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Wednesday, May 22, 2013
महान और सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति
महान और सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति आयु की
प्रारम्भिक अवस्था से लगाकर
अंत तक समाज और राष्ट्र के लिए जीते है
सामान्य व्यक्ति एक आयु तक स्वयं के लिए जीता है
उसके पश्चात वह अपनी संतानों के लिए
और आयु का महत्वपूर्ण अंश व्यतीत हो जाने के
पश्चात अपने परिवार कुल के लिए
अपनी क्षमताओं को न्यौछावर कर देता है
व्यक्ति का व्यक्तित्व जब सम्पूर्णता प्राप्त कर लेता है
जब वह अपनी सारी जिम्मेदारियों को पूर्ण करने के पश्चात
अपना जीवन समाज और राष्ट्र को समर्पित कर देता है
तथा वह समाज और राष्ट्र के लिए जीता है
सामाजिक परिवेश में अधिसंख्य व्यक्ति ऐसे है
आयु के पूर्वार्ध्द से लगाकर आयु के उत्तरार्ध्द तक
मात्र स्वयं के लिए जीते है
ऐसे व्यक्ति अत्यंत स्वार्थी व्यक्ति होते है
अपने स्वार्थ के सामने पारिवारिक ,सामाजिक,
राष्ट्रीय हितो को महत्व नहीं देते
उनका स्वकेंद्रित सोच परिवार समाज और राष्ट्र को
पतन की और ले जाता है
हमारा प्रयास यह होना चाहिए की
हम महान व्यक्तियों का अनुसरण करे उनकी पूजा नहीं
सामान्य व्यक्ति की तरह हम निज स्वार्थ से शनै शनै
पारिवारिक स्वार्थ और निरंतर अग्रसर होते हुए
राष्ट्रीय हितो की और उन्मुख हो जाए
Sunday, March 31, 2013
श्मशान वैराग्य
श्मशान में हर व्यक्ति को विरक्ति हो जाती है
जलती हुई शव की चिता को देख कर
मानव देह मिटटी की देह लगने लगती है
भौतिक पदार्थो से आसक्ति हटाने लगती है
रिश्तो और व्यक्तियों से मोह समाप्त होने लगता है
परन्तु श्मशान से लौटने के पश्चात
व्यक्ति अपने दैनिक कार्यो में लग जाता है
संसार में पूर्ण रूपेण लिप्त हो जाता है
भौतिक पदार्थो की प्राप्ति के लिए अनुचित
अनैतिक मार्ग अपनाने से भी नहीं चुकता
इस अवस्था को श्मशान वैराग्य के नाम से
संबोधित किया जाता है
कुछ लोग संसार से स्थाई विरक्ति प्राप्त करने हेतु
संन्यास मार्ग का अनुशरण करते है
परिवार रक्त संबंधियों से नाते तोड़ लेते है
पैत्रिक स्थान पैत्रिक गाँव शहर का परित्याग कर देते है
किसी गुरु से दीक्षा ग्रहण कर लेते है
किसी अखाड़े आश्रम सम्प्रदाय से जुड़ जाते है
मोह के नए बंधन निर्मित कर लेते है
वास्तव में व्यक्ति को सच्ची विरक्ति कैसी प्राप्त हो सकती है
जब व्यक्ति को सच्ची विरक्ति प्राप्त होती है
तो उसके लिए वास्तविक मुक्ति का मार्ग
स्वत खुल जाता है
सन्यास क्या है ? सच्चा सन्यासी वस्त्रो से नहीं
विचारों और संस्कारों से होता है
संन्यास में न्यास शब्द होता है
विशुध्द न्यास भाव में संन्यास निहित होता है
न्यास भाव का तात्पर्य यह है की मन में
किसी व्यक्ति वस्तु के प्रति स्वामित्व का भाव नहीं रखना है
सदैव व्यक्ति वस्तु पदार्थ सम्पत्ति के प्रति यह भाव रखना की
