व्यक्ति की पहचान उसके व्यक्तित्व से होती है
व्यक्ति का व्यक्तित्व उसकी आदतों से बनता है
अच्छी आदतें व्यक्ति को चरित्रवान
और बुरी आदतें व्यक्ति को दुश्चरित्र बना देती है
व्यक्ति के दुश्चरित्र की कीमत
उसके परिवार समाज
और कभी कभी राष्ट्र को चुकाना पड़ती है
जबकि चरित्रवान व्यक्ति परिवार समाज
और समाज को अपने चरित्र को उपकृत करता है
उसे सच्चरित्र होने की कीमत पग पग पर
चुकाना पड़ती है चरित्र की पवित्रता
व्यक्ति को मर्यादित रखती है
इसलिए वह पथ भृष्ट नहीं हो पाता
चारित्रवान व्यक्ति जिस पर अग्रसर होता है
वह पथ उसके पग से सुशोभित होता है
जिस गंतव्य की और प्रस्थान करता है
वह गंतव्य गरिमा प्राप्त करता है
जिस पद को प्राप्त करता है
वह पद उत्कृष्ट व्यक्ति के कृतित्व से
धन्य हो जाता है
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Friday, January 6, 2017
चरित्र
Saturday, December 3, 2016
बुरा जो देखन मैं चला
यह पंक्ति बहुत से संत दोहराते है कि
"बुरा जो देखन जो चला मुझसे बुरा न कोय "
ऐसा कह कर व्यक्ति को
आत्म आलोचना करने हेतु प्रेरित करते है
परन्तु व्यवहारिक जगत में
वास्तव में ऐसा नहीं होता
कुछ लोग जो मूलतः अपने स्वभाव से बुरे होते है
वे अकारण ही अच्छे लोगो को हानि पहुचाते रहते है
हम कभी कभी यह सोचने का
तलाशने का बहुत प्रयास करते है
कि जाने अनजाने हमसे ऐसी कौनसी त्रुटि हो गई
जो सामने वाला व्यक्ति हमारा अहित चाहता है
कारण तलाशने पर भी पता नहीं चलता
यदि यह दोहा वर्तमान परिस्थितियो में
सार्थक होता तो हम अच्छे और बुरे लोगो में
कोई भेद ही नहीं कर सकते
हम कोई भी क्षति होने पर
बुराई की पहचान न कर
मात्र आत्म विश्लेषण कर लेते ऐसा कर हम बुरे व्यक्तियों को बुरे कर्मो से विमुख न कर
उन्हें और अधिक स्वच्छंद और उच्छृंखल ही बनाते रहेगे और स्वयम संत्रास झेलते रहेंगे
कबीर दास का यह दोहा
वर्तमान परिस्थितियों के लिए
अधिक प्रासंगिक नहीं रहा है
कबीर दास जी ने इस दोहे की जब रचना की थी
तब कि परिस्थितियां भिन्न थी
लोग अकारण भले व्यक्तियों को संत्रास नहीं देते थे परन्तु वर्तमान में ऐसे लोगो की बहुतायत है
जो अकारण दूसरे व्यक्तियों को क्षुद्र स्वार्थो की पूर्ति हेतु संत्रस्त करते रहते है
तब भले व्यक्तियों के लिए यह कहना कि
"बुरा जो देखन मैं चला मुझसे बुरा न कोय"
उचित प्रतीत नहीं होता है
Sunday, November 6, 2016
राक्षस भगवान् विष्णु की तपस्या क्यों नहीं करते थे?
