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Monday, January 2, 2012

बिल्व वृक्ष का श्री शिव एवम कुबेर देवता से सम्बन्ध


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स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति तथा समृध्दी हेतु 
भगवान् विष्णु ,माता महालक्ष्मी ,एवम शिव शंकर महादेव तथा कुबेर देव केमध्य परस्पर संबंधो के विषय में चिंतन किया आवश्यक है 
यह विषय आज तक अछूता रहा है 
आखिर इन सभी देवताओं में परस्पर क्या सबंध है 
सर्वप्रथम लक्ष्मी जी की प्राप्ति हेतु कर्म किया जाना होता है 
भगवान् विष्णु जो कर्म के देवता है 
कर्म एवम पुरुषार्थ किये जाने पर धन की प्राप्ति अर्थात महालक्ष्मी की कृपा होती है
किन्तु यदि ऐसा ही है हम बहुत से ऐसे लोगो को इस जग में  देखते है की जो निरंतर कर्मरत रहते है फिर भी वांछित सम्पन्नता प्राप्त नहीं कर सकते है
कर्म कर वांछित सम्पन्नता कैसे प्राप्त की जा सकती है इस बिंदु कर पर  श्री सूक्त का यह मन्त्र प्रकाश डालता है
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥
अर्थात हे सूर्य के सामान कांति वाली आपके तेजोमय प्रकाश से बिना पुष्प के फल देने वाला एक वृक्ष विशेष उत्पन्न हुआ तदनन्तर आपके हाथो से बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ उस बिल्व वृक्ष का फल मेरे बाह्य और आभ्यंतर की दरिद्रता नष्ट करे 
 आखिर बिल्व के वृक्ष से लक्ष्मी जी अर्थात सम्पन्नता का क्या सम्बन्ध है 
सूक्ष्मता से देखे तो बिल्व वृक्ष के पत्ते को अर्पित किये जाने से मात्र से भगवान् शिव प्रसन्न होते है 
बिल्व वृक्ष के पुष्प विहीन होना और उसके फल को धारण करने का आशय यह है की कर्म के द्वारा अर्जित धन को उसी प्रकार से धारण करना चाहिए 
जिस प्रकार पुष्प विहीन बिल्व फल को धारण किया जाता है
अर्थात
जीवन अनावश्यक वैभव प्रदर्शन किये व्यतीत किये जाना चाहिए 
ठीक उसी प्रकार से जैसे शिव शम्भू अनावश्यक आडम्बर से सदा नैसर्गिक रूप से विचरण करते है 
इसीलिए शिव उपासको को भी लक्ष्मी जी की कृपा मिलती है 
धन का मितव्ययिता पूर्वक उपयोग किये जाने से कुबेर देव भी प्रसन्न होते है  इसलिए दीपावली के अवसर पर कुबेर देव की अर्चना का महत्त्व है 
महालक्ष्मी धन वर्षा कर सकती है 
कितु धन को संचित रहे यह उपाय 
भगवान् महादेव के जीवन का अनुशरण करते हुए कुबेर देव जैसी संचय की भावना से किया जाय 
तो व्यक्ति को स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है
ऐसा व्यक्ति कभी भी दरिद्र नहीं हो सकता है

उपरोक्त वीडियो  बिल्वामृत्तेश्वर  महादेव धर्मपुरी जिला-धार रेवा गर्भ संस्थान का है जो माँ नर्मदा के मध्य बसे टापू पर स्थित है कहा जाता है की यहाँ पर स्थित शिवलिंग उसी स्थान पर विद्यमान है जहा राजा रंतिदेव ने बिल्व-पत्रों के माध्यम से शिव जी को प्रसन्न करने हेतु अनुष्ठान किया था इस टापू पर महर्षि दधिची की भी समाधि है जिनके बारे में कहा जाता है की उनकी अस्थियो से बने वज्र से इंद्र ने वृत्तासुर का वध किया था 

Sunday, January 1, 2012

युध्द नीती का श्रीराम एवम श्रीकृष्ण से संबध


 

