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Monday, February 6, 2012

कार्तिकेय भगवान्





शिव शंकर के पुत्र भगवान् कार्तिकेय 
जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन स्वामी ,सुब्रह्मण्यम स्वामी नामो से भी पुकारा जाता है 
उनके सम्बन्ध में यह प्रचलित है की वे मयूर पर सवारी करते है
तथा निरंतर गतिशील रहते है 
भगवान् कार्तिकेय जिन्हें अग्निनंदन ,सनत कुमार ,गांगेय ,क्रौंचारी  के नामो से संबोधित किया जाता है 
देवताओं के सेनापति कहलाये जाते है
उनका जीवन में एक मात्र उद्देश्य
शिवत्व अर्थात कल्याणकारी श्रेष्ठ विचारों का प्रचार प्रसार है
इस कार्य के लिए उन्होंने अखंड ब्रहमचर्य धारण किया है 
जहा भगवान् श्री गणेश माँ पार्वती के प्रिय पुत्र है वही भगवान् कार्तिकेय भगवान् शिव के परम प्रिय पुत्र है 
भगवान् कार्तिकेय में शिव जी का सम्पूर्ण व्यतित्व प्रतिबिंबित होता है 
शिव जी जैसा वैराग्य ,भोलापन ,सांसारिकता से दूर लोक कल्याण की भावना सभी गुण उनमे समाहित है
कार्तिकेय जी द्वारा कभी भी स्वयं को महिमा मंडित 

करने का प्रयास नहीं किया गया 
अपितु उन्होंने अपने पिता शिव शंकर का गुण गान उनके गुणों का प्रचार कर उन क्षेत्रों में  धर्म की स्थापना की जहा द्रविड़ संस्कृति विद्यमान थी 
कार्तिकेय जी पहला उदाहरण है
 जो इस कारण पूजित वन्दित हुए की 
उन्होंने निज पूजा करवाने के बजाय शिव पूजा पर जोर दिया 
कार्तिकेय जी निरंतर सक्रियता रहने का धोतक है
उनका जीवन यह सन्देश देता है की 
सक्रीय रह कर निरंतर शिव प्रचार अर्थात 
श्रेष्ठ कर्म करने से स्वत शिव अर्थात परम पिता परमात्मा की 
प्राप्ति हो सकती है
प्राचीनकाल में  कथा है की ताड़कासुर नामक राक्षस था का वध  
 कार्तिकेय देव द्वारा किया गया था
आखिर त्रिदेवो सहित समस्त देवी देवता उसका  वध करने मे क्यो असमर्थ हो गये थे?
यह सत्य है कि उसे ब्रह्मदेव से बहुत सारे वरदान प्राप्त थे
 
ताड़कासुर प्रखर पुरुषार्थी के साथ अजेय पराक्रमी भी था
किन्तु वह असत्य ,अनाचार, अन्याय का प्रतिनिधि था
उसका वध मात्र बाहुबल से किया जाना संभव नही था
असत्य की सत्ता को बेदखल करने के लिये नैतिक बल की आवश्यकता होती है
ताड़कासुर के वध के लिये शिव पुत्र का चयन का क्या अर्थ हो सकता है?
शिव अर्थात लोक कल्याण के देवता 
शक्ति अर्थात सत्य पर मर मिटने की
प्रखर इच्छा शक्ति 
दोनो के संयोग से जो निश्छलता लिये सन्तति जन्म लेती है
वह कुमार कार्तिकेय के रूप मे अवतरित होती है
कार्तिकेय ने बाल्य अवस्था मे देवताओं का नेत्रत्व कर आसुरी शक्तियो के प्रतिनिधी ताड़कासुर का नाश किया
आशय  यह है कि बालक सी निश्छलता लिये जो व्यक्ति नैतिक बल को लेकर
सज्जन शक्तियो को साथ लेकर सत्य के लिये संघर्ष करता है
वह बडी -से बडी बुराई को परास्त करने का सामर्थ्य रखता है
अधिकतर सत्य के प्रवक्ता इसीलिये अपने उद्देश्य की 
पूर्ति मे विफल हो जाते है
उनके भीतर का नैतिक बल निर्बल होता है
क्योकि वे स्वयम जाने-अनजाने प्रपंचो,पाखंडो से घिरे रहते है



