Total Pageviews

Sunday, July 19, 2015

पंचमुखी हनुमान

हनुमान जी के कितने ही रूप है 
बाल रूप रणवीर रूप  संजीवनी स्वरूप 
परन्तु हनुमान  जी का पंचमुखी स्वरूप अदभुद  है 
अनुपम  है ऊर्जावान और प्रेरणादायक  है
पंचमुखी हनुमान जी के दिव्य स्वरूप के दर्शन करने से जीवन में अद्भुत ऊर्जा का संचार होता है
जीवन प्रेरणा से ओत प्रोत हो जाता है 
अकर्मण्यता के रोग से व्यक्ति मुक्त हो जाता है 
व्यक्ति प्रत्येक प्रकार के कार्य करने को 

तत्पर और उद्यत रहता है
पंचमुखी हनुमान जी के पांच मुख के साथ हनुमद बैठक
 हमें जीवन में प्रत्येक प्रकार की कार्य का 
दायित्व उठाने की प्रेरणा देती है 
  व्यक्ति को अपने कार्य क्षेत्र में कैसी भी हो 
भूमिका का स्वीकार कर लेनी चाहिए
 कभी किसी कार्य को छोटा या तुच्छ मानकर 
कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए
जो व्यक्ति सदैव कार्य करने हेतु तत्पर रहता है 
उसकी सफलता में कोई संदेह नहीं रहता है

Thursday, June 18, 2015

परिचय

मित्रता  प्रेम या आत्मीयता हो 
इन सभी का रास्ता परिचय से होकर  गुजरता है
अनजान अपरिचित अजनबी लोगो से परिचय निकालना 
हर किसी के लिए सहज सरल नहीं है
जो व्यक्ति चिर परिचित व्यक्तियो के बीच कार्य करने का आदि होता है
 वह स्वभाव से कूप मंडूक मानसिकता का होता है 
निरन्तर अपरिचित लोगो के बीच रह कर अपनी आजीविका चलाना 
एक चुनोति पूर्ण कार्य है 
परन्तु कुछ लोग जो इस प्रकार के रोजगार से जुड़ जाते 
धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लग जाता है 
परिचय का प्रारम्भ संवाद से शुरु  होता है
अपरिचित लोगो से कैसे संवाद बिना किसी सन्दर्भ के कैसे 
स्थापित करना यह एक कला है 

Saturday, June 13, 2015

भय

भय दो प्रकार के होते है
 पहला वास्तविक भय दूसरा काल्पनिक भय 
व्यक्ति जितना अधिक भयभीत
 काल्पनिक भय से रहता है
 उतना भयग्रस्त वास्तविक भय से नहीं रहता काल्पनिक भय के कारण
 व्यक्ति के मनो मस्तिष्क में पलने वाली 
तरह तरह की आशंकाए 
तथा व्यर्थ के भ्रम होते है |
काल्पनिक भय व्यक्ति की
 उस मानसिक अवस्था का परिणाम होता है 
जो लंबे समय की निराशा तथा उससे उत्पन्न अवसाद है इस कारण व्यक्ति संभावित् दुष्परिणामो की 
कल्पना करता रहता है 
विश्व जितने भी तंत्र मन्त्र प्रेत बाधा की जो मान्यताये है ज्योतिष भविष्य वक्ताओं के कर्मकाण्ड है 
उनका मूल काल्पनिक भय है

Sunday, May 24, 2015

एक था हीरालाल

हीरालाल का पूरा जीवन जन सेवा एवम् राष्ट्रसेवा में बीता शासकीय सेवक रहते भी वह अपने कर्मचारी भाइयो मदद में लगा रहता था पत्नी की मृत्यु और मातृविहीन एक पुत्री और दो पुत्रो की परवरिश ने उसको समझोता परस्त बना दिया था जीवन में उसके
समस्या सुलझाने के तरीके अनोखे थे वह जैसे ही समस्या सुलझाने के लिए आगे बढ़ता समस्याएं और गहराती जाती हीरालाल इन सभी चीजो से बेफिक्र हो
अपनी कथित राष्ट्र सेवा में लगा रहता हीरालाल एक विशेषता थी की वह सदा उस व्यक्ति के साथ खड़ा रहता जो जीवन में किसी न किसी कारण असफल हो गया हो  इसे हीरालाल की सदाशयता कहे या जीवन के प्रति अव्यवहारिक दृष्टिकोण इससे हीरालाल को कोई प्रभाव नहीं पड़ता चरैवेति चरैवेति का मन्त्र का जप करते अपने चुने रस्ते पर चलता रहता आज हीरालाल अपने जीवन के पच्चाहत्तरवे  बसंत को पूर्ण कर चूका है परन्तु परेशानिया और जिम्मेदारिया बढती ही जा रही है आलोचक हीरालाल की इस दशा का उत्तरदायी उसे ही मानते है कि हीरालाल ने उन जिम्मेदारिया भी ओढ़ ली जिसे ओढ़ लेना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं है परन्तु हीरालाल अपनी धुन पक्का है उसकी मान्यताये धारणाये को ध्वस्त करना इस उम्र में संभव नहीं है

