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Monday, December 10, 2012

अास्तिकता मे निज अस्तित्व का बोध


विश्व कितने ही धर्म हो दर्शन हो सिध्दान्त हो
सम्पूर्ण विश्व मे दो प्रकार के व्यक्ति विद्यमान है
पहले वे जो ईश्वर के प्रति अास्था रखते है
ऐसे लोगो को अास्तिक के रुप मे सम्बोधित किया जाता है
दूसरे वे लोग होते है जो ईश्वरीय सत्ता को नकारते है
ऐसे लोग नास्तिक कहलाते है
प्रश्न यह है कि दोनो प्रकार के व्यक्तियो के व्यवहारिक जीवन मे 
 भेद कहा होता है
अास्तिक रहने क्या लाभ है ?
नास्तिक व्यक्ति को किस प्रकार की हानिया होती है या उन्हें लाभ भी होते है
नास्तिक व्यक्ति या तो इसलिये होता है
कि उसे अतीत मे ईश्वरीय अास्था की भारी कीमत चुकानी पडी होगी
या उसे स्वयम की क्षमता पर जरूरत से अधिक विश्वास होता है
या उसे यह ज्ञात होता है कि अास्तिक बने रहने मे 
अत्यधिक कठिनाईया है
रीति -नीती परम्पराअो संस्कारो का पालन करना उसकी विवशता रहेगी
ईश्वरीय भय से निरन्तर उसे ग्रस्त रहना होगा
ऐसे मे वह सुविधा भोगी जिन्दगी जी नही पायेगा
परन्तु ऐसे मे नास्तिक व्यक्ति यह भुल जाता है
कि प्रत्येक व्यक्ति की सीमीत क्षमता होती है
व्यक्ति कितना ही परिश्रम कर ले असफलता की सम्भावना बनी रहती है
असफल होने के कारण नास्तिक व्यक्ति निराशा के अन्धकार से घिर जाता है
परिणाम स्वरूप वह तरह -तरह के व्यसनो मे लिप्त हो जाता है
अन्तत ऐसा व्यक्ति अात्म हत्या की अोर अग्रसर हो जाता है
नास्तिक व्यक्ति को ईश्वरीय सत्ता का भय न होने से
तरह-तरह के अधम कर्मो मे लिप्त रहता है
अन्तत वह अपराध जगत मे प्रवेश कर क्रूर अपराधो की अोर प्रव्रत्त होता है
अास्तिक होने के कई लाभ है
प्रथम लाभ यह है कि व्यक्ति निरन्तर निश्चिंत रहता है
सतत उसे स्वयम पर ईश्वरीय अाशीष की अनुभूति प्रतीत होती रहती है
कठिन परिश्रम करने पर उसे सफलता मिल जाती है
तो वह उसे ईश्वर का अाशीर्वाद समझ कर
सफलता को प्रसाद के रूप ग्रहण कर परम सन्तुष्टि 
परमानन्द का अनुभव करता है
अास्तिक व्यक्ति को असफलता प्राप्त होने पर वह निराश नही होता
उसे ईश्वर की इच्छा मान कर नये सिरे से 
लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रयत्न रत हो जाता है
समय अाने पर ऐसा व्यक्ति वांछित लक्ष्य तो प्राप्त करता ही है
साथ ही उसे ईश्वरीय अाशीर्वाद के रूप मे 
पूरक परिणाम भी प्राप्त हो जाते है
जिनसे उसके लक्ष्य का मूल्य कई गुना हो जाता है
अास्तिक व्यक्ति निराश होने पर कभी भी अात्म हत्या नही करता है
अास्तिक व्यक्ति व्यसनो का अादि नही होता
एेसे व्यक्ति जो अास्तिक रहते हुये व्यसनो के अादि होते है
उनमे व्यसनो से मुक्त होने की पर्याप्त सम्भावना बनी रहती है
अास्तिक होने का दूसरा लाभ यह है
ऐसा व्यक्ति के साथ ईश्वरीय सत्ता की
निरन्तर उपस्थिति उसे अधम कर्म करने से रोकती है
पाप पुण्य स्वर्ग -नरक की अवधारणाये
उसे अपराध की अोर प्रव्रत्त नही होने देती
जिससे व्यक्ति महानता को प्राप्त करता है
इसलिये हे नास्तिक तुम अास्तिक बनो
अास्तिक बन कर अच्छे नागरिक बनो



