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Monday, October 26, 2020

तेरे दर भगवान

सच्चे अच्छे कार्य करे, सेवा और उपकार
सेवा तुझको धन्य करे,उपकृत से दातार

सेवा तो गुमनाम रहे, दाता रहे अनाम
याचक बनकर माँग रहा, तेरे दर भगवान

मिल जुल करके काम करो, रखो कार्य मे धार
कार्य यहाँ अनिवार्य रहा, परखा फिर व्यवहार

मिलता जुलता रूप रहा, मिलते जुलते गुण
उल्टे सीधे कार्य करे ,फिर भी कार्य निपुण

मिली जुली कोई बात मिली , मिलते नये पड़ाव
मिलने का जब दौर चला, मिले हृदय में घाव



Sunday, October 25, 2020

Srijan: देहरी में हो दीप

Srijan: देहरी में हो दीप: घर मे खुशिया बसी रहे, देहरी में हो दीप दोहरे होते चाल चलन , उन सबको तू लीप मौलिकता तो मिली नही , मिले मिलावट लाल मिले जुले ही रूप मिले , मौल...

Friday, July 10, 2020

वैधानिक गल्प - उपन्यास समीक्षा

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित उपन्यास वैधानिक गल्प लेखक चंदन पांडेय द्वारा अभिलिखित है ।वैधानिक उपन्यास अर्जुन नामक ऐसे व्यक्ति से आरम्भ होती है जो लेखक और कथाकार के साथ प्रकाशन समूह का संपादक भी है ।  अर्जुन जिसकी पत्नी अर्चना है को तब झटका लगता है जबकि एक दिनअर्जुन  उसकी पूर्व प्रेमिका अनसूया का  नोमा नामक कस्बे से फोन आता है । अनसूया अर्जुन को बताती है कि  उसका पति रफीक कही गायब हो गया है ।।      
                    रफीक रंग कर्मी के साथ कॉलेज में संविदा प्राध्यापक भी रहा है। अर्जुन अनसूया की मदद के लिए पहुँचता है ।  अर्जुन अनसूया को थाने में पुलिस द्वारा अपमान जनक तरीके से पूछताछ करते हुये पाता है । थाने के आतंक पूर्ण वातावरण को महसूस करता है । अनसूया से गर्भ से है को अर्जुन थाने से उसके घर ले जाने के बाद कुछ दिनों के लिए अर्जुन नोमा ही रुक जाता है । प्रकाशन समूह के मालिक की मदद से अर्जुन को थाने का प्रभारी शलभ का सहयोग प्राप्त होता है ।परंतु स्थानीय राजनीति के चलते रफीक का नाम लव जेहाद में जुड़ जाता है क्योंकि रफीक के गायब होने के साथ उसकी छात्रा जानकी के गायब होने की जानकारी भी उसे प्राप्त होती है 
          रफीक की तलाश किये जाने के सिलसिले में अर्जुन को रफीक की डायरी प्राप्त होती है जिसके गीले और फटे हुये  पन्नो पर लिखी इबारत को पढ़ने का प्रयास करता है ।जिसके माध्यम से अर्जुन गायब होने के पूर्व रफीक की क्या मानसिकता थी । इसे समझने चाहता है ।इसी दौरान अर्जुन को निलम्बित पुलिस उपनिरीक्षक अमन दीप मिलता है जिसके ऊपर आर्थिक गबन का आरोप है ।परंतु गहराई से जांचने पर ज्ञात होता है ।अमन दीप को निलंबित किये जाने की वजह कुछ और है। जिसमे अमन दीप ने एक व्यक्ति को प्रायोजित भीड़ द्वारा की गई हिंसा से बचाये जाने के कारण स्थानीय राजनेता की नाराजगी है  उपन्यास के अंत तक गायब हुए रफीक और जानकी का पता नही चलता। 
          उपन्यास के माध्यम से लेखक ने यह तथ्य कहने का प्रयास किया है कि प्रत्येक मामले को लव जेहाद का रंग देने की आवश्यकता नही है ।कितने संविदा अध्यापकों और प्राध्यापको को लंबे समय से नियमित न किया जाकर उनका शोषण किया जा रहा है । उपन्यास के माध्यम से लेखक ने पुलिस की कार्य प्रणाली और पुलिस स्थानीय राजनेताओ के साथ साठ गांठ को रेखांकित किया है । लेखक ने यह प्रश्न भी उठाया है ।पुलिस में संवेदनशीलता का अभाव है वह एक प्रसूता के साथ पेशेवर अपराधी की तरह व्यवहार करती है ।  

