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Sunday, March 16, 2014

होली का पर्व

होली का पर्व अभिजात्य वर्ग का पर्व नहीं 
अभिजात्य मानसिकता त्याग कर 
सर्वहारा वर्ग का जीवन जी लेने का पर्व है 
ज्ञान ,धन ,वैभव का अहंकार त्याग करने का पर्व है 
विशेष व्यक्ति से सामान्य व्यक्ति बन जाने का यह उत्सव है 
व्यक्ति जब तरह -तरह के अहंकारो में बंध जाता है 
तो वह एक तरह कि कृत्रिमता का आवरण से घिर जाता है 
काल्पनिक छवि स्व यम कि गढ़ लेता है
 स्व यम में ही सारी विशेषता पाता है 
उसके लिए अपनी आलोचना सुनना सम्भव नहीं होती 
चाटुकारिता उसे अच्छी लगती है 
होली चाटुकारीता  प्रवृत्ति से मुक्ति पाने का अवसर है 
स्व यम के व्यक्तित्व कि वास्तविकता जानने का दिवस है 
अपनी जड़ो से जुड़ जाने सहज मस्ती अपनाने 
रंगो में मौसम कि उमस पाने का पर्व है 
हर प्रकार के रंग को आत्मसात कर लेने मे होली का आनंद है


Monday, March 10, 2014

रणछोड़ राय भगवान् श्रीकृष्ण

भगवान् श्रीकृष्ण को रणछोड़ राय के रूप में 
सम्बोधित किया जाता है 
भगवान् ने रण क्यों छोड़ा ?रण छोड़ राय क्यों बने ?
इन प्रश्नो के समाधान इतने सरल नहीं है
जीवन के यथार्थ में कब रणछोड़ बने ?
कब रण वीर बने ?
 यह महत्वपूर्ण होता है 
महत्वपूर्ण यह भी है कि विपक्षी के बल कि परख किये बिना 
हम रण में कूद जाए 
इसे वीरता नहीं मूर्खता कहा जाएगा 
भगवान् कृष्ण जानते थे कि 
जरा संघ कि विशाल सेना मथुरा को ध्वस्त कर देगी 
हजारो निरीह नागरिक मारे जायेगे 
इसलिए उन्होंने रण  को उन्होंने छोड़ दिया था 
उपयुक्त समय आने पर द्वंद्व युध्द में 
उन्होंने उसी पराक्रमी अजेय जरासंघ का वध 
 भीम के हाथो करवा दिया
कितनी लम्बी प्रतीक्षा पराक्रमी शत्रु को 
पराजित करने के लिए 
यह विचारणीय प्रश्न होनी चाहिए 
जीवन में समग्र विजय पाने के लिए शक्ति संचय के साथ 
सज्ज्न शक्ति के उदय कि आवश्यकता होती है 
जिसमे समय लगना स्वाभाविक होता है 
रण छोड़ बनने से लेकर जरासंघ के वध तक कि कथा 
भगवान् कृष्ण कि भूमिका इसी तथ्य को इंगित करती है 
इसलिए भगवान् श्रीकृष्ण रणछोड़ होने के बावजूद 
पराजय के प्रतीक के स्थान पर विजय के पर्याय रहे

