Total Pageviews

Saturday, July 7, 2012

बुद्धिमान

बुद्धिमान व्यक्ति एवम चालाक व्यक्ति मे अंतर होता है
बुद्धिंमान व्यक्ति साहित्यिक होता है
अर्थात वह सभी का हित चाहता है तथा वह समस्त कार्य सर्व जन हिताय की भावना से करता है
बुद्धि की देवी माँ शारदा को कहा गया है  
इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति दैविक गुणों से भरपूर होता है 
जबकि चालाक व्यक्ति मात्र अपना स्वार्थ देखता है
ऐसा व्यक्ति कपटी भी कहलाता है 
बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक समस्या के समाधान करने के लिए तत्पर रहता है
जबकि चालाक ,कपटी व्यक्ति किसी भी समस्या का जनक होता है 
बुद्धि मान व्यक्ति पर दैवीय आशीर्वादों की वर्षा होती रहती है 
क्योकि वह श्रेष्ठ उद्देश्यों के लिए समर्पित रहता है
प्रत्येक युग में हर प्रकार की देश काल परिस्थितियों में 
दो प्रकार की विचार धाराये समाज में व्याप्त रहती है
सकारात्मक एवम नकारात्मक  
बुद्धिमान व्यक्ति रचनात्मक विचारधारा को प्रतिनिधि होता है
जबकि चालाक ,कपटी व्यक्ति विध्वंस  एवं नकारात्मक विचार धारा का प्रतिनिधि होता है
ऐसे व्यक्ति के मन में निरंतर ईर्ष्या ,द्वेष के कारण षडयंत्र के विचार पनपते रहते है
बुद्धिमान व्यक्ति की क्या पहचान है
अल्प समय मे बुद्धिमत्ता के परिचय की कसौटी क्या हो सकती है
बुद्धिमान व्यक्ति का सहज आकर्षण एवम अभिरुचि साहित्य ,कला,संगीत ,ज्ञान,विज्ञान के प्रति होती है
जिस व्यक्ति की अभिरुचि जीवन के उपरोक्त आयामों मे नही होती
वह भले ही जीवन मे सफलता के कितने दावे कर ले
भीतर से वह मानवीय गुणो से सम्पन्न नही हो सकता
इतिहास साक्षी है जितने भी महान व्यक्ति हुये है
वे किसी न किसी रूप मे कला संगीत ज्ञान विज्ञान ,साहित्य से जुडे हुये रहे है
महान शासक विक्रमादित्य, सम्राटअशोक ,सम्राट चन्द्रगुप्त ,बादशाह अकबर इसके उदाहरण थे
जिन्होने सदा विद्वानो,कलाकारो,संगीतज्ञो ,का आदर किया
उनकी सभा मे विशेष स्थान दिया था
पुराणिक कथाओं में भी भगवान विष्णु के जितने अवतार थे 
सभी सद बुध्दी के प्रतिनिधि थे
जबकि राक्षस गण उनके प्रतिकूल विचारों के प्रतिनिधि थे
शिव जी के अंश पवन पुत्र की बुध्दी स्वरूप माना गया है
महाभारत में जहा भगवान श्रीकृष्ण बुध्दि एवं 
श्रेष्ठ विचारों के प्रतिनिधि थे
वही उनके विरोधी कंस ,शकुनी ,षड्यंत्रकारी ,कपटी ,चालाक थे 



Wednesday, July 4, 2012

जय भारत ! जय महा भारत !

