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Tuesday, November 3, 2015

प्रश्नो के जबाब

कई प्रश्नो के जबाब नहीं होते
कई समस्याएं के हल नहीं होते
बाधाये कई ऐसी जिनको पार करना
हर किसी के लिए संभव नहीं है
सपने हम कई देखते है है
पर हर सपना सच नहीं होता
अपनापन लिए मिलने वाला हर शख्स
अपना नहीं होता
जो अपना सा लगे
वह अपने संग नहीं रहता
जो अपने को सच्ची और अच्छी लगे
वह अपने को मिल जाए या संभव नहीं है
जीवन में  कष्ट पाये बिना
कोई वस्तु सहज ही मिल जाए 

ऐसा  कोई अनुभव नहीं है
अनुभव और ज्ञान दोनों एक साथ हो
यह बिलकुल आवश्यक नहीं है
जीवन में है कितनी सारी विसंगतियों
इन विसंगतियों को झेल सको तो झेलो
या इन विसंगतियों से दुखी रहो
या इन संग रहो इनसे खेलो
अनुत्तरित रहे सारे प्रश्नो के भी कई हिसाब है
जीवन में है कई अनसुलझी पहेलिया
वक्त के पास होते उनके जबाब है

Monday, November 2, 2015

आंसू की बूंदे

अश्रु ममता भाव भरा अश्रु करुणा जल
अश्रु से है प्यार हरा सम्वेदना कल छल

आँसू मीठी प्रीत रही आँसू विरह गीत
आँसू के ही साथ रही गिरधर तेरी प्रीत

आसु निकले राज है आँसू के कई काज
आँखों मोती रूप रहा आँसू है सरताज

राधा तेरी प्रीत से मोहन क्यों अनजान
आँसू भक्ति रीत रही आंसू रस की खान

आंसू जल की बूँद नहीं ,शब्दहीन है गीत
फुट फुट रोये श्याम है मित्रवत है रीत 

Sunday, November 1, 2015

घटिया प्रयास

ये तो स्पष्ट है कि जब वातावरण अनुकूल होता है तब जनसंख्या वृद्धि होती है और जब वातावरण प्रतिकूल होता है तो पलायन और मृत्यु दर में वृद्धि.... इससे स्पष्ट हे कि भारत में तथाकथित अल्पसंख्यको के लिए वातावरण अनुकूलता लिए हुए है क्योंकि उनकी जनसंख्या दर में वृद्धि हुई है ...
वहीं सिरीया लीबिया व अन्य देशों में पलायन व मृत्युदर में वृद्धि हुई है फिर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा देश के वातावरण को प्रतिकूल बता...
विरोध करना तथ्यों से प्रतिकूल है। व देश के सौहार्दपुर्ण वातावरण व छवि को धुमिल कर क्षणिक प्रसिद्धि पाने का घटिया प्रयास मात्र है।

Saturday, October 31, 2015

भारत - ऋषि निर्मित राष्ट्र

इस देश में रहने वाले लोगों की एक संस्कृति है। इस संस्कृति के ही कारण यह एक राष्ट्र है। इस राष्ट्र- इस संस्कृति का निर्माण किसने किया ? अन्य देशों मे वहाँ के राजा या सैनिकों के द्वारा राष्ट्रों का निर्माण हुआ है।
परंतु इस राष्ट्र का निर्माण ऋषियों ने किया है। वेद के एक मंत्र से यह स्पष्ट होता है।

भद्रमिच्छन्त : ऋषय: स्वविर्द : तपोदीक्षामुपसेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातं तस्मैं देवा: उपसन्नु मन्तु।

ऋषि अर्थात जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है। ऋषि अर्थात अपने स्वार्थ का चिन्तन ना करते हुए संसार के हित में सोचने वाले। उपरोक्त श्लोक में भी यही बात आयी है। "भद्रमिच्छन्त : ऋषय" विश्व के कल्याण की कामना रखने वाले ऋषियों ने तप किया।
उनके तप से इस राष्ट्र को बल मिला, तेज मिला। इसी कारण देवता भी आकर इस राष्ट्र को नमस्कार करते हैं।

इस देवनिर्मित देश में, ऋषि निर्मित राष्ट्र में, हमारा जीवन गतिमान है। प्रायः लोग 'ऋषि का अर्थ संन्यासी समझते हैं। परंतु ऋषि का अर्थ संन्यासी नहीं है। सभी ऋषि गृहस्थ थे। एक ही ऋषि संन्यासी थे- 'शुक्र' महर्षि। शुक्र महर्षि के अतिरिक्त  प्रायः सभी ऋषि गृहस्थ थे।
हम इन्हीं ऋषियों की सन्तान है। इस कारण अपने देश मे गौत्र का प्रचलन हैं। हमारे गौत्र ऋषियों के नाम पर है। हम सभी के गौत्र ऋषियों के नाम पर होने का अर्थ यही है कि हम उन ऋषियों की संताने हैं। ऋषियों का चिंतन लोक हित के लिए होता है। सामान्य व्यक्ति सिर्फ स्वयं के बारे में सोचता है। लोक हित में ही प्रत्येक व्यक्ति का हित है एेसा ऋषियों का दर्शन है।