प्राचीन काल में राक्षस ब्रह्म देव और महादेव शिव की तपस्या कर शक्ति और अमरता का वरदान प्राप्त कर लेते थे \शक्तियों का दुरूपयोग कर संसार में अत्याचार कर आतंक फैलाते है ऐसे दैत्यों का दमन करने के लिए भगवान् विष्णु अवतार धारण करते थे |विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर दैत्य राक्षस भगवान् विष्णु की तपस्या कर वरदान क्यों प्राप्त नहीं करते थे ।इस संबंध में यह कहना उचित होगा कि भगवान विष्णु सृष्टि के पालन कर्ता है | किसी भी व्यक्ति या कृति निर्माण या ध्वंस करना आसान होता है| उसका सरंक्षण संपोषण संवर्धन कठिन होता है ,इसलिए वे अपने दायित्व अनुरूप सृष्टि की संरक्षण संपोषण करने वाली सज्जन शक्तियों के रक्षण हेतु प्रतिबध्द थे वे व्यक्ति की तपस्या को नहीं उनके आशय को देखते है, सदभावना पूर्ण आशय और लोक कल्याण के उद्देश्य रखने वाले भक्त ह्रदय वाले साधक की अल्प साधना ही उन्हें प्रसन्न करने के लिए पर्याप्त है |जबकि महादेव शिव समदर्शी है उन्हें साधक के आशय की अपेक्षा साधक की तपस्या की तीव्रता प्रभावित कर सकती शिव जी स्वभाव से भोले भी है उनकी उदारता की कृपा दुष्ट सज्जन सभी व्यक्तियों पर सामान रूप से बरसती है \ब्रह्मदेव सृष्टि के निर्माता है इसलिए एक बार वे वरदान देने के बाद यह नहीं देखते है \उसका परिणाम क्या होगा इसलिए दैत्य प्राचीन काल में भगवान् विष्णु की साधना न कर महादेव शिव और ब्रह्मदेव की तपस्या कर शक्तियां और अमरता प्राप्त कर लेते थे
Friday, October 28, 2016
लक्ष्य
सौंदर्य उसके लिए है
जो दृष्टि समन्न हो
वैचारिक दृष्टि से नहीं विपन्न हो
आनंद उसके लिए है
जिसके भीतर अमृत तत्व है
जो दृष्टि समन्न हो
वैचारिक दृष्टि से नहीं विपन्न हो
आनंद उसके लिए है
जिसके भीतर अमृत तत्व है
सकारात्मक सोच हो रमा हुआ सत्व है
लक्ष्य उनके लिए
जिन्हें दिखते उतुंग शिखर हो
बहता हो श्रम सीकर प्रतिभा प्रखर हो
ज्ञान उसके लिए जिन्हें जिज्ञासा हो
सदा रहे अतृप्त अनंत पिपासा हो
जीवन उसके लिए जो गतिमान हो
रचते रहे निरंतर अनेक प्रतिमान हो
माँ शारदा का वाहन हंस क्यों है ?
हंस माँ शारदा का वाहन है
परन्तु माँ शारदा ने हंस को ही
वाहन के रूप में क्यों चुना
यह विचारणीय प्रश्न है
हंस का स्वभाव होता है
वह दूध में जल होने पर दूध को पी लेता है
जल को छोड देता है
कंकड़ और मोती के मिश्रण में से
मोती को चुग लेता है कंकड़ को छोड़ देता है
सत्पुरुषों का लक्षण यही होता है कि
सत और असत्य का भेद कर
असत्य छोड कर सत्य को ग्रहण का लेते है
ज्ञान और अज्ञान में भेद कर
अज्ञान को छोड़ ज्ञान को ग्रहण कर लेते है
सत्पुरुषों का आचरण उज्ज्वल होता है
इसलिए हंस का रूप भी धवल होता है
माँ शारदा उसी व्यक्ति की बुध्दि में
विराजमान होती है
हंस के समान सत और असत में
भेद करने में समर्थ होता है
ऐसे व्यक्ति की बुद्धि नीर क्षीर विवेक से युक्त होने से उसे सहज ही आविष्कारक दृष्टि प्राप्त होती है
हंस के समान कल्पना और सृजना के पंख
उसे उपलब्ध होते है
Monday, October 17, 2016
गणित
गणित सबसे कठिन विषय माना जाता है |
विद्यार्थी गणित की जटिलता से
भयभीत रहते है|
परन्तु जीवन में कोई भी व्यक्ति गणित से बच नहीं सकता चाहे कला वाणिज्य या जंतु विज्ञानं हो |
व्यक्ति गणित से जितना बचने का
प्रयास करता उतना ही उलझता चला जाता है |
भूगोल में कौनसी रेखाएं कितने डिग्री से गुजराती है यह गणित की सहायता के बिना असम्भव है|
अर्थ शास्त्र में महंगाई की दर क्या है ?
