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Wednesday, November 28, 2012

नदी



 
नदी गतिशील हो ​,सागर को नापती है
नदी की हिम्मत से,सीमाये काॅपती है
नदी नदी नही,बहती  हुई सदी है
नदी की गति से ऊॅचाई  पर्वत की  हाॅफती है

Tuesday, November 27, 2012

स्नेह


स्नेह जब ममत्व का रूप धारण करता है
तो ममता कहलाता है
स्नेह जब करूणा का रूप धारण करता है
तो मानवता कहलाता है
स्नेह जब पीठ थपथपाकर अाशीष देता है
तो पित्रत्व का भ्रात्रत्व का  भाव कहलाता है
स्नेह जब मधुर भावना से अाहार खिलाता है
अाहार मे सौहार्द सदभाव मिलाता है
तो भीतर से उर्जा को बाहर ले अाता है
स्नेह के कई रूप होते है
कभी शीतल सी भावना तो कभी तेज
अौर अोज की धूप होते है
स्नेह कभी भगवान क्रष्ण बनते है
राधा के रूप मे सम्वेदना के तार बुनते है
स्नेह बनता है शबरी तो ,झुठे बैर श्रीराम खाते है
जात -पात अस्पर्श्यता की दूरियो को वे मिटाते है
योगेश्वर श्रीक्रष्ण का समस्त जीवन स्नेह से भरा है
स्नेह शुन्य व्यक्तित्व तो ​​मरा है अधमरा है

Monday, November 26, 2012

व्यक्तित्व निर्माण मे अनुकूलन क्षमता

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व्यक्तित्व निर्माण के क्षैत्र मे एक महत्वपूर्ण सूत्र है
स्वयम मे अनुकूलन क्षमता का विकसित करना
अनुकूलन क्षमता का सीधा सम्बन्ध विपरीत परिस्थितियो
स्वयम की क्षमता का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना होता है
अथवा नितान्त जीवन के लिये अनुपयुक्त परिस्थितियो मे
जीवन निर्वाह कर लेना अनुकूलन क्षमता होती है
अनुकूलन क्षमता के प्रमाण प्रक्रति मे चारो तरफ बिखरे पडे है
हाइड्रिला नामक जलीय पौधा का निरन्तर 
जल मे मग्न रहते जीवित रहना
,नागफनी का पौधे का मरूथल मे जीवन को बचाये रखना
वनस्पतिक अनुकूलन क्षमता है
हम बहुत से ऐसे लोगो को जानते है
जो निरन्तर परिस्थितियो का रोना रोते रहते है
मौसम को कोसते है
अपनी असफलताअो के लिये दूसरो को दोषी मानते है
वे व्यक्ति जीवन मे कभी सफल नही हो सकते है
सफल वह व्यक्ति होता है जो घोर विषम परिस्थितियो मे भी
धैर्य नही खोता ,परिस्थितियो से सन्तुलन स्थापित कर
अपने लक्ष्य की अोर निरंतर अग्रसर होता जाता है
प्रत्येक परिस्थिति मे संतुष्ट रहता है
अपनी वास्तविक क्षमता अौर कमजोरियो को अच्छी तरह जानता है
निरन्तर अात्म मुल्यांकन करता रहता है
अपनी मौलिक क्षमता के अनुरुप लक्ष्य निर्धारित करता है
असफल होने पर निराश नही होता है
असफलता मे सफलता के बीज तलाश करता है
ऐसा व्यक्तित्व विपरित परिस्थितियो रोना नही रोता
अपितु प्रतिकूलताअो को अपने लिये वरदान बना लेता है
इतिहास साक्षी है सम्राट चन्द्रगुप्त , योगेश्वर श्रीक्रष्ण
शैशव काल से ही घनघोर प्रतिकूलताअो मे रहे
पर वे कभी दुखी नही हुये स्वयम दुखो से घिरे होने के बावजुद
 दूसरो के दुख कम किये
संसार प्राणीयो की अाॅखो से अाॅसू पौछे
अनुकूलन क्षमता का अाशय यह नही है कि
विचारो से समझौता कर पतन की राह पर चले जाना
अनुकूलन क्षमता सकारात्मक सोच को 
अागे बढाने वाली होनी चाहिये
जिस प्रकार हमारे महापुरुष महाराणा प्रताप ने
वनवासियो की तथा भगवान राम ने वानरो की क्षमताअो
का उनके बीच रह कर समाज कल्याण 
तथा राष्ट्र रक्षा के लिये उपयोग किया
नकारात्मक विचारो प्रभावित हुये बिना
अपने सर्वोच्च अादर्शो पर टिके विचारो से 
जन -मन को प्रभावित किया था