Saturday, May 23, 2015

सपना का त्याग

सपना मध्यमवर्गीय परिवार की लाडली लड़की थी कुशाग्र बुध्दि की बालिका परिवार के प्रति अपने दायित्व को भली भाँती समझती थी माता पिता और तीन छोटी बड़ी बहनो सहित एक भाई का सुखी और संतोषी परिवार के बीच सपना स्वयम को पा अपना जीवन धन्य समझती थी शिक्षा पूरी होने के बाद सपना एक शासकीय कार्यालय में लिपिक का पद पा चुकी तो परिवार में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई  सपना जैसी सुयोग्य कन्या पाकर कौन माता पिता ऐसे है स्वयं को भाग्यशाली नहीं समझते धीरे धीरे सपना पर बहनो की शादी का दायित्व भाई के पढ़ाई की जिम्मदारी भी आ गई  पंद्रह साल कैसे बीत गये पता ही नहीं चला सभी बहनो की शादिया हो चुकी थी भाई भी ग्रेजुएट हो चुका था पर कुछ बचा था तो वह सपना का अविवाहित दायित्वों से भरा जीवन और बूढ़े माता पिता

रतिराम का प्रायश्चित्त

रतिराम एक अच्छी नोकरी  पा चूका था I
सुन्दर पत्नी दो नन्हे प्यारे बच्चे सरकारी मकान
और नई नवेली मोटर सायकिल खुशहाल जीवन
रतिराम के तीन भाई और थे रतिराम खर्च करने में बहुत उदार था 
परिवार का सबसे बड़ा भाई होने के नाते छोटे भाईयो  को आर्थिक रूप से स्वालम्बन बनाना वह अपना दायित्व समझता था | पिता अत्यंत निर्धन गाव के सीधे साधे व्यक्ति
मंदिर से घर घर से चाय की दूकान उनकी दिनचर्या बन चुकी थी |आखिर रतिराम जैसा कमाऊ पूत जो पाया था |
धीरे धीरे रतिराम का सारा ध्यान अपनी पत्नी बच्चों से हट सारा ध्यान अपने भाईयो की और चला गया |
आज बीस साल हो गए रतिराम बहुत खुश था |अपने सभी भाइयो को आत्म निर्भर देख कर भाइयो की पत्नी और बच्चों को खुशहाल देख कर पर अगर कुछ नहीं उसके पास तो वे उसके छोटे छोटे बच्चे जो हो गए थे बड़े बिना पिता के सरंक्षण के खो चूका था रतिराम अपनी पत्नी का स्नेह और बच्चों का सानिध्य ||बची थी रतिराम के पास प्रायश्चित्त कि वह भावना कि काश वह भी अपने बच्चों की और दे पाता तो उसने भी पाये होते कमाऊ पूत

Wednesday, May 20, 2015

उत्तम वस्तु और दृष्टिकोण

कई बार हम अपने दिमाग में किसी वस्तु के बारे में क्रय किये जाने का संकल्प करके बाजार जाते है दुकान में प्रवेश करने के बाद विक्रेता हमारी मन पसंद वस्तु बताते हुए कहता है कि बाबूजी आप भले ही अपनी मन पसंद वस्तु खरीद लेना परन्तु एक नई वस्तु भी मै बताना चाहुगा पसंद आये तो विचार कर लेना जैसे ही विक्रेता हमें वह वस्तु बताता है देखते ही हम वह वस्तु भूल जाते है जिस वस्तु को खरीदने की मानसिकता बना कर आये थे  यह एक तरफ तो दूकानदार की विक्रय करने की कुशलता का द्योतक है वही दूसरी और हमारी सीमित सोच और वास्तविक तथ्य में भिन्नता दर्शित करता है जरुरी नहीं की उत्तम वस्तु वह हो जो जिसको हम पसंद करते है हो सकता है की सर्वोत्तम वह हो जिसके बारे में हम जानते नहीं है