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Monday, June 15, 2020

वह हार नही मानता




जीवन में एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति चारो और से ख़ुद को ठगा सा पाता है ,उसने सारी जिंदगी जिस उम्मीद को लिए खुद को दिलासा दिया एक वक्त के बाद वह उस उम्मीद को भी धुंधला सा पाता है..

फिर भी जाने किस विश्वास में वह खुद को ढांढस बंधाता है और उसी धुंधली उम्मीद को लिए अपना बोझ उठता है..

अपने अतीत से जब जब वह आंखे मिलाता है  उसकी आंखों से सदा पानी बह आता है जाने क्या देखता है वह अतीत के झरोखें में जो उसे आज भी रुलाता है..

कुछ यादें उसके दर्द को मरहम लगाती है तो वह मुस्कुराता है इसी हल्की सी ख़ुशी में वह खुद को बहलाता है और आगे बढ़ता है पग पग जीवन का बोझ उठाता है..

अब उसके चेहरे पर थकान सी दिखने लगी है निराश है शायद साँसे थकने लगी है कोई तो बात है जो वह फिर भी चल रहा है उसे मालूम है कि वक़्त भी उसे छल रहा है..

उसने भी तो कहां अभी रार मानी है समय को चुनौती देती उसकी वाणी है, जो सोचा था वैसा कब होता है यही सोचकर वह जीवन का बोझ ढोता है...

अब आगे क्या होगा यह कोई नही जानता लेकिन इतना है के वो हार नही मानता!