Friday, November 23, 2012

अवसर,उपलब्धि एवम सफलता

तीन प्रकार व्यक्ति थे
प्रथम प्रकार के व्यक्ति को राह पर पडा
काॅच का टुकडा पडा मिला
उसने काॅच के टुकडे को हीरा समझ कर
अपने पास रख लिया
दूसरे व्यक्ति को राह पर हीरा मिला
जिसे उसने काॅच टुकडा समझ कर फेंक दिया
तीसरा व्यक्ति जिसे काॅच के टुकडे
अौर हीरे मे अन्तर ज्ञात था
फेंके गये हीरे को अपने पास रख लिया
आशय यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन मे
कर्मरत रहते कुछ उपलब्धिया हासिल होती
व्यक्ति उन उपलब्धियो अौर अवसरो की पहचान करे तो
उपब्धिया अनमोल रुप धारण कर
व्यक्ति के लिये जीवन पर्यन्त उपयोगी रहती है
कुछ व्यक्ति अपने जीवन मे काॅच के टुकडे के
समान बहुत सी अनुपयोगी वस्तुअो
अौर गुणहीन
                              व्यक्तियो के समूह को एकत्र कर
उन्हे अनमोल समझने की गलती कर बैठते है
हम बहुत से ऐसे व्यक्तियो को देखते है
जो जीवन मे हीरे या स्वर्ण के समान हाथ मे
अाये अवसरो को पहचान नही कर
पाने की वजह से उन्हें खो बैठते है
जबकि सभी जानते है कि जीवन मे सुनहरे
तथा हीरे से मूल्यवान अवसर बार-बार नही मिलते है
कितना भी दुर्भाग्यशाली व्यक्ति हो
उसके जीवन मे स्वर्ण अवसर उपलब्ध हो जाता है
परन्तु वह उसे पहचान नही पाता है
जीवन मे सुनहरे अवसरो की पहचान ही उपलब्धि बन जाती है
ऐसे कई उपलब्धियों का समूह व्यक्ति को
समग्र रुप से सफलता प्रदान करती है

Wednesday, November 21, 2012

राधा क्रष्ण

राधा अौर क्रष्ण प्रेम शब्द के प्रतीक है
प्रेम शब्द जब अध्यात्मिक स्तर तक पहुॅच जाता है
तब परमात्मा श्रीक्रष्ण तथा अात्मा राधा का 
  रुप धारण कर लेती है
राधा अौर श्रीक्रष्ण भगवान के प्रेम की गहराई त
था उसकी अलौकिक ऊॅचाई
संत, महंत ,सूर ,मीरा ने अपने अपने तरीके से अभिव्यक्त की है
पर उनके प्रेम की व्याख्या अाज भी अधूरी है
राधा अौर क्रष्ण के सम्बन्ध मे किसी प्रकार का अनुबंध नही है
अनुबंध तो सम्बन्ध को संकीर्ण बना देता है
अनुबंध से जुडे सम्बन्ध देहिक होते है
राधा अौर क्रष्ण का सम्बन्ध किसी प्रकार की परम्पराअो
रिति रिवाजो के मोहताज नही रहे है
वैवाहिक समारोह की किसी सामाजिक मान्यता से परे
राधा अौर क्रष्ण का प्रेम तो अात्मा की 
  परमात्मा से अासक्ति है
अौर सामाजिक बन्धनो से मुक्ति है विरक्ति है
यदि हम स्वयम को किसी कर्म काण्ड विधी-विधान से
परमात्मा तत्व से जोडते है
तो परमात्मा की सीमित क्रपा ही प्राप्त होती है
अात्मा को हम राधा के समान
किसी लौकिक मर्यादा अनुष्ठानो से परे
परमात्मा से जोडते है तो
परमात्म रूप क्रष्ण तत्व स्वयम
हमारी अात्मा की अोर खींचा चला अाता है
तब परमात्मा रूपी श्री क्रष्ण की
अानन्द की बाॅसुरी की ध्वनि हमारे अतिरिक्त
अौर किसी को सुनाई नही देती है

Tuesday, November 20, 2012

संकल्प शक्ति आभाव व् द्रढ़ता -












संकल्प शक्ति आभाव व्  द्रढ़ता -

संकल्प कोई छोटा मोटा शब्द भर नही हैं ये एक एसा शब्द हैं जो अपने आप मैं एक पूरा इतिहास लिए हुए हैं ये बहुत महान शब्द हैं और केवल पुरषार्थ करने वाले लोग ही इस शब्द का महत्व जानते हैं .