वह व्यवस्था या सुरक्षा की दृष्टि उसकी अभिरक्षा में है
न्यास भाव कहलाता है
इसलिए जिस व्यक्ति ने न्यास भाव अंगीकार कर लिया हो
वह सच्चा सन्यासी है
Tuesday, March 26, 2013
होली और होलिका
होली और दशहरे में एक समानता है
होली पर होलिका का दहन होता है
दशहरे पर रावण का दहन होता है
दोनों ही बुराईयों के प्रतीक थे
परन्तु होलिका स्त्री थी रावण पुरुष था
रावण अहंकार का प्रतीक था
तो होलिका ईर्ष्या की प्रतीक थी
ईर्ष्या में व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का नुकसान करने के दुराग्रह में
स्वयं का को भी मिटा सकता है
होलिका इस तथ्य को चरितार्थ करती है
रावण का पुरुष होना होलिका का महिला होना
बुराईयों के बारे में यह तथ्य दर्शाती है कि
वे कही भी किसी भी रूप में हो सकती है
उनका विनाश होना यह दर्शाता है की
चाहे उन्हें कितनी भी वरदानी शक्तिया को मिल जाए
चाहे वे सज्जन शक्ति रूपी प्रहलाद से
क्यों न स्वयं को आवृत्त कर ले ?
उन्हें नष्ट होने से कोई भी बचा नहीं सकता
चाहे वे सज्जन शक्ति रूपी प्रहलाद से
क्यों न स्वयं को आवृत्त कर ले ?
उन्हें नष्ट होने से कोई भी बचा नहीं सकता
प्रहलाद कौन है प्रहलाद मन आल्हाद है मन की वह खुशी है
तद्पश्चात उसे विष्णु भगवान अर्थात
विश्व के प्रत्येक अणु व्याप्त परम तत्व एवं अपने ईष्ट पर
विश्वास होना चाहिए
नहीं तो आत्म विश्वास विहीन एवं ईष्ट एवं ईश से विमुख
व्यक्ति सदा संदेहों से घिरा रहता है
संदेहों से घिरे व्यक्ति के बारे में भगवान कृष्ण ने कहा है
संशयात्मा विनश्यति
जो सकारात्मक मानसिकता को प्रकट करती है
प्रसन्न वही व्यक्ति है जिसकी मानसिकता स्वस्थ है
जो परोपकार में विश्वास रखता है
प्रहलाद बनने के लिए व्यक्ति का सर्वप्रथम स्वयं में
विश्वास होना चाहिए तद्पश्चात उसे विष्णु भगवान अर्थात
विश्व के प्रत्येक अणु व्याप्त परम तत्व एवं अपने ईष्ट पर
विश्वास होना चाहिए
नहीं तो आत्म विश्वास विहीन एवं ईष्ट एवं ईश से विमुख
व्यक्ति सदा संदेहों से घिरा रहता है
संदेहों से घिरे व्यक्ति के बारे में भगवान कृष्ण ने कहा है
संशयात्मा विनश्यति
Monday, March 25, 2013
आयु अनुभव और परिपक्वता
क्या समझदार का आयु से कोई सम्बन्ध है
क्या अधिक आयु का व्यक्ति अधिक समझदार होता है
मेरे अनुसार अधिक आयु का सबंध अनुभव से होता है
समझदारी के लिए अधिक आयु होना आवश्यक नहीं होती
सामान्य रूप से वयस्क व्यक्ति उसे कहते है
जो १८ वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो
वयस्कता को परिपक्व मानसिकता का प्रतीक माना जाता है
परन्तु यहाँ यह प्रश्न खडा होता की
क्या प्रत्येक वयस्क व्यक्ति मानसिक रूप से परिपक्व है
हम बहुत से ऐसे लोगो को जानते है
जो वयस्कता की आयु पूर्ण किये जाने
के बावजूद अपरिपक्व मानसिकता का प्रदर्शन करते रहते है
उनके द्वारा लिए गए निर्णयों में दूर दर्शिता नहीं होती