Saturday, December 8, 2012

वयम पंचाधिक शतकम

 

निकट सम्बन्धो मे सौहार्दता विकास का प्रमुख अाधार है
व्यक्ति समाज या देश हो या चहुमुखी विकास तभी सम्भव है
जबकि हम अपने निकटवर्ती सम्बन्धो मे जटिलताये ,समस्याये ,उत्पन्न न होने दे
जब हम देश की बात करते है तो विकास की दौड मे वे देश अत्यन्त पिछडे हुये है
जिनके निकटस्थ देशो से सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध नही है
परिवारो की बात करे तो परिवार विखण्डित हो रहे है
देश भिन्न धर्मो ,क्षैत्रो मे,धर्म अौर क्षैत्र जातीयो प्रजातियो मे
समाज समूहो मे विभाजित हो रहे है
कही भी कोई सहमति के बिन्दु तलाशे नही जा रहे है
असहमतियो ,अाशंकाअो , ने हमारे चिन्तन को जकड लिया है
सकारात्मक सोच से हम समाधान प्राप्त करने मे रूचि नही रख
अपनीरचनात्मकता को दिशा नही दे पाये है
ऐसे परिवार जिनमे परस्पर विवाद नही है
वे प्रगति की दौड मे बहुत अागे हो चुके है
जिन देशो के अपने निकटवर्ती देशो से सीमाअो के विवाद है
नदीयो के जल के बॅटवारो के बारे मे कोई सहमति नही है
वे प्रगति की पायदान मे बहुत नीचे है
विकसित देश अमेरिका ,इग्लैंड,फ्रांस ,रूस इत्यादी
शक्तिशाली देशो के अपने पडोसी देशो से
सीमाअो के सम्बन्ध मे या तो कोई विवाद नही है
यदि विवाद होंगे तो भी उनकी तीव्रता सीमा से अधिक नही है
अाज हमारे देश के सीमा विवाद इतने अधिक है
कि देश की अर्थव्यवस्था का अधिकतम बजट
सुरक्षा पर खर्च हो जाता है
पारिवारिक द्रष्टि से भी ऐसा परिवार
जिसमे परस्पर निकट सम्बन्धो मे विवाद हो
उत्थान नही कर पाता है
सामजिक वैमनस्यता का भाव
किसी समाज को विकास को दुष्प्रभावित करता है
परिवार के वरिष्ठ सदस्य से हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि
वह बडप्पन दिखाये
ह्रदय का छोटापन वह छोटे सदस्यो के लिये छोड दे
महाभारत मे द्रष्टान्त अाता है कि
जब दुर्योधन को गन्धर्व राज बन्दी बना कर ले जाने
लगे तो पान्डवो ने प्रतिरोध किया था
उन्होने दुर्योधन का साथ दिया था
तर्क यह दिया था परिवारिक विवाद अपने स्थान पर है
जब कोई बाहरी व्यक्ति अाघात करेगा तो हम एक है
अर्थात वयम पंचाधिक शतकम


