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Wednesday, November 5, 2014

सहयोग या सहानुभूति

सहानुभूति बहुत अच्छा भाव है जो मानवीय  भावना को प्रगट करता है
परन्तु अतिरिक्त  सहानुभूति व्यक्ति को कमजोर और भावुक बना देती है
इसी कमजोरी का धूर्त लोग फायदा उठा लेते है
जिस व्यक्ति को किसी के भी सहानुभूति नहीं मिलती वह भीतर से ताकतवर बन जाता है
भीतर की ताकत व्यक्ति की विषम परिस्थितियों में टूटने नहीं देती
इसलिए अतिरिक्त सहानुभूति प्रगट करने वाले व्यक्तियो से 
 सावधान  रहो 
याद रखो हमे किसी की दया या सहानुभूति की आवश्यकता नहीं अपितु सहयोग की आवश्यकता है 

Saturday, October 25, 2014

दीपावली कब सार्थक है

जहा आत्मीयता समाप्त हो जाती है 
वहा ओपचारिकता प्रारम्भ होती है 
आत्मीयता पूर्ण सम्बन्ध निश्छल व्यवहार की आशा रखते है 
कृत्रिम रूप से धारण की गई मधुरता से 
आत्मीय रिश्ते कभी विकसित नहीं किये जा सकते है 
दीपावली और होली जैसे त्यौहार रिश्ते में
 आत्मीयता जाग्रत करने के पर्व है 
जिन रिश्तो में संवाद समाप्त हो चुके है
 उनके बीच संवाद के सेतु बनाये रखने के पर्व है 
वर्तमान में जहा कुछ रिश्ते केवल नाम के रह गए है 
रिश्तो के नाम पर रिश्तो के शव रह गए है 
वहा थोड़ा सा संवाद ही मृत रिश्तो में प्राण फूंक देता है 
दीपावली के फटाके तो रिश्तो में जागृत लाने के प्रतीक है 
मन से सभी प्रकार के भय दूर कर देने का प्रयास है 
इसलिए त्यौहारो में निहित भाव को हम समझ पाये तो
 हमारे त्यौहार सार्थक है 
रिश्तो के भीतर की ऊष्मा को संवाद से बचा पाये तो 
दीपावली सार्थक है  

Tuesday, September 23, 2014

कृतज्ञता

यदि हम किसी के उपकार को याद कर पाये तो 
हम उस व्यक्ति के कृतज्ञ है जिसने हमें उपकृत किया है
 कृतज्ञता   के धरातल पर मनुष्यता पलती  है 
कृतज्ञ  होना अच्छे मनुष्य का लक्षण है 
कृतज्ञता से हम किसी व्यक्ति के ऋण से उऋण हो सकते है 
जिस व्यक्ति में कृतज्ञता का भाव नहीं है 
वह किसी प्रकार की संवेदना और दया का पात्र नहीं है 
संसार में बहुत से ऐसे लोग है 
जो किसी भी व्यक्ति के द्वारा किये  
उपकार को भूल जाते है 
और उसी व्यक्ति की आलोचना करने लगते है 
जिन्होंने बहुत सारे उपकार किये है 
ऎसे लोगो को कृतघ्न कहा जाता है
 दूसरी बार कोई व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर 
कृतघ्न व्यक्ति  की कोई सहायता नहीं करता है
माता पिता  से कृतघ्न पुत्र कपूत कहलाता है 
 गुरु से कृतघ्न शिष्य को ज्ञान भले ही ग्रहण कर ले 
परन्तु गुरु का आशीष नहीं मिलता 
प्राप्त ज्ञान का उपयोग नहीं कर सकता
देश की माटी से कृतघ्न व्यक्ति देश द्रोही 
 आश्रय दाता  से कृतघ्न व्यक्ति विश्वासघाती कहलाता है 
संसार में जो उपकार की  भावना  जो समाप्त हो रही है 
उसका सबसे प्रमुख कारण  कृतघ्नता है
इसलिए जीवन में जिसने भी 
हमारा थोड़ा सा भी उपकार किया है
 उसके प्रति कृतज्ञ अवश्य  रहे


Tuesday, September 9, 2014

प्रीती में आलोक आनंद है

प्रेम के भीतर ईश्वर   है 
इस सच्चाई को जानने के बावजूद 
विशुध्द प्रेम की अभिव्यक्ति को 
कोई स्वीकार नहीं करता 
प्रेम के भीतर 
किसी न किसी   प्रकार की मिलावट 
सभी को चाहिए 
प्रेम विशुध्द  हो तो करुणा पिघलती है 
करुणा में माँ और मानवता है 
संवेदना को  तरलता मिलती है
 मानवीय व्यवहार की सरलता  सच्ची पूजा है 
 प्रेम  के ढाई अक्षर में अद्भुत ऊर्जा है
 प्रीती की दीप्ती पाकर प्रतिभाये उभरती  निखरती है 
प्रीती  में आलोक आनंद है ईर्ष्या कहा ठहरती है

