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Saturday, June 2, 2012

अक्षर ,शब्द ,मन्त्र एवं सिध्दी

अक्षर अर्थात जिसका क्षरण नहीं हो 
एक से अधिक अक्षर मिलकर शब्द बनता है 
शब्दों का सुसंगठित समूह वाक्य होता है 
सार्थक शब्दों का समूह काव्य कहलाता है
काव्य  यदि आत्मा  को परमात्मा से जोड़े तो वह मन्त्र कहलाता है 
हम अनुभव करते है की एक मन्त्र जब सिध्द होता है  तो आस -पास के परिवेश में सकारात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है 
भिन्न -भिन्न प्रभाव हेतु भिन्न भिन्न मन्त्र
उपयोगी होते है 
मन्त्र सिध्द कब होता है ? 
प्रारंभ में जब कोई साधक मन्त्र का जाप करता है 
तो मन्त्र परिवेश में अधिक प्रभाव उत्पन्न नहीं करता है
 यहाँ तक की मन्त्र का प्रभाव शून्य भी होना दृष्टिगत होता है साधक निराश होने लगता है 
ऐसा नहीं होना चाहिए 
मन्त्र का सीधा सम्बन्ध स्वर ,तथा ध्वनि विज्ञान से होता है  
विज्ञान ने प्रमाणित किया है 
कि जिस प्रकार से प्रकाश की गति होती है 
उसी प्रकार से ध्वनि की भी गति होती है 
प्रकाश की गति की अपेक्षा ध्वनि की गति कम होती है 
साधक जब मन्त्र साधना करता है 
तो एक निश्चित स्वर एवं ध्वनि में संतुलन निर्धारित कर मन्त्र को उच्चारित किया जाता है 
मन्त्र में निहित आशय एवं साधक में मन में चलने वाले विचार तथा पलने वाले संकल्प 
मन्त्र  की ध्वनि के साथ अनंत ब्रहमांड की यात्रा करते है 
यह देखने में आता है की कोई मन्त्र दीर्घ कालावधि अर्थात कई वर्षो के पश्चात सिध्द होता है
 मन्त्र अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ कर देता है इसका तात्पर्य यह है कि
मन्त्र में निहित शब्द एवं शब्दों में निहित अक्षर की यात्रा पूर्ण हो चुकी है
व्यवहारिक जीवन में यह अनुभव आता है
कि
हम जिस प्रकार के शब्दों का प्रयोग दूसरो के प्रति करते है 
 सामने से हमें उन्ही शब्दों में उत्तर मिलता है 
यहा पर भी शब्द में निहित अक्षर की अविनाशी प्रकृति सामने आती है
 इसलिए हमें यह ध्यान रखना होगा की 
हमें दूसरो के प्रति उन शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए
 जिनकी हम अपने लिए दूसरो से अपेक्षा नहीं करते है 
हमारे नियमित व्यवहार में अच्छी शब्दावली हमारे व्यक्तित्व को सुन्दर बनाती है 
जो जीवन में हमारी सफलता का पैमाना होती है  इसलिए अक्षर की महिमा का हमें सदा स्मरण रखना चाहिए 
शब्द को ब्रहम की संज्ञा इसलिए भी दी गई है

