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Saturday, January 5, 2013

धृतराष्ट्र मानसिकता



महाभारत मे द्रोपदि के चीर हरण का प्रसंग आता है
जिसमे यह विशेष रूप से उल्लेख है कि
द्रोपदि के चीर हरण का विरोध मात्र जुए मे स्वयम को हार चुके
पाण्डव हारी हुई मानसिकता के साथ तथा
कौरवो मे से दुर्योधन का अनुज विकर्ण ही करते है
कौरव सभा मे उपस्थित शेष महारथी अपने नितान्त निजी कारणो से
विरोध न कर मूक दर्शक बने बैठे रहते है
माना कि ध्रतराष्ट्र नैत्रहीन थे परन्तु मूक और बधिर नही थे
क्या उन्हे द्रोपदि की करूण पुकार सुनाई नही दी
क्यो उनका कण्ठ अवरुद्ध हो गया?
कहने को सम्पुर्ण कुरुसभा मे ध्रतराष्ट्र अन्धे थे
किन्तु भीष्म ,द्रोण,क्रपाचार्य ,अश्वत्थामा ,कर्ण इत्यादि महान योद्धा
जो सभी प्रकार की शस्त्र विधाओं मे पारंगत और सर्वगुण सम्पन्न थे
नैत्रवान थे पर द्रष्टि सम्पन्न नही थे
आज भी हमारे समाजिक राष्ट्रिय परिवेश मे हमे यही स्थिति दिखाई देती है
तथा कथित बुद्धिजीवी ,विचारक,समाज सेवक , पराक्रमी पहलवान,
प्रतिभा से सम्पन्न खिलाडी,राजनेता,
अनेक ज्वलंत विषयो पर उसी प्रकार से मौन है
जिस प्रकार से कुरुसभा मे द्रोपदि चीर हरण के प्रसंग पर
तत्कालीन भद्रजन मौन थे
उस समय ईश्वरिय सत्ता के प्रतीक श्रीक्रष्ण
अन्याय का प्रतिरोध करने हेतु सामने आये थे
पर वर्तमान स्थितियो मे क्या कोई व्यक्ति श्री क्रष्ण
अथवा विकर्ण की भूमिका अपनाने के लिये तत्पर है
संभवतया नही हम स्वयम अपने आस -पास व्याप्त
अन्याय पूर्ण घटनाओं के प्रति कितनी संवेदन शीलता
मन वचन कर्म से दर्शा पा रहे है
इस विषय पर हमे आत्म विश्लेषण की आवश्यकता है
यदि हमारी संवेदनाये मर चुकी है
हम किसी पीडीत व्यक्ति की पीडा हरण करने मे
किंचित भी योगदान नही कर पाये तो
फिर हमे क्या अधिकार बनता है कि
हम स्वयम को सनातन परम्परा का प्रतिनिधि तथा
श्री क्रष्ण रुपी शाश्वत सत्ता के अनुयायी माने

Wednesday, January 2, 2013

12 जनवरी 2013 स्वामी जी का 150 वां जन्म दिवस


12 जनवरी 2013 स्वामी जी का 150 वां जन्म दिवस ( सार्ध सती  )




कुछ विचार पानी पर खिची लकीर की तरह होते हैं जो कुछ पल रहते है और मिट जाते हैं इसी तरह कुछ विचार पत्थर पर खिची लकीर की भाती होते हैं जो सदा सदा के लिए अमिट होते हैं यही बात व्यक्तियों और उनके कार्यो पर भी  लागु होती हैं।
अधिकांस लोग पैदा होते हैं और पानी की लकीर की तरह  काल की धारा मैं लुप्त हो जाते हैं वही कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो  इतिहास के पन्नो मैं भविष्य को लिखते हैं और आने वाली पीडी और सदियों पर अपना प्रभाव छोड़ जाते हैं।