महाभारत कथा के बारे मे यह भ्रान्ति है कि
इसकी पुस्तक जिस घर मे रखी जाती है उसका वातावरण
कलह पूर्ण हो जाता है
महाभारत ग्रन्थ के बारे मे यह भी कहा जाता है कि
यह युद्ध का ग्रन्थ है
पारिवारिक विवादो की दास्तान है
उक्त विषयो पर पुन द्रष्टिपात की आवश्यकता है
वास्तव मे महाभारत कथा परिवार के विखंडन के स्थान पर 
परिवार व्यवस्थापन सिखाता है
महाभारत मे दो भाईयो अर्थात पाण्डु एवम
 ध्रतराष्ट् के पुत्रो के बीच सत्ता संघर्ष की कथा को
सत्य और असत्य के बीच युद्ध के रूप मे उल्लेखित करता है
इसके अतिरिक्त पाण्डव पक्ष हो या कौरव पक्ष दोनो पक्ष मे 
उनके मध्य पारिवारिक एकता अन्यत्र दुर्लभ है
कौरव दल मे सौ भ्राता थे वे आपस मे कभी नही लडे 
उन्होने दुर्योधन को अपना प्रतिनिधि तथा परिवार का कर्ता-धर्ता
नियुक्त कर दिया था परिवार से सारे निर्णय दुर्योधन ही लेता था
चाहे उसके से कौरव दल ने कितनी ही क्षति उठाई हो 
पर सभी कौरव भ्राता अंत तक एक साथ रहे
दूसरा पक्ष पाण्डवो का था अक्सर यह देखने मे आता है 
किपरिवार मे एक से अधिक भाईयो कि अपनी अपनी पत्निया होती है
फिर भी औरतो के कारण उनमे परस्पर विवाद होते है
पाण्डव भ्राता जो संख्या मे पाच थे
के बारे मे मान्यता है की उन सभी कि एक पत्नि द्रोपदि थी
फिर क्यो उनके बीच विवाद नही हुये
इसमे अवश्य द्रोपदि की महानता द्रष्टिगत होती है
जिन्होने पाचो भाईयो को एक सूत्र मे पिरो कर रखा
द्रोपदि उस महिला का प्रतीक है
जो परिवार मे किसी भी कीमत पर एकता बनाये रखे
महाभारत मे छुपे इस तथ्य को किसी ने नही समझा
पाण्डव भ्राता ने अपने परिवार के निर्णयो हेतु वरिष्ठ भ्राता
युधिष्ठर को अधिकृत  कर रखा था
भीम और अर्जुन कितने ही बलशाली थे
उन्होने युधिष्ठर के निर्णयो सदा शिरोधार्य किया
इसलिये महाभारत विवादो ग्रन्थ न होकर
पारिवारिक एकता का ग्रन्थ है
तथा सत्य और असत्य के बीच संग्राम की महा कथा है
सत्य और असत्य मे सदा संघर्ष चला है ,चलता रहेगा
जय भारत ! जय महा भारत !