संकल्प का  अर्थ क्या होता हैं  -  
इस विषय मैं इतना ही कहा  जाना उचित हैं की किसी कार्य को करने के लिए अथवा न करने योग्य कार्य को करने से स्वयम को रोकने के लिए मन को कठोर करना स्वयम को प्रेरित करना मन को अनुशासित करना उसके पश्चात स्वयम को अनुशासित करना और फिर धर्म अनुरूप उसे करना न करना यही संकल्प की मोटी मोटी परिभाषा हैं

कार्यो का लक्ष्य स्वरूप ( करने व त्याज कार्यो का स्वरूप ) -

अब कल्पना कीजिये की आप ने संकल्प लिया की मैं सुबह चार बजे उठ कर दौड़ लगाने जाऊंगा, अब यदि आप किसी प्रेरणा से प्रेरित होकर कठोर संकल्प लेते हैं तो अवश्य आप उठेगे, परन्तु यदि आप मैं संकल्पशक्ति का आभाव हुआ तो सुबह की गहरी नींद ,रजाई की गर्माहट ,और आलस्य का आनन्द आप के संकल्प पर भारी पड़ जायेगा और आप कभी अपने लक्ष्य को नही पा सकेंगे .
आप जीवन मैं कोई भी लक्ष्य निर्धारित करे तो उसे पूरा करने के लिए कठोर परिश्रम और  त्याग करना अनिवार्य हैं और ये त्याग - परिश्रम आपके ही संकल्प की उत्पति हैं .
यदि किसी को कोई बुरा व्यसन हैं तो उसे छोड़ने के लिए कठोर संकल्प लेना जरूरी हैं शराब की लत सिगरेट की लत आदि मादक पदार्थो से स्वयम को मुक्त  करने के लिए दृढ इच्छाशक्ति का होना आवश्यक हैं और ये  इच्छा शक्ति कठोर संकल्प से ही प्राप्त हो सकती हैं .

आज हमारे इतिहास और वर्तमान मैं जितने भी महान और आदर्श हमे देखने  व सुनने  मैं आते हैं  वे अपने द्वारा किये  गये महान कार्यो को अपने संकल्प से मूर्त रूप देकर ही इतने महान बने है।
उन्होंने वो काम किया जो साधारण लोगो को असम्भव प्रतीत होते हैं   अगर इनके संकल्प मैं कमी होती तो इतिहास के पन्नो मैं इनका नाम नही आता कमजोर संकल्प वाला व्यक्ति कभी इतिहास के पन्नो पर अपना  नाम नही लिख पाया हैं वो उसी तरह मिट गया जेसे पानी पर खिची कोई लकीर मिट जाती हैं .

किसी पहाड़ की छोटी पर एक विशाल पाषण शिला रखी थी  शिला पर लिखा था  -
"उत्थान कठिन हैं पतन सरल हैं" 

व्यक्ति को अपने उत्थान के लिए जितने भी कार्य करने पड़ते हैं वो सब कठिन हैं उन कामो को करने के लिए बहुत कष्ट सहना पड़ता हैं कई बाधाये पार करनी पडती हैं कई प्रकार के लालच जीवन मैं आते हैं और इन सब को जीत कर ही मनुष्य महान बनता हैं उत्थान के शिखर पर पहुचता हैं लाखो करोड़ो मैं कोई एक विवेकानंन्द होता हैं।

किसी सुंदरी के रूप और योवन  के आकर्षण मैं आकर काम के वेग मैं बहना अति सरल और आनंद देने वाला होता हैं पर करोड़ो मैं कोई एक एसा भी होता हैं जो अपने  लक्ष्य के आगे इस प्रस्ताव को ठोकर मार दे .
और  वही भीष्म कहलाता हैं।

आज के वर्तमान युग मैं चारो और भोतिक्तावादी संस्क्रति का बोल बाला हैं 
नित्य नए आकर्षण हमे अपने लक्ष्य से भटकाने के लिए तैयार खड़े हैं पर यदि हम अपने आदर्शो और इतिहास से प्रेरणा ले और अपनी संकल्पशक्ति के बल पर इन सभी बाधाओ पर विजय पा ले तो अपने जीवन को सार्थक कर सकते हैं।
हमारे इतिहास धर्म ग्रंथो मैं जितने भी महापुरुष व् अवतार हुए उन्होंने अपने कर्मो द्वारा हमे यही ज्ञान दिया हैं।

