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Saturday, October 17, 2015

प्रेम और व्यवहार कुशलता

जहा प्रेम होता है 
वहा आत्मीयता होती जहा आत्मीयता होती है
 वहां आत्मीयता पूर्ण सम्बोधन होते है 
परन्तु आत्मीयता हो न हो 
फिर  भी व्यवहार में मधुरता सदा आवश्यक है
 इसी मधुर  व्यवहार को 
व्यवहार कुशलता कहा जाता है 
व्यवहार कुशलता जीवन प्रबंधन के लिए 
सदा आवश्यक है 
आत्मीय जन से प्रेम प्रगट करने के लिए 
तो सभी लोग सद व्यवहार दर्शाते है
 व्यवहार कुशल वे लोग होते है 
जो अपने विरोधियो से भी 
मधुर वाणी से संवाद स्थापित कर लेते है
 ऐसे व्यक्तियो को व्यवहार कुशल कहा जाता है 
कटु कर्कश शब्दों में कहा गया सत्य 
सत्य को सही स्थान पर प्रतिष्ठित नहीं कर सकता है सत्य को प्रतिष्ठा दिलवाने के लिए आवश्यक है कि सत्य को सौम्य स्वरूप में उजागर किया जाय
तब आलोचक यह नहीं कह पायेगे 
कि वह व्यक्ति सत्य बोलता है 
पर कड़वा बोलता है
 इसलिए वेदों में भी कहा गया है कि 
सत्यम ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्

Friday, October 16, 2015

UNIVERSE: साहित्य साहित्यकार और पुरूस्कार

UNIVERSE: साहित्य साहित्यकार और पुरूस्कार

साहित्य साहित्यकार और पुरूस्कार

वर्तमान में साहित्यकारों द्वारा 
सम्मान लौटाए जाने की की खबरों को 
मीडिया में प्रमुखता से प्रकाशित किया जा रहा है जितनी सुर्खिया पुरूस्कार लौटाए जाने की
 खबरों ने पाई है 
उतनी तो जब साहित्य अकादमी द्वारा 
पुरूस्कार दिया गया था
 तब भी पुरुस्कृत साहित्यकारों को नहीं मिली थी बहुत साहित्यकारों के बारे में 
लोगो को तब जानकारी मिली 
जब उनके बारे में पुरूस्कार लौटाए जाने की 
खबरे प्रकाशित हुई है 
याने की साहित्यकारों द्वारा पुरूस्कार लौटाया जाना भी एक सुखद स्मृति रहेगी 
कम से कम पुरुस्कृत साहित्यकारों की 
गुमनाम कृतिया चर्चा की विषय 
तो हाल ही के कुछ दिनों तक बनी रहेगी 
प्रश्न यह है साहित्य किसे कहेंगे
जो समाज का हित करे 
परन्तु साहित्यिक संस्थाये अपने अपने
 समूह के साहित्यकारों के हित साधने का 
माध्यम बस रह गई गई है 
विपरीत विचार धारा वाला लेखक या कवि
 कितनी भी उच्च कोटि की 
रचना या कृति का सृजन कर दे 
संस्थाये कभी भी उन्हें पुरुस्कृत करने योग्य नहीं समझती।
सूक्ष्मता से देखे तो पुरूस्कार लौटाने वाले साहित्यकार किसी जमाने में 
उसी संस्था के सर्वेसर्वा थे 
जिस संस्था के पुरूस्कार वे लौटा रहे है
आशय यह है
 ऐसे साहित्यकार्यो ने साहित्यिक संस्थाओ को स्वयं या स्वयं के निकटस्थ कथित साहित्यकारों की 
स्वार्थ साधना का ही माध्यम बनाया था ।
ऐसे साहित्यकारों और साहित्यिक संस्थाओ के कारण साहित्य की नवोदित प्रतिभाये दम तोड़ रही है साहित्य की कई विधाए समाप्त होने की स्थिति में है