Saturday, June 30, 2012

वेश ,परिवेश ,विसंगति

मात्र बाह्य आकार , प्रकार ,वेश या परिवेश 
किसी व्यक्ति या स्थान की वास्तविक पहचान नही करवा सकते है
वास्तविक पहचान किसी भी व्यक्ति या स्थान की
संस्कार,कर्म,एवम स्थान से जुडे
 गुण धर्म से होती है
जैसे भवन की मंदिर जैसी आकृति 
किसी भवन को मंदिर नही बनाती
जब तक कि उसमे स्थापित देव प्रतिमा न हो
और उस देव प्रतिमा के प्रति लोगो की आस्था न हो
विद्यालय मे जब तक विद्या अध्ययन न हो 
विद्यालय का भवन कितना ही विशाल हो 
सही रुप मे विद्यालय नही हो सकता
जिस प्रकार ज्ञानी का ज्ञान 
आचरण के बिना निरर्थक होता है
ज्ञानी ज्ञान को आचरण मे उतारता है
 तभी वह आचार्य कहलाता है
भगवा वस्त्र धारण करने से कोई व्यक्ति 
संन्यासी नही हो जाता
संन्यासी वह व्यक्ति भी हो सकता है 
जो भगवे वस्र नही पहनता हो
पर वह विरक्ति के भाव मे स्थिर हो गया है
गुरु वह जो स्वयम मे गुरुता का आवरण न ओढ़े अपितु
शिष्य मे स्थित लघुता को गुरूता प्रदान करे
वह गुरु जो शिष्य मे छुपी हुई क्षमता को बाहर निकाल न सके
उसके भीतर निहित सकारात्मक उर्जा को
 दिशा न दे सके
वह गुरु चाहे कितने भी शिष्य बना ले 
वह गुरू स्वयम की पूजा भले ही करवा ले
परन्तु किसी शिष्य को किसी भी प्रकार की पूर्णता प्रदान नही कर सकता
कर्म चारी कर्म न करे तो मात्र कार्यालय मे उपस्थित हो जाने से वह कर्मचारी नही हो जाता
जिस कार्यालय मे कार्य न हो
वह चाहे भौतिक रुप से कितना ही विशाल हो कार्यालय नही हो सकता
हा!वह अकर्मण्य लोगो का संग्रहालय हो सकता है
पुस्तको के संग्रह होना ही 
किसी पुस्तकालय के लिये पर्याप्त नही है
संग्रहित पुस्तके सार्थक विषयो पर होनी चाहिये
ऐसे पुस्तकालय के प्रति पाठको का सहज आकर्षण भी होना चाहिये
आश्रम  मे भौतिक सुविधा के सारे साधन उपलब्ध हो
तथा श्रम पर आधारित आश्रम वासीयो का जीवन न हो तो ऐसे  होटल नुमा आश्रम 
भले नामो के आधार पर आश्रम कहे जाते हो
पर वे अपनी सार्थकता खो चुके है
इस प्रकार प्रत्येक क्षैत्र मे स्थान या व्यक्ति की सार्थकता उसके कर्म तथा आचरण से होती है
केवल उसका बाह्य स्वरुप अच्छा दिखना 
पर्याप्त नही है
व्यक्ति का बाहरी स्वरूप या स्थान का बाहरी आवरण वातावरण को अनुकूल करने
तथा श्रेष्ठ कार्य शैली विकसित करने के लिये होता है
गणवेश जिस प्रकार से विद्यार्थियो 
एवम सुरक्षा बलो मे अनुशासन निर्मित करने के उद्देश्य से निर्धारित किये जाते है
जबकी वास्तविक अनुशासन की भावना तो 
भीतर से विकसित करनी होती है
नदि वह है जिसमे निरंतर निर्मल जल बहता हो
जिस नदि मे मात्र बारिश मे पानी बहता हो वह नाला तो हो सकती है नदि नही हो सकती
वर्तमान मे हम जिस परिवेश मे रह रहे है जिस जीवन शैली मे जी रहे है
वह नदि को नाला बनाने वाला है
हमे अपनी जीवन शैली को सुधारना होगा
अपना अस्तित्व खो चुकी नदिया जो नालो का रुप धारण कर चुकी है
मे पुनः निर्मल जल प्रवाहित हो ऐसी वातावरण निर्मित करना होगा
 
 

Monday, June 25, 2012

कर्म की आराधना

भगवान् विष्णु के जितने भी अवतार हुए है 
सभी कर्म के अवतार है
भौतिक जगत में कर्म तीन प्रकार की क्षमता से किये जाते है 

प्रथम ज्ञान द्वितीय धन तृतीय बल  
तीनो क्षमताये कर्म के बिना जड़ अवस्था में रहती है ज्ञान का प्रसार न किया जाय तो 
ज्ञान मात्र पुस्तकों एवं ग्रंथो में ही सजा हुआ रहता है ज्ञान का सक्रिय स्वरूप गुरु, शिक्षक,विद्यालय ,महाविद्यालय ,विश्वविद्यालय ,प्रयोगशालाए ,चिकित्सालय ,अनुसंधान केंद्र होते है 
इसलिए ज्ञान के देव ब्रह्मा जी अपने ज्ञान को चारो दिशाओं में चार मुखो के द्वारा विस्तारित करते है
द्वितीय क्षमता 
धन, धन की क्षमता चाहे कितना भी अधिक हो यदि वह सक्रिय अवस्था में न हो 
तो एक स्थान पर पड़ा रहता है 
ऐसा धन गड़ा हुआ धन या अवैध स्त्रोतों से अर्जित कर गुप्त रूप से रखा गया  धन होता है 
ऐसा धन काले धन की श्रेणी का  भी हो सकता है ऐसा धन जड़ अवस्था वाला धन होता है 
धन का कर्म  एवं सक्रिय स्वरूप  उद्योग ,कृषि ,व्यापार ,इत्यादि होता है 
जिसमे धन निरंतर प्रवाहमान होता है 
 इसलिए धन की देवी लक्ष्मी की अष्ट रूपों  रूपो में पूजा की जाती है 
जिस किसी रूप में पूजा की जाती है 
उसी रूप में फल देती है 
तृतीय क्षमता बल होती है
 बलवान पहलवान व्यक्ति यदि वीर ,साहसी ,दिन दुर्बल की मदद न करे तो 
उसका बल जड़ अवस्था वाला होता है 
 सक्रिय बल कर्म रूप होकर सदा अन्याय का प्रतिकार हेतु तत्पर रहता है 
तीनो प्रकार की क्षमताओं के सक्रिय रूप में ईश्वरीय तत्व समाहित होता है
 तीनो क्षमताओं के सक्रिय एवं कर्म रूप की चैतन्यता प्राप्ति हेतु 
हम ईश की साधना एवं देव दर्शन करते है 
जिससे हमारी क्षमताओं में चेतना उत्पन्न होती है और हम अपनी क्षमताओं का पूरा उपयोग कर पाते है यदि हम अपनी क्षमताओं में पूर्ण कार्य कुशलता चाहे तो हमें ओजस्विता के देव भगवान् सूर्य की भी आराधना करनी चाहिए
 क्योकि ओजस्विता से किये कर्म से ही उत्कृष्ट परिणाम प्राप्त हो सकते है
पवन पुत्र हनुमान भगवान् शिव का  कर्म रूप है
 पवन पुत्र उसी प्रकार से सक्रिय रहते थे
  जिस प्रकार से पवन निरंतर गतिमान रहती है उन्होंने अपने कर्म में पूर्ण कार्य कुशलता विकसित करने हेतु भगवान् सूर्य से ओज प्राप्त किया था

