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Tuesday, April 14, 2026

भाव और भावनाए

भाव  और  भावनाए  व्यक्ति  के  आंतरिक  चेतना  है  |
किसी  व्यक्ति  के  भाव  और  भावनाओं  का  स्तर  कम  या  अधिक  हो  सकता  है,  परंतु  यह  सम्भव  नहीं  है  कोई  व्यक्ति  पूर्ण  रूपेण  भावना  विहीन  हो  |
       भावनाओं  को  किसी  व्यक्ति  के  व्यवहार  चेहरे  की  भाव  भंगिमा  से  जाना जा सकता  है | चालाक  और  धूर्त  लोग  की  भावनाए  न  तो  चेहरे  जानी  जा सकती  है  और  नहीं  शब्दों  से  उनके  भीतर  कुछ  और  चल  रहा  होता  है  बताया  जा  सकता  है कहा  कुछ  जाता  है किया  कुछ और    जाता  है  वे  अभिनय  कौशल  मे  पारंगत  होते  है | 
      सहज , सरल ,सच्चे  और  भोले  व्यक्तियों  को  अपनी  भावनाए  छुपाना  नहीं  आती  है | उनके  भावों  उनके  चेहरे  और  शब्दों  से  पकड़ा  जा सकता  है  | ऐसे  व्यक्तियों  के  जीवन  को  खुली  किताब  कहते  है | पारदर्शिता  होने  से  उनके  पास  छुपाने  के  लिए  कुछ  नहीं  होता  है  | इस  पारदर्शिता  उन्हें  नुकसान  भी  उठाना  पड़ता  है |
     कभी कभी व्यक्ति  हृदय  विदारक  घटनाओं  के  आघात कुछ  समय  के  लिये  भाव  शून्य  हो  जाता  है l उसे  संसारिक  संबंधों  से  विश्वास  उठ  जाता  है  | किसी  भी  विषय  में  रुचि  नहीं  रहती  | कुछ  समय  के  लिए  वैराग्य  की  भावना को  श्मशान  वैराग्य  कहा जाता  है |
     कुछ  लोग  थोड़ी  सी  खुशी  मिलने  अत्यधिक  प्रसन्न थोड़ा  सा  दुख  मिलने  पर  अत्यधिक  दुखी  ,थोड़ी  सी  परेशानी  मिलने  पर  अत्यधिक  विचलित  , थोड़ा  सा  धन  मिलने  पर  अत्यधिक  व्यय  करने  वाले  , थोड़ा  से  अभाव  में  दीनहीन  हो  जाते है  l ऐसे  भावुक  व्यक्तियों  से भरोसे  कोई  भी  बड़ा  लक्ष्य  न  परिवार  हासिल  कर सकता  है   और  न  कोई  संस्था  या  समाज  भरोसे  रह  सकता  है |
     भावनाओं  पर  नियंत्रण  रखना  हर  किसी  के  लिए  सम्भव  भी  नहीं  है | बड़ी  योजनाओं  के  क्रियान्वयन  के  लिए  भावनाओं  को  परे  रख  कर  स्थिर  चित्त  से  विचार  किया  जाना  आवश्यक होता  है  | भावनाओं  में  बह  कर  लिये  गये  निर्णय  व्यक्ति  परिवार  समाज और  देश  के  लिये  घातक  होते  है  |
    समुचित  और  संतुलित  भावनाये  व्यक्ति  को  सम्वेदनशील  बनाती  है  | भावनाए  समाज, राष्ट्र  ,संस्कृति,  साहित्य,  संगीत, कला ,नृत्य, खेल  ,पर्यावरण, से  जुड़ जाती  है  तो वे सार्थक  हो  जाती  है  | भावनाए  स्वयं से  जुड़  जाती  है  तो  व्यक्ति  स्वार्थी  हो  जाता  है  | भावनाओं  का  विस्तार  है  व्यक्तित्व  का  विस्तार  है 

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