इसलिए वयस्कता मानसिक परिपक्वता का पैमाना नहीं हो सकती
हां वय्क्स्क व्यक्ति शारीरिक रूप से पूर्ण विकसित हो जाता है
कई बार अधिक आयु के होने बावजूद व्यक्ति में
अनुभवों का अभाव पाया जाता है
कई व्यक्ति ऐसे है जिन्हें अल्पायु में पर्याप्त अनुभव प्राप्त हो चुके है
समाज में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं
जिनके पास अधिक आयु अधिक अनुभवी होने
के बावजूद वे एक ही प्रकार की त्रुटियों की पुनरावृत्ति करते रहते है
अतीत के अनुभवों से वे कुछ भी नहीं सीखते
इसलिए सदा अल्प आयु के व्यक्ति की समझदारी और परिपक्वता
का निर्णय उसकी आयु के आधार पर नहीं लिया जाना चाहिए
अपितु आयु सम्बन्धी पूर्वाग्रह परे रख कर
व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसकी क्षमता का मूल्यांकन करना चाहिए
माँ शारदे और हंस
इस प्रश्न के उथले तौर कई जबाब हो सकते है
परन्तु सही जबाब यह है की हंस प्रतीक है धवल आचरण का
हंस प्रतीक है नीर क्षीर विवेक का
हंस प्रतीक है ज्ञान सरोवर में रमण करने वाले चित्त का
हंस प्रतीक है कल्पना पखेरू का
इसलिए माता सरस्वती ऐसे चित्त में प्रवेश करती है
जो ज्ञान सरोवर में रमण करता हो
माता सरस्वती धवल आचरण एवं ऊँचे शील से युक्त व्यक्ति की
मति को अपना आसन बनाती है
माँ सरस्वती कल्पना पखेरू जिसका एक पंख जिज्ञासा
और दूसरा पंख अन्वेषण का होता है
उसे नया आकाश प्रदान करती है
Thursday, March 21, 2013
मंत्र साधना और मनोरथ सिद्धि
भिन्न भिन्न मंत्र के प्रयोजन भिन्न होते है
भिन्न -भिन्न मंत्रो से वांछित मनोरथ की पूर्ति होती है
मनोरथ किसे कहते है मनोरथ अर्थात मन का रथ
मंत्र सिद्ध होने पर मन मे पलने वाले वाले
भिन्न -भिन्न मंत्रो से वांछित मनोरथ की पूर्ति होती है
मनोरथ किसे कहते है मनोरथ अर्थात मन का रथ
मंत्र सिद्ध होने पर मन मे पलने वाले वाले
संकल्प स्वत साकार होने लगते है
सपने और संकल्प वांछित आकार ले लेते है
जो लोग मंत्र साधना करते है
सपने और संकल्प वांछित आकार ले लेते है
जो लोग मंत्र साधना करते है
वे गणना करते हुये निर्धारित संख्या मे मंत्रो को उच्चारण करते हुये
मनोरथ सिद्धि की कामना करते है
मनोरथ सिद्धि की कामना करते है
परन्तु मंत्र के निहितार्थ को भूल जाते है
मात्र कण्ठ के माध्यम मे ध्वनि की निकल पाती है
मंत्र के साथ मन का संकल्प नही रह पाता है कही छूट जाता है
परिणाम स्वरुप मन का रथ वांछित लक्ष्य की प्राप्ति की ओर
मात्र कण्ठ के माध्यम मे ध्वनि की निकल पाती है
मंत्र के साथ मन का संकल्प नही रह पाता है कही छूट जाता है
परिणाम स्वरुप मन का रथ वांछित लक्ष्य की प्राप्ति की ओर
सही दिशा मे सही गति से नही चल पाता है
मनोरथ प्राप्ति का अभियान मंत्र साधना से
मनोरथ प्राप्ति का अभियान मंत्र साधना से
अलग हट जाने के कारण अधुरा रह जाता है