Friday, July 3, 2020

लौटा दे कोई बीते हुए पल

कहते है ,समय हर यक्ष प्रश्न का जबाब देता है ।इसलिए सही समय की प्रतीक्षा करो ।परन्तु सही समय की प्रतीक्षा में सही व्यक्ति का पूरा जीवन संघर्षो में बीत जाता है ।संघर्ष करते करते सही व्यक्ति के जीवन का रस और आनंद कही खो जाता है और रह जाती है वे अनुभूतिया जिनकी स्मृति मात्र व्यक्ति के मन मे कसैलापन ला देती है ।व्यक्ति  के हृदय में तब आत्मीयता स्नेह करुणा के स्त्रोत सूख जाते है । व्यक्ति यथार्थवादी हो जाता है ।
      इसलिए यह कहना कि समय हर प्रश्न का जबाब दे देता है सही समय का इंतज़ार करो ।कहना बहुत आसान है ।नही आसान होता बुरे समय से गुजरने वाले व्यक्ति की समस्याओं को समझना,अनुभूतियो को जानना, संघर्ष यात्रा के पथ के उतार चढ़ाव पीड़ा को पहचानना ।हम तत्काल उस व्यक्ति के शुष्क व्यवहार पर टिप्पणी कर देते है ।जिसने समय से संघर्ष करते करते उपलब्धिया पाई है । यह शाश्वत  सत्य है कि बीता हुआ समय कभी वापस नही लौटता । लौट कर आती है  तो दुखद और सुखद यादे । ये दुखद और सुखद यादे ही व्यक्ति के व्यक्तित्व को परिभाषित करती है ।
        हर आयु के साथ जुड़े  हुए कुछ आनंद के पल होते है । बचपन , यौवन , की अपनी आवश्यकता होती है ।समय बीत जाने पर हम बचपन आनंद को अधेड़ अवस्था मे अनुभव नही कर सकते ।यौवन के आनंद को वृध्दावस्था में अनुभव नही किया जा सकता । चाहे लाख अनुकूलताएं आ जाये एक उम्र बीत जाने पर उस उम्र से जुड़ी आनंद की अनुभूतियो का अनुभव नही किया जा सकता । जिन लोगो ने बचपन मे बचपन के उल्लास को ,यौवन में यौवन की उमंग को अनुभव नही किया है ।आयु बीत जाने पर बूढ़े होने पर उस आनंद को पाना चाहते है ।इसलिए कोई व्यक्ति वृध्दावस्था में बच्चों की तरह खेलना कूदना चाहता है ।उछलने की कोशिश करता है । कुछ लोग वानप्रस्थ अवस्था दूसरा विवाह कर लेते है । इसलिए उच्छृंखलता और उदंडता से परे बच्चों को  अपनी स्वाभाविक चपलता और मस्ती जीने अवसर दिए जाने चाहिए। इसी प्रकार से किशोर और तरुण को भी यौवन से जुड़ी उमंगे  को खिलने तथा तरंगित होने के मौके मिलने चाहिए ।अन्यथा बचपन और यौवन न जीने कुंठा व्यक्ति के व्यक्तित्व को तहस नहस कर देती है जिसकी परिणीति व्यक्तित्व में आने वाली विकृतियों के रूप में होती है

Tuesday, June 30, 2020

व्यक्तित्व की सघनता

वृक्ष हो या व्यक्ति उसका  बड़ा होना पर्याप्त नही है। घना होना भी आवश्यक है, नही तो लोग ऊंचाई से आतंकित होने लगते है ।पास आने पर भी डर लगता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व में ऊंचाई के साथ घनत्व भी होना चाहिये ।घनत्व के साथ व्यक्ति के व्यक्तित्व में गुरुत्व भी होना  चाहिए
            लोग अक्सर सफलता और ऊँचे लक्ष्य पाकर उदारता खो देते है उदारता ही व्यक्ति के व्यक्तित्व की सघनता निर्धारित करती है अहंकार से ग्रस्त होने पर व्यक्ति किसी काम का नही रहता । अधिकार और वैभव प्राप्त होने पर तो कोई भी व्यक्ति सामान्य शिष्टाचार भूल जाता है । अपने अधिकारों का दुरुपयोग  प्रारम्भ कर देता है ।ऐसे अहंकारी व्यक्ति से किसको क्या मिल सकता है ? जो लोग ऐसे व्यक्ति से कोई आशा रखते है तो वह ऐसा ही होगा जैसे रेत में से  कोई व्यक्ति तेल निकाल ले। मरुथल में कोई व्यक्ति उद्यान लगा ले ।जो वृक्ष सघन होते है वे ही छायादार और फलदार होते है । जो व्यक्ति उदार होते है वे मानवीय गुणों की सघनता से परिपूर्ण होते है उनके पास दुसरो को देने के लिए सकरात्मकता ,सर्जनात्मकता ,होती है इसलिए लोग उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर खींचे चले आते है । उन्हें जबरन किसी को बुलाने की आवश्यकता नही होती है अपनी बात को मनवाने के लिए कुतर्को का सहारा नही लेना पड़ता । उनके व्यक्तित्व में सदैव स्नेह संवेदना और करुणा की छाया रहती है । उनका सानिध्य मात्र ही तन मन को आल्हादित कर देता है 
           घने वृक्षो के  पत्तो और डालियो पर जिस प्रकार पंछी सुरक्षा का भाव पाते है ।अपने घोंसले बनाते है । पथिक थकान मिटाते है ।घने वृक्ष की विद्यमानता यह सुनिश्चित करती है कि उसके आस पास निश्चय ही मीठे जल का स्त्रोत होगा । उसी प्रकार से सघन व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति की सघनता के पीछे उनकी जड़ो की गहनता और संस्कारों की विरासत होती है ।