Saturday, December 1, 2012

त्रिशंकु


त्रिशंकु शब्द अस्थिरता के अनिश्चय के लिये
उपयोग मे लाया जाता है
प्रश्न यह है कि त्रिशंकु कौन थे
वे अस्थिरता अनिश्चय के पर्याय क्यो बन गये
त्रिशंकु नामक प्राचीन काल मे महान तथा प्रतापी राजा थे
जो भगवान श्रीराम के पूर्वज थे
दो महान महर्षियो की प्रतिस्पर्धा
तथा स्वयम के सशरीर स्वर्ग जाने के हठ के कारण
उनकी यह स्थिति हुई
महाराजा त्रिशंकु यह चाहते थे कि वे सशरीर स्वर्गारोहण करे
उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिये वे तत्कालिन महर्षी वशिष्ठ के पास पहुॅचे
जो ब्रह्म विद्याअो के ग्याता थे
महर्षी वशिष्ठ द्वारा उन्हे नियति के विधान से बॅधे होने का कारण बता कर
उनकी इच्छा पूरी करने से इन्कार कर दिया
उस समय अपने पुरूषार्थ के बल राजा से
ब्रहम रिषियो मे शामिल हुये महर्षि विश्वामित्र
का तप अौर कीर्ति चरम पर थी
महर्षि विश्वामित्र के द्वारा महाराजा त्रिशंकु को
उनकी इच्छा पुर्ति का अश्वासन दिया गया
तथा इस हेतु उनके द्वारा अनुष्ठान प्रारम्भ किया गया
नियति के विधान के विपरीत किसी
व्यक्ति को स्वर्ग पहुॅचाने का यह पहला प्रयास था
इसलिये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे खल-बली मच गई
स्वर्ग के अधिपति देवराज इन्द्र अत्यन्त विचलित हो गये
उन्होने महर्षि विश्वामित्र के अनुष्ठान का विरोध किया
महर्षि विश्वामित्र अत्यन्त संकल्पवान तपस्वी थे
उन्होने देवराज इन्द्र को चेतावनी दी कि
यदि उन्होने महाराजा त्रिशंकु को अपने स्वर्ग लोक मे
सशरीर अाने की अनुमति नही दी तो
वे नये स्वर्ग की रचना कर महाराजा त्रिशंकु की इच्छा पूर्ण करेंगे
सफलता पूर्वक अनुष्ठान पूर्ण होने पर
जब सशरीर महाराजा त्रिशंकु को महर्षि विश्वामित्र ने
उर्ध्व दिशा मे भेजना प्रारम्भ किया तो
देवराज इन्द्र ने उन्हे स्वर्ग मे सशरीर प्रवेश करने से रोक दिया
ऐसी स्थिति मे त्रिशंकु भूलोक अौर स्वर्ग लोक के मध्य अधर मे
अन्तरिक्ष मे ही स्थिर हो गये
न तो वे स्वर्ग का सुख भौतिक शरीर के साथ उठा पाये
अौर नही भू-लोक मे अपनी सम्पूर्ण अायु पूर्ण कर
दिग दिगन्त मे अपनी कीर्ति को फैला पाये
कहने का अाशय यह है कि
जो व्यक्ति नियति का विधान तोडता है
विधी-विधान के विपरित कार्य करता है
लक्ष्य प्राप्ति के लिये संक्षिप्त मार्ग अपनाता
है उसकी दशा महाराज त्रिशंकु की तरह हो जाती है

Thursday, November 29, 2012

स्वाभिमान


स्वालम्बन का सीधा सम्बन्ध स्वाभिमान से होता है
स्वाभिमानी व्यक्ति को अात्म सम्मान से बहुत अधिक प्यार होता है
वह किसी भी कीमत पर अपने अात्म सम्मान के ठेस लगने पर
समझौता नही करता
अात्मसम्मान को ठेस लगते ही
वह कितने ही बडे प्रलोभन को एक क्षण मे ठुकरा देता है
स्वालम्बन जीवन मे उत्थान का प्रथम लक्षण है
स्वाभिमान व्यक्ति को उर्जा प्रदान करता है
व्यक्ति उसमे निहित क्षमता से स्वयम को प्रमाणित करने हेतु
अतिरिक्त क्षमता से कार्य करता है
स्वाभिमानी व्यक्ति विश्वसनियता की प्रतिमूर्ति होता है
ऐसा व्यक्ति पहली बार देखने मे अभिमानी स्वभाव का प्रतीत होता है
परन्तु शनै :शनै :परिचय होने पर उसका
वास्तविक स्वरुप समझ अा जाता है
मिथ्याभिमान अयोग्यता का प्रतीक होता है
ऐेसा व्यक्ति निरन्तर एक प्रकार की भ्रान्ति मे विचरण करता है
मानो वह बहुत अधिक योग्यता धारण करने वाला व्यक्ति है
ऐसे व्यक्ति अपने मिथ्याभिमान से स्वयम का नुकसान तो करते ही है
साथ ही वह स्वर्णिम अवसरो का लाभ भी नही उठा पाते है
मिथ्याभिमानी व्यक्ति का अभिमान जितनी जल्दी दूर हो जाये वह श्रेयस्कर है