Saturday, February 4, 2012

पुरुषार्थ की प्रतीक माँ नर्मदा


माँ नर्मदा पुरुषार्थ की प्रतीक है
वह आस्था का दीप है
माँ नर्मदा प्रवाह के प्रतिकूल बहने का प्रमाण है
विषमताओ में समता स्थापित करने का प्रयास है 
माँ नर्मदा अन्धानुकरण नहीं है
अपितु अंधी आस्थाओं को आराधना का पथ दिखाने का प्रकाश पुंज है
माँ नर्मदा भावो का अन्त्योदय तथा असुविधाओ में सुविधाओं का उदय है
शिवत्व इसमें समाहित है यह शून्य में सृष्टि को उत्पन्न करने का चमत्कार है
जो अमर कंटक से छोटे से जल स्त्रोत से  सागर बनने का उपक्रम है
इसीलिए माँ नर्मदा अमरकंटक से अपनी यात्रा को प्रारंभ करती  हुई
मध्यप्रदेश के बड़े क्षेत्र में अपने जल का वरदान बिखेरती हुई
महाराष्ट्र ,एवम गुजरात होते हुए  अरब सागर में गिरती है
माँ नर्मदे  के गंगा जी के सामान शिव जी के मस्तक से नहीं निकलती है
यह तो शिव जी के तप के फलस्वरूप उनके पसीने का प्रताप है
अर्थात माँ नर्मदा शिव जी के पुरुषार्थ का प्रतीक है
माँ नर्मदा ग्लेसियर से नहीं बनती है
वह सहज स्वत पर्वत की ऊँची चोटी से निकल कर उस क्षेत्र को सींचती जो अनछुआ रह गया है
अर्थात माँ नर्मदा पूर्णता प्राप्ति का प्रयास है
स्कन्द पुराण जो भगवान् कार्तिकेय  से सम्बंधित है
में माँ रेवा का विस्तृत उल्लेख है यह महर्षि दधिची की तपोस्थली धर्मपुरी नगरी को भी तृप्त करती है
भगवान् शिव जी  के व्यक्तित्व को कही देखना हो तो माँ रेवा अर्थात माँ नर्मदा के दर्शन करना चाहिए नर्मदा जी के हर कंकर को शंकर के रूप में पुकारा गया है
शास्त्रों में इस कारण यह वर्णन है की यह सात पवित्र नदियों में शामिल है
क्योकि  अन्य पवित्र नदियों जिनमे गंगा ,यमुना ,ब्रह्मपुत्र,सिन्धु ,कावेरी व् विलुप्त सरस्वती नदी है 
में स्नान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जबकि माँ नर्मदा के दर्शन मात्र ही पुण्य प्राप्ति के लिए पर्याप्त है

