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भगवान् विष्णु ,माता महालक्ष्मी ,एवम शिव शंकर महादेव तथा कुबेर देव केमध्य परस्पर संबंधो के विषय में चिंतन किया आवश्यक है
यह विषय आज तक अछूता रहा है
आखिर इन सभी देवताओं में परस्पर क्या सबंध है
सर्वप्रथम लक्ष्मी जी की प्राप्ति हेतु कर्म किया जाना होता है
भगवान् विष्णु जो कर्म के देवता है
कर्म एवम पुरुषार्थ किये जाने पर धन की प्राप्ति अर्थात महालक्ष्मी की कृपा होती है
किन्तु यदि ऐसा ही है हम बहुत से ऐसे लोगो को इस जग में देखते है की जो निरंतर कर्मरत रहते है फिर भी वांछित सम्पन्नता प्राप्त नहीं कर सकते है
कर्म कर वांछित सम्पन्नता कैसे प्राप्त की जा सकती है इस बिंदु कर पर श्री सूक्त का यह मन्त्र प्रकाश डालता है
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥
अर्थात हे सूर्य के सामान कांति वाली आपके तेजोमय प्रकाश से बिना पुष्प के फल देने वाला एक वृक्ष विशेष उत्पन्न हुआ तदनन्तर आपके हाथो से बिल्व वृक्ष उत्पन्न हुआ उस बिल्व वृक्ष का फल मेरे बाह्य और आभ्यंतर की दरिद्रता नष्ट करे
आखिर बिल्व के वृक्ष से लक्ष्मी जी अर्थात सम्पन्नता का क्या सम्बन्ध है
सूक्ष्मता से देखे तो बिल्व वृक्ष के पत्ते को अर्पित किये जाने से मात्र से भगवान् शिव प्रसन्न होते है
बिल्व वृक्ष के पुष्प विहीन होना और उसके फल को धारण करने का आशय यह है की कर्म के द्वारा अर्जित धन को उसी प्रकार से धारण करना चाहिए
जिस प्रकार पुष्प विहीन बिल्व फल को धारण किया जाता है
अर्थात
जीवन अनावश्यक वैभव प्रदर्शन किये व्यतीत किये जाना चाहिए
ठीक उसी प्रकार से जैसे शिव शम्भू अनावश्यक आडम्बर से सदा नैसर्गिक रूप से विचरण करते है
इसीलिए शिव उपासको को भी लक्ष्मी जी की कृपा मिलती है
धन का मितव्ययिता पूर्वक उपयोग किये जाने से कुबेर देव भी प्रसन्न होते है इसलिए दीपावली के अवसर पर कुबेर देव की अर्चना का महत्त्व है
महालक्ष्मी धन वर्षा कर सकती है
कितु धन को संचित रहे यह उपाय
भगवान् महादेव के जीवन का अनुशरण करते हुए कुबेर देव जैसी संचय की भावना से किया जाय
तो व्यक्ति को स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है
ऐसा व्यक्ति कभी भी दरिद्र नहीं हो सकता है

उपरोक्त वीडियो बिल्वामृत्तेश्वर महादेव धर्मपुरी जिला-धार रेवा गर्भ संस्थान का है जो माँ नर्मदा के मध्य बसे टापू पर स्थित है कहा जाता है की यहाँ पर स्थित शिवलिंग उसी स्थान पर विद्यमान है जहा राजा रंतिदेव ने बिल्व-पत्रों के माध्यम से शिव जी को प्रसन्न करने हेतु अनुष्ठान किया था इस टापू पर महर्षि दधिची की भी समाधि है जिनके बारे में कहा जाता है की उनकी अस्थियो से बने वज्र से इंद्र ने वृत्तासुर का वध किया था

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