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Friday, October 9, 2015

चित्त में पलते संकल्प और विकल्प

जिस प्रकार मन चंद्रमा का प्रतीक और सूर्य बुध्दि का प्रतीक होते है |उसी प्रकार हमारा चित्त जो मन और बुध्दि से सूक्ष्म पर व्यापक होता है |आकाश का प्रतीक होता है चित्त में चिंतन निवास करता है |चित्त में आत्मा से जुड़े संस्कार प्रवाहित होते रहते है |रात्रि में जिस प्रकार आकाश में तारे टीम टिमाते है ठीक वैसे ही हमारे चित्त में संकल्प और विकल्प उठते रहते है
| जब हम ध्यानस्थ होते है तो हमारा प्रयास रहता है कि इन संकल्प विकल्पों से नियंत्रित विचारो को रोक कर एकाग्र होकर चित में विराजित परम तत्व के सामीप्य का अनुभव करना |दिन के उजाले में तारे दृष्टिगत नहीं होते है |वैसे ही भाग दौड़ भरी व्यस्तता में हमे हमारे मन में पलने वाले संकल्प विकल्प दिखाई नहीं देते है इसलिए हम चित्त में प्रविष्ट करने के लिए रात्रि के सामान शांत वातावरण की तलाश करते रहते है हमे एकांत अच्छा लगता है |

Wednesday, October 7, 2015

मन बुध्दि के प्रतीक सूरज और चन्द्रमा

चद्रमा व्यक्ति के मन का प्रतीक है |
  सूरज व्यक्ति की बुध्दि का प्रतीक है
मन की अवस्था अस्थिर होती है
ठीक उसी प्रकार से चद्रमा का आकार और उसका स्वरूप परिवर्तित होता रहता है
जो व्यक्ति मन के अनुसार निर्णय लेले है
वे निर्णय भावना प्रधान होते है
भावनाओ में उथल पुथल होने से स्वभाव में स्थिरता नहीं रहती ऐसे व्यक्ति के निर्णय बदले भी जा सकते है
जबकि सूरज जो बुध्दि का प्रतीक होता है
अपने निश्चय पर दृढ और समय का पाबन्द होता है
सूरज के आकार में परिवर्तन नहीं होता है
बुध्दि से निर्णय लेने वाला व्यक्ति संकल्प का दृढ होता है उसके कार्य व्यवहार में विश्वसनीयता प्रतिबिंबित होती है व्यक्तित्व में सूरज की तरह ओजस्विता दर्शित होती है इसलिए हमें यह तय करना है क़ि हम मन रूप चन्द्रमा से प्रकाश पाये या बुध्दि रूपी सूरज से तेज ग्रहण करे

Tuesday, October 6, 2015

अनन्त ईच्छाओ की मृगतृष्णा

कामनाए इच्छाये हर मनुष्य के जीवन मे किसी ना किसी रूप में निहित रहती है शायद यही हमें मनुष्य बनाती है, क्योंकि यदि यह कामनाए इच्छाये किसी के जीवन मे ना हो तो वह व्यक्ति असाधारण, ईशवर तुल्य हो जाये क्योंकि केवल ईशवर ही हे जिसको कोई ईच्छा कामना ञस्त नहीं करती जबकि देवता भी इस रोग से अच्छुते नहीं वे भी हर क्षण स्वर्ग के सुखों की इच्छा रखते है
इसका मतलब यह नहीं की जीवन मे कामनाए अथवा इच्छाये होना गलत हे मेरा यह मतलब कदापि नहीं हे कामनाए और इच्छाये होना चाहिए परन्तु  सकारात्मक रूप में जो व्यक्ति को जीवन में आगे बढने को प्रेरित करे उसे कुछ अच्छा कुछ बढ़ा करने को प्रोत्साहित करे, फिर इच्छाओं का व्यक्ति की सीमा व्यक्ति के सामर्थ्य और योग्यता के अनुरूप होना भी परम आवश्यक है
अब दो ही विकल्प शेष रह जाते हे या तो व्यक्ति स्वयं को अपनी इच्छाओं के अनुरूप योग्य बनाये अथवा अपनी इच्छाओं को अपनी योग्यता अनुसार रखे परंतु अधिकांश लोग एेसा नहीं करते वे बस बिना योग्यता व विशेष प्रयासों को करे बिना ही वह सब इच्छाये पुरी कर लेना चाहते है और यही कारण हे की वह इच्छाओं की  मृगतृष्णा में फस कर स्वयं अपना ही नुकसान कर लेता है अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह अन्य किसी पर निर्भर रहना शुरू कर देता हे और यही निर्भरता उसे पंगु बना देती है
वह अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए उस अन्य की विवशता को भी नजरअंदाज कर देता है बस स्वयं को ही केन्द्र में रखता है जो कि सर्वथा अनुचित है क्योंकि ईच्छाये का तो कोई अन्त नहीं।

