ध्यान लगाना हर किसी के बस की बात नहीं भगवान के सामने घन्टों बैठने के बाद भी एक पल ध्यान लग जाये तो व्यक्ति धन्य हो जाये ये सब सतयुगी चौचले है ध्यान ना लगने में भक्त की नहीं भगवान में ही कोई डिफाल्ट होगा अब भगवान भी समय और देशकाल के अनुसार होना चाहिए भई आज के लोग कोई ओल्ड फैशन के तो हे नहीं पहले इस्तेमाल करे फिर विश्वास करे का चलन हे फिर भगवान के बारे मे भी ये सब सोचना जरूरी है कोई तपवप ना होगा यूज एन्ड थ्रो की पॉलिसी है कलयुगी भक्त भक्ति से पहले सौ बार तोलेगा कोई घाटे का सौदा करने का काम नहीं है भक्ति आज कल तो भईया जो भक्त की मनोवांछित मुराद पूरी करेगा भक्त उसी भगवान की जय-जय कार करेगा इष्ट बदलना तो आजकल फैशन हे आदमी बाप बदल लेता हे फिर धर्म और भगवान बदलना कौनसा पाप हो गया?
और हे भी तो डरने की कोनों बात नहीं जेब मे चिल्लर बहुत हे और दान-पेटीया भी अब भगवान अपने मुँह से तो माँगेगे नहीं कलयुगी भक्त बड़ा ही समझदार है बिना बोले ही सब समझ जाता है भगवान को गरज हे एेसे भक्तों की भला कलयुगी भक्त को किसकी गरज है
ध्यान लगाना है तो मोबाइल के सामने बैठ जाओ बड़ा तगडा भगवान हे भईया हाथ में लेते ही ध्यान लग जाता है घन्टों का पता नहीं चलता कब गुजर गये और ध्यान भी एेसा गहरा की सामने बच्चा डूब जाये कोई मर जाये घर में आग लग जाये या ट्रक आ जाये तो भी समाधि ना टूटे अरे ये बच्चे घर सब मोह-माया हैं इसी देवता के कारण कितने ही स्वर्गपुरी पहुंच गये भक्त और भगवान का मिलन हो गया भईया कलयुगी भक्त को जम गया मोबाइल भगवान सारे काम हो रहे है मंदिर जाने का टाइम कहां ? दानपेटिका भी अटैच आता है थोड़ा सा दान दो तो प्रसाद मे अमृत तुल्य नेटडेटा प्राप्त होता है फिर क्या चिंता इस नश्वर संसार की और कर्म योग से श्रेष्ठ भक्ति योग है अब कलयुगी भक्त की च्वाईस हे की वह किसकी भक्ति करे बाल बच्चे माँ बाप पति पत्नी सब मोह-माया है अब जो कलयुगी भक्त जो करे वो कम है ।
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Wednesday, November 4, 2015
कलयुगी भक्त
Tuesday, November 3, 2015
प्रश्नो के जबाब
कई समस्याएं के हल नहीं होते
बाधाये कई ऐसी जिनको पार करना
हर किसी के लिए संभव नहीं है
सपने हम कई देखते है है
पर हर सपना सच नहीं होता
अपनापन लिए मिलने वाला हर शख्स
अपना नहीं होता
जो अपना सा लगे
वह अपने संग नहीं रहता
जो अपने को सच्ची और अच्छी लगे
वह अपने को मिल जाए या संभव नहीं है
जीवन में कष्ट पाये बिना
कोई वस्तु सहज ही मिल जाए
ऐसा कोई अनुभव नहीं है
अनुभव और ज्ञान दोनों एक साथ हो
यह बिलकुल आवश्यक नहीं है
जीवन में है कितनी सारी विसंगतियों
इन विसंगतियों को झेल सको तो झेलो
या इन विसंगतियों से दुखी रहो
या इन संग रहो इनसे खेलो
अनुत्तरित रहे सारे प्रश्नो के भी कई हिसाब है
जीवन में है कई अनसुलझी पहेलिया
वक्त के पास होते उनके जबाब है
Monday, November 2, 2015
आंसू की बूंदे
अश्रु से है प्यार हरा सम्वेदना कल छल
आँसू के ही साथ रही गिरधर तेरी प्रीत
आँखों मोती रूप रहा आँसू है सरताज
आँसू भक्ति रीत रही आंसू रस की खान
फुट फुट रोये श्याम है मित्रवत है रीत
Sunday, November 1, 2015
घटिया प्रयास
ये तो स्पष्ट है कि जब वातावरण अनुकूल होता है तब जनसंख्या वृद्धि होती है और जब वातावरण प्रतिकूल होता है तो पलायन और मृत्यु दर में वृद्धि.... इससे स्पष्ट हे कि भारत में तथाकथित अल्पसंख्यको के लिए वातावरण अनुकूलता लिए हुए है क्योंकि उनकी जनसंख्या दर में वृद्धि हुई है ...
