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Wednesday, April 4, 2012

आत्म बल के जागरण का पर्व

व्यक्ति मे कई प्रकार के बल होते है
जिनमे शारीरिक बल ,धन-बल ,चारित्रिक बल,
बुध्दि बल ,मानसिक बल होते है
शारिरिक रूप से बलवान व्यक्ति पहलवान कहलाता है
चारित्रिक रुप से बलवान व्यक्ति चरित्रवान कहलाता है
आर्थिक रुप से बलवान व्यक्ति धनवान कहलाता है
बौध्दिक रुप से बलवान व्यक्ति बुध्दिमान कहलाता है
मानसिक बल से सम्पन्न व्यक्ति मनीषी कहलाता है
उपरोक्त बलो का संबन्ध व्यक्ति के शरीर 
एवम शरीर से जुडी इन्द्रियो से होता है 
आत्म-बल का संबन्ध व्यक्ति की आत्मा से होता  है
बल के अनुसार व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अपने -अपने क्षैत्र
मे पुरूषार्थ का प्रदर्शन करता है 
उसी के अनुसार उसकी योग्यता ,
पराक्रम या वीरता के मानदंड स्थापित होते है
महावीर जयन्ती आत्म बल की श्रेष्ठता से जुडी वीरता के बारे मे है
 आत्मा  का बल आत्मा से जुडा हुआ है
आत्मा का बल आत्मा की शुध्दी से है 
 महावीर स्वामी  ने आत्मा के शुध्दी के उपाय बताये है 
उन्होने आत्मा बल की जाग्रति पर अधिक जोर दिया है
यदि व्यक्ति शारीरिक रुप से आर्थिक रूप से बौध्दिक रूप से कितना ही सम्पन्न हो
किन्तु उसमे आत्म-बल का अभाव है तो 
ऐसा व्यक्ति आत्मविश्वास से शून्य होता है 
आत्मबल कारण ही व्यक्ति अपनी सभी इन्द्रियो पर विजय प्राप्त कर सकता है
आत्मबल के कारण व्यक्ति मे संकल्प के प्रति
 सहज ही दृढ़ता  आ जाती है
और  वह काम क्रोध ,लोभ,मोह ,अहंकार,लोकेषणा इत्यादी भावना पर विजय प्राप्त कर सकता है
उल्लेखनीय है कि प्रत्येक व्यक्ति मे अच्छे व बुरे विचारो का द्वन्द का निरन्तर चलता रहता है
बुरे पर अच्छे विचारो की विजय तभी संभव होती है जब व्यक्ति आत्मबल से युक्त होता है
ऐसे व्यक्ति को ही महावीर का संबोधन दिया जाता है इसलिये महावीर जयन्ती को आत्मबल का जागरण के पर्व
के रुप मे मनाया जाय तो भगवान महावीर स्वामी के प्रति सच्ची श्रध्दान्जली होगी



Monday, April 2, 2012

तमोगुण से सतोगुण की यात्रा नवरात्री

चैत्र नवरात्रि का समापन रामनवमी पर होता है
 नवरात्रि के अवसर व्यक्ति अपनी आसुरी वृत्तियों से मुक्त होने के लिए भिन्न भिन्न उपाय करता है 
अर्थात भूख  प्यास पर नियंत्रण ,जप -तप इत्यादि उपाय करता है किन्तु 
यह देखने में यह भी आता है की 
कुछ साधको के मन में शांति एवम वृत्तियों के नियंत्रण के स्थान पर 
मन में अशांति ,क्रोध ,अहंकार की उत्पत्ति होती है
 वह आसुरिक प्रवृत्तिया इस पर्व के मूल महत्त्व को समाप्त कर देती है कुछ साधक स्वयम को ईश्वर के अधिक समीप बताने हेतु 
तरह तरह से अनावश्यक पाखण्ड रचते है 
जबकि वास्तव में ईश्वरीय तत्व  
नित्य शुध्द एवम पाखण्ड विहीन होता है 
पाखण्ड कर्म पुरातन युग में दैत्य गण भी करते थे 
इसके शास्त्रों में तरह तरह के प्रमाण मिलते है 
इसलिए आवश्यकता है 
नवरात्रि में सात्विक भावना से दुष्प्रवृत्तियों को त्यागने हेतु निरंतर  साधना एवम अहंकार शून्य होकर ईश्वरीय शरणागति होकर साधना की जाये 
रामनवमी को हवन की अग्नि में सामग्री के साथ मन की दुष्प्रवृत्तियों का दहन किया जाय 
 तद्पश्चात श्रीराम जी दर्शन करने का तात्पर्य यह है की 
समस्त दुष्प्रवृत्तियों को दहन करने के पश्चात
 सतोगुण रूपी राम को स्वयं में समाहित किया जाय 
यदि हमने राम नवमी के दिन सतोगुण रूपी राम को स्वयं समाहित नहीं किया तो नवरात्रि में की गई साधना निरर्थक है 
 नवरात्रि तमोगुण से सतोगुण की यात्रा है 
इसकी भिन्न भिन्न तिथिया तमोगुण से सतोगुण की और बढ़ने की अवस्थाये है 
महत्त्वपूर्ण यह तथ्य है की इस यात्रा में कौनसा पथिक रामत्व रूपी सतोगुण के कितना निकट पहुचा