Saturday, October 3, 2015

एकांत

आज रमेश बहुत थका हारा था 
कोचिंग क्लास से आकर उसने हाथ मुंह धोया और चाय पी 
काफी दिन हो गए थे 
उसे अपने साथियो के साथ 
रूम पार्टनर के रूप में रहते 
माँ बाप ने बड़ी उम्मीदों के साथ बड़े शहर पढने के लिए भेजा था की बेटा कलेक्टर बनेगा 
रमेश की भी महत्कांक्षा थी की वह आई.ऐ ,एस न सही राज्य प्रशासनिक परीक्षा ही उत्तीर्ण का ले 
पर यह उसका तीसरा साल था प्रारंभिक परीक्षा में तो वह उत्तीर्ण हो जाता था
 परन्तु मुख्य परीक्षा में असफल | दोस्त ऐसे की वे उसे कम्पनी दे सकते थे पर हौसला नहीं 
रमेश को इसी में संतोष था की वह प्रयास तो कर रहा है देखते देखते उसके कई सहपाठी अपने 
माता पिता के साथ रहते पढ़ाई करते हुए कई अच्छे प्रशासनिक पदो पर आसीन हो चुके थे 
पर रमेश था कि  उसे अपने परिवार से अलग रह कर पढ़ाई करने के लिए उपयुक्त वातावरण उचित कोचिंग 
और एकांत चाहिए था | इस दौड़ भाग कोलाहल की जिंदगी में उसे महानगरीय मित्रो के बीच कहा एकांत मिल पाता  रमेश की आँखे खुल चुकी थी कि सफलता के लिए एकांत और कोचिंग की नहीं एकाग्रता और स्वाध्याय की आवश्यता थी

Wednesday, September 30, 2015

विशेष दिखने की चाहत

 वर्तमान में कुछ लोगो में 
विशेष दिखने की चाहत दिखाई देती है 
भीड़ में स्वयं को भिन्न दिखाने के लिए 
लोग क्या क्या उपाय नहीं करते है 
विशेषकर यह प्रवृत्ति युवा पीढ़ी  में पाई जा रही है 
जो मात्र सुविधाओ तथा उत्कृष्ट जीवन शैली को 
अपना कर स्वयं को विशिष्ट श्रेणी का बताने का 
प्रयास करते है 
परन्तु वे भूल जाते है कि  
मात्र भौतिक सुविधाओ एवं ऊँचे रहन सहन से 
कोई व्यक्ति विशिष्ट नहीं हो जाता 
व्यक्ति को विशिष्टता  धारण करने के लिए व्यक्अपराधिक तिगत गुणों का विकास करना होता है 
बिना किसी पात्रता कर्म कौशल एवं मानवीय गुणों के जो व्यक्ति सुविधाओ के बल पर 
विशेष दिखना चाहता है 
वह जन मानस को भीतर तक
 प्रभावित नहीं कर पाता  है 
मात्र स्वयं को भ्रान्ति में ही डालता है 
अक्सर ऐसे युवा जो बिना किसी आधार के 
उच्च स्तर  की जीवन शैली की ओर  उन्मुख होते है 
वे कालान्तर में अपनी महंगे शौक और व्यसनों से ग्रस्त होकर अपराध कृत्यों में लिप्त हो जाते है 
इसलिए विशिष्टता व्यक्तित्व होती है साधनो के बल पर कोई भी व्यक्ति विशिष्ट नहीं हो सकता