Monday, May 28, 2012

कृतज्ञता भाव गोवर्धन पूजा और देश भक्ति


गूगल से साभार 



गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में 
भगवान् श्रीकृष्ण के जीवन में घटित प्रसंग आता है जिसमे उन्होंने गोकुल वासियों को
 इन्द्र की पूजा न कर गोकुल में विद्यमान गोवर्घन पर्वत की पूजा करने को प्रेरित किया 
इस प्रसंग के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण 
क्या कहना चाहते है ?
यह समझना आवश्यक है 
क्या वे इंद्र राज  के अहम् का दमन कर उन्हें अपमानित करना चाहते थे ? भगवान् श्रीकृष्ण का गोवर्धन पूजा के पीछे छुपा आशय 
किसी देवता को अपमानित करने का नहीं हो सकता 
क्योकि महान सोच के धनी भगवान् श्रीकृष्ण का 
किसी भी कार्य के पीछे गलत मंतव्य नहीं हो सकता 
हमारे शास्त्रों यह कहा जाता है की 
"कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती 
करमूले तू गोविन्द : प्रभाते कर दर्शनम 
समुद्र वसने देवी पर्वत स्तन मंडले 
विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं  पाद स्पर्शं क्षमस्व मे "
अर्थात -हाथो  के अगले भाग उंगलियों के रहने वाली देवी श्री लक्ष्मी  हाथो के मध्य भाग में निवास रत माँ सरस्वती 
तथा हाथो के मूल जिसे कलाई भी कहा जाता में रहने वाले
 भगवान् विष्णु का दर्शन करताहूँ ।
तथा वह देवी जिसके.वस्त्र समुद्र है
 पर्वत जिसके वक्ष है 
उस विष्णु पत्नी प्रथ्वी को मेरे पैरो को छु जाने से जो कष्ट हुआ है 
उसके लिए क्षमा मांगता हूँ 
उक्त श्लोक से यह स्पष्ट है की 
हमें प्रतिदिन उस धरती से सदा क्षमा मांगनी चाहिए 
तथा उस धरती के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए 
जहा हम रहते  है 
जिससे हम भरण पोषण पाते है 
जो हमें आश्रय प्रदान करती है 
 आशय यह है की 
अपने देश की माटी के प्रति स्नेह कर्तव्य एवं कृतज्ञता का भाव होना चाहिए ।
ऐसा नहीं हो की हम जिस स्थान परिवेश मिटटी में रहे 
वहा के प्रति अपने 
 कृतज्ञ भाव को भूल कर दूसरे देश दूसरी मिटटी के प्रति हम प्रतिबध्द हो जाए 
इसी तथ्य को स्थापित करने के लिए 
भगवान् कृष्ण में गोकुल वासियों को 
तत्समय यह सन्देश दिया की 
तुम गोवर्धन रूपी उस मिटटी पर्वत परिवेश को 
नमन करो जो तुम्हे आजीविका भरण पोषण प्रदान करता है 
 न की इन्द्र रुपी उस आसमान को 
जिससे तुम्हारा जन्म ,शिक्षा ,भरण ,पोषण ,आजीविका ,का कोई सम्बन्ध नहीं रहा है 
इसलिए गोवधन पूजा के पीछे देश की मिटटी के प्रति कृतज्ञता भाव निहित रहा है
 और यही सच्ची गोवर्धन पूजा है   


Tuesday, May 22, 2012

अभिवादन के निहितार्थ

 अभिवादन   का प्रयोग भिन्न  -भिन्न भावो के लिए 
भिन्न  भिन्न श्रेणियों के व्यक्तियों  के लिए 
विभिन्न प्रकार   से किये जाते है 
भारतीय संस्कृति  में अभिवादन का एक प्रकार यह है कि 
किसी व्यक्ति  को  दोनों हाथ जोड़कर हाथो को अपने ह्रदय के निकट रखते हुए अपने सम्मुख व्यक्ति को नमन करना 
 इस प्रकार का अभिवादन का आशय यह है कि  जिस व्यक्ति क़ा हृदय मे स्थान हों उस हृदय से  नमन करना चाहिए 
ह्रदय प्रेम ,विश्वास ,और आस्था का प्रतीक होता है 
इस प्रकार के अभिवादन से परस्पर प्रेम विश्वास और आस्था का 
संचरण होता है 
उसी प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा अपने आस-पास के परिवेश में
 बिखरती है 
दुसरे प्रकार का  अभिवादन सुरक्षा बलो के सदस्य द्वारा  राष्ट्रिय ध्वज तथा अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सावधान  की मुद्रा में सिर  की दाहिनी  कनपट्टी पर दाहिने हाथ को  लगा कर किया जाता है 
हमारे मानव शरीर में सिर  चेतना  बुध्दी क़ा प्रतीक होता है और हाथ कर्म के प्रतीक 
 सभी.सुरक्षा,से जुड़े कर्मचारियों को अपने वरिष्ठ एवं देश तथा समाज
 के प्रतीक राष्ट्र ध्वज को निरंतर यह आश्वस्त रखना चाहिए की वह अपने मन वचन कर्म से देश एवं समाज की रक्षा के लिए प्रतिबध्द है 
अभिवादन का यह प्रकार की सांकेतिक दृष्टि से एक हाथ थोड़ा  आगे कर दुसरे व्यक्ति से  मिलाने 
का आशय यह  हाथ सहयोग का प्रतीक होता है 
दो व्यक्तियों द्वारा परपरस्पर सहयोग का भाव दर्शाने हेतु 
इस प्रकार के अभिवादन का प्रयोग किया जाता है  
कभी कभी हम देखते है 
व्यक्ति जल्दबाजी में मात्र सांकेतिक दृष्टि से दाहिने हाथ को सिर की उंचाई तक लेकर अभिवादन करता है
इसका उपयोग तब किया जाता है 
जब व्यक्ति किसी कार्य विशेष करने की और अग्रसर हो 
और उसके पास समयाभाव हो  
परन्तु शिष्टाचार वश  अभिवादन किया जाना भी आवश्यक हो और सामने वाला व्यक्ति महत्वपूर्ण भी नहीं हो
अभिवादन की सर्वश्रेष्ठ शैली चरण स्पर्श की होती है  
जो सदा अपने माता -पिता ,शिक्षक,अपने श्रध्देय व्यक्तियों के लिए प्रयोग में लाई जाती है
इस 
अभिवादन का व्यक्ति को बहुत सोच समझ कर उपयोग करना चाहिए  
क्योकि उत्तम श्रेणी के व्यक्तियों के चरण स्पर्श से जहा हमें ऊर्जा मिलती है 
वही अधम श्रेणी के चरण स्पर्श से हमारी आंतरिक ऊर्जा का नाश होता है
चरण स्पर्श के माध्यम से हम समर्थ एवं योगी पुरुषो से अपने कुण्डलिनी का जागरण करते है 
क्योकि चरण स्पर्श की मुद्रा में हमारा मस्तक और हाथ समर्थ व्यक्ति के चरणों में होते है 
और उनके हाथ हमारे सिर पर स्थित कुण्डलिनी के शीर्ष सहस्त्रार चक्र पर होते है 
जिससे हमारे भीतर  दिव्य शक्तिया जाग्रत होती है 
इसलिए समर्थ पुरुष को अनेक लोग चरण स्पर्श करते है
किन्तु वे अपना हाथ केवल सुपात्र व्यक्ति के सिर पर ही रखते है

