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Saturday, May 2, 2026

खेल के बहु आयामी प्रभाव


इलेक्ट्रॉनिक  संचार  एवं  कंप्युटर  युग  में  एक  ही  स्थान  पर  बैठकर  दृश्य  श्रव्य  माध्यम से  मनोरंजन  किया  जा सकता  है  l व्यायाम  के  माध्यम  से  तन  को  पुष्ट  और  बल  दिया  जा सकता  है l प्रात  एवं  सायंकाल  भ्रमण  कर  शरीर  को  सक्रिय  किया  जा सकता  है .परंतु  खेल  ही वह
माध्यम  है  जिससे  तन  को  स्वस्थ रखने  के  साथ  साथ  मन  को  भी  उल्लास  दिया  सकता  है 
       व्यक्ति  बच्चा  बूढ़ा  हो  या  जवान  शौक  हर  व्यक्ति  के  होते  है l शौक  मे  किये  जाने  वाले  कार्य में  थकान  अनुभव  नहीं  होती l व्यक्ति  का  व्यक्तित्व  यह  बताता  है  कि  उसका  कौन  से  खेल  से  जुडाव  है l जीवन  के  उसका  दृष्टिकोण  उसका  कैसा  है  l 
       खेल  से  व्यक्ति  के  व्यक्तित्व  का  निर्माण  होता  है  l खिलाड़ी  व्यक्ति  जीवन  की  चुनौतियों  को  सहज ही  स्वीकार  कर  लेता  है  l अपवादीत परिस्थितियों  को  छोड़ कर  खिलाड़ी  अवसाद  से  ग्रस्त  नहीं  होता l वह  व्यसन  विहीन  होता  है  l
         जो  लोग  यह  कहते  है  कि  शारीरिक   व्याधियों  के  कारण वे  कोई  खेल  गतिविधि  नहीं  कर  पाते  उन्हें  दिन  में  एक  बार  उस  खेल  के  मैदान  में  अवश्य  जाना चाहिए  जहां  प्रत्येक  आयु  वर्ग  व्यक्ति  भिन्न  भिन्न  प्रकार  की  खेल  गतिविधियों  में  संलग्न  हो l 
   एक  बीमार  व्यक्ति  भी  खेलते  हुए  बच्चों  देख कर  स्वस्थ  हो  सकता  है  l खेल  से  जुड़े  व्यक्ति  की  मानसिकता  योद्धा  के  समान  हो  जाती  है l वह  बार  बार  हारता  पर  हार  स्वीकार  नहीं  करता l  खेल  वह भावना है  जो  जीवन  के  प्रत्येक  क्षैत्र  उपयोगी  साबित  होती  है खेल  गीता  के  कर्मयोग  के  व्यवहारिक  प्रयोग  है   इसलिए  जहा हो  सके  किसी  खेल  से  जुड़े l 