मुद्रा स्फीति मुद्रा का अवमूल्यन
किस प्रकार से होता है |
इसमें भी गणित का महत्व होता है|
इतिहास में कौनसे सन में
कौनसी घटना घटित हुई
कौनसा शासक किसका समकालीन था
इस तथ्य को अंक गणित के ज्ञान से ही
समझा जा सकता है|
हिंदी भाषा में तो छंद रचना ही
मात्राओं के संतुलन आधारित है
किस छंद की किस पंक्ति में कितनी मात्राएँ होगी
यह पूर्व निर्धारित रहता है
सांख्यकी जैसा कलात्मक विषय ही
गणितीय ज्ञान पर आधारित है|
चित्रकला हो या वास्तु शास्त्र हो सममिति और त्रिकोणमिति के ज्ञान के बिना
इनकी कल्पना करना मुश्किल है |
इसलिए बंधुवर गणित विषय मत भागो गणित में जीवन की कला है |
विद्यार्थी गणित की जटिलता से
भयभीत रहते है|
परन्तु जीवन में कोई भी व्यक्ति गणित से बच नहीं सकता चाहे कला वाणिज्य या जंतु विज्ञानं हो |
व्यक्ति गणित से जितना बचने का
प्रयास करता उतना ही उलझता चला जाता है |
भूगोल में कौनसी रेखाएं कितने डिग्री से गुजराती है यह गणित की सहायता के बिना असम्भव है|
अर्थ शास्त्र में महंगाई की दर क्या है ?
मुद्रा स्फीति मुद्रा का अवमूल्यन
किस प्रकार से होता है |
इसमें भी गणित का महत्व होता है|
इतिहास में कौनसे सन में
कौनसी घटना घटित हुई
कौनसा शासक किसका समकालीन था
इस तथ्य को अंक गणित के ज्ञान से ही
समझा जा सकता है|
हिंदी भाषा में तो छंद रचना ही
मात्राओं के संतुलन आधारित है
किस छंद की किस पंक्ति में कितनी मात्राएँ होगी
यह पूर्व निर्धारित रहता है
सांख्यकी जैसा कलात्मक विषय ही
गणितीय ज्ञान पर आधारित है|
चित्रकला हो या वास्तु शास्त्र हो सममिति और त्रिकोणमिति के ज्ञान के बिना
इनकी कल्पना करना मुश्किल है |
इसलिए बंधुवर गणित विषय मत भागो गणित में जीवन की कला है |
Sunday, July 31, 2016
बादशाह हलवाई मंदिर
बादशाह हलवाई मंदिर जबलपुर जो बारहवी शताब्दी का होकर कलचुरी कालीन है
इस मंदिर की मुख्य विशेषता यह है कि इसमें शिवलिग भगवान् के साथ पञ्च मुखी
शिव जी की संगमरमर के पत्थर पर उत्कीर्ण अत्यंत सुन्दर और चैतन्य प्राण
प्रतिष्ठित प्रतिमा है गर्भ गृह में शिव जी के परिवार में गणेश जी की
नर्मदा जी सरस्वती जी पार्वती जी और भैरव बाबा की मुर्तिया भी विराजमान है
मंदिर के प्रांगण में नंदी जी और स्तम्भो पर सभी प्रकार के देवी देवताओ की
मुर्तिया उत्कीर्ण है
मंदिर एक पहाड़ी पर स्थित है जहा जाने के लिए ऊंचा सीढ़ीनुमा दुर्गम मार्ग है
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