पुरुषोत्तम  श्री राम एवम भगवान् कृष्ण के जीवन  की कथाओं का युध्द नीती से अत्यधिक सम्बन्ध है 

जिसके बारे में चिंतन की आवश्यकता है 
वर्तमान में जो महाशक्ति अमेरिका द्वारा जिस प्रकार से ईराक अफगानिस्तान में हुए युध्दों में जिस प्रकार की रण नीती बनायी गयी थी 
उससे बेहतर रण -नीति तत्समय भगवान कृष्ण एवम राम तथा पवन पुत्र हनुमान द्वारा बनायी गई थी 
युद्ध नीती का यह सूत्र की सदा शत्रु की धरा पर किया गया युध्द शत्रु पक्ष को अधिक क्षति कारित कर सकता है
का पालन रामायण में हुए युध्द से परिलक्षित होता है 
जहा युद्ध स्थल शत्रु अर्थात रावण राज्य लंका रही थी 
दूसरा सूत्र यह की स्वयं की भूमि को युद्ध के दुष्प्रभावो से मुक्त रखना 
रामायण में हुए युध्द से दर्शित होता है जिसमे श्रीराम चाहते तो अयोध्या से सैन्य बल मंगवा सकते थे 
किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया और वनवासियों की वृहद् सेना इकठ्ठी की 
जिस प्रकार से अमेरिका ने ईराक एवम अफगानिस्तान में हुए युध्दो में स्वयं के सेना का न्यूनतम उपयोग करने की योजना के तहत नाटो सेना को युध्द में उतारा था 
यदि श्रीराम अयोध्या की से सैन्य बल मंगावाते तो संभव है 
रावण की सेना के मायावी राक्षस अयोध्या में विध्वंस करते 
जिसका लंका में हो रहे राम रावण युध्द पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता 
स्वयं की धरा को युध्द से मुक्त रख शत्रु से युध्द करने की नीती भगवान् कृष्ण ने भी अपनाई थी 
जिसके तहत उन्होंने कंस का वध किये जाने के पश्चात जरासंघ की विशाल सेना से मथुरा राज्य कोबचाने के सभी  उपाय किये चाहे उन्हें रण-छोड़ के रूप में संबोधित किया गया हो 
पर उन्होंने मथुरा राज्य को युध्द भूमि नहीं बनने दिया 
पश्चातवर्ती घटना क्रम में उन्होंने द्वारका के रूप ऐसे राज्य की स्थापना की जो भोगौलिक दृष्टि से सभी प्रकार से सुरक्षित थी 
इसी कारण श्रीकृष्ण महाभारत में महायुध्द हेतु पांडवो की सहायता में समर्थ हो सके 
युध्द नीती का यह सूत्र की युद्ध के पहले शत्रु को सभी प्रकार से निर्बल कर देना 
रामायण में भगवान् राम ने मुख्य युद्ध के पहले 
रावण बंधू खर दूषण का वध 
तथा पवन पुत्र हनुमान द्वारा सीता जी की खोज के दौरान

प्रमुख राक्षसों का वध व् लंका दहन कर रावण के आयुधागार  को क्षति कारित करते हुए शत्रु दल को भय भीत कर देना इसी नीती का अंग है 
उसी प्रकार से महाभारत युद्ध के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कौरवो के शुभ चिंतक जरासंघ ,कंस ,शिशुपाल का वध भिन्न भिन्न प्रकार से भिन्न भिन्न परिस्थितियों कराया जाना तथा किया जाना इसी नीती को दर्शाता 
क्योकि यदि जरासंघ की मृत्यु नहीं होती तो वह तथा उसकी विशाल सेना कौरवो की ही सहायता करती
इस प्रकार भगवान् विष्णु के दोनों अवतारों द्वारा जो युध्द नीती अपनाई गई वह आज भी प्रासंगिक है जिस पर अन्वेषण की आवश्यकता है