Tuesday, April 14, 2026

भाव और भावनाए


भाव  और  भावनाए  व्यक्ति  की  आंतरिक  चेतना  है  |
किसी  व्यक्ति  के  भाव  और  भावनाओं  का  स्तर  कम  या  अधिक  हो  सकता  है,  परंतु  यह  सम्भव  नहीं  है  कोई  व्यक्ति  पूर्ण  रूपेण  भावना  विहीन  हो  |
       भावनाओं  को  किसी  व्यक्ति  के  व्यवहार  चेहरे  की  भाव  भंगिमा  से  जाना जा सकता  है | चालाक  और  धूर्त  लोग  की  भावनाए  न  तो  चेहरे  जानी  जा सकती  है  और  नहीं  शब्दों  से  उनके  भीतर  कुछ  और  चल  रहा  होता  है  बताया  जा  सकता  है कहा  कुछ  जाता  है किया  कुछ और    जाता  है  वे  अभिनय  कौशल  मे  पारंगत  होते  है | 
      सहज , सरल ,सच्चे  और  भोले  व्यक्तियों  को  अपनी  भावनाए  छुपाना  नहीं  आती  है | उनके  भावों  उनके  चेहरे  और  शब्दों  से  पकड़ा  जा सकता  है  | ऐसे  व्यक्तियों  के  जीवन  को  खुली  किताब  कहते  है | पारदर्शिता  होने  से  उनके  पास  छुपाने  के  लिए  कुछ  नहीं  होता  है  | इस  पारदर्शिता  उन्हें  नुकसान  भी  उठाना  पड़ता  है |
     कभी कभी व्यक्ति  हृदय  विदारक  घटनाओं  के  आघात कुछ  समय  के  लिये  भाव  शून्य  हो  जाता  है l उसे  संसारिक  संबंधों  से  विश्वास  उठ  जाता  है  | किसी  भी  विषय  में  रुचि  नहीं  रहती  | कुछ  समय  के  लिए  वैराग्य  की  भावना को  श्मशान  वैराग्य  कहा जाता  है |
     कुछ  लोग  थोड़ी  सी  खुशी  मिलने  अत्यधिक  प्रसन्न थोड़ा  सा  दुख  मिलने  पर  अत्यधिक  दुखी  ,थोड़ी  सी  परेशानी  मिलने  पर  अत्यधिक  विचलित  , थोड़ा  सा  धन  मिलने  पर  अत्यधिक  व्यय  करने  वाले  , थोड़ा  से  अभाव  में  दीनहीन  हो  जाते है  l ऐसे  भावुक  व्यक्तियों  से भरोसे  कोई  भी  बड़ा  लक्ष्य  न  परिवार  हासिल  कर सकता  है   और  न  कोई  संस्था  या  समाज  भरोसे  रह  सकता  है |
     भावनाओं  पर  नियंत्रण  रखना  हर  किसी  के  लिए  सम्भव  भी  नहीं  है | बड़ी  योजनाओं  के  क्रियान्वयन  के  लिए  भावनाओं  को  परे  रख  कर  स्थिर  चित्त  से  विचार  किया  जाना  आवश्यक होता  है  | भावनाओं  में  बह  कर  लिये  गये  निर्णय  व्यक्ति  परिवार  समाज और  देश  के  लिये  घातक  होते  है  |
    समुचित  और  संतुलित  भावनाये  व्यक्ति  को  सम्वेदनशील  बनाती  है  | भावनाए  समाज, राष्ट्र  ,संस्कृति,  साहित्य,  संगीत, कला ,नृत्य, खेल  ,पर्यावरण, से  जुड़ जाती  है  तो वे सार्थक  हो  जाती  है  | भावनाए  स्वयं से  जुड़  जाती  है  तो  व्यक्ति  स्वार्थी  हो  जाता  है  | भावनाओं  का  विस्तार  है  व्यक्तित्व  का  विस्तार  है 

Wednesday, March 25, 2026

आत्म सम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा

आत्मसम्मान  प्रत्येक व्यक्ति का होता है l व्यक्ति का जब आत्म सम्मान आहत होता है तो वह गहन निराशा से ग्रस्त हो जाता है  l व्यक्ति की सामाजिक या आर्थिक हैसियत से उस व्यक्ति के आत्मसम्मान के स्तर का अनुमान नहीं लगाया जा सकता l बल्कि यह भी संभव है कि किसी गरीब व्यक्ति का किसी धनाढ्य व्यक्ति से अधिक आत्म सम्मान हो l 
   परजीवी परावलंबी और नैतिक दृष्टि से पतित और भ्रष्ट व्यक्ति में आत्मसम्मान का अभाव होता है  l आत्मसम्मान से  परिपूर्ण व्यक्ति स्वालंबन का राही होता है l आत्मसम्मान से युक्त व्यक्ति अल्प साधनों में जीवनयापन करने वाला होकर  मितव्ययी होता है l  
   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित व्यक्ति आत्मसम्मान से परिपूर्ण हो यह आवश्यक नहीं l व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा बाह्य आवरण है l बाह्य आवरण छद्म भी हो सकता है l आत्म सम्मान का संबंध व्यक्ति के भीतर स्थित आत्म भावना से होता है l इसलिए ऐसा कहते है कि व्यक्ति दूसरों की नजर से गिर जाए पर खुद की नजर से नहीं गिरना चाहिए l 
      जब व्यक्ति खुद की नजर से गिर जाता है तो  वह आत्मविश्वास से विहीन हो जाता है l ऐसा व्यक्ति बाहर से स्वयं को कितना भी धार्मिक तथा आदर्शवादी बताता हो वह भीतर से कमजोर मानसिकता वाला होता है उसमें आत्मबल नहीं होता l विपरीत परिस्थितियों में वह भीतर से टूट जाता है l इसलिए यह देखने में आता है तथाकथित कई प्रतिष्ठित लोग आत्म हत्या कर लेते है l