Saturday, June 23, 2012

कर्म क्षेत्र अर्जुन श्रीकृष्ण एवम गायत्री मन्त्र

 कुरुक्षेत्र में भगवान् कृष्ण अर्जुन के सारथी थे 
अर्जुन के रथ की ध्वजा को हनुमान जी थामे हुए थे ऐसा चित्र हम देखते आये है
 वर्तमान में हम भगवान् कृष्ण को खोजते है 
की वे कहा पर है
 इस विषय के सम्बन्ध में यह उल्लेख किया जाना आवश्यक है
 पहले जो कुरुक्षेत्र था 
वह आज कर्म क्षेत्र बन चुका है 
यदि  हमने हमारे मन  को हमने  ईश साधना के माध्यम से परमात्मा से जोड़ लिया तो हमारी आत्मा एवम मन अर्जुन की भाँती परिष्कृत  सुसंस्कृत हो जाएगा 
ऐसी स्थिति में जीवन का कार्य क्षेत्र 
जो कुरुक्षेत्र की तरह है 
उसमे आने वाली कौरव रूपी  दुष्प्रवत्तियो से हम सदबुद्धी रूपी श्रीकृष्ण रूपी सारथी की सहायता  से परास्त कर सकते है 
 क्योकि  जिस प्रकार श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को समय समय पर गलत निर्णय लेने से बार बार रोका था और जीवन को सही दिशा प्रदान की थी  
उसी प्रकार हमारी देह में स्थित सदबुध्दी जीवन में आने वाली कठिन परिस्थितियों में मन में आ रही किंकर्तव्य -विमूढ़ता को समाप्त कर 
सही दिशा एवम सही गति प्रदान करती है 
इस प्रकार हम जीवन के कर्म क्षेत्र में विजय प्राप्त कर सकते है अब प्रश्न यह उठता है की हम अपनी देह में स्थित सदबुद्धी रूपी भगवान् कृष्ण को 
कैसे चैतन्य रखे 
इसका मार्ग महर्षि विश्वामित्र द्वारा रचित महामंत्र गायत्री मन्त्र में निहित है
यह मन्त्र दुसरे मंत्रो की भाँती 
सांसारिक समस्याओं को समाप्त करने के स्थान पर आत्मा एवम मन का उत्थान करता है
 इस मन्त्र के माध्यम से हमने ईश्वर जो प्राण दाता दुःख हरता सुख देने वाला है 
जो शुध्द स्वरूप है 
सर्व जगत का उत्पत्ति कर्ता है से अपनी बुध्दी को अच्छे गुण कर्म स्वभाव प्रेरित किये जाने की प्रार्थना की है  