Monday, November 19, 2012

त्रिदेव और लोकतंत्र तीन स्तम्भ


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लोकतंत्र के मुख्य रूप से तीन स्तम्भ
विधायिका ,कार्यपालिका,न्यायपालिका है
कभी हमने सोचा है कि त्रिदेव ब्रह्मा,विष्णु ,महेश,के
व्यक्तित्व से भी तीनो स्तम्भो की भूमिका को हम भली भाॅती समझ सकते है,
यदि विधायिका का कार्य एवम अाचरण अौर भूमिकाब्रह्म देव के समान हो
तथा कार्यपालिका अर्थात प्रशासनिक अधिकारियो का कार्य एवम
अाचरण अौर भूमिका भगवान विष्णु के समान हो
व न्यायपालिका की भूमिका महेश अर्थात शिव के समान हो
तो तीनो स्तम्भ एक दूसरे के पर्याय रहेगे
एेसा लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिये शुभ रहेगा
जिस प्रकार प्रत्येक कल्प के ब्रह्मा अलग-अलग होते है
उसी प्रकार से प्रत्येक पाच वर्षो के अन्तराल के पश्चात
जनता निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से नई विधायिका का गठन करती है
विधायिका अर्थात लोकसभा ,राज्य सभा ,विधान सभा
जिस प्रकार से समय समय पर अावश्यकता के अनुरूप विधेयको को पारित कर
अधिनियमो का निर्माण करते है
उसी प्रकार से ब्रहम देव स्रष्टि मे अावश्यकता के अनुरुप
जीवो,वनस्पतियो,ग्रहो ,उपग्रहो,ब्रह्माण्ड की रचना कर उनकी अायु अाकार प्रकार
अौर भूमिका निर्धारित करते है
विधायिका देश के सभी समुदायो का प्रतिनिधीत्व कर
उनके हितो के प्रति जबाब देह होती है
उसी प्रकार से ब्रह्म देव उनके नर ,दानव ,देवता,गन्धर्व इत्यादि को
उनके प्रारब्ध अौर पुरुषार्थ के अनुसार वरदान अौर उचित योनि मे जन्म प्रदान करते है
परिणाम चाहे जो हो वे अपने विधान को बदलते नही है
विधायिका के सदस्यो अर्थात जन प्रतिनिधियो को
उसी प्रकार से अपने चिन्तन ,ग्यान अौर दर्शन की
चहू दिशाये तथा सम्वाद के सभी मार्ग खुले रखने चाहिये
जिस प्रकार से बह्म देव चारो दिशाअो मे चार मुखो से अौर अाठ अाॅखो से
स्थितियो का समुचित अध्ययन करते रहते है तथा सम्वादरत रहते है
ब्रह्मदेव का कमल अासन पर विराजित होना हाथो मे किसी प्रकार का
अस्त्र नही होकर वेद ग्रन्थ होना इस तथ्य का प्रतीक है कि
विधायिका मे बाहुबली या अपराधी तत्वो को निर्वाचित नही होना चाहिये
सज्जन अौर ऐसे सतोगुणी का निर्वाचित होने चाहिये
जिन्हे विधी या सामाजिक सन्दर्भो से जुडे विषयो का पर्याप्त ग्यान या
अनुभव हो या जो इनमे रूचि रखते हो
विधायका को कार्यपालिका अौर न्याय पालिका के प्रति उसी प्रकार से
सम्मान का भाव रखना चाहिये जिस प्रकार से ब्रह्मदेव
भगवान विष्णु अौर शिव के प्रति रखते है
हम यह देखते है कि भगवान विष्णु प्रत्येक प्रकार का कार्य करने हेतु
तत्पर रहते है तथा उन्होने जितने अवतार धारण किये है
उतने किसी भी अन्य देवता ने अवतार धारण नही किये है
अवतारो के माध्यम से भगवान विष्णु ने निरन्तर समाज को समधान प्रदान किये है
उसी प्रकार से कार्यपालिका को विविध अायामो मे प्रवेश कर समाज अौर देश की
समस्याअो को सुलझाने हेतु तत्पर रहना चाहिये
भगवान शिव जो लोकतंत्र के तीसरे स्तम्भ अर्थात न्याय पालिका
के प्रतीक के रूप मे है का व्यक्तित्व यह बताता है
न्याय पालिका के कनिष्ठतम से वरिष्ठतम न्यायाधीश का व्यक्तित्व कैसा होना चाहिये
भगवान शिव जैसा वैरागी स्वभाव , सर्वहारा वर्ग के लिये संवेदना की भावना
,समाज के अभिजात्य वर्ग से लगाकर उपेक्षित वर्ग तक समानता का भाव
,गरिमापूर्ण अाचरण शिव जी को सभी देवो मे विशिष्ट बना कर महादेव बनाता है
उसी प्रकार से न्यायपालिका का सच्चा प्रतिनिधि शिव के व्यक्तित्व का न्यायाधिश
समाज के प्रत्येक व्यक्ति मे न्याय के प्रति श्रद्धा की भावना उत्पन्न करता है