ऐसे ही  युग पुरुष हुए  स्वामी विवेकानंन्द एक महान व्यक्तित्व जो शायद ईश्वरीय अवतार से कम न थे।
 एक युवा सन्यासी जो परिव्राजक हो कर राष्ट्र और धर्म को एक करने के लिए राष्ट्रधर्म के लिए  खड़े हुए पुरे भारत वर्ष की पैदल यात्रा करते हुए अमीर से लेकर गरीब से मिले ब्रहामन की कुटिया मैं भी रुके और दलित की सेवा भी स्वीकार की पुरे भारत की नस - नस  को जाना भारत के गौरव ,गरिमा ,सांस्क्रतिक महानता से लेकर समाज मैं फेली कुरीतियों और विषमताओ का भी अधयन्न किया
और अंत मैं दक्षिण पहुचे जहा विशाल हिन्द महासागर हिलोरे ले रहा था सागर के बीच मैं विशाल चट्टान को देख सागर मैं कूद पड़े और  लहरों को चीरकर उस शिला पर पहुचे जहा  माँ कन्याकुमारी ने घोर तप किया था स्वामी जी उसी शिला पर ध्यानस्थ हुए और लगातार तीन  दिनों तक ध्यान समाधि मैं रहे  और जब आखे खोली तो सामने भारतवर्ष के दर्शन हुए और एक अनभूति हुई की पूर्व को प्रभावित करने के लिए पहले पश्चिम को जितना होगा फिर क्या था स्वामी जी निकल पड़े अपने लक्ष्य को मूर्त रूप देने  


शिकागो धर्म सम्मेलन मैं भारत और हिंदुत्व धर्म - दर्शन का प्रतिनिधित्व करने  जहा उन्हें केवल इस आधार पर भाग लेने से रोका गया की वो किसी अधिकारिक धर्म संगठन के सदस्य नही थे। 
पर जब उसी सम्मलेन के अधिकारी ने स्वामी जी के विचार सुने तो धर्म सभा के अधिकारियो को पत्र लिख कर ये आदेश दिया की ये सन्यासी  हावर्ड के सभी विद्वानों से कही अधिक विद्वता लिए हुए हैं 
आखिरकार स्वामी जी ने शिकागो मैं लाखो लोग को "   sister's and brother's of my america "     कहा तो लाखो लोग खड़े होकर दस मिनट तक तालिया बजाते रहें, उनके ढाई मिनिट के भाषण के सामने बड़े बड़े विद्वानों के घंटो कम पड गये और पूरा पश्चिम भारत के एक सन्यासी का लोहा मान उठा अब तो लोग स्वामी जी को सुनने के लिए लोग घंटो बोर भाषण सुनते यही कारण था की सभा उनका उद्भोद्न सबसे आखिर मैं रखती पूरा विश्व मिडिया स्वामी जी के शब्दों से भर पडा ........................................शेष  भाग आगे 

Wednesday, December 26, 2012

UNIVERSE: तृष्णा ,तृप्ति और परम तत्व

UNIVERSE: तृष्णा ,तृप्ति और परम तत्व: तृष्णा और तृप्ति दोनों परस्पर विपरीत अर्थ वाले शब्द है जहा तृप्ति संतुष्टि प्रदान करता है वहा तृष्णा व्याकुलता अ...
तृप्त रही है आत्मा ,तृप्त रहा तन मन
तृष्णा तो अनंत रही ,सदा तृप्त सज्जन 