Friday, May 18, 2012

पुरुषार्थी पुरुष विश्वामित्र का भगवान् परशुराम से सम्बन्ध

परशुराम भाग  - 5

भगवान् परसुराम एवम महर्षि  विश्वामित्र में परस्पर  क्या  सम्बन्ध हो सकता है   ?
आखिर वो दिन आ ही गया जिसके लिए नियति ने खेल  खेला था रिचिक पत्नी ने जो वर ऋषि से मांग था ऋषि द्वारा उस वर की पूर्ति अब होने ही वाली थी ऋषि ने शुभ महूर्त के दिन अपनी पत्नी से कहा  आज तुम्हारी सेवा के फल स्वरूप तुम्हारे वर को पूरा करने के लिए मैं आज एक महान यज्ञ का अनुष्ठान करूंगा  तुम अपनी माँ के साथ इस यज्ञ मैं आहुति दोगी  तूम यज्ञ के लिये तेयार हों जाओ .
ऋषि ने महायज्ञ शुरू किया रिचिक पत्नी और और उनकी साँस  ने इस यज्ञ मैं आहुति दी  यज्ञ समाप्त हुआ यज्ञ समाप्त होने के पश्चात रिचिक ने प्रसाद स्वरूप चरु बनाया ( चरु - चावल , दूध , पञ्चमेवों से बनी खीर ).
और उस चरु को दो भागो मैं बराबर विभाजित कर दिया एक भाग अपनी पत्नी के लिए और दूसरा भाग अपनी सांस  के लिए रखा , रिचिक ने अपनी पत्नी से बोला देखो यज्ञ के प्रसाद स्वरुप ये चरु मैंने तुम्हारे 
और माता जी के लिए बनाया हैं ध्यान रखना दाया वाला पात्र तुम्हारे  लिए हैं और बाया वाला पात्र माता जी के लिए है  इस बात का ठीक से  ध्यान रखना रिचिक इतना कहकर कुछ  आवश्यक काम से कुछ देर के लिए आपनी कुटी मे चले गये  रिचिक पत्नी चरु लेकर अपनी माँ के पास पहुची।
माँ उन्होंने ये प्रसाद दिया है इसे आप ग्रहण कीजिये जब माँ  ने देखा की पुत्री उन्हें बड़ी सावधानी से चरु दे रही हैं  तो उन्होंने प्रश्न  किया क्या बात हैं बेटा दोनों चरु मैं कुछ अंतर हैं क्या ?
पुत्री ने कहा नही माँ ऐसी कोई बात नही हैं पर उनकी आज्ञा  हैं की मैं आप को ध्यान से बायाँ पात्र ही दूँ .

