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Tuesday, March 22, 2016

मनुष्यता के मापदंड -२

ज्ञान - विद्या और ज्ञान यह दोनों भले ही एक लगे परन्तु यह दोनों है अलग - अलग यह अवश्य हे कि यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हे परस्पर जुड़े हुए पर एक नही
विद्या को प्राप्त किया जाता है और ज्ञान का उपयोग विद्या का परिणाम ज्ञान हे दोनों में बहुत सूक्ष्म भेद हे ज्ञान व्यक्ति को मनुष्य बनाने वाली वह शक्ति हे जिसके उपयोग से मनुष्य स्वयं अपना और विश्व का कल्याण करने का सामर्थ्य रखता हे विद्या ग्रहण कर उससे उत्पन्न ज्ञान का उपयोग कर मनुष्य बहुत सकारात्मक प्रभाव पैदा कर सकता हे जो मनुष्यता को नई ऊँचाईया  देने मे सक्षम है
शील - इस एक ही शब्द में दो गुणों का सामूहिक समावेश है  पहला है चरित्र यह वह गुण है जो व्यक्ति को मात्र मनुष्य ही नही एक श्रेष्ठ मनुष्य बनाता हे चरित्र ही मनुष्य की संचित एकमात्र सम्पति हे जो यद्दपि भौतिक सुख नही क्रय कर सकती परन्तु  व्यक्ति को हजारों धुली - कणों के मध्य प्रकाशित रत्न के रूप में आलोकित करने में सक्षम हे चरित्र से मनुष्यता आती हे यह व्यक्ति को वह शक्ति देता हे जो उसे विकट परिस्थितियों मे भी विचलित नहीं होने देता
दूसरा हे विनम्रता यह मनुष्य का आभूषण हे विनम्रता से मनुष्य लोकपूजक बन जाता है अहंकार मनुष्य का क्षत्रु हे विनम्रता से अहंकार का नाश हो जाता हे और मनुष्य सदैव के लिए आत्मशातिं  (inner peace)
को प्राप्त हो जाता है
                                            शेष .........

Monday, March 21, 2016

होली

होली एक पर्व नहीं
सामाजिक क्रान्ति है
सामाजिक क्रान्ति जो आर्थिक
असमानता को दूर कर करे
सामाजिक क्रान्ति जो जातीयता के
दानव का दहन कर दे
होली एक आंदोलन है
आंदोलन जो सत्य को ग्रहण करे
असत्य को त्यागने को
अहम् के हिरण्यकश्यप का हनन करे
होली एक क्रीड़ा है े
क्रीड़ा वह जो मन की पीड़ा का शमन करे
होली एक अनुभव है आत्मीयता का
आत्मीयता जो मन को आल्हाद दे
आधुनिक प्रह्लाद का सरंक्षण करे
होली एक पिपासा है
पिपासा जो प्रेम का  वरण करे
ईर्ष्या और घृणा का क्षरण करे

Saturday, March 19, 2016

मनुष्यता के मापदंड

कोई भी व्यक्ति तब तक मनुष्य कहलाने योग्य नहीं होता जब तक उसमें शास्त्रों में बताए गये सात गुणों का अभाव हो वह सात गुण है
विद्या - विद्या से आशय किताबी ज्ञान , डिग्रीयों के बडंल या रटंत विद्या से नहीं अपितु उस विद्या से है जो व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करने वाली हो उसे सत-असत का बोध कराती हो उसे राष्ट्र -समाज का आदर्श नागरिक बनाती हो जो उसे अपने ही परिवार  का उत्तम सदस्य बनाती हो सारत: विद्या वह है जो व्यक्ति को मनुष्य बनाती हो
तप - दूसरा गुण है तप यहाँ तप से मतलब हिमालय कि किसी कन्दरा या गहन वन मे एक टांग पर खड़े होकर किये जाने वाले तप से नहीं हे अपितु मनुष्य द्वारा समाज जीवन में किये गए उसके पुरुषार्थ से है पुरुषार्थी पुरूष का हर कर्म स्वत: में ही तप हे चाहे वो कर्म  राष्ट्र के लिए हो समाज के लिए अथवा परिवार  की उन्नति के लिए किया गया हो  पुरुषार्थी व्यक्ति का हर कर्म तप ही होता हे बस उसमें  "में " की भावना का का पूर्ण रूप से अभाव होना चाहिए
दान - किसी भिखारी को जेब में शेष रह गयी रेंजगारी दे देना अथवा पुण्य के स्वार्थ में किया गया कोई एेसा दान जो सतही हो दान नही है , प्रतिकर  की  भावना से किया गया दान दान हो ही नहीं सकता
दान की परिभाषा तो बहुत व्यापक होती है दान का महत्व तभी है जब दाता को उस सम्बधित दान की उतनी ही अधिक आवश्यकता हो जितनी की दान लेने वाले को हे सारत: दान वह है जो प्रतिकर ,स्वार्थ रहित हो तथा जो दाता के लिए उतना ही महत्व रखता हो जितना की वह अदाता के लिए महत्वपूर्ण है  जो स्वयं कष्ट पाकर भी परहित के लिए किया गया हो वही दान व्यक्ति को मनुष्य बनाती है
                                               शेष भाग .........

Friday, March 18, 2016

चिंतन क्या है ?

