Total Pageviews

Friday, August 16, 2013

अनुकूलता और प्रतिकूलता

जो लोग निरंतर प्रतिकूलताओ का रोना रोते है
 स्वयं की  असफलताओ के लिए दूसरे व्यक्तियों को दोष देते है 
यह लोगो के लिए यह महत्वपूर्ण है की 
अनुकूलता प्रतिभा को आगे बढ़ने मात्र अवसर ही देती है
जबकि प्रतिकूलता व्यक्ति की प्रतिभा और व्यक्तित्व को परिष्कृत करती  है निखारती है
अनुकूलता और प्रतिकूलता दो प्रकार की परिस्थितियों में पले -बढे दो  प्रकार के व्यक्ति जब  
 एक जैसी उपलब्धि एक साथ हासिल करते है
 तो दोनों का मुल्य भिन्न-भिन्न होता है
कार्य करने की प्रणालियाँ अलग -अलग होती है
 अनुकूलता  में पाई गई उपलब्धी चिर स्थाई नहीं होती
ऐसी उपलब्धि धरातल  की वास्तविकता से परिचय के अभाव में व्यक्ति की अनुभव हीनता ही दर्शाती है
परिणाम स्वरूप कठिन परिस्थितियों में व्यक्ति कितने ऊँचे पद पर आसीन हो जाए
उसे पतन के मार्ग की और ले जाती है
प्रतिकूल परिस्थितियों का पथिक जब अपना लक्ष्य प्राप्त करता है
तो वह यथार्थ की परिस्थितियों से परिचित होने के कारण कठिन और विकट परिस्थितियों में विचलित नहीं होता उसका प्रत्येक निर्णय दूरदशिता पूर्ण होता
अन्तत ऐसा व्यक्ति अनंत उंचाईयों  को प्राप्त करता है
इसलिए व्यक्ति को प्रतिकूलताओ से भयभीत नहीं होना चाहिए

Tuesday, August 6, 2013

माँ दुर्गा में निहित जीवन के सूत्र


http://www.newsonair.nic.in/feature-image/Durga-mata.jpg
माँ  दुर्गा जिनकी नवरात्रि में आराधना की जाती है 

नारी में शक्ति का प्रतीक है 
मात्र माँ दुर्गा की पूजा से ही कोई  महिला 
या  पुरुष शक्तिशाली नहीं हो जाता 
माँ  दुर्गा द्वारा  अतुल पराक्रमी दैत्यों का वध 
किया गया 
रक्त बीज नामक राक्षस 
जिसके हर रक्त की बूँद एक नए राक्षस को जन्म देती थी 
का भी देवी दुर्गा द्वारा संहार किया गया 
आखिर इतनी शक्ति आई कहा से 
नारी समाज के लिए 
यह स्वयं में शक्ति जगाने का सूत्र हो सकता है 
सर्व प्रथम विचार करते है तो पाते है
 शिव साधना इसका प्रथम सूत्र है 
माँ दुर्गा का अंश महाकाली शिव साधक थी 
जिन्होंने कठोर तप  किया था 
दूसरा  सूत्र है अगाध सौन्दर्य की स्वामिनी होने के बावजूद 
चारित्रिक दृढ़ता थी
कथा आती है महिषासुर तथा अन्य  दैत्यों द्वारा
 विवाह के प्रस्ताव भेजे जाने के बावजूद 
उन्होंने शिव के प्रति अपनी निष्ठा  को नहीं छोड़ा था 
तीसरा  सूत्र  है निर्भयता 
 सामान्य रूप से सभी प्राणी सिंह  के डरते  है 
परन्तु माँ  दुर्गा  द्वारा  सिंह  की सवारी की जानी 
यह दर्शाता  है की सच्ची वीरांगना  को 
निर्भीकता  पूर्वक बुराइयो से मुकाबला करना चाहिए 
चौथा  सूत्र है दूर दर्शिता वर्तमान की समझ 
और अतीत से सीख लेने की प्रवृत्ति को अपनाना 
माँ  दुर्गा के शास्त्रों में त्रिशूल भी शामिल है 
जिसके तीनो भाग भूत भविष्य और वर्तमान के द्योतक है 
पांचवा  सूत्र है अच्छे  लोगो का साथ 
माँ  दुर्गा  के साथ सभी दैवीय शक्तिया  थी 
उनके अग्र  भाग में महावीर हनुमान और प्रष्ट भाग में भैरव देव रहते थे 
जिसका  तात्पर्य यह है की अच्छे  और सत्पुरुषो से
 निरंतर  मार्ग दर्शन प्राप्त करना  चाहिए 
और ऐसे सत्पुरुषो के साथ रहने का परिणाम यह होता  है 
की कोई पीठ पीछे भी विश्वासघात नहीं कर पाता  है 
इसलिए दुर्गा  उपासना  के साथ-साथ 
कोई नारी उपरोक्त सूत्रों का पालन करती है तो 
माँ  दुर्गा  के सामान उसे बल की प्राप्ति होती है 