Sunday, April 1, 2012

क्षमा का अधिकार


क्षमा का अधिकार 




शास्त्रों  मैं लिखा हैं -
 
"क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हैं
        उसे नही जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल  हैं"

क्षमा को वीरो का आभूषण बतलाया जाता हैं अपने क्षत्रु को विजय  के  पश्चात क्षमा कर देना न केवल एक बहुत बड़ा निर्णय होता हैं अपितु उसमे  ये शंका भी रहती हैं की क्षत्रु पुनह आघात कर सकता हैं. परन्तू  जो बलवान होता हैं सशक्त होता हैं विजयी होता हैं वो अपनी शरण मैं आये हुए क्षत्रु को बिना इस विषय पर विचार किये क्षमा कर देता हैं और क्षमा करने का अधिकार भी उसी को शोभा देता हैं जिसमे  बल होता हैं जो शक्तिवान होता हैं सामर्थ्यवान होता हैं. क्योंकी कमजोर किसी को क्या क्षमा करेगा उस द्रश्य की कल्पना कीजिये जिसमे एक कमज़ोर एक पहलवान से कहे जा मैंने तुझे माफ़ किया जा घर  जाकर खेर मना आज तेरा  दिन  अच्छा  हैं कल्पना मात्र से ही हँसी आ जाना स्वाभाविक हैं.
क्षमा करने का अधिकार सदेव बलवान को ही प्राप्त हैं आखिर वो व्यक्ति किसी को माफ़ क्या करेगा जिसमे बल ही  नही शक्ति नही जो किसी को हरा नही सकता जो कभी जीत नही सकता जो कभी विजित नही हुआ वो तो केवल कल्पना ही कर सकता हैं.
श्लोक का विवरण - क्षमा उसी को शोभ देती हैं जिसके पास बल होता हैं यहा उदाहरण के लिए भुजंग अर्थात सर्प को इंगित किया हैं सर्प जो की गरल (विष ) का स्वामी होता हैं उसकी मात्र एक काट से ही सामने वाला काल को प्राप्त हो जाता हैं और ऐसे ही बल वाला व्यक्ति क्षमा करने का अधिकार रखता हैं .
क्षमा उसे शोभा नही देती जिसके पास ना तो बल होता हैं ना ही साहस होता हैं ( बिना दाँतों वाला, बिना विष वाला, सरल और सीधा सा कमजोर प्राणी भला किसी को क्या मारेगा और क्या माफ़ करेगा)
यहाँ विष को बल के रूप मैं वर्णित किया गया हैं .
बिना दांतों,विष वाला सीधा सरल  आदि उपमा बोधक शब्द कमजोर व्यक्ति को इंगित करते हैं. 
बल किसी भी रूप मैं हो सकता हैं - भुजबल, बाहुबल, आत्मबल, व्यक्ति का किसी बड़े पद पर होना प्रसासनिक बल, जनबल ,बुधिबल आदि.
 
इस प्रसंग  से ये बात भी निकल कर आती हैं की बल के साथ - साथ  शील का होना भी अति आवश्यक हैं जो व्यक्ति बलवान होने के साथ साथ शीलवान होता हैं वो और अधिक उच्च होता हैं उसका बल उतना ही अधिक शोभा  पाता  होता हैं और वही उस शक्ति का सही पात्र होता हैं.
शील - बल का अभिमान ना होना उसका दुरपयोग ना करना ही शील वान होना हैं आत्मिक सयंम और विनम्रता युक्त बल .     
   