Thursday, January 26, 2012

अनुशासन एवम गणतंत्र दिवस



स्वतंत्रता शब्द कितना मधुर शब्द लगता है 
लेकिन स्वतंत्रता बिना अनुशासन  के व्यक्ति को उछ्र्नख्ल उद्दंड अपराधी बना देती है 
व्यक्ति चाहे आत्मानुशासित रहे या भय के द्वारा स्थापित अनुशासित
किन्तु जीवन में अनुशासन होना बहुत आवश्यक है जो व्यक्ति आत्मानुशासन में नहीं रहता है उसे भय के द्वारा स्थापित अनुशासन में रहना पड़ता है ऐसे व्यक्ति को स्वतंत्रता भी गुलामी या परतंत्रता के सामान प्रतीत होती है जीवन में उत्थान और नव निर्माण के लिए अनुशासित रहना आवश्यक है उसी प्रकार से समाज को अनुशासित रखने के भी सामाजिक अनुशासन अनिवार्य होता है और राष्ट्र को अनुशासित रखने के लिए संविधान होना आवश्यक है अर्थात स्वतंत्रता का मूल्य अनुशासित जीवन है चाहे वह व्यक्ति, समाज ,या राष्ट्रीय अनुशासन जो जुड़े प्रश्न हो
गणतंत्र दिवस २६ जनवरी राष्ट्रिय अनुशासन का स्मृति दिवस है 
इसलिए १५ अगस्त १९४७को आजादी प्राप्त होने के बाद  को देश को प्रगति समाज अपराध मुक्त बनाए रखने के लिए संविधान लागू किया गया है 
जो संविधान की प्रस्तावना के अनुसार हमने उसे आत्मार्पित किया है 
अर्थात हमने राष्ट्रीय जीवन को अनुशासित करने का संकल्प किया लिया है
हमारे सारे अधिनियम ,नियम संविधान की आधार भूमि पर ही रचे गए है या रचे जाते है
संविधान के प्रतिकूल क़ानून अवैध एवम औचित्यविहीन ठहराया जा सकता है
संविधान के अधीन विरचित अधिनियम स्वेच्छाचारी लोगो में भय निर्मित कर उन्हें अनुशासित बनाए रखता है
तथा अनुशासित व्यक्तियों को उनके मौलिक अधिकारों को सुरक्षित रखने को आश्वस्त करता है 
गणतंत्र दिवस हम सही अर्थो में तभी मना सकते हैजब हम व्यक्तिगत ,सामाजिक ,राष्ट्रीय जीवन में अनुशासित रहने का संकल्प ले इसी में व्यक्ति ,समाज ,राष्ट्र की प्रगति निहित है

Monday, January 16, 2012

चारित्रिक नैतिकता एवं अर्जुन


महाभारत में एक प्रसंग आता है 
जब अर्जुन वनवास काल के दौरान अपने मानस पिता इन्द्र के यहाँ स्वर्ग में गये थे 
अपने मानस पुत्र के कष्टों को दूर करने के लिए इन्द्रराज ने अर्जुन के लिए स्वर्ग में मनोरंजन एवम सुख सुविधा के सारे प्रबंध किये थे
इन्द्र की सभा में नृत्य करने वाली अप्सरा उर्वशी थी 
जो नृत्य संगीत में अत्यंत कुशल होकर सुन्दरता की प्रतिमूर्ति थी
इन्द्र ने अपने मानस पुत्र अर्जुन की सेवा हेतु अपनी अप्सरा उर्वशी को भेजा 
इंद्र के आदेशानुसार उर्वशी अर्जुन की सेवा हेतु अर्जुन के समक्ष उपस्थित हुई
अर्जुन धीर वीर ही नहीं अपितु जितेन्द्रिय चरित्र का दृढ व्यक्ति थे 
उन्होंने उर्वशी को यह निवेदन किया की चूँकि वह इंद्र की सेविका होकर उनकी उपभोग में आनेवाली महिला है
इंद्र उसके मानस पिता होने से उर्वशी उसकी माता के सामान है
इसलिए वे माता सामान स्त्री से किसी प्रकार से स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध नहीं बना सकते
इस पर उर्वशी अप्सरा कुपित हो गई एवम अर्जुन को नपुंसकता का श्राप दिया 
जो परम वीर अर्जुन ने सहर्ष स्वीकार किया किन्तु स्वर्ग जैसी जगह पर पतित कर्म करने से स्वयं को रोका
पश्चातवर्ती घटनाक्रम में अज्ञातवास के दौरान नपुंसकता का श्राप अर्जुन को काम आया 
और उन्होंने विराट राज्य की राजकुमारी उत्तरा को नृत्य एवम संगीत का प्रशिक्षण दिया 
अज्ञातवास पूर्ण होने पर जब विराट के राजा ने जब उत्तरा से विवाह करने करने का प्रस्ताव अर्जुन के समक्ष रखा
तो अर्जुन जैसे पराक्रमी वीर ने फिर चारित्रक प्रबलता दर्शाई 
और उन्होंने विराटराज के प्रस्ताव को यह कह कर इनकार कर दिया की उन्होंने उत्तरा को शिक्षा दी है 
इसलिए उत्तरा एवम उनके मध्य गुरु शिष्य के सम्बन्ध बन चुके है
गुरु के शिष्या से विवाह नैतिक दृष्टि से उचित नहीं है
वीर अर्जुन जिन्होंने भले ही सुभद्रा ,गंधर्व कन्या ,नागकन्या ,द्रोपदी से विवाह कर बहु विवाह किये हो 
किन्तु उन्होंने जो रिश्तो की मर्यादा स्थापित की है वह अत्यंत दुर्लभ है
वर्तमान में  भी यह कथा प्रासंगिक होकर अनुकरणीय है
आशय यह है की उत्तम श्रेणी के पुरुष उत्तम स्थान पर सुविधाए पाकर पतित नहीं होते है 
अपितु पवित्र स्थान पर आचरण की पवित्रता बनाए रखते है 
जो व्यक्ति रिश्तो का आदर करते है ऐसे व्यक्ति को ही सभी प्रकार की विद्याये तथा कुशलताए प्राप्त होती है 
और उन्हें वासुदेव श्रीकृष्ण एवम इंद्र देव जैसे देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है

