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Friday, January 11, 2013
Monday, January 7, 2013
मनुष्य की श्रेणिया
मनुष्य की प्रमुख रूप से तीन श्रेणिया होती है
प्रथम श्रेणी में मनुष्य अकारण निस्वार्थ रूप से
दूसरो का हित करने की प्रव्रत्ति रखता है
सदा पर हित करने की और अग्रसर रहता है
पर पीड़ा में अपनी पीड़ा समझता है संवेदना से परिपूर्ण
ऐसा मनुष्य देवत्व के सबसे अधिक समीप होता है
दूसरी श्रेणी का मनुष्य वह होता है
जो सकारण और स्वार्थ वश
दुसरे के हित की और अग्रसर होता है
आदान प्रदान की भावना से व्यवहार करता है
ऐसा व्यक्ति सामान्य मनुष्य कहलाता है
तीसरी और अधम श्रेणी का मनुष्य वह होता है
जो अकारण अन्य लोगो से द्वेष रखता है
अकारण दूसरो के हितो पर आघात करता है
अच्छे कार्य में समस्याए और बाधाये उत्पन्न करता है
दुसरे व्यक्तियों को सुख में देख कर दुखी होता है
हमें चिंतन यह करना है कि
हम उक्त श्रेणियों में से कौनसे मनुष्य
कि श्रेणी में स्वयं को पाते है
यदि हम स्वयं को प्रथम श्रेणी में पाते है तो
हमें पूजा पाठ कर्म काण्ड करने कि कोई आवश्यकता नहीं है
हमारा प्रत्येक कर्म ही पूजा है
हमारी अंतरात्मा में ही देवत्व विद्यमान है
हम ईश्वर के सबसे प्रिय है
ईश्वरीय तत्व हमें सहज ही प्राप्त हो सकता है
Saturday, January 5, 2013
धृतराष्ट्र मानसिकता
महाभारत मे द्रोपदि के चीर हरण का प्रसंग आता है
जिसमे यह विशेष रूप से उल्लेख है कि
द्रोपदि के चीर हरण का विरोध मात्र जुए मे स्वयम को हार चुके
पाण्डव हारी हुई मानसिकता के साथ तथा
कौरवो मे से दुर्योधन का अनुज विकर्ण ही करते है
कौरव सभा मे उपस्थित शेष महारथी अपने नितान्त निजी कारणो से
विरोध न कर मूक दर्शक बने बैठे रहते है
माना कि ध्रतराष्ट्र नैत्रहीन थे परन्तु मूक और बधिर नही थे
क्या उन्हे द्रोपदि की करूण पुकार सुनाई नही दी
क्यो उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया?
कहने को सम्पुर्ण कुरुसभा मे ध्रतराष्ट्र अन्धे थे
किन्तु भीष्म ,द्रोण,क्रपाचार्य ,अश्वत्थामा ,कर्ण इत्यादि महान योद्धा
जो सभी प्रकार की शस्त्र विधाओं मे पारंगत और सर्वगुण सम्पन्न थे
नैत्रवान थे पर द्रष्टि सम्पन्न नही थे
आज भी हमारे समाजिक राष्ट्रिय परिवेश मे हमे यही स्थिति दिखाई देती है
तथा कथित बुद्धिजीवी ,विचारक,समाज सेवक , पराक्रमी पहलवान,
प्रतिभा से सम्पन्न खिलाडी,राजनेता,
अनेक ज्वलंत विषयो पर उसी प्रकार से मौन है
जिस प्रकार से कुरुसभा मे द्रोपदि चीर हरण के प्रसंग पर
तत्कालीन भद्रजन मौन थे
उस समय ईश्वरिय सत्ता के प्रतीक श्रीक्रष्ण
अन्याय का प्रतिरोध करने हेतु सामने आये थे
पर वर्तमान स्थितियो मे क्या कोई व्यक्ति श्री क्रष्ण
अथवा विकर्ण की भूमिका अपनाने के लिये तत्पर है
संभवतया नही हम स्वयम अपने आस -पास व्याप्त
अन्याय पूर्ण घटनाओं के प्रति कितनी संवेदन शीलता
मन वचन कर्म से दर्शा पा रहे है
इस विषय पर हमे आत्म विश्लेषण की आवश्यकता है
यदि हमारी संवेदनाये मर चुकी है
हम किसी पीडीत व्यक्ति की पीडा हरण करने मे
किंचित भी योगदान नही कर पाये तो
फिर हमे क्या अधिकार बनता है कि