Sunday, August 4, 2013

अभय भाव और वेद

विश्व में शत्रुओ के शमन दमन स्तम्भन 
उच्चाटन मारण  के कितने ही मंत्र है
 कितनी  ही विधिया है कितने ही विधान है 
यहाँ तक की अहिंसा के सिध्दांत पर आधारित
जैन धर्म में में भी प्रमुख मन्त्र ॐ नमो अरिहंताणं ही है 
तंत्र विद्या में कितनी देवी देवताओं की स्तुतिया
शत्रुओ के सर्वनाश के लिए साधको द्वारा की जाती है 
परन्तु व्यवहारिक  जगत में यह देखने में आता है
 की व्यक्ति किसी व्यक्ति शत्रु  मानता है 
यथार्थ में शत्रु कोई और भी हो सकता है 
हम जिसके अनिष्ट की कामना करते है 
उसके स्थान पर ऐसे व्यक्ति का अनिष्ट हो जाता है 
जिसे हम अपना परम हितैषी समझते  है
वास्तव देखा जाए तो हमारी स्थूल दृष्टि 
 शत्रु और मित्र में भेद ही नहीं कर सकती हमें किससे अभय चाहिए
इस विषय पर  अथर्ववेद  का  मन्त्र स्पष्ट करता है
अभयं  मित्रादभयममित्रादभयम ज्ञाताद अभयं परोक्षात अभयं नक्तं भयं दिवां न सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु 
अथर्व. १९\१५\6
अर्थात हे भगवान हमें अभय प्रदान करो 
मित्रो से अमित्रो से अभय प्रदान करो 
हम जिनको जानते है उनसे अभय प्रदान करो 
हम जिनको नहीं जानते है उनसे भी हमें प्रदान करो 
तथा सभी और हमारे मित्र हो
मित्रता पूर्ण वातावरण से हम घिरे हो

Friday, July 26, 2013

लघु कथा -रामकिशन

पारिवारिक जिम्मेदारियों से पलायन कर 
रामकिशन शान्ति की खोज में 
गंगा तट के किनारे एक महात्मा के आश्रम पर पहुंचा 
आश्रम की व्यवस्था के अनुसार
 प्रत्येक आश्रमवासी की एक नियत दिनचर्या थी 
सौपे गए कुछ कार्य थे गोशाला ,पाक शाला ,
 गुरुसेवा ,अतिथि सेवा जिसमे शामिल थी 
कुछ दिनों तक आश्रम में रहने के बाद 
राम किशन को भान हुआ की 
यह सब तो वह अपने परिवार में 
रह कर भी तो कर सकता था
 फिर वह क्यों शान्ति की खोज में गंगा तट पर आया
 और कर्म से पलायन किया 
तब उसे समझ में आया की कर्म ही धर्म है 


विचार -बिंदु

जिस प्रकार बहुमूल्य धातु और रत्न 
मिटटी में रह कर भी अपनी चमक और गुण धर्म नहीं खोते 
उसी प्रकार से गुणवान व्यक्ति दुर्गुणों से घिरे होने के बावजूद 
अपने गुणों को नहीं खोते
 
पारस वह पत्थर होता है 
जिसके संपर्क में आने पर लोहा भी स्वर्ण का रूप धारण कर लेता है
उसी प्रकार से योग्य और गुणवान व्यक्तियों के मध्य रहते 
गुण हीन व्यक्ति भी सद्गुणों की आभा ग्रहण कर
अनुभव और कुशलता प्राप्त कर लेता है 
इसलिए हमारा प्रयास यह होना चाहिए की 
हम अपने से अधिक कुशल और गुणवान और अनुभवी व्यक्तियों का 
सान्निध्य प्राप्त करे और अपने व्यक्तित्व को पारस सा बनाए 
ताकि हमारे सम्पर्क जो भी आये वे हमारे सामान मूल्यवान हो जाए

व्यक्ति में  संतुष्टि का भाव 
उसके  चिंतन के स्तर पर निर्भर होता है
व्यक्ति का चिंतन निम्न स्तर का हो तो 
वह मुल्य हीन वस्तुओ और विषयो पर आसक्त रहने के कारण
 निरंतर असंतुष्ट रहता है 
असंतुष्टि मन में अधिक समय तक रहे तो 
वह तन में रोग की उत्पत्ति का कारण बन जाती  है  


 

