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Sunday, April 1, 2018
Saturday, March 24, 2018
प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है
प्रेम यदि पूजा हो तो प्रेरणा प्रदान कर
वह ऊर्जा बन जीवन को प्रकाशित करता है
प्रेम यदि कामना हो तो वह व्यसन बन
व्याभिचार की और ले जाता है
प्रेम यदि भक्ति हो तो शक्ति बन जाता है
मन की शक्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक उत्थान की ले जाती है
प्रेम यदि वात्स्ल्य हो तो
ममता और पोषण प्रदान कर स्वास्थ्य प्रदान करता है
प्रेम यदि करुणा हो तो
आँसू बन कर सम्पूर्ण मानवता को सींच देता है
प्रेम यदि सेवा हो तो
वह कर्म बन धर्म को जागृति देता है
प्रेम यदि आशीर्वाद बन जाए तो
भिक्षा में शिक्षा की दीक्षा प्रदान कर
शिष्य को सम्पूर्णता प्रदान कर देता है
प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है
प्रेम की प्रतिष्ठा है प्रेम से ही जीवन गतिमान है
प्रेम की भावना जीवंत है वसंत है
प्रेम स्वयं ही एक धर्म है एक पंथ है
Friday, March 16, 2018
Tuesday, February 13, 2018
शिव शंकर
शिव शंकर का ध्यान करो भीतर करो प्रवेश
कुदरत से श्रंगार धरे शिव का अदभुत वेश
कुदरत से श्रंगार धरे शिव का अदभुत वेश
शिव जी शक्ति देत रहे भक्ति और आनंद
सुरभित आस्था होत रही महकी आती गंध
सुरभित आस्था होत रही महकी आती गंध
शिव की पुत्री साथ रही साथ रहे सुख चैन
रेवा मैय्या बांट रही करुणा निश्छल प्रेम
रेवा मैय्या बांट रही करुणा निश्छल प्रेम
मुक्ति की मुस्कान रहे ज्योति पुंज है जीव
भक्ति जिसके पास रही पाया उसने शिव
भक्ति जिसके पास रही पाया उसने शिव
शिव शक्ति दोउ साथ रहे साथ रहे सब जीव
पूजित शक्ति होत रही वंदित होते शिव
पूजित शक्ति होत रही वंदित होते शिव
जीवन सारा बीत गया बीत गई कई रैन
शिवरात्रि को खूब मिला व्याकुल मन को चैन
शिवरात्रि को खूब मिला व्याकुल मन को चैन
शिव श्रध्दा से जीत मिली प्रीत भरी मुस्कान
हर निश्चय को लक्ष्य मिले शिव जी दो वरदान
हर निश्चय को लक्ष्य मिले शिव जी दो वरदान
शिव व्यापत हर रूप रहे धूप रहे और छाँव
दुर्बल मन की पीर हरो डग मग होती नाव
दुर्बल मन की पीर हरो डग मग होती नाव
Saturday, October 7, 2017
व्यक्ति की अवस्था
मन जब अबोध और मासूम होता है तब बच्चा कहलाता है
बच्चा जैसे जैसे समझने लगता है
सांसारिक जटिलताओं से निपटने के लिए
कुटिलताओ सीखने की कोशिश में बच्चा किशोर हो जाता है
किशोरवय में कई भटकाव होते है
भटकाव में व्यक्ति सम्हाल जाए तो जीवन संवर जाता है
संघर्षो की राह पकड़ किशोर जीवन की ऊंचाइयों को पाता है
भटकाव में व्यक्ति भटक जाए बहक जाए तो वह पतित होकर
अनैतिक साधनो को अपनाने लगता है अपराधी बन जाता है
कोई भी व्यक्ति जो मासूम और अबोध और बच्चा होता है
कब अपराधी बन जाए उसे पता ही नहीं च लता
अपराध को ही अपनी नियति मान लेता है