Thursday, June 11, 2020

चन्दावती-उपन्यास की समीक्षा

अनुज्ञा  प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास चन्दावती जो सुप्रतिष्ठित नवगीतकार श्री भारतेन्दु मिश्र द्वारा लिखित है ।एक ऐसी ग्रामीण महिला जिसका नाम चन्दावती है के जीवन पर आधारित है ।जो बाल विधवा हो गई है और उसे उसके ससुराल वालों ने ससुराल से बहिष्कृत कर दिया है ।चन्दावती तेली समाज की हैऔर वह रामलीला में सीता जी की भूमिका निभाती रही है ।गांव में ही रहने वाले और चन्दावती से आयु में अधिक ब्राह्मण समाज के विधुर व्यक्ति हनुमान दादा जो रामलीला में रावण की भूमिका निभाते रहे है और पहलवानी के शौकीन है का चन्दावती से प्रेम हो जाता है ।दोनों एक दूसरे से विवाह कर लेते है ।बाद में चन्दावती को पता चलता है कि हनुमान दादा कुश्ती में आई चोट के कारण संतानोत्पत्ति में असमर्थ है । मैले में लगने वाले जड़ी बूटियों के दवाखाने में उपचार हेतु सपत्नीक जाते है जहाँ बाबा चन्दावती को नियोग की सलाह देते है चन्दावती उपरोक्त परिस्थितियों में स्वयं को ठगा हुआ पाती है 
       चन्दावती को ब्राह्मण समाज से भिन्नं तेली समाज की सदस्य होने के कारण हनुमान दादा के परिवार के लोग उनके भाई और भतीजा शिवप्रसाद तरह तरह से अपमानित करते है।एक बाल विधवा को कितनी प्रकार की मानसिक यातनाएं झेलना पड़ती है यह उपन्यास में बहुत अच्छी तरह से दर्शाया है लोग ऐसी महिलाओं से अनैतिक संबंध बनाना चाहते है पर विवाह कोई नही करना चाहता है ।निचले तबके की विधवा महिला से विवाह करने वाले सवर्ण पुरुष को भी हेय दृष्टि से देखा जाता है ।चन्दावती जिसने अपने भतीजे शिवप्रसाद को पुत्रवत स्नेह दिया ।शिवप्रसाद के विवाह उत्सव के दौरान जिस उत्साह का प्रदर्शन किया ।उसी के द्वारा चन्दावती के पति की मृत्यु हो जाने पर जिस प्रकार से चन्दावती को घर से बाहर निकाल दिया जाता है ।वह अत्यंत हृदय विदारक है लेखक द्वारा विवाह उत्सव पर बारात प्रस्थान के पश्चात महिलाओं द्वारा किये जाने वाले प्रहसनों को जिस मनोरंजक अंदाज में प्रस्तुत किया गया है वह अद्भुत है ।चन्दावती को उसके भतीजे शिव प्रसाद द्वारा घर से बाहर निकालने पर चन्दावती द्वारा जिस प्रकार प्रतिकार किया जाता है वह उल्लेखनीय है धरना प्रदर्शन देवी दल का गठन, ग्रामीण महिलाओं में रचनात्मक शक्ति का निर्माण , अपनी आवाज को सर्वोच्च स्तर पर पहुचाना, इन सभी उपक्रमो का उपन्यास में बहुत अच्छी प्रकार से समावेश किया गया है ।ग्रामीण आंचलिक महिलाओं की कठिनाइयों के बारे नगरों की अभिजात्य वर्ग की महिलाओं और उनसे जुड़े आंदोलनों को पता ही नही है 
        उपन्यास में आगे चन्दावती के उसके पति की सम्पति के अधिकारों के संघर्ष को लेकर गांव की कुंताबाई और उसकी लड़कियों द्वारा सहयोग दिया जाता है ।चन्दावती के संघर्ष में उसका भाई शंकर भोजाई रजना भी सहयोग करती है ।गांव की राजनीति , पुलिस प्रशासन का धन बल के सहारे  चन्दावती भतीजे शिवप्रसाद द्वारा अपने पक्ष में उपयोग कर चन्दावती को कुचलने के किस प्रकार प्रयास किया जाता है ।यह हमारे पंचायती राज और प्रशासनिक व्यवस्था पर कई प्रश्न चिन्ह खड़े कर देता है इसी कड़ी में एक हद तक लोक तंत्र के चौथे स्तम्भ को भी उपन्यास ने कठघरे में खड़ा किया है । अंत मे चन्दावती और कुंता शिव प्रसाद द्वारा रचे गए षडयंत्रो के तहत मारी जाती है परन्तु चन्दावती द्वारा जो आंदोलन स्वयम के अधिकारों के लिए प्रारम्भ किया गया था। वह अंचल की समस्त नारी समुदाय के लिये बन जाता है। जिस मकान से चन्दावती को बहिष्कृत किया गया था।वह देवी दल का कार्यालय और जो जमीन उसे मिलना थी उस विद्यालय निर्माण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है
         उपन्यास की अंतर्वस्तु और भाषा सरस हैं ।मूल रूप यह उपन्यास अवधी भाषा मे लिखा गया है बाद में हिंदी में अनुवाद किया गया है इसलिए अवधी भाषा के अंचल में प्रचलित लोक गीतों को पढ़ने का अवसर भी मिल जाता है।कुल मिला कर इस उपन्यास की विशेषता यह है कि जो पाठक इसके कथानक से जुड़ जाता है तो वह पढ़ते चला जाता है कथा में निरन्तर प्रवाह है । कथानक की परिस्थितियां कृत्रिम नही लगती ।पात्र जीवंत प्रतीत होते है 