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Monday, March 3, 2014

श्रीकृष्ण का सखा भाव

यह  सत्य है कि सज्जनों को किसी के भी प्रति 
विद्वेष का भाव नहीं रखना चाहिए 
परन्तु इसका यह तात्पर्य भी नहीं कि
 हम दुष्टो  कि दुष्टता को अनदेखा कर दे 
और सज्जनो को सज्जनता के लिए पुरस्कृत भी न करे 
ह्रदय में क्षमा भाव होना अच्छी बात है 
परन्तु क्षमा भाव को कोई हमारी कमजोरी ही समझ ले 
यह कतई उचित नहीं है 
यदि दुष्टो को समय रहते दण्डित नहीं किया गया 
तो उनकी दुष्टता और अधिक उग्र होती जावेगी 
इसी प्रकार से सज्जनता को पारितोषिक नहीं दिया गया तो 
समाज से सज्जनता लुप्त हो जावेगी 
समाज से सज्जनता लुप्त न हो 
इसलिए जहा भी अवसर मिले
 सज्जनो को सरंक्षण और प्रोत्साहन देना 
हमारा दैवीय दायित्व है
 कभी कभी सज्जन व्यक्ति इतना अधिक अकेला और असहाय 
हो जाता है कि उसका   मनोबल और सत्संकल्प 
टूट कर बिखर जाने कि स्थिति में होता है 
तब हमारा मात्र नैतिक समर्थन उसे नई ऊर्जा और जोश दे सकता है 
तब वह हम में श्रीकृष्ण  का सखा भाव  अनुभव करता है 
 इस पुनीत कार्य से हम  सहजता से देवत्व को प्राप्त कर लेते है 
देवत्व प्राप्त करते ही हमारे लघु प्रयास भी 
वृहद् लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु पर्याप्त होते है

Saturday, February 15, 2014

शासकीय कर्मचारी और आयकर

सरकार की आय का मुख्य स्त्रोत है आयकर 
आयकर का वह भाग जो सरकारी कर्मचारियो से जुड़ा है 
महत्वपूर्ण है 
क्योकि सरकारी कर्मचारियो की आय से कर वसूली हेतु 
सरकार कोई प्रयास नहीं करना पड़ते 
सारे प्रयास आयकर दाता कर्मचारीगण को ही करना पड़ते है 
कि वह अपनी आय को किस उपाय से आयकर से बचाये 
सभी संत महंत लोगो को अपनी आय का दशांश 
दान करने का उपदेश देने से नही भूलते
पर वे भूल जाते है 
कि एक शासकीय कर्मचारी आय की एक सीमा के बाद
 अपनी आय का १/५ से लगाकर एक तिहाई तक 
आयकर के रूप मे देश और समाज को धन दान कर देता है 
इसलिये ऐसे कर्मचारियो को दाता के रूप मे 
सम्बोधित किया जाता है
 चाहे आयकर दाता के रूप मे ही क्यों न हो ?
जब व्यक्ति किसी धर्म ,समुदाय संस्था विशेष को दान करता है 
तो उस धन का उपयोग सीमित होता है 
पर जब कोई व्यक्ति आयकर के रूप धन का दान शासन करता है 
तो उसका उपयोग किसी धर्म समुदाय संस्था विशेष के लिए 
न होकर सम्पूर्ण राष्ट्र और समाज के लिए 
सम्पूर्ण प्रयोजनों के लिये होता है
वर्त्तमान मे जो आयकर हेतु जो मानक निर्धारित किये गये है 
उसमे बहुत से ऐसे कर्मचारी भी आ गये है
 जो चतुर्थ श्रेणी मे कहलाते है 
कितने गुना महंगाई बढ़ गई मुद्रा क़ा कितना ही अवमूल्यन हो 
आयकर कटौती के पुरातन प्रावधान यथावत जारी है 
समय -समय पर जो आंशिक राहत दी जाती 
वह दिखाई बहुत जाती है पर  नगण्य ही पाई जाती है

वेलेंटाइन डे या वसंत पंचमी

वेलेंटाइन डे हो या वसंत पंचमी 
दोनों का सम्बन्ध प्रणय और प्रेम से है 
 दोनों दिवसो के बीच क्या अंतर है 
वेलेंटाइन डे प्रेम युध्द क्षैत्र से
 पलायन के भाव से परिचित कराता है 
जबकि वसंत पंचमी प्रेम को प्रज्ञा के साथ 
कर्म  को धर्म से जोड़ता है 
पश्चिम का प्रेम जो वेलेंटाइन डे के विचार पर आधारित है 
प्रेम को वासना के धरातल तक ले जाता है
 जबकि ऋतुराज वसंत का सौंदर्य 
प्रकृति से परिणय का भाव लेकर 
प्रेमियो की आत्मा तक समा जाता है
आत्मा अजर है आत्मा का प्रेम अमर है
वसंत पंचमी पर भारतीय संस्कृति में
 विवाह करने अत्यधिक महत्व है
विवाह प्रेम पर आधारित हो 
 इसलिए वसंत पंचमी का पर्व बना है
प्रेम में सौंदर्य हो ,प्रणय हो 
पर  प्रेम में  भाव स्प्ष्ट हो
 जीवन में  नही किसी प्रकार का कष्ट हो 
इसलिए प्रज्ञा की देवी माँ सरस्वती की होती  आराधना है
भारतीय प्रेम अध्यात्म की ऊंचाई तक जाता है 
या भाव भरी गहराईयो तक गहराता है 
युध्द से  पलायन नही सीखाता है 
बल्कि देश और समाज के प्रति बलिदान की भावना को जगाता है 
इसलिए वेलेंटाईन डे से नही वसंत पंचमी से जुड़ो 
प्रेम के  लगाकर  के पंख 
 सभ्यता संस्कृति और अध्यात्म के नीले गगन मे उड़ो


