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Monday, February 11, 2013

शिष्टाचार और आत्मीयता


शिष्टाचार और आत्मीयता दोनों में बहुत भिन्नता है
आत्मीयता में दिखावा नहीं अपनापन होता है
जबकि शिष्टाचार कृत्रिम आवरण को ओढे मानवीय आचरण होता है
शिष्टाचार में औपचारिकताये अधिक होती है
संबोधन भले ही सम्मान जनक हो
पर दिलो में दूरिया दर्शाते है
वर्तमान में रिश्तो में आत्मीयता का स्थान
औपचारिकताओं ने ले लिया है
व्यवहार कुशलता का छद्म आवरण व्यक्ति की कुटिलता को छुपा लेता है
पर स्वभाव में स्वाभाविक सहजता सरलता
आत्मीयता को छुपा नहीं सकती
वह तो कभी गोकुल की गोपियों की तरह
तो कन्हैया की मैया यशोदा की तरह
भावनाओं का मीठी मिश्री और मख्खन की अनुभूति करा ही देती है
जब नदियों पर बढे -बढे घाट बने
 नदियों से हमारे आत्मीय सम्बन्ध समाप्त हो चुके है
घाट पर कर्म काण्ड अनुष्ठान हो सकते है
परन्तु नदी के कल कल बहते जल का ममत्व तो
निर्मल तटों से ही प्राप्त हो सकता है
हमें शिष्टाचार के घाटो से पुन आत्मीयता के तटों की और लौटना होगा
तभी हम रिश्तो के भीतर नदी के कल कल प्रवाह की तरह चलते और पलते
दुःख और सुख की अनुभूति कर पायेगे

Friday, February 8, 2013

गुणो की परिक्षा


व्यक्ति के गुणो की परिक्षा अनुकूलताओ मे नही प्रतिकूलताओ मे होती है
मित्रो और रिश्तो की परिक्षा विपदाओ मे होती है
ज्ञानी के ज्ञान की परिक्षा ज्ञान के प्रयोग और प्रचार से होती है
कर्मकार के शिल्प की परिक्षा शिल्प की जीवन्त हो जाने से होती है
वीरो के बल की परिक्षा धैर्य और साहस से होती है
स्त्री के चरित्र की परिक्षा रुपवान होने पर होती है
स्त्री के रुप की सार्थकता आंतरिक सौन्दर्य से होती है
व्यवहार की कुशलता की परिक्षा
अपरिचित व्यक्तियो के बीच सफलता पूर्वक
सामंजस्य स्थापित करने से होती है
व्रत और उपवास की सार्थकता व्रत्तियो पर नियंत्रण करने पर होती है
म्रदु भाषा की सार्थकता किसी के हित पर निर्भर होती है
सत्य वचन जब तक तथ्य पर आधारित न हो खरा और सत्य नही होता
कटुता वैमनस्यता का कारण जरूर हो सकती है
पर कटू वचन सदा अहित कर नही होते
दुर्बल वे व्यक्ति है जो सदा असुविधाओ और साधन हीनता का रोना रोते
दरिद्र वे व्यक्ति है जो मन से दरिद्र है
धनवान धन से नही होते धन के सद उपयोग होते है

Tuesday, February 5, 2013

प्रभु कृपा


शान्ति और अहिंसा एक दूसरे के पर्याय है
शान्ति के लिए अहिंसक होना अनिवार्य है
शान्ति भीतर से बाहर की और आती है
बाहर आकर चहु और छा जाती है
जो शान्ति को बाहर की और खोजता है
वह बुध्द की और नहीं अशांति की और लौटता है
जो व्यक्ति भीतर से जितना शांत है
वह उतना अहिंसक है
अशांत व्यक्ति वाचाल है आक्रामक है हिंसक है
मानसिक हिंसा भी होती अति क्रूर है
घृणा, क्रोध, प्रतिशोध से होती वह भरपूर है
मानसिक हिंसा में रहते दुर्विचार है
निष्ठुरता ,हैवानियत करती वह अंगीकार है
मानसिक रूप से हिंसक व्यक्ति
संकल्प और विकल्प में कितनी बार खुद मरता है मारता है
जीत के भ्रम में जीवन की कई लडाईया रोज-रोज हारता है
समग्र विजय के लिए व्यक्ति के भीतर शान्ति होना जरुरी है
शांत व्यक्ति की शान्ति ही उसकी शक्ति है सफलता की धुरी है
शांत व्यक्ति पर रहती प्रभु कृपा है
अशांति में आदमी उग्र होकर जीवन में मरा खपा है
इसलिए शांत रह कर गहन शांति में प्रभु कृपा पाओ
शान्ति बाहर से नहीं भीतर से बाहर लाओ

