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Thursday, July 5, 2018

शिवत्व भाव

शिव पूजा से अधिक शिवत्व भाव का है 
शिवत्व में शिव तत्व विद्यमान है
 शिव साकार स्वरूप है 
तो शिवत्व निराकार भाव है
 शिवत्व को जिसने धारण किया 
उसने शिव स्वरूप को आत्मा में समाहित कर लिया है 
शिव पूजा आसान है 
शिवत्व धारण करना कठिन है 
शिव कल्याण कारी है 
तो शिवत्व स्वयं में कल्याणकारक क्षमता जाग्रत करना है 
शिव का तात्पर्य निष्पक्षता 
शिवत्व स्वयं में निष्पक्षता का भाव उत्पन्न कर लेना है 
जिसकी निष्पक्षता संदिगध हो जाए 
उसके किसी को भी न्याय की आस नहीं रहती 
इसलिए न्याय कार्य शिवत्व धारण करके ही किया जा सकता है 
शिवत्व का अर्थ प्रकृति के समीप हो जाना है 
कृत्रिमता के आवरण से दूर स्वाभाविकता में जी लेना ही शिवत्व है 
साधनो के अधीन नहीं साध्य के अधीन हो जाना शिवत्व है 
विपरीत प्रकृति के जीवो के मध्य रहकर भी 
ध्येय के प्रति एकाग्रता का भाव शिवत्व कहलाता है

Tuesday, July 3, 2018

बावडिया हमारी सभ्यता

भारतीय संस्कृति में बावड़ियों का अत्यधिक महत्व है बावडिया हमारी सभ्यता की प्रतीक होकर धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है वास्तु शिल्प की उत्कृष्टता बावड़ियों के निर्माण में दृष्टिगत होती है बावडिया कितनी भी गहरी हो पथिक में उसमे सरलता सीढियो से उतर कर अपनी प्यास बुझा सकता है बावड़ियों जगह जगह बैठने और विश्राम करने के लिए झरोखे होते है जिसमे गर्मी के दिनों में पथिक विश्राम कर अपनी थकान मिटा लिया करते है प्राचीन काल मे राजाओ की प्रशस्ति और कीर्ति इस आधार पर होती थी कि उसके कितनी बावडिया धर्म शालाये बनवाई  नगर सेठ भी पूण्य प्राप्ति हेतु बावडिया निर्मित करवाते थे ।बावड़ियों से जुड़ी हमारे ग्राम्य अंचलो में कई प्रकार की दंत कथाये प्रचलित रही है देवताओ एवम उपदेवताओं की उपस्थिति बावड़ियों के भीतर होना बताई गई है वर्तमान में बावड़ियों का अस्तित्व खतरे दिखाई देता है
जहां निरंतर भू जल स्तर कम होता जा रहा है वहा बावड़ियों भू जल स्तर को ऊंचा उठाने में उपयोगी सहायक हो सकती है बावड़ियों में वर्षा जल के पुनर्भरण से उनका समाज के लिए उपयोग हो सकता है

Sunday, June 24, 2018

पुरुष कौन ?

पुरुष कौन  ? 
पुरुष वह है जो पुरुषार्थी हो 
जो पुरुषार्थ न करे भाग्य के भरोसे बैठा रहे 
वह व्यक्ति हो सकता है किन्तु पुरुष नहीं 
आध्यात्मिक पुरुषार्थ आजीविका सम्बंधित पुरुषार्थ 
पुरुषार्थ के कई प्रकार होते कई रूप होते 
किसी भी प्रकार की रचनात्मकता ज्ञानार्जन 
शोध कृषि कार्य समाज सेवा पुरुषार्थ की परिधि में आते है 
महिला कौन ? 
महिला वह है जो मही अर्थात  भूमि 
के सामान क्षमा की मूर्ति हो
 भूमि के सामान पोषण करे 
जिसका सानिध्य पाते ही तन मन आल्हादित हो 
जो निरंतर नए बीजो को अंकुरित कर 
समाज और परिवार को उर्वरकता प्रदान करे 
मिटटी के सामान ममत्व का भाव संजोये रखे 
जो स्त्री मही  अर्थात भूमि में व्याप्त गुणों की भाँती 
न हो वह स्त्री हो सकती है पर किसी भी अर्थ में 
महिला के रूप में परिभाषित नहीं की जा सकती है 

Friday, May 11, 2018

आत्म तत्व और मंत्र शक्ति

मंत्र जीवित रहते व्यक्ति की आत्म बल को बढ़ाता है
परन्तु व्यक्ति के मृत हो जाने के बाद भी उसका प्रभाव आत्मा के साथ बना रहता है किसी भी मंत्र का जप नियमित रूप से दीर्घ अवधि तक किया जाता है तो वह आत्मा का संस्कार बन जाता है देह की अचेतन अवस्था मे वह आत्मा के पंख की तरह क्रियाशील हो जाता है आत्मा मंत्र रूपी पंखो के सहारे इच्छित दिशा में चलायमान होने में समर्थ होती है वह स्वयं के निर्णय लेने में समर्थ रहती है नकारात्मक शक्तियां मंत्र शक्ति से परिपूर्ण आत्मा को प्रभावित नही कर सकती है इसलिए जीवन मे नियमित मंत्र जाप अत्यंत उपयोगी है

Sunday, April 1, 2018

वैदिक दैविक यज्ञ

चार दिन की चांदनी फिर अंधियारी रात

जो मस्ती में मस्त रहा ईश्वर उसके साथ 

 

जहा रही नई सोच है जीवन है गतिमान

स्थिरता में शून्य रहा विकसित ऊर्जावान

 

जीव है जग में पड़ा रहा जीवन का न पार

हे! नारायण दूत हमे दुर्गम पथ से तार

 

हर कण में है व्याप्त रहा परमेश्वर सर्वज्ञ 

जीवो का कल्याण करे वैदिक दैविक यज्ञ 


 


Saturday, March 24, 2018

प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है


प्रेम यदि पूजा हो तो प्रेरणा प्रदान कर 

वह ऊर्जा बन जीवन को प्रकाशित करता है 

प्रेम यदि  कामना हो तो वह व्यसन बन 

व्याभिचार की और ले जाता है 

प्रेम यदि  भक्ति हो तो शक्ति बन जाता है 

मन की शक्ति व्यक्ति को आध्यात्मिक उत्थान की ले जाती है

प्रेम यदि वात्स्ल्य हो तो

 ममता और पोषण प्रदान कर स्वास्थ्य प्रदान करता है 

प्रेम यदि करुणा हो तो 

आँसू  बन कर सम्पूर्ण मानवता को सींच देता है 

प्रेम यदि सेवा हो तो

 वह कर्म बन धर्म को जागृति देता है 

प्रेम यदि आशीर्वाद बन जाए तो 

भिक्षा में शिक्षा की दीक्षा प्रदान कर 

शिष्य को सम्पूर्णता प्रदान कर देता है

प्रेम के कई प्रतिरूप है प्रतिमान है 

प्रेम की प्रतिष्ठा है प्रेम से ही जीवन गतिमान है 

प्रेम की भावना जीवंत है वसंत है 

प्रेम  स्वयं ही एक धर्म है एक पंथ है