Tuesday, June 9, 2020

गुस्सा करने का अधिकार

गुस्सा अर्थात क्रोध करने का अधिकार भी हर किसी को उपलब्ध नही होता । यह अधिकार एक विशेषाधिकार है या तो गैर जिम्मेदारों का हथियार होता है या अधिकारों से सम्पन्न ऐसे व्यक्तियों को प्राप्त होता है। जो दूसरों पर अनावश्यक रूप से अपना प्रभुत्व जमाना चाहते है । बेचारे गरीब शोषित , अपना उत्तर दायित्व समझने वाले व्यक्ति को गुस्सा करने का अधिकार कहा रहता है। जिसके पास कुछ खोने का भय नही होता और पाने कोई संभावना नही रहती ।वह गुस्सा कर अपने महत्व स्थापित करने का प्रयास करता है और परिवार व समाज मे कलह ईर्ष्या अशांति का वातावरण तैयार कर अपनी मांगे मनवाता है ।
           थोड़ी थोड़ी बात पर गुस्सा हो जाना ,बात बात पर भड़क जाना,अपनी बात को स्वीकारोक्ति दिलवाने के लिए अनुचित तर्कों का सहारा लेना,यह एक कमजोर  और असफल व्यक्ति के लक्षण है । समझदार व्यक्ति के लिए ऐसे व्यक्तियों से निपटने के लिए स्वयं को संयमित और नियंत्रित करने के अतिरिक्त कोई उपाय नही है ।
          कमजोर और असफल व्यक्तियों को यह पता ही नही चलता कि उनकी गुस्सेल प्रवृत्ति से अभी तक कितना नुकसान उठा चुके है । हकीकत में उनकी असफलता का सबसे बड़ा कारण उनका अकारण और असमय अनुचित्त व्यक्ति पर गुस्सा होना ही होता है।बेचारा सफल और जिम्मेदार व्यक्ति तो निरंतर जहर ही पीता रहता है ।अनगिनत कठिनाईया उठाने के बावजूद समस्या के समाधान में रत रहता है
          कभी कभी लोग यह यह कहते है अमुक व्यक्ति को गुस्सा आता ही नही है ।उन्हें यह मालूम नही होता कि बेचारे उस व्यक्ति को अतीत में गुस्से की कीमत चुकाई है । वैसे भी हर किसी व्यक्ति पर गुस्सा भी तो नही किया जा सकता ।व्यक्ति जिसे अपना समझता है अधिकार समझता है।उसी पर गुस्सा किया जा सकता है ।अविश्वसनीय पराये और अनुत्तरदायी व्यक्ति पर गुस्सा करने से क्या लाभ । समाज मे ऐसे कितने व्यक्ति है जो किसी पर गुस्सा नही करते उसका कारण यह है ।एक एक उनका सारे रिश्तों से विश्वास उठ चुका है ,आत्मीयता समाप्त हो चुकी है मात्र कर्तव्य समझ कर अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे है ।लोगो को ऐसे व्यक्तियों को कभी हल्के में नही लेना चाहिए। ऐसे व्यक्ति कभी भी बड़ा निर्णय ले सकते है ।जिसका परिणाम ऐसे लोगो को उठाना पड़ सकता है जो छोटी छोटी बात पर गुस्सा करना अपना अधिकार समझते है और ऐसे जिम्मेदार और संयमित व्यक्ति अपमानित करते रहते है

Monday, June 8, 2020

नीति नियत और नियति -कहानी

अभय के परिवार में तीन सदस्य थे ।अभय उसकी माँ और उसके पिता शिवनारायण शिवनारायण शासकीय सेवक थे ।
       यदा कदा अभय और उसकी माता के बीच यह चर्चा होती रहती थी कि शिवनारायण जी का स्वास्थ्य खराब रहता है,यदि शिवनारायण के सेवा निवृत्ति के पूर्व उनकी मृत्यु हो जाती है तो अभय को अनुकम्पा नियुक्ति और उसकी मां को पेंशन मिलती रहेगी ।इस प्रकार अभय और उसकी माँ अपने भविष्य के लिए पूरी तरह से आश्वस्त थे ।शिवनारायण जी के स्वास्थ्य खराब रहने कारण उनकी समय समय पर चिकित्सा और जांच होती रहती थी।दवाईया भी समय समय पर दी जाती थी ।
     अभय अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त होने के कारण किसी प्रतियोगी परीक्षा में भाग नही लेता और नही पढ़ने लिखने में उसकी कोई रुचि थी।शिवनारायण जी अभय को कुछ कहते तो अभय की माँ शिवनारायण जी को टोक देती उन्हें कुछ कहने नही देती ।शनै: शनै: समय निकलता जा रहा था। अभय निरन्तर ढीठ और उद्दंड होता जा रहा था।   इधर एक दिन अभय की माँ को अचानक चक्कर आ गए और वह बाथरूम में गिर पड़ी ।डॉक्टर को बताया तो कई प्रकार की  चिकित्सकीय जांचे हुई। रिपोर्ट आने पर पता चला कि अभय की माँ को गम्भीर और असाध्य बीमारी है । अभय के पिता को शासकीय सेवा करते करते 60 वर्ष पूरे होने वाले थे ।सेवा निवृत्त होने के ठीक दूसरे दिन अभय के पिता शिवनारायण को ह्रदयाघात हो गया ।हॉस्पिटल में भर्ती होने के उनका देहांत हो गया ।अब तो अभय की अनुकंपा होने के भी सारी संभावना भी समाप्त हो गई थी। अभय एवम उसकी माता को इस बात का दुख था कि शिवनारायण को मरना ही था तो सेवा में रहते मरते ,सेवा निवृत्त होने के दूसरे दिन मरने से क्या लाभ हुआ ।एक मात्र अनुकम्पा नियुक्ति की अभय की आशा भी टूट गई। फिर भी अभय को इस बात के लिए हो गया कि अभी तो माँ की पेंशन से काम चलता रहेगा ।परन्तु भाग्य को कुछ और ही मंजूर था।अभय मां की बीमारी अब और भी अधिक बढ़ चुकी थी।गंभीर स्वरूप धारण करने से दवाईयों का खर्च भी अत्यधिक हो गया था। माँ की पेंशन के सारे पैसे इलाज में ही खर्च होने लगे ।अभय की आंखों के आगे अंधेरा छा गया था ।
            अभय अब स्वयम को असहाय अनुभव कर रहा था।सोच रहा था काश उसने कोई अच्छा सोच होता है ।वह सकारात्मक सोच रखता तो आज वह अपने पैरों पर खड़ा होता ।उसे समझ आ गया था यह आदमी की नीति और नियत का ही खेल है ।आदमी की नीति और नियत जैसी होती है उसकी नियति वैसी ही बन जाती है ।