साधक की ईष्ट और मंत्र से आस्था हटने लगती है
साधक की ईष्ट और मंत्र से आस्था हटने लगती है
ईष्ट और मन्त्र के साधक के बीच आत्मीय संपर्क
होना अत्यंत आवश्यक है
साधक की मन्त्र साधना के समय निष्काम भावना हो तो
आत्मीयता ईष्ट से गहरी होती जाती है
ईष्ट से आत्मीयता स्थापित होने पर ईष्ट से बिना मांगे ही
सब कुछ मिलने लग जाता है
हो सकता हमारी दृष्टि में हमारी अपेक्षाए भिन्न हो
परन्तु हमारे लिए क्या श्रेयस्कर है यह हमारे
ईष्ट बहुत अच्छी तरह जानते है
जिसका महत्व हमें बहुत समय बाद ज्ञात होता है
Monday, March 18, 2013
श्रेय सहयोग और प्रसाद
श्रेय का सहयोग से अनुपम सम्बन्ध है
यदि हम किसी कार्य का श्रेय स्वयं ही लेते है तो
सहयोगी हमसे दूर चले जाते है वांछित सहयोग के अभाव में
हमारी योजनाये दम तोड़ने लगती है
यथार्थ के धरातल पर उतर ही नहीं पाती है
प्रबंधन के महत्वपूर्ण सुर्त्रो में से एक है श्रेय बांटना
यदि हम किसी कार्य का श्रेय स्वयं ही लेते है तो
सहयोगी हमसे दूर चले जाते है वांछित सहयोग के अभाव में
हमारी योजनाये दम तोड़ने लगती है
यथार्थ के धरातल पर उतर ही नहीं पाती है
प्रबंधन के महत्वपूर्ण सुर्त्रो में से एक है श्रेय बांटना
हम जिस प्रकार से मंदिर पर जाकर ईश्वर को प्रसाद चढाते है
बाद में प्रसाद को अधिक से अधिक लोगो को बाँटते है
प्रसाद को बांटने से हमें ईष्ट का आशीर्वाद
बाद में प्रसाद को अधिक से अधिक लोगो को बाँटते है
प्रसाद को बांटने से हमें ईष्ट का आशीर्वाद
और प्रसाद को ग्रहण करने वालो की
शुभ कामनाये प्राप्त होती है उसी प्रकार से
जब संगठित रूप या व्यक्तिगत रूप से
किसी उपलब्धि को प्राप्त करने की दिशा
में प्रयत्न करते हुए उस उपलब्धि को हासिल करते है
तो हमें कर्म योगी तरह प्राप्त हुई उपलब्धि के लिए
अहंकार के वशीभूत न हो उसे ईष्ट का आशीर्वाद मान कर
तथा प्रसाद के रूप में अंगीकार कर अपने परिवार या संस्था में
विद्यमान व्यक्तियों को भी श्रेय देना चाहिए
श्रेय देने से प्राप्ति का मुल्य बढ जाता है
संस्था के सदस्यों या परिजनों में सहयोग की भावना में वृध्दि होती है
परिणाम स्वरूप भविष्य की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए
हमें बिना मांगे ही सहयोग प्राप्त जाता है
में प्रयत्न करते हुए उस उपलब्धि को हासिल करते है
तो हमें कर्म योगी तरह प्राप्त हुई उपलब्धि के लिए
अहंकार के वशीभूत न हो उसे ईष्ट का आशीर्वाद मान कर
तथा प्रसाद के रूप में अंगीकार कर अपने परिवार या संस्था में
विद्यमान व्यक्तियों को भी श्रेय देना चाहिए
श्रेय देने से प्राप्ति का मुल्य बढ जाता है
संस्था के सदस्यों या परिजनों में सहयोग की भावना में वृध्दि होती है
परिणाम स्वरूप भविष्य की योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए
हमें बिना मांगे ही सहयोग प्राप्त जाता है
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