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Thursday, April 14, 2016

नवरात्रि

नवरात्रि देवी का पूजन है
जप है तप है आराधना है
नवरात्रि नवल सृजन है
नवीन संकल्प है कर्म साधना है
नवरात्रि क्रिया शक्ति है महामंत्र है
ओंकार मात्रा है
आंतरिक शक्तियो का जागरण है
आध्यात्मिक यात्रा है
नवरात्रि गहन अन्धकार में
उजाले की आस है
भौतिक जगत के मध्य
नवधा भक्ति है ज्ञान की प्यास है
नवरात्रि भावनाओ का एक क्रम है
संवेदनशीलता है
नवीन अनुभूतिया पाने का उपक्रम है
नवरात्रि मातृ शक्ति का वरदान है
देवी का गुणगान है देवीयता धारण कर ही
व्यक्ति बना महान है

Wednesday, April 6, 2016

आया अब सिंहस्थ

  संत जहां पर मस्त हुए ,दुर्जन दल है पस्त   
 महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
हरसिध्दि भी हरी भरी हरे भरे हो स्वस्थ 
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
मंगल दंगल हुआ करे मिटे शंख से कष्ट 
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
संतो का अब संग रहे कभी नहीं हो भ्रष्ट 
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
सिंह के जैसा भाव रहे गज सा हो मदमस्त 
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
क्षिप्रा रेवा मिल गई मिले संत से गृहस्थ 
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
संता बंता ढूँढ  रहे सिध्द मिला न हस्त 
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ 
भीड़ में भक्ति  ग़ुम गई कटी जेब से त्रस्त
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिंहस्थ
अब तक शाही भोज किया अब शाही स्नान करो
महाकाल उज्जैनी में आया अब सिहस्थ

Wednesday, March 30, 2016

अंत

अंत में संत है महंत है पूर्ण विराम है
अंत में मृत्यु का सत्य है श्रींराम है
अंत में कथा का श्रवण वैकुण्ठधाम है
अंत में क्षीणता दुर्बलता बुढ़ापा है
अनुभव की गहराई है नभ् नापा है
अंत में वैराग है संन्यास है शोक है
शाश्वत और सनातन है श्लोक है
अंत में लक्ष्य है शिखर है सागर गहरा है
अनंत ब्रह्माण्ड के भीतर तम ठहरा है
अंत में कृष्ण गीता है रामायण है
कर्तव्य से विमुख क्यों ? समरांगण है
अंत में लय है प्रलय है ताण्डव है
नर में नारायण सत्य में पांडव है
अंत में नाद है निनाद है नृत्य उत्तम है
शिव का डमरू बजता डम डम है
इसलिए अंत से आरम्भ है
आरम्भ से अंत है
सृष्टि का बीज है बीज में बसंत है

Tuesday, March 29, 2016

आरम्भ और ऊँ

आरम्भ में ॐ है नम: शिवाय है
आरम्भ ही आदि अनादि भीमकाय है
आरम्भ में गंध स्पर्श झंकार है
भीगी हुई अनुभूतिया है निर्विकार है
आरम्भ में कठिनाईया है 
विघ्न है बाधा है
आरम्भ हो गया तो कार्य सफल हो गया आधा है
आरम्भिक अवस्था में
हर व्यक्ति सकुचाता है घबराता है
भय और संकोच के कारण आगे नहीं बढ़ पाता है
आरम्भ में उत्साह है रंग है तरंग है
होती विषम समस्याएं पर जीती जाती जंग है
आरम्भ में अर्पण तर्पण है समर्पण है
आरम्भिक प्रयासों से ही दिख जाता 
भावी का दर्पण है
इसलिए आरम्भ होना चाहिए
 उत्तम और भव्य है
उत्तम और सार्थक प्रयासों से 
मिल जाता गंतव्य है
आरम्भ में साधना है परिश्रम है 
तो जीवन योग है
तृप्त हो जाती सभी कामनाये
 मिल जाता आरोग्य है