Friday, January 31, 2014

कर्मयोगी

व्यक्ति कितना ही ईमानदार हो कितना ही विरक्त हो 
वह सभी प्रकार के मोह त्याग सकता है 
पद और यश के मोह से मुक्त नहीं हो सकता 
सन्यासी  हो चाहे सामान्य व्यक्ति 
कौन व्यक्ति पद कि आकांक्षा नहीं रखता 
कौन व्यक्ति नहीं चाहता कि 
निरन्तर  उसका यश प्रकाशित होता रहे 
इतिहास के पृष्ठों पर उसका नाम सुशोभित हो 
संन्यास धारण करने पर भी व्यक्ति 
संत महंत मंडलेश्वर महामंडलेश्वर शंकराचार्य 
गिरी पुरी  कि और अग्र  सर होने कि कर्मरत रहता है 
सामान्य व्यक्ति भी एक ही दशा में न रहते हुए 
वर्त्तमान स्थिति से उत्तम स्थिति कि प्राप्त करना चाहता है 
सामाजिक क्षैत्र में कार्य करने वाले समाज सेवी भी 
लोकेषणा कि भावना तो रखते ही है 
लोकेषणा की  भावना से मुक्त होना 
हर किसी के लिए सम्भव  नहीं है 
उपरोक्त परिस्थितियो में भी वर्त्तमान में ऐसे व्यक्ति 
जो किसी पद या किसी यश कि अपेक्षा  किये बिना
समाज के विभिन्न क्षैत्रो में कर्म रत है 
ऐसे व्यक्ति भी विदयमान है 
स उन्हें देखने परखने कि दृष्टि हमारी होनी चाहिए
वास्तव में कर्मयोगी है सच्चे सन्यासी है
 पूरी निष्ठा से कर्म करने के बावजूद 
वे कोई भी श्रेय व् पद लेने कि इच्छा नहीं रखते है 
ऐसे मौन साधको मौन तपस्वियों  सच्चे कर्मयोगियों 
के कारण ही हमारा समाज और देश उपकृत हो सकता है

Friday, January 17, 2014

वैचारिकता का स्तर


मनुष्य विचारशील जीव है 
परन्तु प्रत्येक व्यक्ति के वैचारिकता का स्तर 
अलग अलग होता है 
निम्न वैचारिक  स्तर वाला व्यक्ति संकुचित परिप्रेक्ष्य में 
प्रत्येक विषय के बारे में सोचता है 
व्यक्ति का  जितना वैचारिक दृष्टि से उत्थान होता 
उसका दृष्टिकोण उतना ही व्यापक और विहंगम होता जाता है 
वैचारिकता के निम्न धरातल पर खड़े रह कर 
हमें केवल अपने आस-पास 
कि समस्याए और समाधान समझ में आते है 
दूरगामी हित और परिणाम हमें दिखाई नहीं देते
आवश्यकता इस बात कि हम अपनी विचार शक्ति को 
समग्र उंचाईया प्रदान करे 
तभी हम शिखर पर बैठे व्यक्ति के दृष्टिकोण 
,व्यवस्थाओ और व्यवस्थाओ से जुडी विवशताओं को समझ पायेगे 
तब हमें हमारे परिवेश में व्याप्त विकृतिया ही नहीं 
विकृतियों को दूर करने हेतु सही  समाधान भी दिखाई देंगे