Wednesday, March 28, 2012

परशुराम भाग - ५

परशुराम भाग - 5 ( रिचिक सेवा का फल  )

माता की सलाह को मानकर राजकुमारी( रिचिक पत्नी ) ने अपने पति रिचिक की यथोचित( कठोर ) सेवा की .
एक दिन रिचिक पत्नी सेवा से प्रसन्न होकर बोले - मुझे बहुत दुःख हैं की तुम्हे मुझसे विवाह करना पड़ा मैं जानता हूँ की मुझसे विवाह करके तुम्हे बहुत कष्ट उठाना पड़ रहा हैं, अपने महलो के सुख छोड़ कर तुम्हे मेरे साथ मेरे समान कठोर तपस्वी जीवन जीना पड़ रहा हैं मैं तो इस जीवन का आदि हूँ मैंने इसे स्वयं इसे अपनी  इच्छा से चुना हैं पर तुम इस की आदि नही हो, परन्तु मैं कर भी क्या सकता हूँ कभी कभी इश इच्छा बड़ी प्रबल होती हैं और परहित के लिए त्याग अनिवार्य हो जाता हैं.
इतने पर भी तुमने सारे कष्टों को हसते हुए सहा और अपने धर्म का पालन किया मेरी हर प्रकार से सेवा की. कहो तुम्हारी क्या कामना हैं निसंकोच कहो यदि तुम चाहो तो अपने  पिता के घर भी  जा सकती हो और वहा सुख से रह सकती हो.
प्रभु की आज्ञा मान कर मैंने तुमसे विवाह किया हैं पर मैं तुम्हे जबरन यहाँ नही रखना चाहता. और वेसे भी जो निश्चित होगा वही होकर रहेंगा.
रिचिक की बात सुनकर राजकुमारी बोली - स्वामी ये आप क्या कह रहें हैं मैं कही नहीं जाना चाहती और मुझे यहाँ किसी प्रकार का कष्ट नहीं हैं अपितु मैं तो स्वयं को अत्यंत भाग्यशाली मानती हूँ की मुझे आप जेसा वर प्राप्त हुआ आप की सेवा का अवसर मिला ,धर्म, आध्यात्म, ज्ञान का ऐसा वातावरण मिला परहित करने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ अवश्य ही किसी जन्म मैं मैंने पुण्य कर्म किये हैं जिसके फलस्वरूप मुझे ये सब देखने को मिला.
रिचिक राजकुमारी की बातों को सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुए. तुम सच में एक उतम कुल की कन्या हो तुम्हारी वाणी से तुम्हारे कुल के संस्कार साफ़ दिखाई पड़ते हैं तुम सच में राजकन्या हो कहो तुम्हारी क्या इच्छा हैं कोई भी वर मांगों प्रिय. 
रिचिक के मुख से अपने लिए पहली बार इतने कोमल शब्द सुनकर राजकुमारी को पहली बार विवाहित होने का सुख मिला ऐसा लगा मानो आज रिचिक एक ऋषि के रूप में नही अपितु उनके पति के रूप में उनसे बात कर रहें हो और एक पत्नी होने के नाते पति से कुछ भी मांगने का अधिकार तो राजकुमारी को स्वत ही प्राप्त हैं.
राजकुमारी (रिचिक पत्नी) थोड़ी लज्जाती हुई बोली स्वामी यदि आप सच में मुझ पर प्रसन्न हैं यदि आप सच में मुझे कुछ देना चाहते हैं तो में आप से एक पुत्ररुपी रत्न मांगती हूँ.
और पुत्र के साथ साथ ये मांगती हूँ की मेरे पिता के पश्चात राज्य को सम्भालने के लिए व् राजा बनने के लिए  मेरी माता को एक पुत्र और मुझे एक भाई प्राप्त हो.
ऋषि मुस्कुराये वो प्रभु लीला को समझ गये उनके श्रीमुख से अमृतवचन निकले - तथास्तु 
एक सुखी ग्रहस्थी के लिए पति और पत्नी के बीच आपसी समझ होना आवश्यक हैं परिस्थिति केसी भी हो समय केसा भी हो सुख हो या दुःख दाम्पत्य जीवन मैं एक दुसरे का साथ निभाना ही ग्रहस्थ आश्रम की कुंजी हैं.
( सुख और विशवास की कुंजी जेसा  की इस प्रसंग मैं देखने मैं आता हैं.)