Tuesday, December 27, 2011

त्रिदेव एवम जीवन दर्शन

त्रिदेव ब्रह्मा विष्णु महेश के कार्यो में मूलभूत अंतर क्या है 
सामान्य रूप से कहा जाता है ब्रह्मा सृष्टि का  निर्माण करते है 
विष्णु जी पालन तथा शिव जी संहार करते है
किन्तु यह उनके कार्यो का अधूरा परिचय है 
वैसे ब्रह्मा जी के कार्यो परिचय के सम्बन्ध यह कहना महत्वपूर्ण होगा की शब्द को ब्रह्म की संज्ञा दी गई है
ब्रहमा जी ने समय समय पर राक्षसों को वचन देकर वरदान दिए है 
इसलिए उनको वचन का देवता भी कहा जा सकता है 
बोलचाल की भाषा में किसी महत्वपूर्ण वाक्य को ब्रह्म वाक्य कहा जाता है 
अर्थात वह वाक्य जो सत्य हो अटल हो तथा फलीभूत हो  
शब्द में ब्रहम होने का मतलब यह है की जो भी हम बोलते है वह शब्द सुनने वाले पर उच्चारित शब्द के अनुसार प्रतिक्रिया करता है 
चाहे वह सकारात्मक प्रतिक्रिया करे या नकारात्मक प्रतिक्रिया करे यह उस शब्द की प्रकृति पर निर्भर करता है 
इसलिए शब्द में ही ब्रह्म अर्थात ब्रह्मा जी का वास होता है
दुसरे स्थान पर विष्णु का सम्बन्ध कर्म से होता है 
इसका तात्पर्य यह है की जब तक सृष्टि है तब तक जीवन है 
कर्म के बिना जीवन जड़ है कर्म ही जीवन में चेतनता प्रदान करता है
चेतना कई प्रकार की हो सकती है जहा चेतना है वहा कर्म है जहा कर्म है फल है 
सत्कर्म में ईश्वर का अर्थात विष्णु भगवान् का वास होता है 
इसलिए भगवान् विष्णु के सभी अवतारों ने कर्म की आराधना पर बल दिया है 
कर्म शील व्यक्ति के साथ भगवान् विष्णु का आशीर्वाद होता है
भगवान शिव सहिष्णुता तथा उत्तरदायित्व,प्रबंधन  के देवता है 
भगवान् शिव ने माता गंगा के अतिरिक्त ऐसे जीव जन्तुओ तथा भूत प्रेत पिशाचो पशुओ के प्रति भी उत्तरदायित्व का निर्वहन किया जिन्हें सभी देवगण ने त्यक्त कर रखा था 
समस्त राक्षसों के भी आराध्य देव शिव रहे है
जहा तक सहिष्णुता का बात की जाय शिव जी जैसा सहिष्णु देव मिलना असम्भव है 
सामान्य रूप से जिस व्यक्ति को कही सम्मान नहीं मिलता उसे उसके ससुराल में तो सम्मान तो मिलता ही है
किन्तु शिव जी को उनके ससुराल में सार्वजनिक रूप से ससुर द्वारा अपमानित किया गया फिर भी वे मौन रहे
अंत में उनकी पत्नी माता सती को क्रोध आने पर जब हवन कुण्ड माता सती ने आत्मदाह किया
तब जाकर शिव जी धैर्य टूटा इसलिए धैर्य सहिष्णुता एवम दायित्व का पाठ भगवान् शिव से हमें ग्रहण करना चाहिए 
शिव जी प्रबंधन में अद्वितीय थे इसलिए भिन्न भिन्न प्रकार के प्राणी उनके साथ होने के बावजूद उन्होंने सभी के लिए गणा अध्यक्षों की नियुक्ति कर रखी थी 
और स्वयं तपस्या रत रहते थे 
आशय यह है की वर्तमान जीवन में कोई व्यक्ति  शब्द को सिध्द कर हर वचन का मुल्य समझता  है तथा वाणी के माध्यम से शब्द को मुख से बहार निकालता है 
उसकी जिह्वा एवम कंठ में सरस्वती का वास होता है अर्थात शब्द ब्रह्म की अनुगामिनी वाणी स्वरूपा सरस्वती होती है 
कोई यदि जीवन को सत्कर्मो को करते हुए सृजनरत रहता है तो उसे लक्ष्मी स्वरूपा लक्ष्मी की प्राप्त होती है 
लक्ष्मी के बल पर पुन नव कर्मो में रत होता जाता है तो लक्ष्मी बहु गुणित होती जाती है 
इसलिए कर्म के देवता विष्णु की अनुगामिनी लक्ष्मी माता को कहा जाता है 
जो व्यक्ति सहिष्णुता पूर्वक तथा कुशलता पूर्वक अपने दायित्वों का निर्वहन कुशल प्रबंधन के माध्यम से भलीभांति करता है वह अद्भुत शक्ति का अनुभव करता है 
उसे असीम बहु आयामी शक्तिया प्राप्त होती है वह शिव में समाहित होकर शक्ति संपन्न हो जाता है