महत्वकांक्षा

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अाकांक्षा प्रत्येक व्यक्ति के ह्रदय मे
किसी वस्तु ,विषय,भोग ,उद्देश्य को पाने की इच्छा है
व्यक्ति इच्छाअो का कोई अन्त नही है, 
वर्तमान मे पद ,यश,शक्ति,
अधिक अार्थिक सामर्थ्य को पाने की अाकांक्षा
जिसे महत्वकांक्षा के रूप से संबोधित किया जाता है
चिंतन का विषय है
महत्वकांक्षा यदि व्यक्ति की सामर्थ्य एवम योग्यता के अनुपात मे हो तो
व्यक्ति ऐसी अाकांक्षा को प्राप्त करने के लिये
 अवैध साधनो का प्रयोग नही करता
किसी का शोषण नही करता ,क्रुरता कारित नही करता,
अनावश्यक वैभव का अतिरेक प्रदर्शन नही करता
वास्तविक सामर्थ्य अौर पात्रता के अभाव मे
व्यक्ति अपनी महत्वकांक्षा की पूर्ति के लिये उपरोक्त उपाय अपनाता है
अाचरण से भ्रष्ट होता है
अाचरण से भ्रष्ट होकर व्यक्ति भले ही
अपनी राजनैतिक ,पदिय ,अार्थिक,महत्वकांक्षा की पूर्ति कर ले
परन्तु पद या अाकांक्षा की प्राप्ति के पश्चात न प्राप्ति का मूल्य रहता है
न व्यक्ति का मूल्यवान रह पाता
ऐसे महत्वकाक्षी को इतिहास सदा हेय द्रष्टि से ही देख पाता है
इतिहास साक्षी है ऐतिहासिक व्यक्ति वे ही कहलाये
जिन्होने व्यक्तिगत महत्वकांक्षा को परे रख
समाज राष्ट्र को सर्वोपरि मान कर
अपने पावन उद्देश्य बनाये
समाज मे हम ऐसे व्यक्तियो को भी देखते है
जिन्होने सभी प्रकार के संसारिक भोगो को त्याग दिया परन्तु
लोकेषणा से जुडी अाकांक्षा से मुक्ति प्राप्त नही कर सके
ऐसे व्यक्ति अपने कर्म तथा संस्कारो से समाज मे
पूज्य होकर भी होकर लोकेषणा मे लिप्त दिखाई देते है
भविष्य मे उनके पतन की संभावना इसी प्रव्रत्ति के
कारण बनी रहती है
हम ऐसे महापुरुषौ को भी देखते है
जिन्होने महान अौर समाज उपयोगी कार्य
किसी प्रकार के प्रचार -प्रसार से दूर रह कर
मौन साधक के रूप मे किये
किसी भी पद पर न होने के बावजूद
वास्तव मे महानता के सर्वोच्च शिखर पर पदासीन है
जन-जन के ह्रदय कमल पर अासीन है



Wednesday, November 28, 2012

नदी



 
नदी गतिशील हो ​,सागर को नापती है
नदी की हिम्मत से,सीमाये काॅपती है
नदी नदी नही,बहती  हुई सदी है
नदी की गति से ऊॅचाई  पर्वत की  हाॅफती है

Tuesday, November 27, 2012

स्नेह


स्नेह जब ममत्व का रूप धारण करता है
तो ममता कहलाता है
स्नेह जब करूणा का रूप धारण करता है
तो मानवता कहलाता है
स्नेह जब पीठ थपथपाकर अाशीष देता है
तो पित्रत्व का भ्रात्रत्व का  भाव कहलाता है
स्नेह जब मधुर भावना से अाहार खिलाता है
अाहार मे सौहार्द सदभाव मिलाता है
तो भीतर से उर्जा को बाहर ले अाता है
स्नेह के कई रूप होते है
कभी शीतल सी भावना तो कभी तेज
अौर अोज की धूप होते है
स्नेह कभी भगवान क्रष्ण बनते है
राधा के रूप मे सम्वेदना के तार बुनते है
स्नेह बनता है शबरी तो ,झुठे बैर श्रीराम खाते है
जात -पात अस्पर्श्यता की दूरियो को वे मिटाते है
योगेश्वर श्रीक्रष्ण का समस्त जीवन स्नेह से भरा है
स्नेह शुन्य व्यक्तित्व तो ​​मरा है अधमरा है