माँ ने कहा मुझे  ऐसा  लगता हैं की जमाई जी ने तुम्हारे लिए विशेष चरु बनाया हैं जिसके  पीने से तुम्हें उतम संतान की प्राप्ति होगी , ओर शायद मेरे लिए साधारण चरु बनाया है आखिर तुम उनकी पत्नी हो ,  माँ ने कहा देखो पुत्री तुम्हारा चरु मुझे दे दो आखिर तुम्हारे भाई को राजा होना हैं  माँ के अत्यधिक आग्रह करने पर पुत्री ने चरु बदल लिए दोनों ने प्रसाद लिया इतने मैं रिचिक आ गये  पत्नी का मुख देख कर वो सब समझ गये उन्होंने बोला मैने जों चरू तुम्हारे लिए दिया था वों ज्ञान और ब्राहमण  तत्व का प्रतीक था।
और जो चरु मैंने माता जी के लिए दिया था  वो युद्ध  वीरता ,शोर्य का प्रतीक था जो राजा के अनिवार्य गुण हैं परन्तु अब ठीक इसके विपरीत होगा रिचिक पत्नी ने कहा मेरा पुत्र और युद्ध क्रपा करे स्वामी  मैं ऐसा नही चाहती मुझसे गलती हो गई कुछ तो उपाए करे।  पत्नी के बार बार  आग्रह करने पर रिचिक ने चरु  का प्रभाव बाँट  दिया फल स्वरूप रिचिक के पुत्र स्वरूप जम्दागनी और जम्दग्नी के पुत्र के रूप मैं परशुराम जी का जन्म हुआ। और रिचिक पत्नी के भाई के स्वरूप विस्वामित्र का जन्म हुआ 
जो बाद मैं चरु के प्रभाव से  क्षत्रिय राजा होने पर भी तप कर ब्रहामण हूए .
जमदाग्नि के पूत्र  परशुराम जी  जो ब्रह्मिन होते हुए भी अपने युद्ध कोशल से क्षत्रिय धर्म का निर्वहन किया और 
इक्कीस बार धरती को दुष्ट हेहयक्षत्रिय राजाओ से विहीन कर दिया जो की अधर्म के स्वरूप थे और अपने बल से धरती को कष्ट दे रहें थे।
यदि सभी वर्ग व्यवस्था के अनुरूप अपने अपने धर्म का निर्वाह करे और एक दुसरे का सम्मान करे तो यही सम्पूर्ण धरा के लिए कल्याणकारी होगा धर्म होगा .

( विश्वामित्र जी  जमदागनी  ऋषि की माता के भी थे और परशुराम जी जमदागनी और रेणुका के पुत्र थे)

"जब जब होत धर्म की हानि बडत अधम असुर अभिमानी तब तब प्रभु धरी विविध शरीरा हरही हरी भव सज्जन पीरा"
जब जब धर्म की हानि होती हैं तब तब  ईश्वर भिन्न भिन्न रूपों मैं जन्म लेता हैं और सज्जनों की पीड़ा को हरता हैं (अधर्म का नाश कर और धर्म की स्थापना कर)  . 

सीता एवं तत्व ज्ञान


सीता कौन है ?
सीता शुभकामनाये ,सद इच्छाये,सदभावनाये है
सद प्रव्रत्तिया है।
सीता का जन्म कहा और  कैसे होता है?
सीता का जन्म विशुद्ध आहार,विहार से पोषीत विशुद्ध देह अर्थात  विदेह 
मे विराजमान आत्मा  मे होता है
लक्ष्मण रेखा क्या है ?
दुष्प्रव्रत्तियो से सदप्रव्रत्तियो को दूर रखने हेतु 
सत  संकल्प रूपी लक्ष्मण द्वारा दृढ़ता  पुर्वक  खिची गई रेखा है।  
दुष्प्रव्रत्तियो के दशानन जो काम क्रोध लोभ ,अभिमान ,के रुप मे होता है
और  जो अविवेक रुपी पुष्पक विमान पर सवार होकर से सीता रुपी
सदप्रव्रत्तियो का हरण करना चाहता है
सीता रुपी सदप्रव्रत्तिया से श्रीराम रूपी ईश्वरीय तत्व से  मिलन  ही
सीता एवम श्रीराम विवाह है।
जिस प्रकार से सीता की खोज मे श्रीराम वन- वन भटकते है
उसी प्रकार सदप्रव्रत्तियो मे रमण करने वाले सतपुरुषो की खोज
सदा श्रीराम रूपी ईश्वरीय तत्व को रहती है
जिस प्रकार सीता जी ने प्रतिकुल परिस्थितियो मे वन मे वाल्मिकि ,लंका मे त्रिजटा
के श्रेष्ठ विकल्प दृढ़  संकल्प प्राप्त किया थे।
उसी प्रकार से सद प्रव्रत्तिया प्रतिकुल परिस्थितियो मे सत्संग ,सज्जन,सदविचार,सद साहित्य ,स्वाध्याय ,साधना
का साथ प्राप्त करने को उत्सुक रहती है