Tuesday, March 27, 2012

ज्ञान एवम बुध्दि



प्राचीन काल में राक्षस ब्रह्म देव की आराधना करते थे
 ब्रहम देव ज्ञान के देवता कहे जाते है इसका आशय यह है की राक्षस गणज्ञान -विज्ञान के साधक थे 
इसलिए उनमे ज्ञान विज्ञान का अपार एवम अथाह भण्डार था
 माता सरस्वती बुध्दी की देवी है 
राक्षसों द्वारा माता सरस्वती की साधना कभी नहीं की गई
 इसलिए उनमे निर्मल  प्रज्ञा का अभाव था 
परिणाम स्वरूप ज्ञानी होने के बावजूद वे मूर्खताए करते थे 
ज्ञानी व्यक्ति में निर्मल बुध्दी नहीं हो तो 
व्यक्ति में अहंकार का भावना उत्पन्न हो जाती है 
इसलिए ब्रह्म देव की साधना के साथ माता सरस्वती की स्तुति करना आवश्यक है 
विश्व में बहुत कम मंदिर मिलेगे 
जहा मात्र ब्रह्मा जी की पूजा की जाती है
 ब्रह्मा जी के साथ सरस्वती की प्रतिमा होगी 
या 
ब्रह्मा जी के साथ विष्णु भगवान् एवम महादेव शिव की प्रतिमा होगी इसका मुख्य कारण यह है 
की अकेला ज्ञान अहंकारी निरंकुश हो जाता है 
उसे निर्मल एवम प्रखर  बुध्दि का साथ चाहिए
जिससे वह अपना समुचित उपयोग कर सके 
यदि  ज्ञान के साथ कर्म एवम प्रबंधन अर्थात विष्णु भगवान् एवम शिव का हो तो उसके चमत्कारिक परिणाम मिलते है 
अन्यथा मात्र ज्ञान सैध्दांतिक ही रह जाता है
 उसका व्यवहारिक जीवन में उपयोग नहीं हो पाता है 
 माता सरस्वती अर्थात बुध्दि  ब्रहमा जी अर्थात ज्ञान को वह कल्पना एवम सृजना देती है
जो किसी भी कृति के लिए प्रथम सीढ़ी होती है
महर्षि  विश्वामित्र द्वारा रचित महामंत्र में ईश्वर से केवल अच्छे गुणकर्म
स्वभाव  वाली बुध्दि की ही कामना की गई है
प्रखर  बुध्दी के बल पर सामान्य ज्ञानी बड़े बड़े रचनात्मक कार्य कर पाता है 
जबकि अधिक ज्ञानी व्यक्ति निर्मल बुध्दि के अभाव में आत्मघाती कृत्य कर बैठता है 
तथा प्रखर बुध्दि के अभाव में सामान्य सा कार्य भी नहीं कर पाता है 

