माध्यम है जिससे तन को स्वस्थ रखने के साथ साथ मन को भी उल्लास दिया सकता है
व्यक्ति बच्चा बूढ़ा हो या जवान शौक हर व्यक्ति के होते है l शौक मे किये जाने वाले कार्य में थकान अनुभव नहीं होती l व्यक्ति का व्यक्तित्व यह बताता है कि उसका कौन से खेल से जुडाव है l जीवन के उसका दृष्टिकोण उसका कैसा है l
खेल से व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है l खिलाड़ी व्यक्ति जीवन की चुनौतियों को सहज ही स्वीकार कर लेता है l अपवादीत परिस्थितियों को छोड़ कर खिलाड़ी अवसाद से ग्रस्त नहीं होता l वह व्यसन विहीन होता है l
जो लोग यह कहते है कि शारीरिक व्याधियों के कारण वे कोई खेल गतिविधि नहीं कर पाते उन्हें दिन में एक बार उस खेल के मैदान में अवश्य जाना चाहिए जहां प्रत्येक आयु वर्ग व्यक्ति भिन्न भिन्न प्रकार की खेल गतिविधियों में संलग्न हो l
एक बीमार व्यक्ति भी खेलते हुए बच्चों देख कर स्वस्थ हो सकता है l खेल से जुड़े व्यक्ति की मानसिकता योद्धा के समान हो जाती है l वह बार बार हारता पर हार स्वीकार नहीं करता l खेल वह भावना है जो जीवन के प्रत्येक क्षैत्र उपयोगी साबित होती है खेल गीता के कर्मयोग के व्यवहारिक प्रयोग है इसलिए जहा हो सके किसी खेल से जुड़े l
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