Tuesday, October 13, 2015

UNIVERSE: आंतरिक शक्तियो के जागरण का पर्व नवरात्रि

UNIVERSE: आंतरिक शक्तियो के जागरण का पर्व नवरात्रि

कर्म कर ले वीर तू कर्म कर ल

कर्म कर ले वीर तू कर्म कर ले कर्म से ही जीवन महान हैं
आलस्य तो जीवित जलता श्मशान है
कर्म कर ले वीर तू कर्म कर ले....
भूल मत ए वीर तू वीरों की सन्तान है
लक्ष्मण और गुडाकेश तेरे आदर्श महान हैं
कर्म ही जीवन जीने का सूत्र हे, आलस्य तो नाली में बहता मल-मूत्र है
कर्म कर ले वीर तू कर्म कर ले...
जाग जा अब तूझे आलस्य नहीं सूहाता हे
बहुमूल्य जीवन का समय व्यर्थ क्यों गवाता है ?

कब तक तू सोयेगा ? अपनी किस्मत को कब तक रोयेगा ?
रोना तुझे नहीं सुहाता है जाग तू ही अपना भाग्य विधाता है
कर्म कर ले वीर तू कर्म कर ले...
नींद मे अब तू ना रहना आलस्य को तू ना सहना
जाग जा अब यही समय की मांग है मौत के बाद फिर विश्राम ही विश्राम है।

आंतरिक शक्तियो के जागरण का पर्व नवरात्रि

बाह्य शक्तियो से अधिक महत्वपूर्ण भीतर की शक्तिया होती है बाह्य शक्तियो से सम्पन्न व्यक्ति कितना भी शक्तिशाली हो आंतरिक दुर्बलता व्यक्ति को विवश कर देती है किसी विपत्ति को बर्दाश्त करने के लिए भीतर की शक्तिया चाहिए नवरात्रि की साधना आंतरिक शक्तियो के जागरण का उत्सव है परन्तु क्या माता की भक्ति करने वाले आंतरिक शक्तियो का संधान करते है
ऐसा प्रतीत नहीं होता है निज कर्म से विमुख हो धार्मिक अनुष्ठान करना आंतरिक दुर्बलता को दर्शाता है ऐसे धार्मिक अनुष्ठान व्यक्ति की कर्म से पलायनवादी प्रवृत्ति को दर्शाते है धर्म वह है जो कर्म की प्रखरता में वृध्दि कर दे भक्ति हो ज्ञान दोनों योग की श्रेणी में माने गए है और योग के बारे में कहा गया है योगः कर्मशु कौशलम् इसलिए नवरात्रि साधना के अवसर पर आंतरिक शक्तियो का जागरण ही वास्तविक शक्ति उपासना है कायरता पलायन अकर्मण्यता से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही माता का साक्षात्कार है

Sunday, October 11, 2015

महर्षि दधीचि की तपोभूमि

तपस्या व्यक्ति को तपोबल प्रदान करती है
तपोबल से व्यक्ति दिव्य शक्तिया प्राप्त करता है
ऐसे बहुत कम तपस्वी होते है 
जिन्होंने तपस्या से
अर्जित तपोबल का उपयोग 
लोक कल्याण के लिए किया है
 ऐसे ही तपस्वी महर्षि दधीचि थे 
जिनके तपोबल से तपी अस्थियो को 
महर्षि ने दैत्य शक्तियो के विनाश के लिए
 दान किया था 
परन्तु यह तथ्य बहुत कम लोग जानते है कि 
महर्षि दधीचि की तपोभूमि वर्तमान में कहा स्थित है आज हम महर्षि दधीचि की तपोभूमि जो धरमपुरी जिला धार (म.प्र.)में स्थित के ऐतिहासिक और पौराणिक स्वरूप के बारे में बताते है
धरमपुरी जहा नर्मदा नदी दो भागो में विभक्त होती है
दोनों धाराओ के बीच एक द्वीप स्थित है
 जिसे रेवा गर्भ स्थल कहा जाता है पर दधीचि मुनि की तपो स्थली विद्यमान है