Sunday, March 25, 2012

वर्णाश्रम व्यवस्था एवम देश की अर्थ व्यवस्था

शास्त्रों में हमारे शरीर को चार वर्णों में विभक्त किया गया है
 हमारे मस्तक को ब्राह्मण 
, वक्ष तथा हाथो को क्षत्रिय
 एवम उदर को वैश्य 
कटी भाग के नीचे अर्थात पैरो को शुद्र के रूप में संज्ञा दी गई है
 जिस प्रकार सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 
सभी वर्णों को अपनी योग्यता के अनुसार 
कार्य करने की आवश्यकता है 
इस तथ्य को हमारे शरीर के माध्यम से इस प्रकार समझ सकते है 
की हमारे वक्ष तथा हाथ हमारे शरीर की रक्षा करते है 
उसी प्रकार से देश की सेना तथा आंतरिक सुरक्षा बल देश एवम समाज की सुरक्षा करते है 
वे क्षत्रिय धर्म का पालन करते है 
देश के वैज्ञानिक ,अर्थशास्त्री ,शिक्षाशास्त्री चिन्तक ,विधिवेत्ता हमारे मस्तक अर्थात ब्राह्मण वर्ण का कार्य करते है  
उदर वैश्य का इसलिए कार्य करता है 
क्योकि वह ग्रहण किया गया अन्न को अवशोषित कर सम्पूर्ण शरीर को पोषण प्रदान करता है  
कटी भाग के अधोभाग में पैर शरीर को गतिशील रखते है 
जिस प्रकार से प्रशासनिक अधिकारी एवम कर्मचारी ,कृषक ,मजदूर सारे देश के उत्पादन क्षमता को गति प्रदान करते है 
यदि वैश्य वर्ग में संग्रह प्रवृत्ति बढ़ती  
उसी प्रकार से व्यक्ति के आलस्य के कारण 
मानव का पेट बाहर निकल जाता है 
ऐसा इसलिए होता है 
की प्रशासनिक व्यवस्था के निकम्मेपन एवम निष्क्रियता के कारण व्यापारी वर्ग  बड़े बड़े गोदाम अनाज भरे जाते है
 इसी कारण अर्थ व्यवस्था में महंगाई में वृध्दि होती 
अर्थात व्यक्ति का पेट बड़ने से  शरीर भिन्न -भिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जाता है 
इसका तात्पर्य यह है 
हमारे शरीर की भाँती हमारे देश एवम समाज की व्यवस्था चलती है  जिस प्रकार से हमने अपने स्वास्थ्य का ध्यान नहीं दिया 
तो शरीर रुग्ण हो जाता है उसी प्रकार देश के वर्णाश्रम व्यवस्था में संलग्न अंगो द्वारा  अपने कर्तव्यो का भली भाँती कर्तव्य का निष्पादन नहीं किया तो देश की सम्पूर्ण व्यवस्था बिगड़ जाती है 

धर्म













धर्म 
बात पुराने समय की हैं जब लोग तीर्थ यात्रा के लिए पैदल ही जाते थे परिवहन का कोई साधन  उस समय उपलब्ध नही था 
रेल, बस, मोटर गाड़ी को कोई नही जानता था इन सब का अस्तित्व ही नहीं था तब लोग पैदल ही मिलो की धुरी अपने पेरो से तय करते थे हाँ कभी कभी वे अपने साथ अपने पालतु पशुओ जेसे गधे खच्चर आदि को समान और सवारी के निम्मित ले जाते.
उस समय यात्रा अवधि बहुत लबी हो जाती  और रास्ते मैं भोजन पानी की भी कोई सुविधा नहीं होती तो लोग अपने साथ सतू  और चना आधी खाने को ले जाते.


ऐसे ही समय की ये  घटना हैं - सदियों से ये परम्परा हैं की भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम जो की दक्षिण भारत मैं स्थित हैं उनका अभिशेख उत्तरभारत  मैं बहने वाली भारत की आत्मा माँ गंगा के जल से ही किया जाता रहा हैं.
वहा के पुजारी और स्थानीय श्रद्धालु लोग अभिषेख  के लिए गंगा जल लाने के लिए भारत के एक छोर से दुसरे छोर तक की कठिन यात्रा करते और माँ गंगा का जल लाकर भगवान् शिव का अभिषेक करते.