Sunday, July 21, 2013

रुचि

  रूचिया  जिसे शौक भी कहते है 
 व्यक्तित्व का दर्पण होती है
ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जिसे कोई रूचि नहीं हो
यह संभव है की रुचियों के अच्छे बुरे प्रकार हो सकते है
साक्षात्कार की प्रक्रिया में साक्षात्कार कर्ता प्रत्याशी से
 रुचियों के बारे में इसलिए पूछते है
रुचियों से व्यक्ति के बारे में यह तथ्य ज्ञात किया जा सकता है की
किसी व्यक्ति की  मानसिकता किस स्तर की है
व्यक्ति का सकारात्मक है अथवा नहीं 
रुचियों के आधार पर ही यह निर्धारित किया जा सकता है की
व्यक्ति में रचनात्मक प्रवृत्ति है या नहीं 
साहित्य कला संगीत में रूचि रखने वाला व्यक्ति संवेदना
से परिपूर्ण  भावुक  और रचनात्मक होता है 
खेल और व्यायाम में रूचि रखने वाला व्यक्ति
 स्वास्थ्य के प्रति जागरूक सक्रीय रहने वाला व्यक्ति होता है 
रूचि में किये जाने वाले कार्य में 
व्यक्ति को पूरी सफलता प्राप्त होती है
 अरुचि से किये जाने वाला अभ्यास हो या कोई कार्य 
समय और श्रम अधिक लगने के बावजूद व्यक्ति को 
वांछित फल प्रदान नहीं करता 


Wednesday, July 17, 2013

काल और महाकाल

 हिन्दू धर्म  में  काल  चौघडिया मुहूर्त  का  
अत्यधिक  महत्व  होता  है 
कुछ  व्यक्ति  तो  बिना  मुहूर्त  के  कोई  भी  
कार्य  करते  ही  नहीं  है 
भले  ही   कार्य  में  कितना  ही  विलम्ब क्यों  न  हो  जाये 
दिशा शूल  का  ध्यान  रखने  के  बाद  ही 
 कुछ  लोग  कही  प्रयाण करते  है  
कौनसी  दिशा  में  कौनसे दिवस  जाना 
 यह सुनिश्चित  करने के  बाद  ही  यात्रा  का  मार्ग  निर्धारित  करते  है उपरोक्त  मान्यताये यद्यपि  ज्योतिषीय काल गणना  पर  आधारित  है  परन्तु  प्रत्येक परिस्थिति  उपरोक्त  मान्यताओं  का
  पालन  किया  जाय  यह  आवश्यक नहीं 
यदि  काल  गणना का  इतना  ही  महत्व  होता  तो 
 ज्योतिष  विद्या का  प्रकाण्ड  विद्वान रावण 
अकाल  मृत्यु  का  ग्रास  नहीं  बनता
 भगवान्  विष्णु के  अवतार  श्रीराम एवं  सीता  जी  विवाह  का  
शुभ  मुहूर्त  में  होने के  बावजूद  
उन्हें विवाह के  पश्चात  वनवास  नहीं  भोगना  नहीं  पड़ता 
बिना किसी मुहूर्त  के श्री   कृष्ण  द्वारा रुक्मणी  का हरण 
तथा  अर्जुन  द्वारा सुभद्रा का हरण  और  हरण  के  बाद  
उनका सुखी  दाम्पत्य जीवन हमारे  सामने 
बिन  मुहूर्त  के उदाहरण  है 
कभी  हम  कोई  शुभ  कार्य  बिना  मुहूर्त  देखे कर  लेते  है 
 बाद में  हमें  पता  चलता  है 
 हमने वह  कार्य  उत्तम  मुहूर्त  में कर  लिया  है
 इसका  आशय  यह  मानना  चाहिये कि  किये  कार्य  में 
भगवान्  की पूरी  शुभकामना  शुभाशीर्वाद है 
व्यक्ति  अच्छे  मुहूर्त  में  कोई कार्य  क्यों करना  चाहता  है 
इसके  पीछे  प्रमुख  कारण  यह  होता  है  कि  व्यक्ति 
तरह  तरह की  आशंकाओं  से  भयभीत  रहता  है
 एक  ओर  तो  व्यक्ति  ईश्वर  की उपासना  करता  है 
 दूसरी  ओर  मन  तरह  तरह के  भ्रम  और  भय  को स्थान देता  है 
इस  प्रकार  के  व्यक्तियों  पर  गृह नक्षत्रो शकुन  अपशकुन 
का  ज्यादा  प्रभाव  होता  है 
यह  व्यक्ति  में  ईश्वरीय  शरणागति  भावना 
नहीं  होने  के  कारण होता  है 
जो  व्यक्ति  ईश्वर  पर  पूरा  विश्वास  रख कर  
प्रबल  पुरुषार्थ से कार्य  करता  है  
 उसके सारे  कार्य  बिना  मुहूर्त  देखे  ही  श्रेष्ठ  मुहूर्त  में 
निष्पादित हो  जाते है इसलिये  ईश्वर  को  महाकाल 
के  रूप में  भी  संबोधित  किया  गया है