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Sunday, June 24, 2018

पुरुष कौन ?

पुरुष कौन  ? 
पुरुष वह है जो पुरुषार्थी हो 
जो पुरुषार्थ न करे भाग्य के भरोसे बैठा रहे 
वह व्यक्ति हो सकता है किन्तु पुरुष नहीं 
आध्यात्मिक पुरुषार्थ आजीविका सम्बंधित पुरुषार्थ 
पुरुषार्थ के कई प्रकार होते कई रूप होते 
किसी भी प्रकार की रचनात्मकता ज्ञानार्जन 
शोध कृषि कार्य समाज सेवा पुरुषार्थ की परिधि में आते है 
महिला कौन ? 
महिला वह है जो मही अर्थात  भूमि 
के सामान क्षमा की मूर्ति हो
 भूमि के सामान पोषण करे 
जिसका सानिध्य पाते ही तन मन आल्हादित हो 
जो निरंतर नए बीजो को अंकुरित कर 
समाज और परिवार को उर्वरकता प्रदान करे 
मिटटी के सामान ममत्व का भाव संजोये रखे 
जो स्त्री मही  अर्थात भूमि में व्याप्त गुणों की भाँती 
न हो वह स्त्री हो सकती है पर किसी भी अर्थ में 
महिला के रूप में परिभाषित नहीं की जा सकती है 

Friday, May 11, 2018

आत्म तत्व और मंत्र शक्ति

मंत्र जीवित रहते व्यक्ति की आत्म बल को बढ़ाता है
परन्तु व्यक्ति के मृत हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव आत्मा के साथ बना रहता है किसी भी मंत्र का जप नियमित रूप से दीर्घ अवधि तक किया जाता है तो वह आत्मा का संस्कार बन जाता है देह की अचेतन अवस्था मे वह आत्मा के पंख की तरह क्रियाशील हो जाता है आत्मा मंत्र रूपी पंखो के सहारे इच्छित दिशा में चलायमान होने में समर्थ होती है वह स्वयं के निर्णय लेने में समर्थ रहती है नकारात्मक शक्तियां मंत्र शक्ति से परिपूर्ण आत्मा को प्रभावित नही कर सकती है इसलिए जीवन मे नियमित मंत्र जाप अत्यंत उपयोगी है

Sunday, April 1, 2018

वैदिक दैविक यज्ञ

चार दिन की चांदनी फिर अंधियारी रात

जो मस्ती में मस्त रहा ईश्वर उसके साथ 

 

जहा रही नई सोच है जीवन है गतिमान

स्थिरता में शून्य रहा विकसित ऊर्जावान

 

जीव है जग में पड़ा रहा जीवन का न पार

हे! नारायण दूत हमे दुर्गम पथ से तार

 

हर कण में है व्याप्त रहा परमेश्वर सर्वज्ञ 

जीवो का कल्याण करे वैदिक दैविक यज्ञ 


 


Saturday, March 24, 2018

प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है


प्रेम यदि पूजा हो तो प्रेरणा प्रदान कर 

वह ऊर्जा बन जीवन को प्रकाशित करता है 

प्रेम यदि  कामना हो तो वह व्यसन बन 

व्याभिचार की और ले जाता है 

प्रेम यदि  भक्ति हो तो शक्ति बन जाता है 

मन की शक्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक उत्थान की ले जाती है

प्रेम यदि वात्स्ल्य हो तो

 ममता और पोषण प्रदान कर स्वास्थ्य प्रदान करता है 

प्रेम यदि करुणा हो तो 

आँसू  बन कर सम्पूर्ण मानवता को सींच देता है 

प्रेम यदि सेवा हो तो

 वह कर्म बन धर्म को जागृति देता है 

प्रेम यदि आशीर्वाद बन जाए तो 

भिक्षा में शिक्षा की दीक्षा प्रदान कर 

शिष्य को सम्पूर्णता प्रदान कर देता है

प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है 

प्रेम की प्रतिष्ठा है प्रेम से ही जीवन गतिमान है 

प्रेम की भावना जीवंत है वसंत है 

प्रेम  स्वयं ही एक धर्म है एक पंथ है 

 

 


Tuesday, February 13, 2018

शिव शंकर

शिव शंकर का ध्यान करो भीतर करो प्रवेश
कुदरत से श्रंगार धरे  शिव का अदभुत वेश

शिव जी शक्ति देत रहे भक्ति और आनंद
सुरभित आस्था होत रही महकी आती गंध

शिव की पुत्री साथ रही साथ रहे सुख चैन
रेवा मैय्या बांट रही करुणा निश्छल प्रेम

मुक्ति की मुस्कान रहे ज्योति पुंज है जीव
भक्ति जिसके पास रही पाया उसने शिव

शिव शक्ति दोउ साथ रहे साथ रहे सब जीव
पूजित शक्ति होत रही वंदित होते शिव

जीवन सारा बीत गया बीत गई कई रैन
शिवरात्रि को खूब मिला व्याकुल मन को चैन

शिव श्रध्दा से जीत मिली  प्रीत भरी मुस्कान
हर निश्चय को लक्ष्य मिले शिव जी दो वरदान

शिव व्यापत हर रूप रहे धूप रहे और छाँव
दुर्बल मन की पीर हरो डग मग होती नाव

Saturday, October 7, 2017

व्यक्ति की अवस्था

मन जब अबोध और मासूम होता है तब बच्चा कहलाता है 
बच्चा जैसे जैसे समझने लगता है 
सांसारिक जटिलताओं से निपटने  के लिए 
कुटिलताओ  सीखने की कोशिश में बच्चा किशोर हो जाता है
किशोरवय में कई भटकाव होते है 
भटकाव में व्यक्ति सम्हाल जाए तो जीवन संवर जाता है 
संघर्षो की राह पकड़ किशोर जीवन की ऊंचाइयों को पाता है 
भटकाव में व्यक्ति भटक जाए बहक जाए तो वह पतित होकर 
अनैतिक साधनो को अपनाने लगता है अपराधी बन जाता है 
कोई भी व्यक्ति जो मासूम और अबोध और बच्चा होता है 
कब अपराधी बन जाए उसे पता ही नहीं च लता 
अपराध को ही अपनी नियति मान लेता है 
किशोर अवस्था में जो जैसा बन गया जैसा ढल गया 
वैसा ही उसका जीवन मुकाम पाता है
कोई व्यक्ति कठिनाइयों से कमजोर 
तो कोई व्यक्ति कठिनाईयो में निखार जाता है
कोई व्यक्ति सुविधाओं में सम्बल  पाता है 
तो कोई व्यक्ति सुविधाओं में दुर्बल हो जाता है
अभावो में किसी की प्रतिभा निखर जाती है 
तो किसी व्यक्ति की प्रतिभा अभावो में दम तोड़ देती है
जीवन में समताये कम है विषमताएं ज्यादा है 
कभी परिस्थितिया व्यवस्थाएं बन जाती है 
तो कभी परिस्थितियां विवशताये बन जाती है