rachana: प्रवाह

rachana: प्रवाह

Tuesday, December 25, 2012

तृष्णा ,तृप्ति और परम तत्व


तृष्णा और तृप्ति 
दोनों परस्पर विपरीत अर्थ वाले शब्द है
जहा तृप्ति संतुष्टि प्रदान करता है 
वहा तृष्णा व्याकुलता असंतोष का परिचायक है
प्रत्येक व्यक्ति तृष्णा के विषय भिन्न -भिन्न हो सकते है 
पैमाने अलग -अलग हो सकते है
किस व्यक्ति की तृष्णा किस विषय वस्तु से जुडी है 
किस व्यक्ति को किस विषय वस्तु से तृप्ति प्राप्त हो सकती है 
यह उस व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिचायक होता है
तृष्णा का कोई अंत नहीं है जबकि तृप्ति का है
तृप्ति का सीधा सम्बन्ध व्यक्ति के संतुष्टि के स्तर पर निर्भर होता है
संतुष्टि की अनुभूति किसी व्यक्ति को मात्र कुछ अंश 
प्राप्त होने से हो सकती है
जबकि बहुत से व्यक्तियों को जीवन में बहुत कुछ मिलने के बाद भी वे सदैव असंतुष्ट अतृप्त रहते है
ऐसे व्यक्ति वास्तव में कहा जाय तो 
मानसिक रूप से दरिद्र होते है
इसलिए वास्तविक तृप्ति आंतरिक दरिद्रता 
दूर किये जाने से ही प्राप्त हो सकती है
जो व्यक्ति आंतरिक रूप से सम्पन्न होते है 
उन्हें जीवन में सफलता सीघ्र प्राप्त होती है
आंतरिक दरिद्रता अच्छी पुस्तको के अध्ययन सत्संग से संभव है
महाभारत में दुर्वासा एवं उनके हजारो शिष्यों के 
वनवासी पांडवो के घर आना
भोजन के लिए व्यवस्था किये जाने के लिए कहना 
 और भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा पांड्वो के बर्तनों में से अवशेष रहे खाद्य पदार्थ का तुलसी पत्र से सेवन करने पर 
दुर्वासा और उनके शिष्यों का अचानक स्नान किये जाने के 
दौरान तृप्ति का अनुभव करना यह दर्शाता है
परमपिता परमात्मा परम तृप्ति का पर्याय है
तात्पर्य यह है जो व्यक्ति परमात्मा के जितने समीप है 
वह उतना ही तृप्त है संतृप्त है
जो व्यक्ति अतृप्त है तृष्णाओ से घिरा हुआ है 
वह मानसिक रूप से दरिद्र होने के साथ- साथ
परम तत्व से दूर है

Sunday, December 23, 2012

अव्यक्त व्यथा


वर्तमान में समाज में
ऐसी महिलाओं की संख्या बढती जा रही है
जिन्हें किन्ही कारणों से उनके पति द्वारा परित्यक्त कर दिया गया है
ऐसी महिलाओं के साथ नन्हे बच्चे हो तो स्थिति विकट हो जाती है महिला और बच्चो के सम्मुख जीवन मरण का प्रश्न खडा हो जाता है परिस्थतियो से समझौता करना उनकी नियति बन जाती है
कालान्तर में जाकर ऐसी महिलाओं पर
जार कर्म के आरोप लगा दिए जाते है
वस्तुत: क्या ऐसे पतियों का महिला पर जार कर्म का आरोप लगाने का क्या अधिकार शेष रह जाता है ?
जिसने अपनी पत्नी और बच्चो का समुचित भरण पोषण न कर आजीविका के मूलभूत साधन तक छीन लिए हो
पति और पत्नी के मध्य संताने सेतु का कार्य करती है
संतानों के प्रति उपेक्षा यदि किसी जनक द्वारा की जाती है
तो संतानों के ह्रदय में अपने पिता के प्रति विद्रोह उत्पन्न होना स्वाभाविक है
ऐसे पिटा जो अपनी संतानों की उपेक्षा कर देते है
उनका समाज में कही भी सम्मान जनक स्थान नहीं रह जाता है
तथा ऐसी संतानों के माता पिता के मध्य सुलह की संभावना भी क्षीण रह जाती है
शनै शनै ऐसा दायित्वबोध से विहीन पति
और पिता परिवार और समाज में अपनी उपयोगिता खो देता है
उसका देहिक रूप से विद्यमानता अनौचित्य पूर्ण हो जाती है
हमारे में ऐसे पुरुषो की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है
जो अपने जीने के अर्थ खो चुके है
सामान्य रूप से व्यक्ति अपने लिए
अपने परिवार अपने समाज के लिए
अपने देश के लिए जीवन व्यतीत करता है
जो व्यक्ति न तो देश के लिए समाज के लिए
न परिवार के लिए अपना जीवन की सार्थकता प्रमाणित न कर पाया हो वह व्यक्ति स्वयं के उत्थान के लिए कुछ प्रयास कर रहा होगा
इसमें संशय है