्हें हम झूलो में झुलाते है और दूध पिलाते है
लाडले ऐसे निकले निठल्ले बुढापे में रुलाते है
रात भर गीले में सोई रो रो कर आँखे भिंगोई
पूत कपूत निकले माँ की लाठी कहा बन पाते है
Tuesday, October 9, 2012
पूर्वज देवो नमो: नम:
श्रध्दा से ही श्राध्द हुआ ,श्रध्दा को पहचान
श्रध्दा है सत्कर्म परायण ,श्रध्दा से कल्याण
श्राध्द कर्म से पितृ कृपा ,पितृ कृपा वरदान
जो इस वर को पा न सका ,जीवन से अनजान
धूप,दीप और भोज चढ़े ,पितरो को तर्पण
पूर्वज देवो नमो: नम: ,तव चरणन कुछ अर्पण
श्रध्दा है सत्कर्म परायण ,श्रध्दा से कल्याण
श्राध्द कर्म से पितृ कृपा ,पितृ कृपा वरदान
जो इस वर को पा न सका ,जीवन से अनजान
धूप,दीप और भोज चढ़े ,पितरो को तर्पण
पूर्वज देवो नमो: नम: ,तव चरणन कुछ अर्पण
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