Thursday, May 28, 2020

उपन्यास -शिगाफ

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास शिगाफ  महिला लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ द्वारा लिखित है। उपन्यास का आरम्भ कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी पंडित परिवार की एक युवती अमिता जो स्पेन के बार्सिलोना और मेड्रिड शहर में निवास करती है कि आत्मकथा के रूप में लिखी जाने वाली डायरी से होता है । लेखन और अनुवाद के व्यवसाय से जुड़ी  कश्मीरी युवती का संपर्क प्रकाशन व्यवसाय से जुड़े इयान ब्रान से होता है। अमिता और इयान के प्रेम और प्रणय की परिस्थितियों के बीच उपन्यास की कथा आगे बढ़ती है , जो बार बार स्पेन और कश्मीर के बीच की सामाजिक परिस्थितियों और राजनैतिक पृष्ठभूमियो के विश्लेषण तक पहुचती है 
        अमिता उपन्यास की कथा के अनुसार आत्मानुभव अपने  भाई अश्वथ से ब्लॉग के माध्यम  से बाँटती है ।कालांतर में अमिता भारत में आ जाती है। दिल्ली शहर में अमिता उसके पिता और उसके अंकल जो कश्मीर से विस्थापित हो कर कठिन परिस्थितियों में रह रहे है ।उनके कश्मीर की समस्या के प्रति दृष्टिकोण और अनुभूतियो को देखती है ।जम्मू के शरणार्थी शिविरों में कश्मीरी पंडितों की यंत्रणा पूर्ण जिन्दगो को यह उपन्यास परिचित कराता है 
   उपन्यास की कथा के दौरान अमिता कश्मीर के श्रीनगर और पहलगाम पहुचती है जहाँ उसके भाई अश्वत्थ का रंगकर्मी मित्र वजीर मिलता है जो उसके पैतृक निवास स्थान पर ले जाता है अमिता के सामने वे भावुक पल होते है जब उन्हें आधी रात को उसके परिवार सहित कश्मीर से खदेड़ा गया था । कश्मीर में अमिता उसके शिक्षक रहमान सर से मिलती है ।रहमान सर की लड़की यास्मीन जो अमिता की बचपन की सहेली होती है उसकी डायरी जब अमिता को रहमान सर से प्राप्त होती है ।तब उपन्यास यास्मीन की आत्मकथा के रूप में प्रारम्भ होता है ।जिसमे यास्मीन का निकाह एक विधुर से कर दिया जाता है।।कश्मीरी युवतियों को आतंकवादियों द्वारा प्रेमपाश में फांस कर किस प्रकार मानवबम के रूप में प्रयुक्त किया जाता है ,यह उपन्यास में अच्छी तरीके से बताया गया है ।कश्मीर समस्या पर उपन्यास के माध्यम से विभिन्न दृष्टि से देखने का प्रयास किया गया है । कश्मीर समस्या के फलस्वरूप उपन्यास में यह तो बताया ही गया है कि कश्मीर में किस प्रकार कश्मीरी पंडितो पर नृशंस अत्याचार कर बेदखल किया है साथ मे यह भी बताया गया है एक आम कश्मीरी किस प्रकार से आर्मी और आतंकवादियों के बीच मे बुरी तरह फंसा हुआ है ।कई गांव पुरुष विहीन हो चुके है मात्र महिला, बच्चे और वृध्द बचे हुए है ।उपनयास का अंत भूकम्प की त्रासदी से होता है
       उपन्यास की मुख्य पात्र अमिता निरन्तर प्रेम और प्रणय के निश्चय अनिश्चय में झूलती रहती है ।कभी वह इयान ब्रान के प्रति तो कभी कश्मीरी पत्रकार जमाल के तो कभी आर्मी के जवान शांतनु में अपना प्रेम तलाशती है ।उपन्यास में अलग अलग प्रक्रमो पर अलग अलग पात्र आत्मकथा के रूप उपन्यास की कहानी को आगे बढ़ाते है ।उपन्यास में पात्रो द्वारा स्वयम से संवाद भी किया गया है ।संवाद की भाषा और भाव काव्यात्मक होकर अनुभूतियो की प्रखरता को प्रकटित करते है 