Sunday, February 3, 2013

महंगाई का उपाय



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महंगाई के इस दौर में बाजार में जाकर खरीददारी करना
बहुत चुनौती पूर्ण है
विशेष कर उन व्यक्तियों के लिए और भी अधिक तकलीफ देह है
जिनके लिए खरीददारी करना
आवश्यकता ही नहीं अपितु शौक और जूनून है
हमारे समाज और परिवार में परिवेश ऐसे लोगो की कमी नहीं है
जो खरीददारी को एक कला का दर्जा दे चुके है
वे खरीद दारी को पूजा के सामान पवित्र कर्म मानते है
भले ही उनकी क्रय शक्ति कितनी भी कम हो जाए
पर वे यह पुनीत कर्म करने से नहीं चुकते
अल्प क्रय शक्ति वाले व्यक्तियों के लिए सब्जी मंडियों से लगा कर
हाट बाजार प्राण वायु का कार्य करते है
छोटी -छोटी आवश्यकताओं की वस्तुए
उन्हें उनकी प्रतिभा परिष्कृत किये जाने में सहायक होती है
खरीद दारी किये जानेके उपरान्त किस व्यक्ति को कितनी मात्र में
संतुष्टि हुई यह उनके चहरे पर पढ़ी जा सकती है
सब्जियों की खरीद दारी के आनंद तो उन्हें ऐसे आता है
जैसे उन्हें कोई गढ़ा हुआ खजाना मिल गया हो
जब कभी किसी सब्जी क्रेता से वे 
किसी सब्जी का भाव -ताव करते है 
तो मानो ऐसा लगता है वे सामने वाले पर 
मनोवैज्ञानिक विजय प्राप्त करने को उतावले हो रहे हो
भाव कितने भी कम हो या ज्यादा हो
वे अंशत अपनी आशा के अनुरूप कीमत में 
कटौती करवा पाने में विजय समझते है
इसलिए ऐसे व्यक्तियों को दूर से आता देख कर
क्रेता गण वस्तुओ के मुल्य कृत्रिम तौर पर बढ़ा लेते है
तथापि ऐसे व्यक्ति अपनी खरीददारी को सम्पूर्णता प्रदान करने का
कोई अवसर हाथ से जाने नहीं देते
और क्रेता से भाव ताव करने के दौरान मुफ्त का 
मनोरंजन प्राप्त कर ही लेते है
ऐसे व्यक्तियो के जज्बे से महंगाई भी मारे -मारे फिरती है

Saturday, February 2, 2013

सीता जी का सत्याग्रह


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प्राचीन काल में हिन्दू धर्म में महान नारियो की
लम्बी श्रृंखला रही है
जब कभी विद्वता की बात आती है
तो गार्गी और मैत्रेय ऋषि पत्नियों के नाम सामने आते है
चारित्रिक गुणों के आधार पर भी नारियो ने
अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किये है
चारित्रिक गुणों के आधार पर महान स्त्रियों को
सतियो के रूप में संबोधित किया है
महान सतियो में दैत्य कुल की स्त्रिया भी थी
जिनमे दशानन की पत्नी मंदोदरी
मेघनाथ की पत्नी सुलोचना ने जो आदर्श स्थापित किये
इससे इस तथ्य को बल मिलता है
की चरित्र किसी समाज या कुल की संपदा न
होकर सार्वदेशिक गुण है
जब सतित्त्व की बात आती है तो
सती सावित्री का उदाहरण दिया जाता है
जिसने अपने पति सत्यवान के प्राणों के लिए
मृत्यु के देव यमराज से संघर्ष कर लिया था
परन्तु महानता की पराकाष्ठा को पहुचने वाली नारियो में
महान सती श्रीराम भार्या सीता एवं
 ऋषि पत्नी अनुसूया रही है
सीता जी सतीत्व अन्य नारियो की अपेक्षा श्रेष्ठ क्यों है
ऐसा इसलिए है की कोई भी नारी 
अपहरण होने की अवस्था में
स्वयं को असहाय अनुभव करती है
किन्तु सीता ने तत्कालीन दैत्य शक्ति और वैभव के द्योतक
रावण के बंदी रहते मात्र सत्य के बल पर लंबा संघर्ष किया
जिसकी तुलना वर्तमान में अहिंसक आन्दोलन
या सत्याग्रह से हम कर सकते है
सीता जी का सत्याग्रह विश्व में सत्य का सर्वप्रथम प्रयोग था
सीता जी का सत्याग्रह मात्र लंका में ही नहीं
बल्कि श्रीराम की रावण पर विजय के बाद भी जारी रहा
अयोध्या आगमन के पश्चात श्रीराम द्वारा परित्याग
किये जाने के उपरान्त
सीता जी चाहती तो अपने पिता राजा जनक 
के पास चली जाती
या प्रतिकूल परिस्थितियों में
किसी अन्य व्यक्ति का आश्रय प्राप्त कर लेती
परन्तु सीता जी ने ऐसा न कर घनघोर वन में भी
सात्विक प्रकृति के संत वाल्मीकि जी के आश्रम
को अपना आश्रय स्थल बनाया
और अपने अबोध शिशुओ का लालन पालन किया
सीता जी के जीवन का यह पक्ष उन स्त्रियों के लिए दिशा -निर्देश है जिनको पतियों द्वारा परित्यक्त किया जा चुका है