Monday, June 11, 2012

वट का वृक्ष


वट का वृक्ष भारतीय संस्कृति में पूज्य है 
क्योकि वट वृक्ष दीर्घायु होता है 
वट के वृक्ष की विशेषता होती है
कि अधिक विस्तार पाने पर 
उसकी डालिया भी जड़ का रूप धारण कर लेती है इस कारण यह वृक्ष कितना ही विराट हो जाए
अपने आकार और भार के कारण नीचे नहीं गिरता है और निरंतर विस्तार पाता जाता है 
इसकी विशालता को देखते हुए कई वन्य प्राणी और पशु पक्षी इसका आश्रय पाते है
 सृष्टि में अत्यधिक पुराने वट वृक्ष भी 
देखे जा सकते है
वट वृक्ष के सामान ही हमारे परिवारों में बुजुर्ग होते है जिनका आश्रय मात्र जीवन की समस्याओं से जूझने का साहस देता है 
परिवार के मुखिया की स्थिति भी 
वट वृक्ष जैसी होती है 
वट वृक्ष जैसी ह्रदय की विशालता होने पर परिवार का मुखिया पूज्य हो जाता है 
अन्यथा परिवार के मुखिया की संकीर्ण मनोवृत्ति उसे आदर के स्थान पर 
अनादर का पात्र बना देती है 
परिवार के बुजुर्गो में यदि वट वृक्ष की उदारता 
और ह्रदय की विशालता हो तो 
परिवार ही नहीं सम्पूर्ण समाज के लोग 
उसके निकट आकर जीवन की आश्वस्ति स्नेह एवं आशीर्वाद प्राप्त करते है 
परिवार के सभी सदस्य यदि वट वृक्ष के सामान बुजुर्गो का आदर सम्मान करे तो 
सम्पूर्ण परिवार को ईश्वरीय आशीर्वाद 
प्राप्त होगा 
ऐसी स्थिति में परिवार के बुजुर्ग 
अपने अनुभव एवं प्रभाव का लाभपरिवार के दूरस्थ सदस्यों उसी प्रकार देगे 
जिस प्रकार से वट वृक्ष अपनी दूरस्थ शाखाओं को दूरस्थ जड़ो के माध्यम से देता है

Saturday, June 9, 2012

शनि देव एवं उनका न्याय विधान

शनि देव का वर्ण काला होता है जबकि वे प्रकाश के अधिपति सूर्य के पुत्र है
शनि देव की साढे साती या ढैया क्यो लगती है
उपरोक्त बिन्दुओ पर विचार किया जाना आवश्यक है
सामान्य तौर पर हम देखते है कि
अपराध अधिकांशत अंधेरे मे घटित होते है
अपराधिक प्रव्रत्तिया अंधेरे का लाभ उठाती है
वैज्ञानिक तथ्यो से यह प्रमाणित हो चुका है कि
ब्रह्मांड मे भीतर मौजुद द्रव्य मे ९०प्रतिशत डार्क मेटर विध्यमान है
इसलिये प्रकाश के अधिपति सूर्य देव ने उनके पुत्र शनि देव को
न्याय की स्थापना हेतु नियुक्त किया है
सूर्य देव से शनि देव चाहे कितने ही दूर हो
वे अन्याय के अंधकार मे न्याय का दीप जलाये बैठे है
साढे साती और ढैया आखिर क्या है
साढे साती और ढैया शनि देव के द्वारा निर्धारित किये गये दंड के अनुपात है
क्योकि अनुपातहीन दंड देना भी अन्याय के समान होता है
किसी भी अपराध की गंभीरता अपराधी के आशय से आंकी जा सकती है
समान अपराध होने के बावजुद उनकी गंभिरता और व्याप्ति भिन्न -भिन्न हो सकती है
अपराध मे आशय निहीत हो तो दंड अधिक होता है
अपराध मे उपेक्षा या प्रकोपन का भाव हो तो दंड की मात्रा कम होती है
अपराधी मानव रचित न्याय प्रक्रिया से भले ही बच जाये
किन्तु ईश्वरीय विधान अधीन नियुक्त शनि देव की वक्र द्रष्टि से
कोई भी व्यक्ति नही बच सकता
ऐसे व्यक्ति को परिस्थितियो का दंश झेलना पडता है