Friday, December 23, 2011

समुद्र मंथन से निकला चिंतन


वृहद् लक्ष्य के लिए बहुत अधिक श्रम एवम बल की आवश्यकता होती है
किन्तु वृहद् लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए लम्बे संघर्ष  असीम धैर्य भी चाहिए
जब वृहद् लक्ष्य के कई लोग साथ हो तो सभी प्रकार के व्यक्तियों में से किस व्यक्ति की क्या भूमिका रही
उस  भूमिका  से उस व्यक्ति के आचरण का पता चल जाता है
लक्ष्य प्राप्त होने पर लक्ष्य में उसका क्या अंश रहना चाहिए यह देखा जाता है
प्राचीन काल में  समुद्र मंथन का प्रसंग आता है
समुद्र मंथन में अर्थात वृहद् पैमाने पर अमूल्य प्रकार
की कृतियों को प्राप्त करने का उपक्रम था  जिसमे भारी श्रम बल की आवश्यकता थी इसलिए उस युग में विद्यमान समस्त शक्तियों की आवश्यकता थी
रचनात्मक कार्य में जिसका भी सहयोग मिले लेना चाहिए 
उस समय उस व्यक्ति की पृष्ठभूमि को ध्यान में नहीं रखना चाहिए
इसलिए देव दानव सभी गंधर्व किन्नर नाग यक्ष इत्यादि जन समूहों के समग्र प्रयास की आवश्यकता थी
सभी समूहों ने संगठित होकर समुद्र का मंथन प्रारंभ किया 
जिसमे समय समय पर तामसिक प्रवृत्तियों ने अपनी दुष्प्रवृत्तियों को प्रदर्शित भी किया 
समुद्र मंथन का निरिक्षण पथ प्रदर्शन भगवान् विष्णु कर थे  
वे एक एक व्यक्ति की भूमिका एवम उनके आचरण का मूल्यांकन कर समुद्र मंथन में प्राप्त प्रतिफल में उनके अंश को भी निर्धारित करते जा रहे थे 
दैत्य शक्ति के पास बल तो अत्यधिक था 
किन्तु उनके आचरण को दृष्टिगत रखते समुद्र मंथन से प्राप्त प्रतिफल मिलने पर प्रतिफल उनके हाथो में जाने पर दुरुपयोग की संभावना अधिक थी 
इसलिए समुद्र मंथन में दैत्य शक्ति के पर्याप्त सहयोग के बावजूद समुद्र मंथन के दौरान जो उनकी प्रव्रत्तिया उजागर हुई उसे देखते हुए समुद्र मंथन की सफलता के उपरान्त समुद्र मंथन से प्राप्त प्रतिफल से असुरो को वंचित रखा गया 
आशय यह है अच्छे कार्य में सभी लोगो का सहयोग लेना चाहिए
किन्तु अच्छे कार्य से प्राप्त होने वाली उपलब्धियों को गलत हाथो में जाने से लोक हित में जाने रोकना भी आवश्यक है
इससे यह भी स्पष्ट होता है की वृहद् लक्ष्य में सभी लोगो के अच्छे बुरे आचरण सामने आ जाते है
जो लक्ष्य प्राप्त होने मिली उपलब्धियों व् संसाधानो समुचित विभाजन में सहायक होती है