Tuesday, March 10, 2026

नेत्रदान


मानव जीवन में दान आध्यात्मिक के महत्व के साथ सामाजिक महत्व भी है l दान की महिमा का हमारे ग्रंथों में महिमा बताई गई है
 ऋग्वेद के मण्डल 5, सूक्त 39, मंत्र 3 में कहा गया है 

यस्ते दद्वाॅँ इन्द्र यस्ते अस्ति दाता राधांसी शुभती।

अस्मभ्यं तत् त्वावतः स्तोतॄभ्यो रास्व सत्पते॥

दान के अनेक प्रकार होते है धन दान अन्न दान रक्त दान शिक्षा दान , अभय दान, जीवन दान  इत्यादि , परन्तु दान तभी सार्थक होता है जबकि वह सुपात्र व्यक्ति को दिया गया हो l जिज्ञासु व्यक्ति की दिया शिक्षा और ज्ञान का दान व्यक्ति के साथ समाज और राष्ट्र का भी हित करता है l दरिद्र और दुर्बल व्यक्ति को दिया गया धन का दान उसकी मूल भूत आवश्यकताओं की पूर्ति करता है l जबकि विद्वान शिक्षक और गुरु को दिया गया गया धन का दान समाज को ज्ञान की दृष्टि समर्थ बनाता है l कभी कभी कितना भी धन हो व्यक्ति के पास अन्न की उपलब्धता नहीं होती प्रकृति विचरते कई जीव पशु पक्षी आहार न मिलने के कारण प्राण त्याग देते है l ऐसे समय अन्न दान का महत्व अत्यधिक होता है l परंतु शारीरिक और मानसिक रूप से समर्थ होने के बावजूद जो लोग भीख मांगने हेतु घूमते रहते है , उनको दिया गया कोई भी दान हानिकारक होता है l ऐसा दान व्यक्तियों में परजीवी प्रकृति और आलस्य को बढ़ावा देने के साथ व्यसनों की वृद्धि का भी कारण होता है l 

    परिस्थितियों से सताये गए और हमारी शरण में आए व्यक्तिऔर  समाज को स्वीकार कर उनके  पुनर्वास कराना भी एक प्रकार का दान है l पराजित पक्ष को उनका राज्य लौटा देना  , कुछ शर्तों के साथ उन्हें जीवन दान देना , पुराना गौरव लौटा देना अभय दान  कहलाता है जो प्राचीन काल में हमारे देश के पराक्रमी राजाओं में किया है l 