Friday, October 30, 2015

स्वर्ग नर्क और मोक्ष

स्वर्ग नर्क और मोक्ष की अवधारणा
 केवल हिन्दू धर्म में है 
पुनर्जन्म हिन्दू धर्म का महत्वपूर्ण अंग है
पुनर्जम क्या है?
 पुनर्जन्म अपनी गलतियों सुधारने का अवसर है
 इसे बिना समझे
 हम पुनर्जन्म के सिध्दांत पर विश्वास करते है
 स्वर्ग क्या है स्वर्ग रोग मुक्त होकर सज्जनो के मध्य सुविधा के साथ शान्तिपूर्ण जीना है
कई लोगो के लिए यह धरती स्वर्ग है 
इसलिए उन्हें स्वर्ग की कामना करने का 
कोई ओचित्य नहीं है 
सबसे महत्वपूर्ण सिध्दांत मोक्ष का है 
जिसे पाने के लिए ऋषि मुनि ग्यानी तपस्वी 
साधना में लींन रहते है 
जो पुनर्जन्म और आवागमन से मुक्ति का मार्ग है 
जो परमात्म तत्व में विलीन हो जाना है 
सुख दुःख से परे हो जाना है
काम क्रोध मद लोभ मोह से मुक्त होकर
 सांसारिक जीवन में भी समस्त कॉमनाओ विषय वासनाओ से मुक्त हो सकते है 
और मोक्ष की अवस्था का अनुभव कर सकते है
 जहा तक नर्क का प्रश्न है
 हम अपनी मूर्खताओं  के फलस्वरूप 
पतन के मार्ग ओर चले जाते है 
तरह तरह के सुख से वंचित हो जाते है 
दुर्जनो संग पाकर 
अपने स्वाभाविक गुण खोकर 
व्यसनों में लिप्त होकर 
अपना स्वास्थ्य खराब कर लेते है 
नारकीय चिकित्सकीय प्रणालियों के सहारे 
जी पाते है इसी अवस्था को नर्क कहते है

फिर भी करवा चौथ

मन व्यापे विश्वास नहीं फिर भी करवा चौथ
तृप्ति में भी प्यास रही कैसा है ये बोध 

व्रत से शक्ति बनी रहे व्रत भक्ति का रूप
भक्त बसे परमात्मा भक्ति भाव स्वरूप 

सूरज संध्या संग रहा चंदा संग है रात
सजना सजनी संग रहे मंजिल होगी साथ

यहाँ देखता दंग रहा अपनों का व्यवहार
नित बदले रूप रंग है जैसे सात प्रकार

Monday, October 26, 2015

शरद पूर्णिमा की सार्थकता

शारदेय नवरात्रि के पश्चात आने वाली पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है इस दिन खुले आसमान के नीचे खीर बना कर उसे चंद्र किरणों में रखा जाता है रात को चंद्र किरणों के माध्यम से वर्षित सुधा बूंदों को क्षीर पात्र में एकत्र होने के बाद उसे ग्रहण किया जाता है परन्तु इसका तार्किक अर्थ क्या है ?इसका समझना आवश्यक है शारदेय नवरात्रि में शक्ति साधना की उष्णता को शांत किया जाना आवश्यक है खीर जो दूध चावल मेवे से बनती है उसका ओषधीय महत्व होता है वह शक्ति जिसमे उष्णता हो कभी भी किसी का कल्याण नहीं करती है उसके रचनात्मक दिशा देने के लिए उसे आप्त और सौम्य पुरुषो का सान्निध्य चाहिए ।उष्णता से युक्त शक्ति को एकदम से शीतल किये जाने से तप से प्राप्त साधना पर प्रतिकूल पड़ सकता है शक्ति क्षय होने की संभावना विद्यमान रहती है इसलिए चद्रमा रूप आप्त एवम् शीतल और सौम्यता के देव प्रतीक की किरणों से निकली सुषमा जब शरद ऋतू में मौसम में घुल कर क्षीर में प्रविष्ट होती है तो वह खीर अमृत का रूप धारण कर लेती है हमारे तन और मन की उष्णता को शांत कर नवरात्र साधना से संचित शक्ति की उष्णता समाप्त कर उसे समुचित दिशा प्रदान कर देती है