वहीं सिरीया लीबिया व अन्य देशों में पलायन व मृत्युदर में वृद्धि हुई है फिर तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा देश के वातावरण को प्रतिकूल बता...
विरोध करना तथ्यों से प्रतिकूल है। व देश के सौहार्दपुर्ण वातावरण व छवि को धुमिल कर क्षणिक प्रसिद्धि पाने का घटिया प्रयास मात्र है।
Saturday, October 31, 2015
भारत - ऋषि निर्मित राष्ट्र
इस देश में रहने वाले लोगों की एक संस्कृति है। इस संस्कृति के ही कारण यह एक राष्ट्र है। इस राष्ट्र- इस संस्कृति का निर्माण किसने किया ? अन्य देशों मे वहाँ के राजा या सैनिकों के द्वारा राष्ट्रों का निर्माण हुआ है।
परंतु इस राष्ट्र का निर्माण ऋषियों ने किया है। वेद के एक मंत्र से यह स्पष्ट होता है।
भद्रमिच्छन्त : ऋषय: स्वविर्द : तपोदीक्षामुपसेदुरग्रे।
ततो राष्ट्रं बलमोजस्वजातं तस्मैं देवा: उपसन्नु मन्तु।
ऋषि अर्थात जिन्होंने सत्य का साक्षात्कार किया है। ऋषि अर्थात अपने स्वार्थ का चिन्तन ना करते हुए संसार के हित में सोचने वाले। उपरोक्त श्लोक में भी यही बात आयी है। "भद्रमिच्छन्त : ऋषय" विश्व के कल्याण की कामना रखने वाले ऋषियों ने तप किया।
उनके तप से इस राष्ट्र को बल मिला, तेज मिला। इसी कारण देवता भी आकर इस राष्ट्र को नमस्कार करते हैं।
इस देवनिर्मित देश में, ऋषि निर्मित राष्ट्र में, हमारा जीवन गतिमान है। प्रायः लोग 'ऋषि का अर्थ संन्यासी समझते हैं। परंतु ऋषि का अर्थ संन्यासी नहीं है। सभी ऋषि गृहस्थ थे। एक ही ऋषि संन्यासी थे- 'शुक्र' महर्षि। शुक्र महर्षि के अतिरिक्त प्रायः सभी ऋषि गृहस्थ थे।
हम इन्हीं ऋषियों की सन्तान है। इस कारण अपने देश मे गौत्र का प्रचलन हैं। हमारे गौत्र ऋषियों के नाम पर है। हम सभी के गौत्र ऋषियों के नाम पर होने का अर्थ यही है कि हम उन ऋषियों की संताने हैं। ऋषियों का चिंतन लोक हित के लिए होता है। सामान्य व्यक्ति सिर्फ स्वयं के बारे में सोचता है। लोक हित में ही प्रत्येक व्यक्ति का हित है एेसा ऋषियों का दर्शन है।
Friday, October 30, 2015
स्वर्ग नर्क और मोक्ष
पुनर्जम क्या है?
कई लोगो के लिए यह धरती स्वर्ग है
काम क्रोध मद लोभ मोह से मुक्त होकर
फिर भी करवा चौथ
तृप्ति में भी प्यास रही कैसा है ये बोध
भक्त बसे परमात्मा भक्ति भाव स्वरूप
सजना सजनी संग रहे मंजिल होगी साथ
नित बदले रूप रंग है जैसे सात प्रकार