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Sunday, November 1, 2015

घटिया प्रयास

ये तो स्पष्ट है कि जब वातावरण अनुकूल होता है तब जनसंख्या वृद्धि होती है और जब वातावरण प्रतिकूल होता है तो पलायन और मृत्यु दर में वृद्धि.... इससे स्पष्ट हे कि भारत में तथाकथित अल्पसंख्यको के लिए वातावरण अनुकूलता लिए हुए है क्योंकि उनकी जनसंख्या दर में वृद्धि हुई है ...
वहीं सिरीया लीबिया व अन्य देशों में पलायन व मृत्युदर में वृद्धि हुई है फिर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा देश के वातावरण को प्रतिकूल बता...
विरोध करना तथ्यों से प्रतिकूल है। व देश के सौहार्दपुर्ण वातावरण व छवि को धुमिल कर क्षणिक प्रसिद्धि पाने का घटिया प्रयास मात्र है।

Saturday, October 31, 2015

भारत - ऋषि निर्मित राष्ट्र

इस देश में रहने वाले लोगों की एक संस्कृति है। इस संस्कृति के ही कारण यह एक राष्ट्र है। इस राष्ट्र- इस संस्कृति का निर्माण किसने किया ? अन्य देशों मे वहाँ के राजा या सैनिकों के द्वारा राष्ट्रों का निर्माण हुआ है।
परंतु इस राष्ट्र का निर्माण ऋषियों ने किया है। वेद के एक मंत्र से यह स्पष्ट होता है।

भद्रमिच्छन्त : ऋषय: स्वविर्द : तपोदीक्षामुपसेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातं तस्मैं देवा: उपसन्नु मन्तु।

ऋषि अर्थात जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है। ऋषि अर्थात अपने स्वार्थ का चिन्तन ना करते हुए संसार के हित में सोचने वाले। उपरोक्त श्लोक में भी यही बात आयी है। "भद्रमिच्छन्त : ऋषय" विश्व के कल्याण की कामना रखने वाले ऋषियों ने तप किया।
उनके तप से इस राष्ट्र को बल मिला, तेज मिला। इसी कारण देवता भी आकर इस राष्ट्र को नमस्कार करते हैं।

इस देवनिर्मित देश में, ऋषि निर्मित राष्ट्र में, हमारा जीवन गतिमान है। प्रायः लोग 'ऋषि का अर्थ संन्यासी समझते हैं। परंतु ऋषि का अर्थ संन्यासी नहीं है। सभी ऋषि गृहस्थ थे। एक ही ऋषि संन्यासी थे- 'शुक्र' महर्षि। शुक्र महर्षि के अतिरिक्त  प्रायः सभी ऋषि गृहस्थ थे।
हम इन्हीं ऋषियों की सन्तान है। इस कारण अपने देश मे गौत्र का प्रचलन हैं। हमारे गौत्र ऋषियों के नाम पर है। हम सभी के गौत्र ऋषियों के नाम पर होने का अर्थ यही है कि हम उन ऋषियों की संताने हैं। ऋषियों का चिंतन लोक हित के लिए होता है। सामान्य व्यक्ति सिर्फ स्वयं के बारे में सोचता है। लोक हित में ही प्रत्येक व्यक्ति का हित है एेसा ऋषियों का दर्शन है।

Friday, October 30, 2015

स्वर्ग नर्क और मोक्ष

स्वर्ग नर्क और मोक्ष की अवधारणा
 केवल हिन्दू धर्म में है 
पुनर्जन्म हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण अंग है
पुनर्जम क्या है?
 पुनर्जन्म अपनी गलतियों सुधारने का अवसर है
 इसे बिना समझे
 हम पुनर्जन्म के सिध्दांत पर विश्वास करते है
 स्वर्ग क्या है स्वर्ग रोग मुक्त होकर सज्जनो के मध्य सुविधा के साथ शान्तिपूर्ण जीना है
कई लोगो के लिए यह धरती स्वर्ग है 
इसलिए उन्हें स्वर्ग की कामना करने का 
कोई ओचित्य नहीं है 
सबसे महत्वपूर्ण सिध्दांत मोक्ष का है 
जिसे पाने के लिए ऋषि मुनि ग्यानी तपस्वी 
साधना में लींन रहते है 
जो पुनर्जन्म और आवागमन से मुक्ति का मार्ग है 
जो परमात्म तत्व में विलीन हो जाना है 
सुख दुःख से परे हो जाना है
काम क्रोध मद लोभ मोह से मुक्त होकर
 सांसारिक जीवन में भी समस्त कॉमनाओ विषय वासनाओ से मुक्त हो सकते है 
और मोक्ष की अवस्था का अनुभव कर सकते है
 जहा तक नर्क का प्रश्न है
 हम अपनी मूर्खताओं  के फलस्वरूप 
पतन के मार्ग ओर चले जाते है 
तरह तरह के सुख से वंचित हो जाते है 
दुर्जनो संग पाकर 
अपने स्वाभाविक गुण खोकर 
व्यसनों में लिप्त होकर 
अपना स्वास्थ्य खराब कर लेते है 
नारकीय चिकित्सकीय प्रणालियों के सहारे 
जी पाते है इसी अवस्था को नर्क कहते है