 सबसे महत्वपूर्ण  है जीवन दान l  वर्तमान समय में सड़क  दुर्घटनाओं में घायलों की संख्या को देखते हुए  तथा रक्त की अल्पता के कारण प्रसूता स्त्रियों की मृत्यु देखते हुए रक्त दान को जीवन दान कहा जाता है लेकिन हमारे समाज में ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी कम नहीं है जो या तो जन्मे नेत्रहीन है या बाद में किन्हीं कारणों से नैत्र ज्योति खो चुके है l ऐसे व्यक्तियों के लिए इस दुनिया का सौंदर्य व्यर्थ है l वे जीवन में अंधकार होने से दृश्य अनुभूतियों से वंचित रह जाते है l  जीवन के सामान्य काम काज करने में भी कठिनाई महसूस करते है बिना किसी व्यक्ति के सहयोग के न तो घर से निकल पाते है और नहीं वांछित स्थान पर जा सकते है l   अर्थ के इस युग में वे जीवनयापन हेतु योग्य होने के बावजूद आजीविका भी अर्जित नहीं कर पाते है नेत्र दान ऐसे व्यक्तियों को जीवन में प्रकाश उपलब्ध कराता है , आर्थिक स्वालंबन प्रदान करता है   जीवन के आनन्द की अनुभूतियां प्रदान करता है l 

 इस संसार में बहुत से ऐसे लोग है l जो जीवन की आयु पूर्ण कर चुके है  और उनके नेत्र स्वस्थ है  l ऐसे भी लोग है जो अकाल मृत्य को प्राप्त कर चुके परंतु नेत्र स्वाभाविक अवस्था में है ऐसे लोगों में कुछ नेत्र दान कर देते है तो नेत्र हीन व्यक्तियों के जीवन में नई उम्मीद किरण जाग सकती है और वे अपना स्वाभाविक जीवन जी सकते है l ऐसे नेत्र दानी आत्माओं को परमपिता परमात्मा का प्रकाश लोक प्राप्त होता है क्योंकि उन्हें किसी व्यक्ति का जीवन प्रकाशित किया है वास्तव में ऐसे व्यक्ति प्रकाश होते है l 

Saturday, January 10, 2026

समीक्षा- भारतीय कला के बहुआयाम


अद्विविक पब्लिकेशन से प्रकाशित पुस्तक भारतीय कला के बहु आयाम कला वैदिक काल से लगाकर जैन एवं बौद्ध युग के दौरान शिल्प सृजन भित्ति चित्रों लघु चित्रों और उनके पीछे छुपे जीवन और अध्यात्म दर्शन को स्पष्ट करती है l प्राचीन वैदिक ग्रंथों में कलाओं के बारे में संदर्भ देती है l भाषा की सहजता सरलता इस पुस्तक के अध्यायों की विशेषता है l 
       संगीत को छोड़ कर यह पुस्तक कला के विविध आयाम पर प्रकाश डालती है इस पुस्तक को पढ़ते पढ़ते निरंतर नवीनता का अहसास होता है ऊर्जा और उत्साह मिलता है 
      कला मर्मज्ञ आनंद कुमार स्वामी के कृतित्व एवं व्यक्तित्व पर आधारित एक अध्याय हमें यह बताता है कि किस प्रकार एक भू गर्भ शास्त्री कलात्मक रुचि के कारण देशों और संस्कृतियों की सीमाओं से परे जाकर  सागर जैसा विस्तीर्ण शोध कार्य करता है  l
        महान चित्रकार राजा रवि वर्मा के बारे में इस पुस्तक में समिल्लित आलेख उपनिवेश कालीन स्थितियों में  अभावों के बीच पनपती प्रतिभा का विस्तार से परिचय कराता है l सचमुच में इस पुस्तक को पढ़ने से पहले राजा रवि वर्मा और उनके भारतीय चित्रकला के प्रति योगदान के प्रति और उनकी आध्यात्मिक रुझान को जाना ही नहीं था l
   इस पुस्तक में पुरातत्वविद डॉ वाकणकर के पुरातात्विक शोध और उनके व्यक्तित्व को उल्लेखित किया है साथ ही काला के प्रति  गांधीवादी बोध को रेखांकित किया है l
     निश्चय ही यह पुस्तक कला ए बहुआयामी पक्ष की सूक्ष्मताओं को विभिन्न भारतीय रियासतों में बिखरी शैलियों से परिचित कराती है l