Wednesday, January 11, 2012

ब्रह्मा जी एवम जीवन के सूत्र

ब्रहमा जी वह देवता है जो सृष्टि के रचनाकार है
सृष्टि कितनी ही बार नष्ट हो ब्रह्मा जी उसे बार बार निर्मित करते है
ब्रह्मा जी से यह सूत्र सीखने को मिलता है की हमें कभी निराश नहीं होना चाहिए
जितनी बार हमारे प्रयत्न निष्फल हो हार न मानते हुए पुन नव निर्माण में लग जाना चाहिए
ब्रह्मा जी का निवास कमल पुष्प पर होता है कमल को पंकज भी कहा जाता है
पंकज संस्कृत के पंक +अज दो शब्दों से मिल कर बना होता है
अर्थात वह पुष्प जिसका जन्म कीचड़ से हुआ हो
हम सभी यह जानते है की कमल तालाब अर्थात सरोवर में उगते है
जिस तालाब में जितना कीचड़ होता है वहा उतनी ही मात्रा में कमल खिलते है
तालाब का जल स्थिर जल होता है अर्थात प्रवाहमान जल में कमल का अंकुरित होना असम्भव होता है
ब्रह्मा जी का आसन कमल होना यह दर्शाता है की असुविधाओ के कीचड़ में  प्रतिभाये पैदा होती है
इतिहास साक्षी है की विश्व में जितने में प्रतिभावान महान व्यक्ति उत्पन्न हुए है
वे घोर दरिद्रता ,असुविधाओ में ,विषम परिस्थितियों में पले बड़े है
ज्ञान अर्जन हेतु कठिन साधना और परिश्रम करना पड़ता है प्रतिभाये साधनों की मोहताज नहीं होती
जिस प्रकार स्थिर जल में कमल पैदा होता है
उसी प्रकार प्रतिभा संपन्न व्यक्ति को भी ज्ञान अर्जन हेतु अपनी दैनिक दिन चर्या को संयमित और मति को स्थिर रखने की आवश्यकता होती है
जीवन में स्थिरता प्राप्त किये बिना किसी भी संकल्प का साकार नहीं किया जा सकता है
इस प्रकार ब्रह्मा जी के चार मुख होते है
इसका आशय यह है व्यक्ति को ज्ञान के सभी क्षेत्रों में जिज्ञासु होना चाहिए
जहा से जैसे भी हो ज्ञान के प्रति जिज्ञासा शांत करने के प्रयत्न करने चाहिये 
इसलिए ब्रह्मा जी तरह जो व्यक्ति असुविधाओ के कीचड़ में उत्पन्न प्रतिभा  रूपी कमल आसन पर विराजमान होकर ज्ञान के अध्ययन से सभी विषयो समग्र ज्ञान प्राप्त करने के लिए के लिए प्रयत्न रत होता है
वह स्वयं का ही नहीं समस्त लोगो का हित साधने की क्षमता रखता है
ऐसा व्यक्ति उसके स्वप्न कितनी बार टूटे फिर नए संकल्प के साथ नवीन सृजन कर्म करने को उद्यत हो जाता है