फिर भी करवा चौथ

मन व्यापे विश्वास नहीं फिर भी करवा चौथ
तृप्ति में भी प्यास रही कैसा है ये बोध 

व्रत से शक्ति बनी रहे व्रत भक्ति का रूप
भक्त बसे परमात्मा भक्ति भाव स्वरूप 

सूरज संध्या संग रहा चंदा संग है रात
सजना सजनी संग रहे मंजिल होगी साथ

यहाँ देखता दंग रहा अपनों का व्यवहार
नित बदले रूप रंग है जैसे सात प्रकार

Monday, October 26, 2015

शरद पूर्णिमा की सार्थकता

शारदेय नवरात्रि के पश्चात आने वाली पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है इस दिन खुले आसमान के नीचे खीर बना कर उसे चंद्र किरणों में रखा जाता है रात को चंद्र किरणों के माध्यम से वर्षित सुधा बूंदों को क्षीर पात्र में एकत्र होने के बाद उसे ग्रहण किया जाता है परन्तु इसका तार्किक अर्थ क्या है ?इसका समझना आवश्यक है शारदेय नवरात्रि में शक्ति साधना की उष्णता को शांत किया जाना आवश्यक है खीर जो दूध चावल मेवे से बनती है उसका ओषधीय महत्व होता है वह शक्ति जिसमे उष्णता हो कभी भी किसी का कल्याण नहीं करती है उसके रचनात्मक दिशा देने के लिए उसे आप्त और सौम्य पुरुषो का सान्निध्य चाहिए ।उष्णता से युक्त शक्ति को एकदम से शीतल किये जाने से तप से प्राप्त साधना पर प्रतिकूल पड़ सकता है शक्ति क्षय होने की संभावना विद्यमान रहती है इसलिए चद्रमा रूप आप्त एवम् शीतल और सौम्यता के देव प्रतीक की किरणों से निकली सुषमा जब शरद ऋतू में मौसम में घुल कर क्षीर में प्रविष्ट होती है तो वह खीर अमृत का रूप धारण कर लेती है हमारे तन और मन की उष्णता को शांत कर नवरात्र साधना से संचित शक्ति की उष्णता समाप्त कर उसे समुचित दिशा प्रदान कर देती है

अभाव का प्रभाव

अभाव दो प्रकार के होते है 
एक तो वास्तविक अभाव 
दूसरा कृत्रिम अभाव है 
कृत्रिम अभाव वे होते है 
जिनके रहते हमारा जीवन यापन हो सकता है 
परन्तु हमें हमारी सुविधा भोगी प्रवृत्ति 
कृत्रिम साधनो के अधीन कर देती है
 जो लोग संन्यास की ओर 
अग्रसर होने की ईच्छा रखते हो 
उन्हें कृत्रिम साधनो से जुड़े
 अभावो में रहने का अभ्यास करना चाहिए ।
आश्चर्य तब होता है 
जब संन्यास मार्ग से जुड़े कुछ व्यक्ति
 कृत्रिम साधनो के बिना
 अपना नियमित जीवन व्यतीत करने में 
असमर्थ हो जाते है ।
कृत्रिम साधनो के बिना 
जीवन यापन करने के लिए
 व्यक्ति में वास्तविक वैराग्य की 
भावना होनी आवश्यक है 
वास्तविक वैराग्य 
संतोष और अपरिग्रह के व्रत के पालन 
किये जाने से ही संभव है 
व्यक्ति कितने ही बड़े व्रत कर ले 
दिखने में सामान्य व्रत नहीं कर सकता है

Sunday, October 25, 2015

परजीवी

परजीवी वह प्राणी है जो अपने जीवन के लिए दूसरो से पोषण प्राप्त करता है पराश्रयी होकर वह स्वयं के अस्तित्व के लिए किसी भी सीमा तक जा सकता है
शिथिलता आलस्य इसके प्रमुख लक्षण होते है स्वभिमान शून्य होने के साथ साथ निर्लज्जता इसके आभूषण है दुसरो   का कमाया खाना इसका नैतिक दायित्व होता है सामान्य रूप से परजीवी आशय हम वनस्पति में अमरबेल और जन्तुओ में जोंक से समझते है परन्तु मानव समाज में व्याप्त परजीवी की और किसी का ध्यान तक नहीं जाता ।परजीवी व्यक्ति की एक प्रमुख विशेषता यह होती है कि उन्हें छोटी छोटी बातो का बहुत बुरा लगता है पर कुछ ही समय बाद वे पुनः सामान्य अवस्था में आ जाते है दिल पर किसी बात को नहीं लगाते ।सरकारी स्तर पर भी ऐसे परजीवियों के पोषण संवर्धन की योजनाये विद्यमान है
जिसमे परजीवी हितग्राहियो का शासकीय स्तर पर यथोचित ध्यान रखा जा रहा है अलग अलग श्रेणियों में अलग पुरूस्कार तक घोषित किये जा रहे है परजीवियों की अनगिनत नस्ले अब निखर आई है
उनकी कोई नस्ल विलुप्त होने की संभावना भी नहीं है
परजीवियों के रूप में जीवित रहने के लिए लंबे अभ्यास की आवश्यकता होती है सीमित खर्च में पारिस्थितियो से तालमेल जो बिठाना पड़ता है परजीविता एक विज्ञान के रूप विकसित होता जा रहा है इसमें जितना शोध किया जाय उतना कम है अब तो परजीविता के हायब्रिड संस्करण भी दिखाई देने लगे है
बस उन्हें हम देख सके पहचान सके ।