Sunday, March 27, 2016

स्वास्थ्य लक्ष्मी और श्रीसूक्त

लोग माँ लक्ष्मी को मात्र धन प्रदान करने वाली देवी के रूप के में ही जानते है ऋग्वेद के श्रीसूक्त को धन ऐश्वर्य प्राप्त करने का माध्यम ही समझते है किसी का भी ध्यान अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य पर नहीं जाता जबकि स्वास्थ्य को धन से बड़ा धन माना जाता है आज हम श्रीसूक्त के उस मन्त्र की और आपका ध्यान आकृष्ट करायेगे जो लक्ष्मी जी से अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता है श्री सूक्त मन्त्र  जो इस प्रकार है 
" मनस: कामनाकूति वाच: सत्यमशीमहि 
पशूनां रूप मन्नस्य मयि श्री:श्रयतां यश :
अर्थात हे लक्ष्मी मैं आपके प्रभाव में मानसिक इच्छा एवं सकल्प वाणी की सत्यता गौ आदि पशुओं के रूप {दुग्ध दध्यादि एवं यव  बीहयादी }एवं अन्नो के रूप {अर्थात भक्ष्य भोज्य चोष्य लेह्य चतुर्विध भोज्य पदार्थ }इन सभी पदार्थो को प्राप्त करू ,सम्पत्ति और यश मुझमे आश्रय ले अर्थात मैं  लक्ष्मीवान और कीर्तिवान बनू । 
उपरोक्त मन्त्र में यह कामना की गई है की हे लक्ष्मी जी मुझे ऐसा स्वास्थ्य दीजिये की में सभी प्रकार के भोज्य पदार्थ ग्रहण कर सकु अर्थात चूसने चबाने खाने वाले वाले रस द्रव्य ठोस पदार्थो को दांतो से चबा सकु जिव्हा से रस लेते हुए उन्हें पचा सकू ।अप्रत्यक्ष रूप से उक्त मन्त्र से अच्छे स्वास्थ्य की कामना की गई है जिस व्यक्ति का स्वास्थ्य अच्छा होगा वह अच्छी पाचन तंत्र का होगा ही जिस व्यक्ति के हारमोन एंज़ाइम सक्रीय होंगे वह सभी प्रकार का आहार ग्रहण कर पायेगा ।लक्ष्मी जी इस स्वरूप को स्वास्थ्य लक्ष्मी संबोधित किया जाता है जिस व्यक्ति के स्वयं तथा परिवार का स्वास्थ्य अच्छा होता है वहा बीमारिया नहीं रहती ।बीमारिया दरिद्रता का कारण होती है ।बीमारियो से मुक्त व्यक्ति और परिवार होने से धन का अपव्यय नहीं होता है 

Thursday, March 24, 2016

सत्य की लड़ाई

सत्य की लड़ाई में
आदमी अकेला होता है
सूरज को कभी दीपक दिखाया नहीं जाता
जल का अर्पण किया जाता है
दीपक तो चन्द्रमा को दिखाया जाता है
अँधेरे को भागने के लिए
उजाला लाने के लिये
अँधेरे को दूर कर जो
जग में उजाला भर दे
उसे दिवाकर कहते है
दिवाकर की शरण में
सत्य दूत रहते है
अपराध अन्धकार की तलाश करता है
अँधेरे के भीतर गुप् चुप रहता है
उजाला जगमगाते ही खूब रोता है
अपना अस्तित्व खोता है
इसलिए अन्धकार मिटाने के लिए
सच का उजाला होता जरुरी है

Tuesday, March 22, 2016

मनुष्यता के मापदंड -३

गुण - मनुष्यता गुणों से विकसित होती हे सामान्य व्यक्ति गुण रहित होता हे उसे अवगुणी कहते है गुणों का मनुष्यता के लिए उतना ही महत्व हे जितना की अन्न ,जल , और स्वास  का अवगुणी व्यक्ति मात्र शरीर रूपी बोझ के अतिरिक्त और कुछ नहीं गुण शब्द व्यापकता लिए हुए हे उक्त बताए गुणों के साथ साथ और भी गुण हे जो व्यक्ति को श्रेष्ठ मनुष्य बनाते है कला संस्कृति, संगीत , नृत्य , अभिनय , विज्ञान , नाट्य , शिल्प भोजन-पाक कला  जैसे गुण मनुष्य को प्रकृति में विशेष स्थान देते है एकमात्र मनुष्य ही है जिसके पास चिंतन और कर्म करने की स्वतंत्रता यह गुण निहित है ।
धर्म  - धर्म से आशय मंदिर पूजा नियमों के निर्वहन से नहीं है नाही माला फेर देने से या दान- यज्ञ करना धर्म की शुद्ध परिभाषा  हे धर्म तो कर्म से प्रकृति - स्वभाव से संलग्न है जल का धर्म है शीतलता ,अग्नि का धर्म है दाहकता, वायु का धर्म है प्राण सतत बहना, पृथ्वी अपने धारण धर्म को निर्वहन करती है वृक्ष का अपना एक धर्म है प्रकृति में सभी का एक नियत धर्म है और उसी का ईमानदारी से निर्वहन करना कर्मयोग है जैसा कि गीता में भगवान ने स्पष्ट किया है ठीक इसी प्रकार व्यक्ति को मनुष्यता के मापदंड पर खरा उतरने के लिए अपने नियत धर्म का ईमानदारी से पालन करना चाहिए
उस धर्म को हम इस श्लोक से समझ सकते है-
"ईश्वर अंश जीव अविनाशी चेतन सरल सहज सुख राशि"
जीव ईश्वर का अंश हे वह अविनाशी हे अत: उसे सदैव इसी भाव मे रहना चाहिए वह चेतनता, सरलता और सभी के लिए सदैव सुख का माध्यम बनकर रहना यही उसका धर्म है
" येषा न: विद्या न: तपो न: दानं  न ज्ञानं न: शीलं न: गुणों न: धर्म ते  मृत्युलोके भार भवति: मनुष्य रूपेण: पशु चरंति"