चिंतन चित का विश्राम  है
मन की तृष्णाओं का होता विराम है 
चिंतन सृजन का स्त्रोत है 
निर्माण की चेतना है 
चिंतन दुस्साहस नहीं साहस है 
अध्यात्म की ऊर्जा है 
खुल जाते है पंच कोष 
जुड़ जाते है सद विचार 
विस्फुरित होती कुण्डलिनी
खुल जाता पुर्जा पुर्जा है
चिंतन चिंता का करता हरण  है 
मिट जाते है सभी विकार 
 अनाहद के भीतर होता अमृत तत्व
तरल अमृत का होता निरंतर झरण  है
चिंता में होती वेदना है 
चिंतन से जगती  संवेदना है
चिंतन का वरदान उसी को मिलता है 
जिसके चित्त सरोवर में 
ह्रदय का कमल खिलता है 
चिंतन मोक्ष दायिनी गंगा 
पुण्य सलिला मैया नर्मदा है 
मिल जाती है कष्टो से मुक्ति 
आनंदित रहते सर्वदा है 
इसलिए चिंतन उसी को मिला है 
जो भगवद  सत्ता के समीप है 
जप तप  का लंबा सिल सिला है
चिंतन एक भगत  की भक्ति है 
साधक की शक्ति है 
चिंतन के रथ पर होकर सवार 
जीवन के  कर्म क्षेत्र से हर युक्ति मिल सकती है 
चिंतन वासना का विराम है 
किंकर्तव्य विमूढ़ मन का घनश्याम है 


Wednesday, March 16, 2016

सीमित विश्वास और जीवन प्रबंधन

विश्वास करना या न करना 
व्यक्ति व्यक्ति पर निर्भर करता है 
परन्तु किसी पर एकदम से 
 अविश्वास कर लेना 
और हर किसी पर विश्वास करना 
भी उचित नहीं है 
जो व्यक्ति हर किसी पर
 जरुरत से अधिक विश्वास कर लेता है
 विश्वास घात उसी व्यक्ति के साथ होता है
 और जो व्यक्ति किसी पर भी
 विश्वास नहीं करता 
वह सदा संशयग्रस्त रहता है 
जीवन में व्यवहारिक दृष्टि से असफल रहते है
एक बहुत पुरानी कहावत है 
सीमित संपर्क ,सीमित विश्वास, 
सर्वोपरि आत्मविश्वास ,
सीमित विश्वास का तात्पर्य यह है कि
 किसी कार्य के लिए कौनसा व्यक्ति उपयुक्त है
 यह निर्धारित करने के बाद
 किसी व्यक्ति की कार्य क्षमता 
और उसके व्यक्तिगत गुणों का आकलन कर 
उस पर विश्वास करना 
जीवन प्रबंधन का यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है 
इसी मार्ग से समूह का नेतृत्व कर 
दक्षता पूर्वक समूह के
 प्रत्येक सदस्य से कार्य लिया जा सकता है

Saturday, March 12, 2016

गति एवम् उपासना

गतिशीलता जीवन का पर्याय है
गति में प्राण में है
जो गतिमान नहीं है वह निश्चेत है
नदी गतिशील है तो निर्मल है
गतिशील नदी में जल परिशोधन की क्षमता है
स्थिर होने पर नदी का जल प्रदूषित है
इसी प्रकार से बहती वायु में ताजगी है
मंद या स्थिर वायु में बैचेनी है घबराहट है
विचार शून्यता व्यक्ति को चिंता प्रदान करती है
नवीन विचारो का सृजन जीवन को
नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करते है
विज्ञान ने गति के कई नियम
और सिध्दांत प्रतिपादित किये
गति के स्त्रोत का अनुसंधान करने हेतु  तत्वों को
अणु परमाणु इलेक्ट्रान प्रोटान न्युट्रान में
विभाजित किया
परन्तु इलेक्ट्रान प्रोटान को ऋण आवेशित
और धन आवेशित ऊर्जा
कहा से निरन्तर प्राप्त हो रही है
इस पहेली को सुलझा नहीं पाये
प्राचीन ऋषि महर्षियो ने गति के
ऊर्जा के स्त्रोत को अध्यात्म में खोजा
साधना के बल पर उन्हें प्राप्त करने की
प्रक्रियाएं बताई ।उन्ही प्रक्रियाओ में से
शक्ति की उपासना महत्वपूर्ण है
नवरात्रि में इसलिए जीवन में
ऊर्जा भरने के लिए
गति की उपासना की जाती है
क्रिया के तीनो रूपों के स्त्रोत एवम्
प्रेरक शक्तियो से चैतन्यता प्राप्त की जाती है

लोकतंत्र से राजतंत्र तक

सत्ता  के शीर्ष से
 अव्यवस्था दिखाई नहीं देती है
सत्ता के आस पास जो आभा मंडल होता है
वह शासक को वास्तविकता देखने ही नहीं देता है
सत्ता पर बैठते ही व्यक्ति पर 
अहंकार सवार हो जाता है
बहुत से सत्ताधीशो को देखा है 
जो किसी जमाने में जिन मुद्दो के लिए संघर्ष रत थे
सत्ता के शीर्ष पर बैठते ही 
उनकी प्राथमिकताएं बदल गई
सत्ता शोषण का प्रतीक तब बन जाती है
 जब शासक निज सुखो को 
अधिक महत्व देने लगता है
प्राचीनकाल में अच्छे शासक वेश बदल कर जनता के बीच उनके सुख दुःख देखने चले जाते थे
वर्तमान में सुरक्षा  चक्र के नाम पर 
शासक जनता से दूर हो चुके है
निर्वाचित होते ही जनता की 
समस्याओ से पूरी तरह कट जाते है
क्षुद्र और निहित स्वार्थ साधना में लिप्त हो जाते है
उच्च शब्दावलियों में लम्बे व्याख्यान 
भ्रांतिपूर्ण नारेबाजी में उलझकर कोई भी 
लोकतांत्रिक प्रक्रिया से निर्वाचित नेता 
खुशामदी किस्म के व्यक्तियों के 
पाखंडपूर्ण महिमामंडन से गौरवान्वित हो
 आत्ममुग्ध हो जाता है 
और यही से उसके पतन की शुरुआत होती है