Tuesday, June 23, 2020

बेनियाज़ मियाद के पार-कहानी समीक्षा

जहाँ हमारे देश मे मानसिक अवसादों पर बहुत कम साहित्य लिखा गया है वही हिंदी उपन्यासकारा और वरिष्ठ लेखिका श्रीमती मृदुला गर्ग की द्वारा अभिलिखित कहानी "बेनियाज़ मियाद पार" में  मनोवैज्ञानिक समस्याओं की और गंभीरता से ध्यान आकृष्ट किया गया है। कहानी में बताया गया है कि किस प्रकार से कोई व्यक्ति मानसिक अवसाद से ग्रस्त होकर विचारो के भ्रांतियों का शिकार हो जाता है ।चिकित्सक भी समझ नही पाते है कि यह शारीरिक रुग्णता है या मनोवैज्ञानिक ऐसी स्थिति में व्यक्ति निराशाओ से घिरता जाता है ।
              बेनियाज़ मियाद पार को लेखिका का आत्मानुभव कहे तो ज्यादा अच्छा होगा।लेखिका की आयु 80 वर्ष होना बताई गई है बुजुर्ग व्यक्तियों की आयु जनित अंग शिथिलताओ के साथ मनोवैज्ञानिक समस्याएं भी पैदा होने लगती है । कहानी में उकेरी गई अनुभूतियो से हमे बुजुगों की मानसिक स्थितियों को समझने में सहायता मिलती है ।कहानी जिस प्रकार से कही गई है उससे पाठक का मन गुदगुदाता है ।
      कहानी का संदेश यह है कि कब कोई मानसिक समस्या शारीरिक समस्या बन जाती है हमे पता ही नही चलता ।यह कहानी ऐसे लोगो की अनुभूतियो को शब्द प्रदान करती है ।जो तरह तरह की मानसिक पीड़ाओं से घिरे रहते है और जो अपनी पीड़ा को सही प्रकार से प्रगट ही नही कर पाते है ।कहानी में लेखिका के रूप में प्रकाशन जगत से जुड़ी चिंताओं को इस रूप में प्रगट किया है लेखक को पता ही नही चलता कि उसके द्वारा अभिलिखित कृति से प्राप्त निधि का प्रकाशक द्वारा किस प्रकार व्ययन किया गया है 
       कहानी हमे इस तथ्य से अवगत कराती है हमारे देश मे कुशल मानसिक चिकित्सक नही होने से और मनोरोगियों को गलत दवाईया दिए जाने से किस प्रकार से मरीज साइड इफ़ेक्ट का शिकार होता जाता है ।