Wednesday, September 3, 2014

हर तालिका तीज व्रत

हर तालिका तीज व्रत सहित कई व्रत कन्याये 
शिव सामान पति पाने की मनोकामना लिए करती  है 
विवाहित महिलाये अपने पति की दीर्घायु के लिए 
शिव को प्रसन्न करने के लिए करती  है 
स्त्रीया शिव सामान पति क्यों चाहती है ?
जबकि शिव जी तो तपस्वी श्मशानवासी है 
शिव के सामान पति प्राप्त करने  से स्त्रीयो को 
उसी प्रकार शक्ति प्राप्त होती है 
जिस प्रकार से माँ पार्वती को प्राप्त हुई थी 
 माँ पार्वती शक्ति स्वरूपा है 
शिव जैसा पति प्राप्त करने का आशय यह है 
की स्त्रियों को पार्वती सामान संतान सुख की प्राप्ति होती है 
शिव के पास धन नहीं था परन्तु वे जब चाहते थे 
 तब धन के देव कुबेर उनकी सेवा के लिए तैयार हो जाते थे 
शिव आराधना से स्त्रीयो को उसी प्रकार से 
अनुचर और सेवक प्राप्त होते है 
जिस प्रकार से माँ पार्वती  को शिव के गण प्राप्त थे


Saturday, August 23, 2014

जितेंद्रीय

व्यक्ति  की कार्य क्षमता  का थकान से 
बहुत गहरा सम्बन्ध होता है 
व्यक्ति थकता क्यों है?
 व्यक्ति या तो बहुत अधिक परिश्रम से थकता है 
या व्यक्ति थकता इसलिए है की 
उसे सम्बंधित कार्य को करने में रूचि नहीं होती 
व्यक्ति को रूचि के अनुसार कार्य करने का अवसर मिले तो 
उसे किये गए कार्य से 
थकान के स्थान पर ऊर्जा प्राप्त होती है 
 जिस व्यक्ति को संगीत में रूचि नहीं उसे संगीत 
सुनने  और जिस व्यक्ति को पढने में रूचि नहीं 
उसे किताब पढने से थकान अनुभव होने लगती  है 
थकान का तन से अधिक मन से सम्बन्ध होता है
 इसलिए थकान भरी अवस्था से मुक्ति पाना हो तो 
हमें अपनी रुचियों में परिवर्तन करना होगा
 या तो हम अपनी वृत्ति के अनुरूप अपनी रूचि बदल ले 
या हम अपनी रूचि के अनुसार अपनी वृत्ति का चयन कर ले
 जितना कठिन व्यक्ति का अपनी रूचि में परिवर्तन है
 उससे अधिक कठिन अपनी रूचि के अनुसार 
वृत्ति या आजीविका का सफलता पूर्वक चयन कर लेना है
 सबसे बेहतर है कि
 हमें अपना स्वभाव अपनी वृत्ति के अनुरूप विकसित करना होगा
यह संभव तभी हो पायेगा 
जबकि हमारा अपनी इन्द्रियों पर संयम हो 
जिसका अपनी इन्द्रियों पर संयम होता है 
वह जितेंद्रीय कहलाता है

Monday, August 4, 2014

शक्ति पीठ की ऊंचाई का रहस्य

हमारे पूर्वजो ने देवीयो के शक्ति पीठ 
ऊँचे पर्वत की चोटियों पर क्यों बनाये है 
क्योकि ऊँचे पर्वत की चोटियों पर चढ़ने में
 अधिक शक्ति की आवश्यकता होती है 
देव स्थान सहज गम्य स्थान पर स्थित हो तो 
मनुष्य को उसका मूल्य ज्ञात नहीं होता है 
व्यक्ति की प्रवृत्ति रहती है की वह उसी स्थान 
और प्रतीकों की और भागता है जो दुर्लभ हो 
प्रत्येक व्यक्ति में शक्ति होती  है 
परन्तु व्यक्ति को अपने भीतर छुपी शक्ति का 
अहसास नहीं होता 
भीतरी शक्ति का अहसास व्यक्ति को 
तभी होता है 
जब अतिरिक्त परिश्रम की आवश्यकता होती है 
पर्यटन के स्थान हो या तीर्थ स्थल 
वे अधिक चहल पहल भरे होते है 
जो अधिक दूर हो दुर्गम राहो से भरपूर हो 
ईश्वरीय तत्व की अनुभूति भी एकांत में होती है
 सहज  रूप मानव रूप में उपलब्ध ईश्वरीय अवतार 
श्रीराम और श्रीकृष्ण का किसने महत्व जाना था