पुजारियों  का एक दल उत्तर भारत से माँ गंगा का जल अपने साथ लेकर दक्षिण भारत मैं अपने आराध्य  श्री रामेस्वरम का  जलाअभिसेख  करने के लिए कठिन रास्तो को  को पार कर अपने गंतव्य की और बड  रहा था  मार्ग मैं कई स्थान  अतिभयानक थे लम्बी यात्रा मैं कई बार ऐसे स्थान पड़ते जहा पीने को जल और फल आदि भी नहीं मिलते ऐसे ही एक स्थान से ये दल गुजर रहा था सूरज की तेज किरणों से जमीन  जल रही थी धुर धुर तक  पानी का नामो निशाँ नहीं था सभी बेहाल थे पर अपने स्वामी का  जलाअभिशेख करने की कामना उन्हें शक्ति देती सभी भगवान रामेश्वरम का जयघोष करते हुए बड रहें थे तभी उन्हें रास्ते मैं किसी जीव की दर्दनाक वाणी सुनाई दी देखा तो एक गधा गर्मी से व्याकुल प्यास  से तडप  रहा था उसकी स्थति अत्याधिक गम्भीर थी उसे देख कर लग रहा था की उसकी कुछ ही साँसे शेष हैं .
दल के लोग रुक गये एक ने कहा अरे ये बेचारा तो बहुत संकट  मैं हैं  प्यास से तडप रहा हैं, दूसरा बोला लगता हैं किसी यात्री का होगा पानी की कमी होगी तो इसे यहाँ मरने के लिए छोड़ गया होगा.
चलो अब तो भगवान ही इसका मालिक हैं बिना पानी के इसका  मरना तय हैं आगे भोलेनाथ की इच्छा.
सभी उसे मरता छोड़ कर जाने लगे पर एक आदमी वही रुक गया उससे गधे का दर्द देखा नही जा रहा था वो मन ही मन कुछ सोच रहा था उसने भगवान शिव का स्मरण किया और रामेश्वरम अभिशेख के लिए लाया अपना गंगाजल उस गधे को पिलाने लगा .
उसे देख दुसरे लोग चकित रह गए .
अरे ये क्या कर रहें हो भाई  ये गंगा जल भगवान  शिव के अभिशेख के लिए था तुमने इतना कष्ट उठा  कर महीनो लम्बी कष्टों से भरी यात्रा कर ये गंगा जल भारत के एक कोने से दुसरे कोने को पार कर अपने आराध्य को प्रसन्न करने के लिए लाये थे और तुमने अपना  गंगा जल इस गधे  को पिला दिया शिव -शिव बड़ा पाप किया तुमने अब तुम्हारा मनोरथ पूरा नही होगा तभी वो आदमी बोला अरे भइया मेरा गंगा जल इसकी प्यास भुझाने के लिए पूरा नही हैं क्रपा कर के आप लोग भी इसे थोडा सा जल पिला दो बेचारा बहुत तडप रहा हैं बहुत दिनों  से प्यासा हैं हो सकता हैं पानी पीकर ये पुनह स्वस्थ हो जाये इसमें  तोड़ी शक्ति आ जाये. 


शिव शिव क्या बक  रहें हो हमे भी पाप का भागी  बनाओगे ये जल हमारे रामेश्वरम के लिए हैं ये हम उन्ही को अर्पित करेंगे , किसी ने अपना जल नहीं दिया. गधे ने जब उस आदमी का गंगा जल पिया तो उसे बहुत राहत मिली पर पानी उसके लिए काफी नहीं था और गधा प्यासा ही मर गया.
आदमी की आखों से आसू बहने लगे उसे दुःख था की वो गधे की प्यास नही बूझा पाया. 
लो मर गया ना और  तुम्हारा  सारा  जल भी  समाप्त हो गया. 


अब आप ही विचार कीजिये की धर्म क्या हैं क्या रामेश्वरम को जल अर्पित करके वो आदमी धर्म को प्राप्त करलेता  या  उस आदमी ने उस  मरते  हुए प्यास से व्याकुल जीव को पानी पिला कर पाप किया,   
या फिर उसने अपने  धर्म को परिभाषित किया.


क्या वो लोग धर्म को पा  लेगे क्या वो लोग भगवान् को अधिक प्रिय होंगे क्या सच मे भगवान  उन पर कृपा करेगें जिन्होंने भगवान के ही अंश उस जीव को पानी की कुछ बुँदे  देना भी पाप समझा.
  
भगवान ने हमे ये जीवन क्यों दिया इस पर विचार करे धर्म को समझना अति कठिन हैं और उसका पालन करना और भी कठिन आज जहाँ सारी दुनिया धर्म के नाम पर निर्दोष प्राणियों की बली दे रही हैं कर्म काण्ड से अपने को धर्मात्मा सिद्ध कर रहें  हैं वही कुछ  लोग अपने जीवन को परहित मैं लगा कर धर्म की स्थापना कर रहें  हैं.
  
"परहित सरस धर्म हैं नाही परपीड़ा सम दुःख कछु नाही" 


गधा तो मर गया पर मरते मरते उसे संतोष था क्योकि जल की कुछ बुँदे उस के लिए किसी अमृत से कम नही थी आदमी के दिल मैं भी शांति थी की उसने एक मरते हुए को थोडा सुख पहुचाया
और यही सच्चा धर्म हैं 
                                                                         जय भोलेनाथ