Friday, May 22, 2020

उपन्यास 84

सत्य व्यास द्वारा लिखित 84 चौरासी उपन्यास 1984 के सिख विरोधी दंगो पर आधारित है । उपन्यास का प्रारम्भ लेखक द्वारा उपन्यास के महत्वपूर्ण पात्रो मनु , मनु की माँ मनु के पिता छाबड़ा साहब और ऋषि जो मनु के मकान का किरायेदार होता के परिचय कराने से प्रारम्भ होता है । छाबड़ा साहब बाहर कही से आकर ओद्योगिक नगर में रहने के लिए आते है और वे मकान खरीद कर अपने व्यवसाय  चलाते है ।मकान का किरायेदार ऋषि स्कूल के बच्चो को ट्यूशन पढ़ाता है ।मोहल्ले के अंदर जो ऋषि की साफ छवि होती है, मोहल्ले के बाहर इसके विपरीत उसका उद्दंड व्यक्तित्व होता है 
        छाबड़ा साहब की एक मात्र लड़की मनु जो मन ही मन ऋषि की और आकर्षित होती है , वह कॉलेज की छात्रा होते हुए ऋषि से ट्यूशन पढ़ने का आग्रह करती है ।ऋषि के मना करने पर उसे भावनात्मक दबाव में ले लेती है, फिर मनु को पढ़ाने के लिये मान जाता है। अंततः मनु और ऋषि में निश्चय अनिश्चय के बीच मन मोहक संवादों और भाव भंगिमाओं के बीच प्रेम की परिणीति होती है । इसी दौरान बिहार में सूर्य पूजा के त्यौहार हलछठ पर मनु और ऋषि के मध्य उपस्थित हुए प्रेम प्रसंग महत्वपूर्ण हो जाते है ।लेखक ने हलछठ के उत्सव  और उससे जुड़ी परम्पराओ का उल्लेख बहुत ही विस्तृत किया है । प्रेमी युगल के बीच उपजे प्रसंगों  और भावनाओं को काव्यात्मक रूप से रेखांकित किया है  । 
   उपन्यास  में मोड़ तब आता है जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री की उनके अंग रक्षको की हत्या के परिणाम स्वरूप सिख समुदाय के विरुध्द लोगो आक्रोश घृणा  पैदा होता है ।जिसके कारण ऋषि द्वारा उसकी प्रेमिका मनु और उसके परिवार को आक्रामक भीड़ से बचाने के प्रयास किये जाते है और इन प्रयासों के दौरान भीड़ का हिस्सा रहते हुए चुनोतियो का सामना करना पड़ता है ।हिंसा के दृश्यों को लेखक द्वारा शब्द चित्रों के माध्यम बहुत ही बेहतर तरीके से दर्शाया है। दंगा समाप्त होने के उपरांत ऋषि द्वारा मनु और उसके  परिवार को सफलता पूर्वक बचा लेने के बाद जो प्रेमी और प्रेमिका  का बिछोह होता है वह दुखांत है जो गंगा सागर की यात्रा तक समाप्त होता है 