Sunday, January 27, 2013

भगवान् सत्यनारायण


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कोई विषय , समस्या हो या 
किसी प्रकार का वाद -विवाद हो
 समग्र एवं निष्पक्ष दृष्टिकोण आवश्यक है
कभी भी एक पक्षीय सोच कर
किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता है
समस्त प्रकार के आग्रहों पूर्वाग्रहों दुराग्रहो से परे हो कर
सर्वप्रथम विषय विवाद का अध्ययन किया जाना होता है
कोई भी विषय या विवाद हो
जब हम उसे किसी एक दिशा या एक पहलू से देखते है
तो हमें एक समस्या विषय या विवाद का एक पक्ष समझ आता है
जब हम सभी दिशाओं से सभी पहलुओ से समग्र विषय को
समझ कर निष्पक्ष रूप से तथ्यों का मूल्यांकन कर
निष्कर्ष पर पहुँचते है तो इस प्रक्रिया को
न्याय प्रक्रिया कहा जाता है
न्याय दान न्यायालय का कार्य है
परन्तु उक्त प्रक्रिया का जीवन में समग्र रूप से 
पालन किये जाने पर
हम स्वयं को विवादों से परे रख पाते है
समस्याओं के सही समाधान सुझा सकते है
कूप मंडूक मानसिकता से ग्रस्त व्यक्ति
कभी भी न्याय दृष्टि से संपन्न नहीं हो सकता
कभी भी ऐसे व्यक्ति से कोई व्यक्ति समाधान की
अपेक्षा नहीं कर सकता है
न्याय प्रक्रिया क्या है ?
सत्य के अनुसंधान अन्वेषण ,विचारण ,की क्रिया को
न्याय प्रक्रिया कहा जाता है
विचारों से सभी आयाम चिंतन की समस्त दिशाओं के
झरोखे खोल कर रखने से
हमें सत्य को परखने को दृष्टि प्राप्त होती है
जब हम सत्य के निकट पहुच जाते है
तो भगवान् सत्यनारायण रूपी ईश्वरीय सत्ता से साक्षात्कार होता है

Wednesday, January 23, 2013

व्यक्तित्व का मूल्यांकन


व्यक्ति के व्यक्तित्व का मूल्यांकन समाज मे
उसकी भूमिका के आधार पर निर्धारित होता है
समाज मे किसी भी व्यक्ति की भूमिका भिन्न भिन्न स्थानो पर
भिन्न -भिन्न प्रकार की होती है
परिवार मे एक व्यक्ति पुत्र के लिये पत्नि के लिये
पति पिता के लिये पुत्र बहन और भ्राता के लिये भाई होता है
कोई व्यक्ति अच्छा पुत्र हो उसके लिये यह आवश्यक नही है
कि वह अच्छा पिता या अच्छा पति हो
कोई व्यक्ति अच्छा पति हो वह आवश्यक नही कि
अच्छा पुत्र या अच्छा भ्राता हो
समाज मे समस्त भूमिकाऔ का निर्वहन एक साथ
सफलता पूर्वक कर लेना
प्रत्येक व्यक्ति के लिये संभव नही है
बहुत से व्यक्तियो को हम देखते है
कि वे सफल प्रशासक कुशल उध्यमी होते है
पर वे पारिवारिक द्रष्टि से विफल होते है
परन्तु सबसे महत्वपूर्ण है किसी व्यक्ति का एक अच्छा इन्सान होना
व्यक्ति मे मानवीय गुणो की प्रचुरता पाई जाना
सभी व्यक्तियो को संतुष्ट कर पाना संभव नही है
क्योकि प्रत्येक रिश्ते के अपेक्षाये और संतुष्टि के पैमाने अलग -अलग होते है स्वाभिमानी और आदर्शवादी व्यक्ति सामान्यत पारिवारिक द्रष्टि से
उतने सफल नही होते
जितने परिस्थितियो के अनुरुप सामंजस्य बिठाकर
सभी लोगो को साथ मे लेकर चलने वाले व्यक्ति सफल होते है
ऐसे व्यक्तियो को समाज और परिवार
मे व्यवहार कुशल कहा जाता है
छल ,कपट ,मिथ्याभाषी होना 
जो सामान्य रुप से अवगुण समझे जाते
वे कब ऐसे व्यक्ति को अलंक्रत कर देते है
पता ही नही चल पाता
वस्तुत मौलिक तथ्य तो यह है
कि व्यक्ति भीतर से कितना अच्छा है
इसी तथ्य से व्यक्ति की नीयत स्पष्ट होती है
व्यक्ति की जैसी नियत होती है उसकी वैसी नियति बन जाती है
फिर चाहे उसमे आस्तिकता  का भाव कितने प्रतिशत हो 
ईष्ट का आशीर्वाद  व्यक्ति को उसी अनुपात मे प्राप्त होता
जितने मात्रा मे व्यक्ति की नियत 
बाहरी वातावरण के प्रति स्वच्छ होती है