Thursday, December 22, 2011

सहिष्णुता सृजन क्षमता एवम शिव

शिव जी को यद्यपि  प्रलय का देवता माना जाता है
अधिकतर लोग शिव जी को लोक कल्याण का देवता भी मानते है
मेरी द्रष्टि मे शिव जी ऐसे देव है जो घोर विषम विपरित परिस्थितियो मे
जीवन कैसे जिया जावे इसे दर्शाते है
हिम से घिरे घनघोर वन मे ऊँचे -ऊँचे पर्वतो बीच कन्दरा
मे हिंसक जंगली पशुओ के बीच निवासरत होना यही संदेश तो देता है
सहन शक्ति कि इतनी क्षमता की समुद्र मंथन से निकले हलाहल को पीने के पश्चात नीलकंठ हो जाना
और उसी कंठ मे विषैले सर्पों को गले मे धारण कर लेना विचित्र लगता है
किन्तु वर्तमान मे भी जिस व्यक्ति की जितनी अधिक दर्द दुख कठिनाईया सहन करने की क्षमता होगी
वह प्रतिकुल परिस्थितियो मे उतना ही अपना अस्तित्व बचा कर जीवन के समस्त समाधान प्राप्त कर सकता है
व्यक्ति को जीवन मे कुछ निर्माण करना है तो उसे शिव जी सहन क्षमता विकसित करना होगी
इतनी विपरित परिस्थितियो के बीच शिव का ध्यान मग्न होना तथा
मस्तक पर गंगा एवम चंद्रमा धारण कर लेना यह दर्शाता है कि विपरित परिस्थितयो मे व्यक्ति को धैर्य न खोकर
पूरी एकाग्रता से चंद्रमा सी शीतल बुध्दि धारण कर कर्म रत रहना चाहिये
तथा बडी -बडी जिम्मेदारी को उठाने को तत्पर रहना चाहिये
भले ही विषैले सर्पो के समान दुष्ट जनों से व्यक्ति घिरा हो
ऐसा करने से व्यक्ति के चिंतन से वह स्रजन की धारा प्रवाहित होगी
जैसे शिव जी के मस्तक से स्रजन की गंगा प्रवाहित हुई
ऐसी स्रजन की गंगा आस पास के वातावरण को
उसी प्रकार सम्रध्द करेगी जैसे पुण्य सलिला गंगा ने
धरा मे अपना निर्मल जल सिंच कर उसे उर्वर बना कर
मानवता को सम्रध्द किया
तात्पर्य यह है व्यक्ति मे विपरित परिस्थितियों मे कार्य करने कि जितनी क्षमता होगी
वह उतना ही विशाल लक्ष्य सामने रखेगा ,उतनी ही महती जिम्मेदारिया निभाने मे समर्थ होगा
और  उसी अनुपात मे महान कार्य कर सकेगा



Wednesday, December 21, 2011

कल्पना भावना संवेदना एवम अध्यात्मिक चेतना

कल्पना किसी भी अविष्कार की पहली सीढी होती है
कल्पना के बिना किसी भी कृति की रचना संभव नही है
चाहे वह कविता गीत गजल या चित्रात्मक कृति  हो
कल्पना वह अंकुर है जो पल्लवित होकर विशाल व्रक्ष बन जाता है
कल्पना वह छोटा जल स्त्रोत है जो निर्झर से सागर बनने का उपक्रम है
कल्पना से शून्य व्यक्ति रचनाधर्मिता से विहीन होता है
लेकिन कल्पना का उदगम मनुष्य की संवेदना ,भावना ,से होता है
भावना एवम संवेदना से शून्य व्यक्ति कल्पना विहीन होता है
उस व्यक्ति में सृजन की सम्भावना नहीं होती
कविता शब्द शिल्प के माध्यम से हृदय की अनुभूतियो को
लय में सजाना है जिसे भिन्न -भिन्न अलंकारों एवम बिम्बों से सुसज्जित किया जाता है
कविता का रचा जाना एक अध्यात्मिक अनुभव भी है
अचानक ऐसे भावो का प्रकट होना जिनका  स्वत स्फुरण हो
ईश्वरीय अनुभूति होते है
प्राचीन काल में हमारे ऋषि मुनि इसी अंत प्रज्ञा से वेद की ऋचाये  रचते थे
शनै शनै उनका संग्रह ग्रंथो से  निर्माण हो जाता था
श्लोको का सृजन भी इसी अंत प्रज्ञा से हमारे विद्वान कर लिया करते थे
भगवान् कृष्ण जो सभी प्रकार की सिद्दियो से संपन्न थे उनमे भी
काव्य सृजन का सिध्दी थी इसीलिए उपनिषद जैसे जटिल ग्रन्थ को गीता के रूप में सरलीकृत कर दिया
काव्य सृजन हो या संगीत कला दोनों में ही व्यक्ति का आत्मोत्थान होता है यह अवश्य है उक्त कार्य व्यक्ति को समर्पण एवम निस्पृह भाव से करना होते है
व्यक्ति की अध्यात्मिक उन्नति कुण्डलिनी जागरण की अवस्था पर भी निर्भर करती है
नाद योग से हमारे कई संगीतज्ञो का कुण्डलिनी जागरण हुआ है
आशय यह है व्यक्ति को सृजन कर्म में रत रहना चाहिए
इसी में व्यक्ति परिवार समाज ही नहीं आत्मा का भी कल्याण है 