Sunday, May 17, 2020

"प्रेम लहरी " एक उपन्यास

हाल ही में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित "प्रेम लहरी " एक ऐसा उपन्यास है जो मुग़ल  बादशाह शाहजहाँ के शासन काल के समय प्रचलित व्यवस्था सामाजिक परिवेश उनकी पारिवारिक स्थितियो को दर्शाता है शाहजहाँ  की बेगम मुमताज के प्रति उनके प्रेम की परतो को खोलता है शाहजहां की १४ सन्तानो की उत्पत्ति को लेकर उनकी प्रेम के नाम पर कामुक भावनाओ का परिचय देता है |   वैसे तो इस उपन्यास में मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओ के प्रति तीर्थ यात्रा को लेकर लिए जाने वाले कर का उल्लेख किया गया है तथा बिना शासकीय अनुमति के हिंदु  मंदिरो के निर्माण  किये जाने के निषेध सम्बंधित विधि की और ध्यान दिलाया गया है |  परन्तु  शाहजहाँ और उसके पुत्र दाराशिकोह को  हिन्दू मान्यताओं पर विश्वास  करने सम्बंधित प्रसंग भी बताये गए है |  त्रिलोकी नाथ पांडेय द्वारा अभिलिखित इस उन्यास को पढ़ते समय लगता है कि  हम उस युग में प्रवेश कर रहे है ।उपन्यास को पढ़ते समय कथानक के समस्त पात्रो के चित्र और स्थान हमारी कल्पना के पटल पर उतरते चले  आते है |
 उपन्यास का मुख्य पात्र पंडित जगन्नाथ के व्यक्तित्व का प्रभावी रूप से उल्लेख किया गया है पंडित जगन्नाथ की काव्यात्मक प्रतिभा और शारीरिक क्षमता का एक साथ होना शाहजहाँ  की सबसे छोटी पुत्री लवंगी के ह्रदय में प्रेम अंकुरित कर देता है | जहाँ  पंडित जगन्नाथ और लवंगी के बीच निश्छल प्रेम जो आध्यत्मिक उंचाईयों को छूता  है | वही शाहजहाँ  की बड़ी पुत्री जहां आरा  के बादशाह के साथ अनैतिक सम्बन्ध और रोशन  आरा के कामुकता  पूर्ण स्वेच्छाचारिता विचलित  कर देती है |  उपन्यास में पंडित जगन्नाथ के गुरु पंडित कवींद्र  के बारे में काफी अच्छे तरीके से बताया गया है | तत्कालीन समय में जो उनकी हिन्दू समाज में उपस्थिति दर्शाई गई है वह काफी महत्वपूर्ण है |  उपन्यास में एक पात्र आता है वैद्य  सुखदेव | वैद्य सुखदेव आर्युवेदिक ओषधियो  को  बाादशाह हेतु तैयार कर करता है और किस प्रकार बादशाह तैयार की गई वाजीकारक ओषधियो का उपयोग कर अपनी वासनाओ की तुष्टि करते है यह बहुत ही चुटीले अंदाज बताया गया है | 
         उपन्यासकार द्वारा भाषा का चयन  पात्रो के अनुसार किया है |  उपन्यास में यथा  स्थान पात्रो के संवाद जिस चुटीली भाषा में अंकित किये गए है उनसे राग दरबारी की याद आ जाती है | विशेष रूप से काशी में एक निः संतान सेठ को संतान प्राप्ति पर शिव मंदिर निर्माण का घटनाक्रम में उपजे शब्द चित्र उपन्यासकार श्री  लाल शुक्ल के उपन्यास "राग  दरबारी "की याद दिला देते है |  प्रेम लहरी उपन्यास में पात्रो के माध्यम से लेखक ने कई भजनो ,श्लोको आर्युवेदिक ओषधियो के सूत्रों का उल्लेख किया है | उपन्यास पढ़ते समय लगता है लेखक ने उपन्यास  वर्णित काल को जिया है \उपन्यास के अंत में प्रेमी जोड़े पंडित जगन्नाथ एवं शहजादी लवंगी का विवाह धर्म की दीवारों के कारण असंभव होना दर्शाते हुए \बादशाह शाहजहाँ  को एक हिन्दू विधवा चंद्रशिला के शीलभंग  के प्रयास और प्रयास के दौरान चंद्रशिला द्वारा आत्महत्या की जा बताया है \ कुल मिलाकर यह उपन्यास पाठको की ऐतिहासिक  जिज्ञासाओं को शांत करता है \शाश्वत प्रेम के प्रति आस्था जाग्रत करता है \ मुग़ल बादशाह शाह जहां के तथाकथित प्रेम के प्रति भ्रांतियों का निवारण करता है