हम स्वयम को सनातन परम्परा का प्रतिनिधि तथा
श्री क्रष्ण रुपी शाश्वत सत्ता के अनुयायी माने
Wednesday, January 2, 2013
12 जनवरी 2013 स्वामी जी का 150 वां जन्म दिवस
12 जनवरी 2013 स्वामी जी का 150 वां जन्म दिवस ( सार्ध सती )
अधिकांस लोग पैदा होते हैं और पानी की लकीर की तरह काल की धारा मैं लुप्त हो जाते हैं वही कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो इतिहास के पन्नो मैं भविष्य को लिखते हैं और आने वाली पीडी और सदियों पर अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं।
ऐसे ही युग पुरुष हुए स्वामी विवेकानंन्द एक महान व्यक्तित्व जो शायद ईश्वरीय अवतार से कम न थे।
एक युवा सन्यासी जो परिव्राजक हो कर राष्ट्र और धर्म को एक करने के लिए राष्ट्रधर्म के लिए खड़े हुए पुरे भारत वर्ष की पैदल यात्रा करते हुए अमीर से लेकर गरीब से मिले ब्रहामन की कुटिया मैं भी रुके और दलित की सेवा भी स्वीकार की पुरे भारत की नस - नस को जाना भारत के गौरव ,गरिमा ,सांस्क्रतिक महानता से लेकर समाज मैं फेली कुरीतियों और विषमताओ का भी अधयन्न किया
और अंत मैं दक्षिण पहुचे जहा विशाल हिन्द महासागर हिलोरे ले रहा था सागर के बीच मैं विशाल चट्टान को देख सागर मैं कूद पड़े और लहरों को चीरकर उस शिला पर पहुचे जहा माँ कन्याकुमारी ने घोर तप किया था स्वामी जी उसी शिला पर ध्यानस्थ हुए और लगातार तीन दिनों तक ध्यान समाधि मैं रहे और जब आखे खोली तो सामने भारतवर्ष के दर्शन हुए और एक अनभूति हुई की पूर्व को प्रभावित करने के लिए पहले पश्चिम को जितना होगा फिर क्या था स्वामी जी निकल पड़े अपने लक्ष्य को मूर्त रूप देने
शिकागो धर्म सम्मेलन मैं भारत और हिंदुत्व धर्म - दर्शन का प्रतिनिधित्व करने जहा उन्हें केवल इस आधार पर भाग लेने से रोका गया की वो किसी अधिकारिक धर्म संगठन के सदस्य नही थे।
पर जब उसी सम्मलेन के अधिकारी ने स्वामी जी के विचार सुने तो धर्म सभा के अधिकारियो को पत्र लिख कर ये आदेश दिया की ये सन्यासी हावर्ड के सभी विद्वानों से कही अधिक विद्वता लिए हुए हैं
आखिरकार स्वामी जी ने शिकागो मैं लाखो लोग को " sister's and brother's of my america " कहा तो लाखो लोग खड़े होकर दस मिनट तक तालिया बजाते रहें, उनके ढाई मिनिट के भाषण के सामने बड़े बड़े विद्वानों के घंटो कम पड गये और पूरा पश्चिम भारत के एक सन्यासी का लोहा मान उठा अब तो लोग स्वामी जी को सुनने के लिए लोग घंटो बोर भाषण सुनते यही कारण था की सभा उनका उद्भोद्न सबसे आखिर मैं रखती पूरा विश्व मिडिया स्वामी जी के शब्दों से भर पडा ........................................शेष भाग आगे
Tuesday, January 1, 2013
Wednesday, December 26, 2012
UNIVERSE: तृष्णा ,तृप्ति और परम तत्व
UNIVERSE: तृष्णा ,तृप्ति और परम तत्व: तृष्णा और तृप्ति दोनों परस्पर विपरीत अर्थ वाले शब्द है जहा तृप्ति संतुष्टि प्रदान करता है वहा तृष्णा व्याकुलता अ...
तृप्त रही है आत्मा ,तृप्त रहा तन मन
तृष्णा तो अनंत रही ,सदा तृप्त सज्जन
तृप्त रही है आत्मा ,तृप्त रहा तन मन
तृष्णा तो अनंत रही ,सदा तृप्त सज्जन
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