  


Monday, December 19, 2011

सतयुग कलयुग और शिवत्व


बार बार मन -मस्तिष्क मे यह प्रश्न उठता है कि कलयुग और सतयुग मे अन्तर क्या है
अच्छे बुरे लोग सतयुग मे भी थे और कलयुग मे भी है
इसका उत्तर किसी भी विचारक से सन्तोषप्रद नही मिल पाता है
चिन्तन करने पर इसका जबाब अन्तरात्मा देती है कि सतयुग को सतयुग इसलिये कहा जाता था कि
उस समय सत्य और असत्य मे भेद करना आसान था
इस युग मे सत्य और असत्य का मिश्रण इस प्रकार से तथ्यों मे रहता है
कि उनमे भेद करना अत्यन्त दुष्कर कार्य होता है
सतयुग मे व्यक्ति की कथनी और करनी मे कोई अन्तर नही होता था
इस युग मे व्यक्ति कि कथनी और करनी मे भारी अन्तर होता है
इसलिये पुरातन युग मे इतनी जटिल न्याय व्यवस्था की आवश्यकतानही थी कि
सारे तथ्य दर्पण के समान स्वच्छ दिखाई देते थे
किसी भी घटना मे सत्य के अनुसंधान के विशेष प्रयास नही करना पडते थे
इस युग जिसे कलयुग कहते है मे किसी भी घटना अथवा विषय वस्तु के विवाद मे
सत्य असत्य मे इस प्रकार से मिश्रित रहता है कि सत्य को असत्य से प्रथक करने के लिये
सम्पूर्ण ज्ञान कौशल और अनुभव अन्वेषण द्रष्टि का उपयोग आवश्यकता होता है
अन्यथा असत्य सत्य का रूप धारण कर सत्यान्वेषी को भ्रमित कर सकता है
आशय यह है कि न्याय कर्म एवम अन्वेषण कर्म मे उस तीसरे नैत्र की आवश्यकता होती है
जिसे हम शिव जी का तीसरा नैत्र कहते है
जो तथ्य व्यक्ति के दो नैत्र नही देख पाते
उनको देखने के लिये अनुभव ,ज्ञान ,अन्तः चेतना के तीसरे नैत्र की आवश्यकता होती है
तीसरे नैत्र की द्रष्टि पाने हर किसी के लिये संभव नही
इसके लिये व्यक्ति को शिव सा व्यक्तित्व अंगीकार करना पडता है
इसलिये शिव को सत्य के साथ जोडा जाता है
जो सत्य शिव सी द्रष्टि से देखा जाता है वह सत्य बाहर और भीतर दोनो और से सुन्दर होता है
अर्थात उसमे पूर्ण सौन्दर्य का वास होता है
वह व्यक्ति जिसने शिव सी द्रष्टि प्राप्त कर ली वह कभी भ्रमित हो ही नही सकता
इसलिये कलयुग पर विजय प्राप्त करने के लिये शिवत्व धारण करना ही होगा