किशोर अवस्था में जो जैसा बन गया जैसा ढल गया
वैसा ही उसका जीवन मुकाम पाता है
कोई व्यक्ति कठिनाइयों से कमजोर
तो कोई व्यक्ति कठिनाईयो में निखार जाता है
कोई व्यक्ति सुविधाओं में सम्बल पाता है
तो कोई व्यक्ति सुविधाओं में दुर्बल हो जाता है
अभावो में किसी की प्रतिभा निखर जाती है
तो किसी व्यक्ति की प्रतिभा अभावो में दम तोड़ देती है
जीवन में समताये कम है विषमताएं ज्यादा है
कभी परिस्थितिया व्यवस्थाएं बन जाती है
तो कभी परिस्थितियां विवशताये बन जाती है
Thursday, September 21, 2017
नंदी
श्रावण के सोमवार पर शिव मंदिर में भक्तो की भीड़ लगी हुई थी | दर्शन कर प्रसाद चढाने के लिए लम्बी लम्बी लाइने लगी हुई थी | बड़ी मुश्किल से नंबर आया तो एक भक्त ने भगवान् शिव के दर्शन किये
और शिव के समक्ष विराजमान नंदी नमन किया और नंदी के समीप बैठ कर शिव के समक्ष समर्पण भाव से ध्यान किया और स्वयं कृत कृत्य हुआ | बाहर आने पर जो प्रसाद लेकर आया था उसे बाहर खड़े सांड ने मुंह लगाया तो भक्त महाराज को बर्दाश्त नहीं हुआ | वे कैसे एक पशु को पवित्र प्रसाद को मुंह लगाने देते सांड को मारने के दौड़े सांड बेचारा भूखा प्यासा बेहाल मार खाते हुए भागा | प्रश्न एक चुभता रहा मन को की मंदिर के भीतर विराजमान पत्थर के नंदी जो भक्त कितनी श्रध्दा के साथ पूज रहा था वही भक्त मंदिर के बाहर प्रत्यक्ष रूप से खड़े | नंदी को पहचान नहीं पाया भला ऐसे भक्तो को शिव का आशीष कहा से प्राप्त होता
और शिव के समक्ष विराजमान नंदी नमन किया और नंदी के समीप बैठ कर शिव के समक्ष समर्पण भाव से ध्यान किया और स्वयं कृत कृत्य हुआ | बाहर आने पर जो प्रसाद लेकर आया था उसे बाहर खड़े सांड ने मुंह लगाया तो भक्त महाराज को बर्दाश्त नहीं हुआ | वे कैसे एक पशु को पवित्र प्रसाद को मुंह लगाने देते सांड को मारने के दौड़े सांड बेचारा भूखा प्यासा बेहाल मार खाते हुए भागा | प्रश्न एक चुभता रहा मन को की मंदिर के भीतर विराजमान पत्थर के नंदी जो भक्त कितनी श्रध्दा के साथ पूज रहा था वही भक्त मंदिर के बाहर प्रत्यक्ष रूप से खड़े | नंदी को पहचान नहीं पाया भला ऐसे भक्तो को शिव का आशीष कहा से प्राप्त होता
Wednesday, April 12, 2017
सौन्दर्य और वैभव
सौन्दर्य सम्पन्नता में ही नहीं होता सादगी में भी होता है सीधा सच्चा ग्राम्य परिवेश प्रकृति का सामीप्य पा अधिक आकर्षक लगता है वैभव के मानदंड समृद्धि ही नहीं होते इतिहास उज्ज्वल हो तो प्राचीन किले की टूटी दीवारे और जींर्ण शीर्ण महल भी अपनी वैभव गाथा कहते है अन्यथा तो संगमरमर से बने साफ़ सुथरे कई राजसी महल अपनी कलंकित ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते वैभव खो चुके है और पांच सितारा होटलों में बदल कर विदेशियो के सत्कार में पलक पावड़े बिछा कर अपना वैभव तलाश रहे है
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