Friday, June 19, 2020

हसीनाबाद-उपन्यास समीक्षा

लेखिका गीता श्री द्वारा अभिलिखित उपन्यास जो वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है ।यह उपन्यास समाज के एक ऐसे वर्ग की पीड़ा को बयान करता है जिनके बारे में लोग खुले मुँह बात करना पसंद नही करते  अर्थात ग्रामीण क्षेत्र के सामन्तवादी लोगो की वासनाओ की तृप्त करने वाली महिलाओं और उनके बच्चों की दास्तान का नाम है हसीनाबाद।
           वैसे तो देश के कई हिस्सों में हसीनाबाद जैसी बस्तियां दिखाई देती है परंतु उपन्यास में उल्लेखित हसीनाबाद बिहार के वैशाली जिले से सम्बंधित है  उपन्यास की केंद्रीय पात्र सुंदरी जिसे कुछ लोग बचपन मे उसके गांव उठाकर ले जाते है और बाद में उसे है हसीनाबाद में ठाकुर सजावल सिह ठाकुर की कामनाओ का शिकार होना पडता है ।सुंदरी जिसे अपनी नियति मान लेती है । कालांतर में सुंदरी को ठाकुर सजावल सिंह से एक पुत्र रमेश और एक पुत्री गोलमी पैदा होती है । उपन्यास की सम्पूर्ण कथा सुंदरी की पुत्री गोलमी के इर्द गिर्द घूमती है ।हसीना बाद में सुंदरी जैसी अनेक स्त्रियां होती है जो अलग अलग ठाकुरों की यौन इच्छाओ की पूर्ति की साधन मात्र होती है ।परम्परा के तहत ठाकुर उनके जीवन यापन की सारी व्यवस्था करते है ।ऐसी महिलाओं की लड़कियों को पुनः अनैतिक कृत्यों में लिप्त होना पड़ता है कला संगीत नृत्य के माध्यम से ठाकुरों अगली संतति की तृष्णाएं शांत करनी पड़ती है ।लड़को को ठाकुरों सेवा में रह कर लठैतों की भूमिका निभाना पड़ती है ।।                                 कथानक के अनुसार हसीनाबाद मूल भूत सुविधाओ से वंचित रहता है ।महिलाओं के बच्चे अशिक्षित ।ऐसे में एक दिन सुंदरी गांव के मंदिर में अन्य स्थान से आई भजन मंडली के सदस्य  सुगन महतो के साथ प्रेम प्रसंग के रहते अपनी पुत्री गोलमी को लेकर भाग जाती है और सूजन महतो जो पूर्व से अन्य महिला से विवाहित है रहने लगती है । सुंदरी की पुत्री गोलमी और उसकी सहेली रज्जो गांव के अन्य लड़के खेचरु और अढाई सौ के बचपन को उपन्यास में लेखिका द्वारा बहुत खूबसूरती से चित्रित किया गया है। कथा के अनुसार सुंदरी गोलमी को पढ़ाना चाहती है परंतु गोलमी नृत्य और संगीत में रुचि रखती है । उधर सुंदर पुत्र रमेश जिसे वह मालती देवी के पास छोड़कर आ गई थी। वह उपेक्षित बचपन बीताते हुए बड़ा होता जाता है अपनी माँ और बहन के प्रति मन मे घृणा का भाव रखता है । रमेश अपने मित्र उस्मान जो ईट के भट्टे पर मजदूर है तथा ठाकुरों के निर्देशों पर क्रूर कृत्यों को अंजाम देता है के साथ आत्मीयता और सामीप्य का अनुभव करता है ।गोलमी अपनी नृत्य और संगीत में रुचि के चलते नृत्य कला मंडली का गठन कर गांव गांव में लोगो का मनोरंजन करती है । नृत्य कला मंडली में गोलमी का साथ रज्जो खेचरु अढाई सौ देते है इसी दौरान एक राजनेता राम बालक सिंह की दृष्टि गोलमी पर पड़ती जो गोलमी की नृत्य और गीत की कथ्य शैली से प्रभावित होकर उन्हें अपनी पार्टी के चुनाव के प्रचार हेतु मना लेते है ।
         समय के साथ गोलमी कला के सोपान के माध्यम से राजनीति के शिखर पर पहुँच जाती है और रमेश कुशल राजनेता के रूप में स्वयम को स्थापित कर लेता है 
          उपन्यास  अंग्रेजो के समय के पुराने सामन्तवाद  को आजादी के नवीन रूप धारण करते बताया गया है । किस प्रकार राज नेता राम खिलावन के पिता संग्राम सिंह जो प्रथम कोटि के शराबी थे फर्जी तौर पर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी घोषित रोचक कथा के माध्यम से प्रगट किया गया है  । सामंतवादियों द्वारा यौन शोषण की गई महिलाएं जब वृध्दावस्था को प्राप्त होती उनकी मानसिक स्थितियों को सूक्ष्मता से विश्लेषित  किया गया है ।कथा में वरिष्ठ लेखक प्रभात रंजन जी की कृति "कोठागोई" में उल्लेखित चतुर्भुज और उनसे जुड़ी नृत्यांगनाओ और उनके जुड़े संदर्भो को स्पर्श किया है ।उपन्यास की भाषा मे कही कही काव्यात्मकता नज़र आती है ।