Friday, September 25, 2015

गणेश जी सृजन धर्मिता के प्रतीक

गणेश जी की प्रतिमा का निर्माण
 जितना सहज सरल है 
उनका व्यक्तित्व भी उतना ही सहज है सरल है 
गणेश जी की प्रतिमा निर्माण में जितने प्रयोग हुए है 
उतने प्रयोग किसी भी शिल्प निर्माण में नहीं हुए है 
यथार्थ में कहो तो 
गणेश जी सृजन कर्म  के देव है 
जो आमंत्रित करते है 
सृजन और शिल्प के लिए है 
सृजन कर्म  में यदि लचीलापन और प्रयोग धर्मिता की गुंजाईश नहीं हो तो 
नवीन विधाए कभी भी 
अपना स्थान नहीं बना सकती है 
और सृजन की असीम सम्भावनाओ पर
 विराम चिन्ह लग जाते है 
गणेश जी ने उनकी प्रतिमा के शिल्प निर्माण के माध्यम से सृजन कर्म को पूरी स्वतंत्रता प्रदान की है इसलिए गणेश चतुर्थी के पर्व से लगा कर 
अनंत चतुर्दशी के मध्य के समय को हम सृजन धर्मियों का उत्सव कहे तो 
अतिश्योक्ति नहीं होगी 
गणेश जी अर्थात गणाध्यक्ष 
गणाध्यक्ष अर्थात समूहों का नेतृत्व करने वाला 
गणेश जैसा व्यक्तित्व पाकर
 कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में नेतृत्व क्षमता का गुण  समाहित कर सकता है 
गणेश जी की प्रतिमा का सृजन से विसर्जन करना 
यह दर्शाता है कि 
 किसी भी पदार्थ के प्रति आसक्ति ठीक नहीं
वृहद लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपनी प्रिय वस्तु  का त्याग करने में भी संकोच नहीं करना चाहिए 

Sunday, September 6, 2015

विष्णु वराह मंदिर मझौली


 भगवान विष्णु के वराह अवतार के विश्व में कई मंदिर है।  परन्तु ग्राम मझौली  जबलपुर मध्यप्रदेश में स्थित वराह देव की प्रतिमा अत्यंत विशालकाय और चमत्कारी है।  यह प्रतिमा ग्यारही शताब्दी की काले पत्थर से निर्मित है। 
उत्कृष्ट शिल्प की प्रतीक इस प्रतिमा की विशेषता यह है ,की वराह देव की थूंथन के अधो भाग पर भगवान शेषनाग विराजित है।  जिनके नीचे भगवान यो नारायण प्रतिष्ठित है यह प्रतिमा काले रंग के दुर्लभ प्रजाति के पत्थर पर बनी  है स्थानीय लोगो की किवदंती यह है कि  गाँव के समीप एक सरोवर को में ढीमर युवक को मत्स्य  आखेट करते हुए यह प्रतीमा लघु आकार में मिली थी शनै  शनै इसके आकर में विस्तार होते वर्तमान स्वरूप पाया मझौली ग्राम जबलपुर से मात्र ४५ कि. मी  की दूरी पर स्थित है सुन्दर रमणीक पहाड़ियों के मध्य गुजरते हुए सड़क मार्ग से प्रकृति के अंश में ईश्वरीय शक्तियों को अनुभूति होती है