Shoes

One day i am sad because my shoes was old and break its not comfortable  yet.
I want a new pair of shoes  but i have no money that why my mood is not so good and i am really disappoint
I asked the god why? don't you give me lots moremoney.
god you are not really you are only a imagination
its a not good day for me so i dside   to some walk in out side. 
Suddenly I saw a man the man who had no "LEGS "

"That time i understand how lucky i am Thanks   GOD Really  thank"

Friday, January 6, 2012

सौर मंडल में जीवन प्रबंधन के सूत्र


क्या सौर मंडल से व्यवहारिक जीवन का कोई सम्बन्ध हो सकता है ?
हा !सौर मंडल से जीवन प्रबंधन के सूत्र प्राप्त कर सकते है
हम यह देखते है किसी परिवार अथवा शासकीय विभाग या कम्पनी के कार्यालय में एक मुख्य व्यक्ति होता है
जो सम्बंधित संस्था में सूर्य अर्थात मुखिया की भूमिका में होता है
हम यह भी देखते है की सूर्य के सबसे निकट ग्रह बुध ,शुक्र आदि में जीवन की कोई संभावना नहीं है 
तथा सूर्य से दूरस्थ ग्रह वृहस्पति शनि प्लूटो नेप्चून पर भी जीवन नहीं है
पृथ्वी  जो सूर्य से अधिक न तो पास है न अधिक दूर ऐसे ग्रह पर जीवन है
मंगल पर भी जीवन की संभावना विद्यमान है 
इसका तात्पर्य यह है की सौर मंडल का मुखिया हो या परिवार या किसी विभाग का मुखिया हो
उससे न तो अधिक सामीप्य न अधिक दूरी किसी सदस्य अथवा कर्मचारी को फलदायी होती है
जिन सदस्यों का मुखिया से संतुलित तथा स्वस्थ सम्बन्ध रहते है 
उन्हें समस्त सभी समाधान प्राप्त होते है 
इसके आतिरिक्त हम यह भी देखते कुछ सदस्यों के परिवार अथवा संस्था से मुखिया से संबंधो में निरंतरता नहीं होती उनकी स्थिति उन धूमकेतुओ की तरह होती है जिनकी कोई कक्षा नहीं होती
ऐसे व्यक्तियो का कैरियर हो अथवा पारिवारिक जीवन हो ऐसा होता  है जो कभी भी ब्रह्माण्ड के अनंत अन्धकार में धूम केतुओ की तरह या तो खो जाता है अथवा मुखिया रूपी सूर्य के तेज से भस्म हो जाता है 
इसके अतिरिक्त सौर मंडल का आकार हमें यह भी सन्देश देता है की मात्र बड़ा होना ही पर्याप्त नहीं है 
परिवार एवम विभाग में सार्थक भूमिका भी होना अनिवार्य है 
जो मुखिया संतुलित दूरी पर रह कर ही प्रथ्वी ग्रह की तरह सार्थक कर्म करते हुए निभायी जा सकती है 
अन्यथा बड़े ग्रह होने के बावजूद शनि एवम बृहस्पति सौर परिवार में मुख्य सदस्य से अत्यंत दूरस्थ होने के कारण मात्र ज्योतिषीय कारणों से जाने जाते है
सौर मंडल से हमें यह सन्देश भी मिलता है की सूर्य के गुरुत्व में जिस प्रकार सौर मंडल के ग्रह अपनी अपनी कक्षा मे भ्रमण रत रहते है 
उसी प्रकार व्यक्ति को पारिवारिक अथवा संस्था के अनुशासन में रह कर अपनी अपनी भूमिका को निभाने में संलग्न रहना चाहिए  
अन्यथा उद्दंड व्यक्तियों की वही दशा होती है जिस प्रकार से सूर्य के गुरुत्व से बाहर निकल जाने वाले ग्रहों ,उपग्रहों ,उल्का पिंडो की होती है  
जोअनंत ब्रह्मांड के अन्धकार में लुप्त हो जाते है और उनके साथ कही भी किसी भी प्रकार की त्रासदी घटित हो सकती है